नालंदा से 9/11 तक: आग में कैद एक आवाज

11 सितम्बर, 2021 By: विजय मनोहर तिवारी
दूर दक्षिण में विजयनगर की तबाही से लेकर अमेरिका तक, विनाश के मूल में एक ही पंथ की कट्टरता रही है

बीस साल पहले की तस्वीरों को बार-बार देखिए। उन दो गगनचुंबी अट्‌टालिकाओं को जो दशकों से एक राष्ट्र का चमचमाता हुआ परिचय थीं। थोड़े ही समय में वह पहचान भरभराकर मलबे के ढेर में बदल गई थी। उन इमारतों से टकराती हुई चीलगाड़ियों को देखिए, जिनके टकराते ही आग के शोले आसमान में लपकने लगे थे।

उन हवाई जहाजों में सवार होकर चंद घड़ी पहले अपनी मंजिलों पर निकले लोगों के चेहरों पर चिपके दहशत के आखिरी कतरों को महसूस कीजिए, जो आग के शोलों में भस्म होकर मलबे में कहीं खो गए। उन हवाई जहाजों का रुख मोड़ने वाले उन बहादुरों की सुरमेदार आँखों में झाँककर तो देखिए, कौन सा सपना तैर रहा था?

मौत को गले लगाना बच्चों का खेल नहीं है और इस मौत के खेल में हजारों बेकसूर को भी हिस्सेदार बनाना तो बिल्कुल ही नहीं है। सात आसमानों के पार इस अर्श से देखिए कि ऐसे संसार के निर्माण की कल्पना कितनी खूबसूरत है।

वह न्यूयॉर्क था, जहाँ वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों को पलक झपकते ही ढहा दिया गया। अगर कहानी पहले की तरह दोहराई गई होती तो न्यूयॉर्क का कोई नया नाम होता- नूरगंज, नूराबाद। वाशिंगटन वजीराबाद बन गया होता। लॉस एंजेलिस लियाकतगंज।

हमारे लड़ाकों ने यही किया है, यह किससे छुपा रह गया है। सरहदें बेमानी हैं और सरहदों के इस और उस पार पूरी धरती पर आज करोड़ों जेहनों में यह ख्वाब मजबूती से बसा हुआ है कि एक दिन यही होगा। एक दिन धरती पर दीन की हुकूमत होगी। एक ही नारा हवाओं में गूँजेगा। शेष सब मंत्रों को मार दिया जाएगा।

वे बड़े जोर से यह मानते हैं कि मेरे अलावा सारे खुदा नकली हैं। उनके सिर पर जुनून की तरह सवार है यह फ़लसफां कि मेरे बराबर इबादत के लायक कोई नहीं है और जो कोई ऐसा करता है, वह गुनाह है, वह वाजिबुल-कत्ल है। बस हाथों में ताकत आने भर की देर है। संख्या का पशु बल प्राप्त होते ही सिर पर सवार जुनून सड़कों पर उतर आता है।

‘नाइन-इलेवन’ उसी जुनून के हकीकत बनने का दृश्य है, जो दो इमारतों पर उतारा गया। वह कहीं नाइजीरिया, इथोपिया, केन्या या सूडान में हुआ होता तो कहानी इतनी लज्जतदार न होती। वह एक ऐसे मुल्क में हुआ, जिसकी आन, बान और शान सबसे ताजा थी। वर्ना ऐसी कितनी सभ्यताओं की ऊँची गर्दनों को नाप दिया गया है, क्या किसी को नहीं पता?

दमिश्क और इस्तांबुल के सदियों पुराने गिरजाघरों में सलीबियों का किस्सा कैसे तमाम हुआ, क्या आज किसी को बताने की जरूरत है? आग की इबादत करने वाले पारसियों के अते-पते कहाँ हैं आज?

गाँधार की हजारों साल पुरानी रवायतें और बामियान के बौद्धों की चहलकदमी से भरे मठ जमीन की परतों की खुदाइयों में भी नहीं मिलने वाले। नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतीपोर के तालीम के सदियों पुराने ठिकानों को भी आग के ऐसे ही भड़कते शोलों के हवाले कर दिया गया था। दूर दक्षिण में विजयनगर के हरे-भरे शहर की तबाही के सबसे ताजे किस्से तो दस्तावेजों में बखूबी दर्ज हैं।

ये सब न्यूयॉर्क के ट्विन टॉवर के ही हजार साल पुराने सिलसिले की पिछली झुलसी हुई कड़ियाँ हैं। दुनिया हर कड़ी को अलग देखती है, जबकि यह सिलसिला है, जो बदस्तूर है। अरब से लेकर स्पेन और हिंदुस्तान के रास्तों पर उड़ती रही धूल अब अमेरिका और यूरोप के देशों में जा पहुँची है।

धमाके से पहले ट्विन टॉवर

ये जो काबुल-कंधार की सड़कों पर हथियारबंद झुंड मंडरा रहे हैं, उनका दृढ़ मत है कि वे जो कर रहे हैं, मैं वही चाहता हूँ। वे जो कर रहे हैं, वह मेरी असीम प्रसन्नता का कारण बनेगा और अंतिम निर्णय के समय उन्हें कब्रों से उठाकर स्वर्ग की सुन्दर परियों के बीच स्थान प्राप्त होगा।

वे जो कह रहे हैं कि औरतें सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए हैं। उनकी हैसियत पढ़ने या अपने पैरों पर खड़े होने के लिए नहीं हैं। वे मर्दों के पैरों पर खड़ी होंगी और जब चाहे गिरा दी जाएँगी। उनके दिलकश लिबास देखिए। सुदर्शन दाढ़ियों से फूटते चेहरों का नूर देखिए। सिर्फ अफगान ही क्यों, वे धरती पर जहाँ हैं, वहाँ देखिए। दिमागों में एक ही लहर तारी है।

जब सात आसमानों के पार इधर तक उनके गलाफाड़ नारों की गूँज सुनाई देती है, जब पत्थरों की बारिश का शोर यहाँ तक आता है, जब बम-बारूद के धमाके यहाँ तक गूँजते हैं तो उन्हें लगता है कि फर्श से अर्श तक इबादत के सबूत भेज दिए गए। और ऐसा आज से नहीं है।

नाइन-इलेवन के बाद इन बीस सालों का अरसा बहुत छोटा सा है। अर्श पर उस शोरशराबे और विध्वंस के टुकड़े तेरह सदियों से तैर रहे हैं। सिर्फ दो टॉवर की तस्वीरें कहाँ लगती हैं, यहाँ ऐसे हजारों-हजार ‘नाइन-इलेवन’ के एलबम के एलबम रखे हैं। आग, राख, धुएँ के बीच रास्तों पर उड़ती धूल और हवाओं में भरे बारूदी गलाफाड़ नारे, जो हर आने वाली सदियों को कंपकंपाते रहे हैं।

मैं सात आसमानों के पार अर्श पर एक निराकार सत्ता हूँ, उन अक्लमंदों के अनुसार जिसका हुक्म है कि धरती के सारे आकारों को मिटा दिया जाए। सब जानदारों को मौत का मजा चखना है और हरेक का अंतिम निर्णय मेरे समक्ष ही होना है।

स्वर्ग, जिसे वे जन्नत कहते हैं और नर्क, जो जहन्नम है, इनकी तस्वीरें दिमागों में खोद दी गई हैं। अंतिम संदेश और अंतिम संदेशवाहक के बाद अब सिर्फ मानना ही शेष है। कयामत तक सारे किस्से खत्म हैं। वे मानते हैं कि अब धरती पर कोई नहीं आने वाला, जो रास्ता बताए। अब करने को यही है कि रास्तों पर धूल उड़ाते रहिए। जहाँ मौका मिले घात में रहिए और आघात कीजिए।

ऐ लोगो, धरती पर आप जहाँ भी हैं, बहुत निकट से यह सब देख और भुगत ही रहे हैं। इधर सात आसमानों के पार एक निराकार सत्ता के रूप में मैं भी देख रहा हूँ। हम सिर्फ देख ही सकते हैं। कर कुछ नहीं सकते।

विक्षिप्तों के विश्व में विचार का कोई मूल्य नहीं है। शक्ति ही सर्वोपरि है। वह जितनी अधिक होगी, आवाज उतनी ही तीव्र होगी। एक तलवार और एक तोप की आवाज में अंतर हमेशा ही रहा है। और जब हवाई जहाज को ही बम बना दिया जाए तो बीते दौर के सारे धमाके फीके पड़ जाते हैं। नाइन-इलेवन आग के दृश्य में कैद एक ऊँची आवाज ही है, जो मीनारों पर टंगे लाउडस्पीकर्स से नहीं दी गई है।



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