आतंकियों के लिए नमाज-ए-गायबाना पढ़ने वाले AMU के 'छात्र' कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने से आहत

26 अगस्त, 2021 By: संजय राजपूत
अफजल गुरु को शहिद बताने वाले AMU के छात्रों को कल्याण सिंह में अपराधी नजर आता है

पिछड़ों और वंचितों के सबसे बड़े नेताओं में से एक उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निधन के बाद देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। इस बीच उनकी मृत्यु को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। एक विशेष समुदाय को खुश करने के समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव स्व. कल्याण सिंह की श्रद्धांजलि देने नहीं गए।

इस बीच, प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी कल्याण सिंह को लेकर विवाद शुरू हो गया है। दरअसल एमयू के वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने कल्याण सिंह के निधन पर शोक जताया था। इसके बाद पूरे कैम्पस में जगह जगह पर्चे चिपका कर वाइस चांसलर की ओर से कल्याण सिंह के निधन पर शोक संवेदना जताए जाने का विरोध किया जा रहा है।

पोस्टर्स में लिखा गया है, “यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निधन पर शोक संवेदना जताना धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है। यह बेहद शर्मनाक ही नहीं, बल्कि यह AMU की परंपरा और संस्कृति के भी खिलाफ है।”

इसके अलावा, इन पर्चों में पूर्व मुख्यमंत्री को अपराधी बताते हुए लिखा गया है:

“कल्याण सिंह न सिर्फ बाबरी मस्जिद गिराने के अपराधी थे, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उन्होंने उल्लंघन किया था। वाइस चांसलर के शोक संवेदना से AMU आहत है। शोक जताकर कुलपति ने अलीग बिरादरी का अपमान किया है। अलीगढ़ आंदोलन, न्याय और निष्पक्षता में विश्वास रखता है।”

दिलचस्प बात ये है कि न्याय और निष्पक्षता की बात करने वाले एएमयू को आतंकी बुरहान वाणी, मन्नान और अफ़ज़ल गुरु अमन, इंसानियत और भाईचारे के प्रतीक नज़र आते हैं, जबकि कोर्ट से सभी आरोपों से बरी हो चुके स्व. कल्याण सिंह इन्हें अपराधी नज़र आते हैं।

एक यूनिवर्सिटी, जिसके नाम में ही साम्प्रदायिकता झलकती है, वो सेक्युलरिज़्म और निष्पक्षता की बात करता है तो इसे एक सस्ते व्हाटसऐप चुटकुले से ज्यादा कुछ भी नहीं समझा जाना चाहिए। इस्लामी आतंकी मन्नान की मौत का मातम एमयू में सिर्फ इसलिए मनाया जाता है क्योंकि वह एक खास कौम से आता था।

हथियार उठाकर देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाली एक विशेष कौम का आतंकी भी एएमयू को अमन का प्रतीक लगता है, जबकि अपनी कौम के साथ खड़े होने पर कल्याण सिंह इन्हें अपराधी लगते हैं। एमयू शायद भूल गया है कि आतंकी संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) की स्थापना 1977 में AMU में ही रखी गई थी।

आतंकी मन्नान वानी के मारे जाने के बाद एमयू कैंपस में नही आतंकी के जनाने की नमाज पढ़ी गई थी। एएमयू के न्याय और निष्पक्षता का आलम तो ये है कि हालत ये है कि कश्मीर में एक आतंकी का एनकाउंटर होने के बाद देशद्रोही नारों की गूंज मुख्यमंत्री भवन में नहीं, एमयू में सुनाई देती है।

हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर मन्नान वानी के मारे जाने के बाद आजादी के कैलेंडर स्व. कल्याण सिंह ने नहीं, एएमयू के छात्रों ने छपवाए और बँटवाए थे। भारत के दिल राजधानी दिल्ली में संसद भवन पर हमला करने वाले आतंकी अफजल गुरु को शहीद बताने वाले छात्र एएमयू से ही थे।

अफ़ज़ल को फाँसी पर लटकाए जाने के बाद उसकी नमाज-ए-गायबाना स्व. कल्याण सिंह ने नहीं पढ़ी थी, एएमयू के छात्रों ने एएमयू कैम्पस में पढ़ी थी। अफ़ज़ल गुरु को शहीद बताकर कैंडल मार्च एएमयू के छात्रों ने निकाला था। आतंकी मकबूल के लिए रोने वाले लोग भी एएमयू से ही थे।

पूर्व मुख्यमंत्री के जाते ही पोस्टर लगाकर बाबरी से लेकर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना तक का हिसाब माँग लेना क्रांति, आंदोलन, निष्पक्षता या न्याय नहीं है, बल्कि बुद्धिहीनता है। क्या एममयू के छात्र इंदिरा गाँधी के जन्मदिन और पुण्यतिथि पर उनके लिए भी गालियाँ लिख सकेंगे? पोस्टर लगाकर सवाल पूछ सकेंगे उन तमाम गलतियों के लिए जो इंदिरा ने आपातकाल से लेकर नसबंदी तक की?

क्या आप राजीव गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर फासिस्ट पाएँगे जो राम मंदिर के ताला खुलवाने से लेकर शाहबानो प्रकरण तक में राजनीति करते रहे? क्या आप उनकी पुण्यतिथि और जन्मदिन पर उन्हें भागलपुर दंगे याद करके गरिया पाएँगे? क्या आप लालू के मरने पर कॉमरेड चंदू को याद कर के गरियाने लगेंगे?

अपने किए कार्यों के लिए आलोचना से कोई भी परे नहीं है। इस देश मे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री तो छोड़िए प्रभु श्री राम की भी आलोचना होती है, लेकिन ठीक उस घड़ी में जब किसी की मृत्यु पर उसके शुभचिंतक मानसिक रूप से दुखी हैं, टूटे हुए हैं और आप आलोचना का वही वक़्त चुनते हैं, तो भले आप छात्र, निष्पक्षता, न्याय ,बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट का लेबल चिपका लें, आप मनुष्य तो नहीं ही रह गए हैं।

निष्पक्षता और कट्टरता में बारीक सा फर्क होता है। आप जिसे प्रतिबद्धता समझ रहे हैं वो कट्टरता है, जाहिलता है, क्रूरता है, बौद्धिक दिवालियापन और संवेदन हीनता है। निस्संदेह एक धर्म विशेष के नजरिए से स्व. कल्याण सिंह शोषक हो सकते हैं। मगर आपके अपने घरों में भी कोई न कोई शोषक अवश्य रहा होगा।

हो सकता है आपका बाप भाई भी आपकीं माँ बहन को पीटते हों। जब वे मर जाएँ तो उस दिन शोक मत मनाना, बल्कि जश्न मनाना; ये कहते हुए कि ‘मेरी माँ को पीटने वाला पितृसत्ता का गुलाम मेरा बाप मर गया’। सवाल पूछिएगा अपने बाप की कब्र से, उसे अपनी माँ का अपराधी कहने की हिम्मत जुटाइएगा। लेकिन नहीं..

तब आप ऐसा नहीं करेंगे, कर ही नहीं पाएँगे क्योंकि आपको पता है आपके सवालों के जवाब आपके बाप की कब्र से नहीं मिलेंगे। वामी-इस्लामी खेमा हमको शायद इसीलिए नहीं भाया क्योंकि वो चारित्रिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह अपाहिज और संवेदनहीन है। आतंकियों, जिहादियों से लेकर देशद्रोहियों तक मे ‘माई बाप’ ढूँढ लेने वाले एएमयू की औकात नहीं है कि वो स्व. कल्याण सिंह की धार्मिक कट्टरता पर सवाल उठा सके।

अपनी कौम का होने की वजह से आतंकियों तक के समर्थन में खड़े होने वाले जलील लोग किस मुँह से कल्याण सिंह को अपराधी कह रहे हैं? जिनके खून में कट्टरपंथ बहता हो, वो स्व. कल्याण सिंह को कट्टरपंथी कहने से पहले एक बार आईने में अपनी शक्ल क्यों नहीं देख लेते? जिस यूनिवर्सिटी का नाम ही मजहबी कट्टरपंथ का प्रतीक हो, वो किसी अन्य को धार्मिक कट्टर कहते हुए शर्म से जमीन में धंस क्यों नहीं जाते?



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