बंगाल हिंसा: दस्तावेजों से गायब हैं रेप, हत्या की 1000 से अधिक FIR, एनएचआरसी की रिपोर्ट में खुलासा

03 अगस्त, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
कोलकाता उच्च न्यायालय में घिरी ममता सरकार

पश्चिम बंगाल राज्य में विधानसभा चुनावों के उपरांत हुई भीषण हिंसा को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta HC) में कई याचिकाएँ दायर की गई हैं। विभिन्न अवसरों पर हुई देरी के बाद न्यायालय द्वारा अंततः इस मामले में दलीलें सुनी गईं।

मामले को लेकर सोमवार (2 अगस्त, 2021) को कई वरिष्ठ वकील जैसे जे साई दीपक, महेश जेठमलानी, पिंकी आनंद और प्रियंका टिबरेवाल ने कोलकाता उच्च न्यायालय की पाँच जजों की बेंच के समक्ष अपने तर्क प्रस्तुत किए।

बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद पूरे मई माह एवं जून में भी राज्य में भीषण हिंसा हुई। इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं और संघ के स्वयंसेवकों की हत्याएँ की गईं। राज्य में कई महिलाओं के बलात्कार के मामले सामने आए थे।

राज्य में हुए उपद्रव को देखते हुए नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) को राज्य में भेजा गया था। एनएचआरसी ने मामलों की राज्य से बाहर जाँच की बात कही थी।

एनएचआरसी ने सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस को घटनाओं को लेकर फटकार भी लगाई थी और मामलों की सीबीआई जाँच की सिफारिश की थी।


1000 से अधिक मामले दस्तावेजों से गायब

एनएचआरसी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोलकाता उच्च न्यायालय के सामने वकील महेश जेठमलानी ने राज्य में हुए दंगों के विषय में कहा था कि पुलिस ने राज्य की शिकायतों को कम कर दिया एवं कई पीड़ितों को अपनी शिकायतें वापस ले लेने की भी धमकियाँ दीं। जेठमलानी ने आगे तर्क दिया:

“एनएचआरसी की रिपोर्ट आने के बाद यह सामने आया है कि पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ने पुलिस प्रशासन का बचाव किया है, जबकि पुलिस प्रशासन द्वारा निष्पक्ष जाँच करने की बजाय पीड़ितों की शिकायतें कम की गई।”

एनएचआरसी के अनुसार कुल 52 हत्या के मामले हुए, परंतु पुलिस ने केवल 29 की शिकायत दर्ज की है। राज्य में बलात्कार के मामले और भी गंभीर हैं, जहाँ पुलिस के अनुसार राज्य में कोई बलात्कार नहीं हुआ वहीं, एनएचआरसी की रिपोर्ट कहती है कि 14 बलात्कार के मामले एवं 79 से अधिक यौन अपराध हुए हैं।

राज्य में कुल 3384 वारदातें हुईं, जिनमें राज्य प्रशासन ने 1356 वारदातों को झूठा करार दे दिया। हज़ार से अधिक मामले पुलिस प्रशासन ने दर्ज ही नहीं किए। जेठमलानी ने आगे कहा कि अगर राज्य प्रशासन ने अपना कार्य ठीक से किया होता तो न्यायालय तक यह मामला लाने की आवश्यकता ही न होती।

वरिष्ठ वकीलों जे साई दीपक ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए तर्क दिया कि राज्य द्वारा एनएचआरसी की जाँच पर लगातार सवाल उठाए गए हैं एवं उनके विरुद्ध डाली गई हर जनहित याचिका राजनीति से प्रेरित है। साई दीपक ने आगे कहा:

“पश्चिम बंगाल राज्य में संवैधानिक तंत्र एक व्यवस्थित रूप से तोड़ा गया है। राज्य एनएचआरसी पर आक्षेप लगा रहा है। इसके द्वारा प्रशासन किस पर आक्षेप कर रहा है? न्यायालय पर?”



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