9/11 के आतंकी हमले से लेकर अफगानिस्तान प्रकरण तक अमेरिका ने क्या सीखा

11 सितम्बर, 2021 By: पुलकित त्यागी
11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले ने मजहबी आतंक की वास्तविकता को बेनकाब करने का काम किया

11 सितम्बर 2001, मंगलवार का दिन, केवल 19 इस्लामी आतंकी एक ऐसे देश को घुटनों पर ला देते हैं जो स्वयं को विश्वभर में आर्थिक, सैन्य बल और विचारधारा के स्तर पर भी सबसे प्रभावशाली, शक्तिशाली और प्रबल मानता था। केवल एक आतंकी संगठन ने न केवल इस देश की आत्ममुग्धता और वर्चस्व को चकनाचूर किया अपितु परत दर परत हर स्तर पर ध्वस्त करते हुए इस कथित वर्ल्ड पावर को क्षत-विक्षत कर डाला। 

आज का अमेरिका जिन्हें अत्यधिक प्रगतिशील, इस्लामी विचारधारा के प्रति हमदर्द और एशिया, मूलतः भारतीय उपमहाद्वीप में पनप रहे आतंकी संगठनों के प्रति सहानुभूति रखने वाला लगता है, उन्हें एक बार 9/11 के हमले से पूर्व के अमेरिका के विषय में पढ़ना और जानना चाहिए।

यह वही देश है जिसने अपने पर यह भीषण हमला होने से पहले इस्लामी आतंकवाद नामक राक्षस के विषय में वार्ता तो दूर, इसके अस्तित्व तक को स्वीकृति देने से मना कर दिया था। अमेरिका का मानना था कि भारत समेत इस जघन्य विचारधारा से जूझते सभी देश केवल इसे एक हौवे की तरह विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं।

आज की शब्दावली में कहें तो बीसवीं शताब्दी से ही इस विचारधारा से निरंतर जूझ व लड़ रहे देश व सभ्यताएँ, जैसे- हिंदू, यहूदी, पारसी, सभी ‘इस्लामोफोबिक’ हैं।

वर्ष 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और अमेरिकी सेना के हेड क्वार्टर पेंटागन पर इस्लामी आतंकी संगठन अल-कायदा द्वारा किए गए आतंकी हमले ने न केवल अमेरिकी नागरिकों की जान-माल का नुकसान किया अपितु इस वैश्विक शक्ति माने जाने वाले इस देश के अहम को ललकारते हुए विश्व पटल पर अपनी उपस्थिति के साथ-साथ शक्ति का भी एक उदाहरण दिया।

9/11 के दिन क्या हुआ था

11 सितंबर, 2001 की सुबह लगभग 9:00 बजे अल-कायदा के 19 आतंकवादियों ने कैलिफोर्निया जाने वाले कुल चार यात्रियों से भरे हवाई जहाजों को हाईजैक किया। इनमें से दो हवाई जहाज़ न्यूयॉर्क शहर के लोअर मैनहैटन स्थित ट्विन टावर कहे जाने वाले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की ओर बढ़े और आतंकियों द्वारा ये जहाज़ इन दोनों इमारतों में घुसा दिए गए।

इसके लगभग आधे घंटे के बाद ही अन्य यात्रियों से भरे एक हवाई जहाज़ को ओहायो की हवाई सीमा से हाईजैक करके अमेरिकी सेना के हेड क्वार्टर पेंटागन में ले जाकर क्रैश कर दिया गया। 

चित्र साभार -Reuters

अब तक इस जघन्य घटना ने हज़ार से अधिक लाशें तो गिरा ही दी होंगी कि तभी चौथे हवाई जहाज़ के भी हाईजैक होने की सूचना सामने आई। इस जहाज के लिए अल-कायदा द्वारा बनाई गई योजना अमेरिकी तंत्र की जड़ों तक हो हिला देने के लिए पर्याप्त थी, परंतु इसे अल-कायदा का ‘दुर्भाग्य’ कहा जाए या राष्ट्रवादी अमेरिकी नागरिकों का जज़्बा कि यह चौथा हवाई जहाज़ अपने चिन्हित लक्ष्य तक पहुँच नहीं पाया।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हो चुके हमलों की जानकारी मिलते ही इस जहाज़ में उपस्थित लोगों ने आतंकियों से मुकाबला कर जहाज़ को अपने कब्ज़े में ले ही लिया था कि आतंकियों ने स्थिति विपरीत जाती देख जहाज़ को पेंसिलवेनिया के पास क्रैश करा दिया।

कॉकपिट के वॉइस रिकॉर्डर एवं बाद की जाँच में यह सामने आया था कि इस हवाई जहाज़ का निशाना अमेरिकी राष्ट्रपति के निवास स्थान व्हाइट हाउस या अमेरिकी संसद कहा जाने वाला यूएस कैपिटोल था।

वाइट हाउस

इन हमलों में सरकारी आँकड़ों के हिसाब से लगभग 3 हज़ार नागरिकों को अपनी जान गँवानी पड़ी और लगभग 25 हज़ार से अधिक लोग घायल हुए।

अपने नागरिकों के रक्त से पटी सड़कें देखने के बाद इस चिरनिद्रा में विलीन देश की नींद खुली और इसकी सेनाएँ उसी प्रकार इस्लामी मुल्कों पर टूट पड़ीं जैसे एक खिसयानी बिल्ली अपने बहुत देर से हाथ में न आने वाले अपने शिकार चूहे पर झपटती है। 

अमेरिका ने कहा कि अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन अफ़ग़ानिस्तान में छिपा है और अमेरिका उसे ढूँढ कर मारेगा। साथ ही साथ, अमेरिका ने यह दावा किया कि वो अल-कायदा समेत सभी इस्लामी आतंकी गिरोहों को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे।

विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ने टीवी स्क्रीन पर यह हुँकार भरी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश ने भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया समेत पूरे विश्व को इस्लामी आतंकवाद से छुटकारा दिलाने का बीड़ा उठाया।

इस प्रकार की शंखनाद रूपी दहाड़ के बाद अमेरिका वर्ष 2001 में तालिबान द्वारा संचालित इस्लामी मुल्क अफ़ग़ानिस्तान में उतर गया और जंग छेड़ दी। दरअसल अफ़ग़ानिस्तान में ही 90 के दशक में पाकिस्तानी आतंकी ख़ालिद शेख़ मोहम्मद और अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने ही मिलकर 9/11 के हमले की योजना बनाई और आतंकियों को प्रशिक्षण भी दिया था।

ख़ालिद शेख़ मोहम्मद

अफ़ग़ानिस्तान में पनपे संगठन तालिबान का भी अल-क़ायदा से 90 के दशक से अच्छा गठजोड़ रहा है। इन सभी मानकों को आधार बनाकर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में भीषण युद्ध छेड़ दिया। आसपास के देशों में भी खूब अराजकता फैली और अमेरिका लगातार यह दावा करता रहा कि वे तालिबान-अलकायदा समेत सरगना ओसामा बिन लादेन को भी मार गिराएँगे। 

आतंकवाद मिटाने का दावा करते-करते अमेरिका को 11 वर्ष बीत गए। इस वर्ल्ड पावर के हाथों लादेन तो लगा ही नहीं साथ ही, इस्लामी आतंकवाद समाप्त करने चली अमेरिकी फौज की नाक के नीचे, पाकिस्तान और आस पास के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन नए इस्लामी आतंकी संगठन (Indian Mujahideen-2007, Jaish-e-Mohammed-2000, Al-Badr (J&K)-1998, Islamic State-Khorasan Province-2015) पैदा होते और फलते फूलते रहे।

‘ग्रेव्यार्ड ऑफ एंपायर्स’ कहे जाने वाले अफ़ग़ानिस्तान में न केवल एक के बाद एक अमेरिकी सैनिकों की लाशें गिरती रहीं बल्कि इस बीच भारत में भी 26/11 समेत कई इस्लामी आतंकी हमले हुए।

11 वर्षों बाद अंततः लादेन उसी साँप के बिल से अमरीकियों के हाथ लगा जिसे वर्षों से यही अमेरिकी सरकार दूध पिलाती आ रही थी। ये वही मुल्क था जिसकी खुफिया एजेंसी ISI अमेरिका पर हुए 9/11 हमले में बराबरी की ज़िम्मेदार थी, यह एजेंसी हमले में लिप्त आतंकियों के खातों में पैसा डालती पाई गई थीं। 

2 मई, 2011 को पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी नेवी सील ने बिन लादेन नाम के इस कुख्यात को ढेर कर दिया। परन्तु एक व्यक्ति को मारने से अगर एक कुत्सित विचारधारा का अंत हो पाता तो बात ही क्या थी। इस हैवान के मरने तक इसके जैसे कई लादेन कई मुल्कों में पैदा हो चुके थे। 

20 वर्षों में अपने लगभग ढाई हज़ार सैनिकों और साढ़े तीन हज़ार से अधिक कॉन्ट्रैक्टरों को मरवाने के बाद अंततः अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन को याद आया कि अब वे शांति चाहते हैं। और उन्होंने 31 अगस्त, 2021 को तालिबानियों के हाथों में अफ़ग़ानिस्तान सौंप कर अपनी सेना वापस खींच ली।

विश्वभर को इस्लामी आतंकवाद से मुक्त कराने का दावा करने वाला अमेरिका केवल एक इस्लामी मुल्क को भी एक आतंकी संगठन से पूर्णतः मुक्त नहीं करा पाया और अब सवाल और आलोचनाओं से बचने के लिए इस देश का राष्ट्रपति विश्वभर की मीडिया के सामने अपनी राजनीतिक कला की जगह अदाकारी की कला प्रस्तुत कर रहा है।

चित्र साभार- Fox News

इस निर्णय में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अमेरिकी नागरिक 20 वर्षों बाद पुनः उसी स्थिति में जा चुके हैं जहाँ वे स्वयं को ‘लिबरल और वोक’ दिखाने के लिए आतंकवाद जैसे मुद्दों को सामान्य बताने के साथ ही आतंकियों को पीड़ित और शोषित सिद्ध करने को आतुर हैं।

द्वितीय विश्वयुद्ध में यहूदियों का नरसंहार एवं गत 20 वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना द्वारा तालिबान के असफल सफाए का प्रयत्न, यह बताता है कि चाहे एक स्थापित सभ्यता हो या एक रक्तरंजित विचारधारा, इनमें से किसी का भी संपूर्ण सफाया ज़हरीली गैस के कमरों में भरकर इंसानों को मारने या उन पर गोली-बारूद बरसाने से तो अवश्य ही संभव नहीं है।

इस प्रकार के प्रयोग केवल ऊपरी सतह पर और केवल एक सीमित कालखंड के लिए ही प्रभावशाली प्रतीत होते हैं, लंबे समय में स्थाई तौर पर इनके न तो कोई परिणाम निकलते हैं न ही कोई औचित्य रह जाता है।

अमेरिका समेत समस्त विश्व को यह समझना होगा कि वैचारिक संग्रामों में विजय गोली-बारूद से नहीं विचारों और कूटनीति से ही पाई जा सकती है। अगर आप अपने आने वाली पीढ़ियों को खरे को खरा कहना नहीं सिखाएँगे, खतरों से अवगत नहीं कराएँगे, Political Correctness को कचरे में डाल कर सत्य बताते हुए वैचारिक प्रबलता प्रदान नहीं करेंगे, तो आपकी आने वाली पीढ़ी अपनी वास्तविक पहचान खोकर स्वयं को सेमी-सेक्सुअल, डेमिसेक्सुअल, खरगोश और पपीते की तरह आईडेंटिफाई करने को क्रांति और अपनी बगल में बाल उगा लेने को सशक्तिकरण समझती रहेगी।



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