दानिश सिद्दीक़ी मारा गया: जग में सब कहेंगे… रवीश जी, लानत की बना लो बत्ती… भुक-भाक

18 जुलाई, 2021 By: अजीत भारती
दानिश सिद्दीक़ी की मौत पर रवीश ने बंदूक़ को लानतें भेजीं

वो, जो सबसे रहमदिल है, दयालु है। वो, जिसने दानिश के दाहिने कंधे पर बैठे मच्छर से उसके कान में कहलवाया कि जा और हिन्दुओं की चिताओं की तस्वीरें लगा कर बदनाम कर दे, और उसने कर दिया। उसी करूणा के सागर ने, उसी नेक और रहमदिल ने फोटोग्राफर को कहा कि बेटे, ओ बेटे मौज कर दी, ओ बेटे मौज कर दी… बेटा तुम तो बड़े हैवी ड्राइवर निकले, मैंने तो सिर्फ एक दो चिताओं की लेने कही थी, तुमने तो ड्रोन-वोन लगा दिया… 

ऐसा कह कर उसने, जो सबसे रहमदिल है, जिसके कहने पर सूरज उगता है और धरती चपटी हो जाती है, जिसके कहने पर चाँद लालटेन से भी मंद पड़ जाता है, जो फूँकता है तो हवा चलती है, ज्वाइंट फूँकता हो तो ज्वालामुखी फटती है, जिसके नाक के बहने से समुद्रों में सुनामी आती है और जिसके बालों के डैन्ड्रफ से रेगिस्तान में बालू आते हैं, उसी नेक और रहमदिल, करूणा के सागर ने फोटोग्राफर के बाएँ कंधे पर बैठे मच्छर से कहा कि उसे सातवें आसमान पर भेज जहाँ से वो सिर्फ यूपी की ही नहीं, पूरे भारत में जलती चिताओं की तस्वीर लेगा, एकदम बर्ड आई व्यू में। 

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कहते हैं तालिबान ने उसे नहीं मारा, वो तो बिना स्पेस शूट के ऊपर चला गया तो साँस फूलने से मर गया क्योंकि उस वक्त रहमदिल आदमी माल फूँक रहा था। हवा फूँकना भूल गया तो हवा चली नहीं, फोटोग्राफर निपट गया। साहसी फोटोग्राफर था। मामूली बात है कि किसी का कोई अपना मरा हो, उसकी चिता जल रही हो और आप फोटो खींच कर साइट पर बेचने के लिए लगा दें। कितना साहस चाहिए आपको अंदाजा है? कितना बड़ा हृदय रहा होगा उस बीवी और बच्चे वाले फोटोग्राफर का जो बिलखते हुए परिजनों के नम आँसुओं को कैमरे में कैद कर के बेचने की बात सोच रहा होगा?

इस साहस की तो सराहना की जानी चाहिए और फोटोग्राफर के सम्मान में उसे उसके कैमरे सहित किसी कब्रिस्तान के मध्य बाँस डाल कर खड़ा कर देना चाहिए ताकि वो पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बने। बहुत सारे लोग दुखी हैं कि ऐसा विलक्षण, कट्टरपंथियों में सर्वोत्तम, हिन्दूघृणा के इंधन से संचालित फोटो पत्रकार मारा गया। कुछ ने कहा कि यार उसकी फोटो मत शेयर करो, कम से कम मौत में तो उसे सम्मान दो। मतलब, जिस आदमी के बच्चे उन्हीं चिताओं की तस्वीर बेच कर खरीदे हुए आटे की रोटी खा कर पल रहे हों, उसकी तस्वीर न दिखाने की बात करना विडम्बना को आत्मघाती जैकेट पहनाने जैसा है। मर जाएगी वो, चीखेगी वो, उसके दिमाग की नसें फट जाएँगी, आगे से कोई विडम्बना वाली बात नहीं कर पाएगा ब्रो, उसको जीवित रखो। 

तालिबान ने मारा, मतलब मुसलमानों ने मारा। मुसलमानों ने मुसलमान को मार दिया। इस बात पर मुसलमान कह रहे हैं कि वो हिन्दू की फोटो लेता था इसलिए लोग जश्न मना रहे हैं। पंचर साटने वालों को स्मार्टफोन देने से यही होता है। अबे, जा कर मुहल्ले में चचेरी बहन, बेटी के सीने को दबा कर उसकी ब्लाउज का नाप लो और सिलो, जिसमें तुम्हारी दक्षता सत्यापित है, ये कहाँ प्रबुद्ध जनों के बीच ट्विटर पर ज्ञान दे रहे हो। चोर चोरी छोड़ता है, तुम्बाफेरी नहीं। उसी तरह, पंचर साटने वाले अजेंडे का भी पंचर ही साटते दिखते हैं। 

जब तुम तालिबान, इस्लामी आतंकवाद, इस्लामी साम्राज्यवाद के अलावा हिन्दुओं, योगी, मोदी, फासीवाद, स्कोडा, लहसुन सब को दानिश की मौत का जिम्मेदार ठहरा देते हो, तब तो दिखता है कि तुमने थूक लगा कर पहले बुलबुले ढूँढे, और फिर सुलेशन से कटे हुए ट्यूब का हिस्सा चिपका दिया। काटना-छाँटना तो तुम्हारे बचपन का शग़ल है, उसमें तो माहिर हो ही। चाहे चोली हो, ट्यूब हो या… हें हें हें… बड़े हरामी हो बेटा! 

रोहित भाई की हत्या पर जो नंगा नाच तुमने किया था; स्नेह से भरी सुषमा जी पर जो आक्षेप किए थे, विद्वान अटल जी हों या फिर कर्मठ मनोहर पर्रिकर, तुमने किसको अपनी अश्लील हँसी का पात्र नहीं बनाया? तुमने उरी पर अट्टहास किया जब हमारे सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए क्योंकि गोली चलाने वाले तुम्हारे ही बाप-चाचा थे। तुमने कब भारतीय राष्ट्र के प्रतीकों के गिरने पर अभद्र दाँत नहीं दिखाए। इसलिए ‘सुनने की शमता रखिए’, अभी तो हिन्दू शुरु हुआ है। 

तुम्हें खेल खेलने का शौक है न, तो खेलो अब। ट्विटर पर ज्ञान देते थे न कि वो पत्रकार नहीं था, अब तुम देखते जाओ कि हिन्दू झटका सर्टिफिकेशन सिस्टम कैसे कार्य करता है। तुम जिसे आइकॉन बनाना चाहते हो उसे इतनी बार, उसकी सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया जाएगा कि उसके घर वाले भी उससे स्वयं को अलग कर लेंगे। अब्दुल्ला के लौंडे ज्ञान दे रहे हैं कि जो हँस रहे हैं वो दोगले हैं। अरे जिसके बाप, दादा और जो स्वयं हर दिन कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार पर अट्टहास करते हुए, हम हिन्दुओं के ही पैसों पर पलता रहा, वो दोगलेपन की बात करेगा तो उसके पिता को भी शर्म आ जाएगी कि वो एक का है, दो का है, या फिर तीन के साथ तो नहीं कांड कर गई! 

गिनती तो हमें बहुत आती है, हमने आविष्कार किया है, जनक हैं हम गणित और विज्ञान के। तुम चपटी धरती वालों को इतना पेलेंगे कि तुम्हारी सामूहिक सूजन से धरती गोल प्रतीत होने लगेगी। ये तुमने स्वयं पर आमंत्रित किया है, हम तो चुप-चाप, अपने संस्कारों और धार्मिक नैतिकता के बोझ से लदे तुम्हारी नीचता की उपेक्षा कर रहे थे कि कभी तो शांत होंगे। लेकिन तुम गिरते रहे, गिरते रहे, हमारे परिजनों के शवों तक को तुमने बेचा है। एक सीमा होती है, और वो अब तुमने क्रॉस की है, अब तुम कायदे से धोए जाओगे। भाषा की मर्यादा, नैतिकता, पत्रकारिता की आचारसंहिता आदि को अपने समय पर प्रयोग होने वाले शब्दों के स्तर तक तुमने गिराया है, हम जब आए तो ये सारे भाव गौण थे, ये शब्द अदृश्य थे। तो हम फॉलो किसको करेंगे? हमारे सामने तो तुम्हारे अट्टहास के ही उदाहरण हैं, तो हम कम से कम छः गुणा जोर से तो हँसेंगे ही। 

रवीश कुमार, लानत वाले

गाँव-घर में उस कमजोर कुत्ते को देखा है जो अपने इलाके में भी शेर तो रहने दीजिए, कुत्ता भी नहीं हो पाता। वो कुर्सी या चौकी के नीचे बैठा रहेगा और सड़क पर जाते ट्रैक्टर से ले कर, दीवार पर चढ़ती छिपकली, चींटियों की कतार या दूर चर रही गाय पर भी भौंक कर अपने स्वामी को अपने होने का अहसास दिलाता रहता है। उसे रोटी के टुकड़े की ही उम्मीद रहती है। रवीश कुमार की स्थिति वही है। स्वयं को अपने ही कुकर्मों से, पत्रकारिता से विमुख हो कर उसने इतना बेकार बना लिया है कि गाँव का हर आदमी जानता है ये कुर्सी के नीचे, मालिक की टाँगों के बीच से झाँकने और किंकियाने के अलावा कुछ और कर नहीं सकता। 

रवीश भी फोटोग्राफर की मौत पर दुखी हुए। रवीश जब दुखी होता है जो ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान’ टाइप की बात होती है। उसके दुख में एक कवितामयी प्रस्तुती होती है। ‘इन्स्टाग्राम के जमाने में, पोलरॉयड ढूँढती ऊँ’ और ‘इक्बात बताऊँ, जवाब दोगे’ टाइप की काव्यात्मक बात। मतलब, आत्मा को छू जाए और फिर आप कहें कि ये क्या लिख दिए हो $£€§$! रवीश जब दुखी होते हैं तो मंगल ग्रह के लोग खून के आँसू रोते हैं और उसी कारण उस ग्रह का नाम लाल ग्रह रखा गया है। 

रवीश जी दुखी हो गए और हृदय तल से लिख दिया कि फोटोग्राफर साहेब भारतीय पत्रकारिता को एक साहसिक मुकाम तक ले गए। पहली बात तो ये है कि भारतीय तो बस वो पासपोर्ट भर का ही था और पत्रकारिता के नाम पर शवों की बिक्री की है उसने, इसलिए ये दोनों विशेषण सर्वथा अनुचित ही प्रतीत होते हैं। चूँकि वो आदमी मर गया तो बाय डिफॉल्ट साहसी नहीं हो जाता। अगर जलती चिताओं की तस्वीरें लेना साहस है तो रवीश जी आप टावर छोड़ कर नेटवर्क एरिया से बाहर जा चुके हैं। दंगों के बीच अगर उसकी हिम्मत फारूख फैजल के राजधानी स्कूल की छत पर लगे गुलेल या ताहिर हुसैन की छत से हो रही पेट्रोलबमवृष्टि की तस्वीरें लेने की की जगह, एक मुसलमान चोर द्वारा हिन्दू के दुकान को लूटने और आग लगाने की कोशिश में, हिन्दुओं की भीड़ द्वारा घेर कर रोकने पर, उसे पकड़ने की है, तो वो एक इस्लामी अजेंडाबाज पत्रकार था, भारतीय पत्रकार नहीं। 

मुसलमानों द्वारा प्लान किए हुए दंगों में भी जब जामिया का पढ़ाया फोटोग्राफर मुसलमानों को ही विक्टिम बताता है, जब वो दिलबर नेगी, विनोद, दिनेश, अंकित शर्मा, वीरभान, राहुल, मुंशी जी आदि की तस्वीरें नहीं ले पाता है तो वो विशुद्ध हिन्दूघृणा के अजेंडे से प्रेरित था। उसने दसियों हिन्दू मृतकों को कोविड के समय चैन से पंचतत्व में विलीन तक होने नहीं दिया और उसका सर्कस बना कर रख दिया। ये कोई सत्ता पर सवाल उठाने वाली पत्रकारिता नहीं थी। ये वही पत्रकारिता है रवीश जो तुम अपने कमरे से कर रहे हो, ये तुम्हारी ही ब्रीड का दरिंदा था जो अपने पेशे के साथ दलाली कर रहा था और हिन्दुओं को शवों की तस्वीरें बेच कर अपने घर का राशन खरीद रहा था। 

एक तो ये वामपंथियों का ठीक है कि उनकी गली का कुत्ता भी मरता है तो वो शहीद हो जाता है। इनके बलात्कार आरोपी फादर लोग हों, प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाने वाला अर्बन नक्सल हो या फिर हिन्दूघृणा से संचालित फोटोग्राफर, सब शहीद होते हैं। इनका वश चले तो ऐसे घृणित और अधम श्रेणी के प्राणियों के स्मारक बनवा लें। खैर, पारक और स्मारक तो ऐसे नीच लोगों के बने भी हैं, क्या किया जाए। 

इस पोस्ट में रवीश जी भावुक हो गए दूसरे पैराग्राफ में। पुलित्जर अवार्ड को खींच लाए। जब आदमी का काम बेकार होता है तब उसके टैलेंट क स्थापित करने के लिए याद दिलाया जाता है कि पुलित्जर मिला था। रवीश जी, मिला तो आपको भी मैग्सेसे है, लेकिन पत्रकार तो आप चिरकुट ही हो न? फिर पुलित्जर मिले या गोयनका, हमें पता है उसका महत्व क्या है। मिलने को तो ओबामा जैसे लोगों को शांति का नोबेल मिल गया है जिसने सबसे ज्यादा राष्ट्र तबाह किए हैं। तो पुरस्कारों और नामों की बात रहने दीजिए, कोई मतलब है नहीं उसका। अगर बेलनाकार है तो डाल दिया जाए कहीं, फ्लैट है तो जूते के डब्बे में बालू रख कर पीकदान बना लीजिए, बस वही यूटिलिटी है। 

इसके बाद रवीश जी ने जो लिखा है, वो पढ़ कर मैं रो पड़ा। देखिए, आदमी का संस्कार मंद पड़ता जा रहा हो, मुख पर कालिमा की परतें चढ़ती जा रही हों, हर निकलते शब्द से अपनी नीचता का भान हो रहा हो, फिर भी आदमी सूक्ष्म अजेंडे से नहीं भटकता। अजेंडा क्या है? इस्लामी आतंकवाद ने उसकी हत्या की, जिहाद उसकी हत्या का कारण है, इस्लामी साम्राज्यवाद उसकी हत्या का कारण है, हर स्थिति में उसकी हत्या के कारण में इस्लाम ही है, लेकिन मजाल है कि पका हुआ वामपंथी इस्लाम या आतंकवाद का नाम ले ले। जीभ और होठों पर फोड़े हो जाएँगे और चेहरे से पीब बहने लगेगा अगर ऐसी नमकहरामी कर दी तो। 

बंदा लिखता है कि बंदूक से निकली उस गोली को, हज़ार लानतें भेज रहा हूँ। टेस्ला वालों ने बंदूक बना दी हो तो अलग बात है लेकिन मुझे संदेह है कि बंदूक ने दानिश को देखा होगा और चल गई होगी। रवीश ने तो चलिए लिख दिया कि लानतें भेज रहा हूँ, ये नहीं बताया कि फर्स्ट फ्लाइट कूरियर सर्विस से जाएगा या फेडेक्स से कि ब्लू डार्ट से। लानतों का क्या है कि उनमें बड़ी ताकत होती है। 

महाकवि गालिब ने भी कहा है कि ‘हजारों लानतें ऐसी कि हर लानत में दम निकले, बहुत निकले मेरे लानत, लेकिन फिर भी कम निकले। निकलना मुँह से लानत का सुनते आए थे लेकिन, वो गुस्सा आ गया हमको कि पीछे से भी सम निकले।‘ ‘सम’ अंग्रेजी वाला है, लानतें भेजते रहे इस शायरी पर। मैंने जब अफगानिस्तान जाते हवाई जहाज की परिचारिका से फोन पर बात की तो उन्होंने बताया कि रवीश के लानत एक फ्लाइट की पंखी से चिपक कर काबुल जाते हुए दिखे। 

लानत तो वैसे ही काफी शक्तिशाली होते हैं, ऐसा किताबों में लिखा है। लेकिन लानतें भेज कौन रहा है, यह भी लानतों की इंटेसिटी, अर्थात् प्रभाव को बढ़ाता है। रवीश की लानत अत्यंत शक्तिशाली मानी गई है क्योंकि अपने कुकर्मों के सारे फल रवीश ने उन लानतों में लपेट कर भेजे हैं। अच्छा है रवीश जी जज नहीं है वरना हत्या के मामले में अपराधी की जगह बंदूक और गोली को कारागार में रखवाते और आदमी बाहर घूमता रहता। विश्वस्त सूत्रों ने बताया है कि रवीश जी के लानत की गति प्रकाश की गति से थोड़ी ही कम है और उनके लानत सारी बंदूकों को एक साथ जाम कर देंगे और उनमें गोली की जगह क्रोसीन का टैबलेट भर जाएगा। फिर जब वो गोली चलाएँगे तो लोगों के सर्दी जुकाम ठीक हो जाएँगे। 

आगे रवीश ने दानिश के बारे में लिखा है कि जामिया से पढ़ कर फोटोग्राफी को अपना करियर बनाया। जैसे फोटो हैं सर, उस हिसाब से आप नहीं भी बताते तो हमें पता लग ही जाता कि ऐसे फैक्ट्री आउटलेट सेल वाले जीव किस यूनिवर्सिटी से निकलते हैं। और ये करियर था क्या? शवों तक को भुना लेना? इसे आप करियर कहते हैं? इसने प्रतीकात्मक नहीं, शाब्दिक तौर पर चिताओं पर रोटी सेकी है। उसी की लाल-पीली लपटों और ब्रह्मलीन होते शरीरों की जलती मांसपेशियों से वो अपने परिवार का पोषण कर रहा था। ये करियर नहीं है, नीचता है। 

और हाँ, लानती आदमी ने भारतीय मीडिया पर कटाक्ष किया है कि वो घर बैठ कर अफ़ग़ानिस्तान की रिपोर्टिंग कर रहा है, जबकि सत्य यह है कि किसान आंदोलन पर सौ एपिसोड निकाल देने वाले रवीश की आज तक हिम्मत नहीं हुई है कि वो वहाँ से जा कर ग्राउंड रिपोर्टिंग करे। डेढ़ साल से घर में बंद व्यक्ति जब दूसरों को अफगानिस्तान भेजने की बातें कहता है तो बड़ा क्यूट लगता है। घर से निकलो रवीश जी, पूरी दुनिया सड़क पर है सिवाय आपके। इसलिए, कम से कम आप तो ग्राउंड रिपोर्टिंग की तो बात न ही करें। आपने ग्राउंड रिपोर्टिंग तो छोड़िए, घर से ही बैठ कर बंगाल की हिंसा पर तो आज तक रिपोर्टिंग की नहीं, बाहर क्या खाक जाओगे। 

वस्तुतः, कहने का तात्पर्य यह है कि रवीश आज भी वही कर रहा है जो गाँव का वो कुत्ता करता है। वो कुर्सी के नीचे बैठा हुआ है, लानतें भेजे जा रहा है, दूर चरती गाय पर भौंक लेता है और मालिक को अपने होने का आभास कराता रहता है। रवीश तुम्हारी जगह बस वहीं बची है, एक बटा एक की कुर्सी जिसमें तुम्हारा सारा स्वाभिमान, अजेंडा, ज्ञान, शरीर और विचारधारा, सिमट जाते हैं। तुम मेरे लिए मॉल में रखे हुए उस डस्टबिन की तरह हो जहाँ थूकने से पहले देखना नहीं पड़ता कि गीला कचरा है, कि सूखा, बस थूका जाता है। 

और अंत में, अजेंडाबाज फोटोग्राफरों के लिए भावुक होते लम्पटों और वामपंथनों के लिए यही कहूँगा कि अगर ज्यादा दर्द हो रहा है न तथाकथित राइट विंग के ट्रोलों द्वारा गरियाए जाने पर, उनकी हँसी से, तो फिर पेनकिलर स्टोर कर लो। अभी तक तो सिर्फ सहला ही रहे हैं, जब बाँध कर स्पैंकिंग करूँगा न बेबी, तो जंजीरों को गुलाबी फर से कवर नहीं करूँगा, एक-एक शब्द से रीढ़ से मस्तिष्क तक हमारे विचारों की झनझनाहट महसूस करोगे। जब दिन बीत जाएगा तो लँगराते हुए मिलोगे काहे कि प्रातःस्मरणीय हैं हम, लानतें नहीं भेजते, कह के लेते हैं। 



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