अजीत भारती को कड़वा सच क्यों नहीं बोलना चाहिए?

16 सितम्बर, 2021 By: आनंद कुमार
अजीत भारती का सुप्रीम कोर्ट पर किया गया व्यंग्य 'अवमानना' कैसे?

अभी हाल ही में हमने प्रधान सेवक महोदय की बात पर गौर तो किया ही है। अब तो हम लोग सीधे-सीधे अपाहिज या विकलांग जैसे शब्दों से भी परहेज करते हैं। ‘दिव्यांग’ शब्द प्रयोग करते हैं। ऐसे में किसी प्रेम दिवस के फैक्ट चेकर को गंजा या उसके किसी यौन दुराचार के अभियुक्त चेले को पंचर पुत्र, झबरा बुलाया जाना कहाँ से उचित होता है।

माना कि किसी छात्र नेता ने ‘सैराट’ फिल्म की सीडी देने के बहाने लड़की को कमरे में बुलाकर बलात्कार किया था, लेकिन इतने के लिए हम उसकी पार्टी ‘आइसा’ को ‘आल इंडिया सेक्सुअल अस्सौल्टर्स’ बुलाना तो नहीं शुरू कर देते न? करते हैं क्या? कोई दूसरा तथाकथित छात्र नेता अगर महिला छात्रावास के सामने अश्लील हरकतें कर भी रहा था तो इसके लिए उसे ‘लिंगलहरी’ बुलाना तो ठीक नहीं।


सच कड़वा हो सकता है। सच लोगों से हजम न हो ऐसा भी हो सकता है। बचपन में जो संस्कृत सुभाषित पढ़ाए जाते थे उनमें कहा जाता है ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात’, यानि सत्य बोलो प्रिय बोलो लेकिन इसके साथ ही सिखा दिया जाता था – अप्रियं सत्यं कदापि न ब्रूयात।

अब पुराने जमाने में जो सिफलिस जैसे गुप्त रोग होते थे, उनकी वजह से बाल गुच्छों में झड़ने लगते थे। पुराने जमाने के फिरंगी दौर वाले ‘मी-लहसुन’ के सर पर जो अजीब से घुंघराले बालों वाला विग दिखता था वो उसी को छुपाने के लिए पहना जाता था। लुइ तेरहवें के दौर में ये फैशन में आया और पेरिस में तो 1673 में जहाँ 200 विग बनाने वाले थे, वहीं 1765 आते-आते विग बनाने वालों की गिनती बढ़कर 835 हो गई थी।

ऐसे में आप ‘घुंघराले बालों के गुच्छे’ कहकर किसी गुप्त रोग के अप्रिय सत्य को उजागर करें, ये कहाँ तक ठीक है? वैसे तो पुराने जमाने जैसी बात नहीं रही, सिफलिस का इलाज भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में किसी गुप्त रोग के अप्रिय सत्य की ओर इशारा करना निंदनीय है!

जहाँ तक भाषा की सुचिता का प्रश्न है, एआईबी में फ़िल्मी सितारों की बातों पर तालियाँ बजाने के अलावा, नारीवादी तो ऐसी भाषा के विरोधी रहे ही हैं। वैसे भी शुद्ध शाकाहारी, मदिरापान-धूम्रपान निषेध वाले, एकपत्नी व्रत धारकों अथवा अखंड ब्रह्मचारियों वाले संस्कारी एवं विराट हिन्दू राष्ट्र में गाली-गलौच की कितनी जगह है? सीधे-सीधे अपशब्दों का प्रयोग करने के बदले ‘जन्म को अनुसन्धान का विषय’ भी तो बताया जा सकता है।

इंस्टिट्यूशनल बर्थ के मामले में डॉक्टर-नर्स को पता होता है, ना भी हो तो दाई को पता होता है कि व्यक्ति की माँ कौन है। आधे घंटे बाद पता चलता कि बाप कौन है ये शोध का विषय, ढूँढने लायक प्रश्न है, तो ये गाली भी हो सकती है। क्या जरूरत थी सीधे-सीधे शब्दों के प्रयोग की?

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ‘मी-लहसुन’ की ‘जज्बात आपा’ या ‘सेंटिमेंट सिस्टर’ को आहत करना ठीक नहीं है। कोई काला हिरण हैजे से मरा होगा, या सड़क के किनारे सोए चार-छः तथाकथित अल्पसंख्यकों की मौत किसी नशेड़ी की गाड़ी से कुचले जाने के कारण नहीं, केवल अप्राकृतिक कारणों से हुई होगी, ऐसा मान लेने में हर्ज क्या है?

औसत मुक़दमे भी 12-14 साल चलते हैं, लेकिन किसी पुरानी फिल्म का ‘तारीख पर तारीख’ याद दिला देना तो ठीक नहीं है। बोलना ही है तो विधायिका के बारे में बोलिए, कार्यपालिका के बारे में बोलिए, पत्रकारिता के बारे में बोलने की कोशिश कर लीजिए।

पटना की किसी हाईकोर्ट में आम लोगों के घुसने का दरवाजा अलग और जज साहब के लिए ख़ास दरवाजे में आप आम और ख़ास के बीच अंतर कैसे ढूँढ सकते हैं? किसने आपको ये कहने का अधिकार दे दिया कि अदालतों में दिव्यांग जनों के लिए लिफ्ट न होना भी एक आम आदमी को न्याय से वंचित करना है?

यू फ#%ग आम आदमी! सवाल करता है! इसकी सजा मिलेगी… बराबर मिलेगी! सवाल करने वालों को मंसूर और सरमद की तरह पत्थरों से कुचल दिया जाना चाहिए। गैलेलियो की तरह उसे सजाएं मिलनी ही चाहिए।



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