वैक्सीन: अमेरिका भारत को गिड़गिड़ाता देखना चाहता था, मगर वो हो न सका

26 अप्रैल, 2021 By: अजीत भारती
अमेरिका के पास लाखों डोज थे, लेकिन उसने भारत को नहीं दिए।

कल शाम खबर आई कि अमेरिका ने अंततः भारत बायोटेक के वैक्सीन के लिए आवश्यक अवयवों के निर्यात पर से रोक हटा ली है और ‘हर संभव कोशिश’ कर रहा है ताकि भारत को वैक्सीन बनाने में समस्या न हो। कहा जा रहा है कि स्वयं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने अमेरिकी NSA जेक सलिवन से बातचीत के बाद प्रतिबंध खुलवाया।

फोन पर क्या बातचीत हुई, हमारे राजनयिकों ने क्या लॉबीइंग की, हमसे अमेरिका ने इस ‘मानवतावादी कृत्य’ के लिए बदले में क्या मूल्य लिया आदि तो बाद में निकल कर आएगा, लेकिन इसके पीछे और भी बाते हैं। जब अमेरिका ने अपना घिनौना चेहरा दिखाया ताकि फायजर की वैक्सीन भारत $24 की दर से खरीदे तो भारत पीछे नहीं हटा। जो बायडन और कमला हैरिस लगातार अमेरिकी कंपनियों की दलाली में व्यस्त रहे।

वहीं, भारत के जितने तोप-तलवार अमेरिका में बैठे हैं, सत्य नदेला, सुंदर पिचाई आदि, सब इस पूरे तीन-चार सप्ताह चुप रहे। यूएन तक ने इस बात पर कोई आपत्ति नहीं जताई कि अमेरिका किस कारण से भारतीय वैक्सीन के लिए आवश्यक अवयवों की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा रहा है। मानवता की कोई दुहाई नहीं दी गई। ऐसे समय में ड्रोन से रॉयटर्स के नीच पत्रकारों ने हमारे परिजनों की जलती चिताओं को दिखाया और प्रतिशत की जगह संख्या में बात करते हुए, भारत सरकार को असफल तथा नाकाम बताने की कोशिश की।

पश्चिमी देशों को अखबारों में लिखा गया कि मोदी की कोई भी तैयारी नहीं थी, और अब उसकी ‘महान राष्ट्रवादी’ छवि फुस्स हो रही है। जलती चिताओं की संख्या और वीभत्स दृश्य के सहारे कहा गया कि भारत तो कभी तैयार था ही नहीं, पहली बार मृत्यु कम इसलिए हुई क्योंकि यहाँ की जनसंख्या युवा है। वो यह लिखना भूल गए कि दिसंबर 2020 में अमेरिका स्वंय अपने अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति से जूझ रहा था। वो यह लिखना भूल गए कि अमेरिका में गिरती लाशों की दर अभी भी भारत से लगभग 12.58 गुणा अधिक है। भारत में प्रति दस लाख संक्रमित व्यक्तियों में मृत्यु दर 140 है, जबकि अमेरिका में 1762 लोग हर दस लाख संक्रमण पर मर रहे हैं।

तुम्हारा वैक्सीन बनाम हमारा वैक्सीन

उन्होंने यहाँ तक लिखा कि कुम्भ करवाना ही दूसरी लहर ले कर आया जबकि सत्य यह है कि कुम्भ जनवरी 14 को शुरु हो चुका था और दूसरी लहर की शुरुआत के तीन महीने पहले तक वहाँ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। दूसरी लहर के बीच भी कुम्भ में प्रति दस लाख संक्रमण की दर न तो राष्ट्रीय दर से अधिक थी, न ही अमेरिकी दर से। फिर आखिर ऐसे अखबार हिन्दू प्रतीकों को क्यों निशाना बना रहे हैं?

अमेरिका ने जब निर्यात प्रतिबंध लगाए तो उसे लगा कि भारत बर्बाद हो जाएगा और जहाँ से भी संभव हो वैक्सीन खरीदेगा, तब वो कहेंगे कि अमेरिका के पास तो लाखों डोज पड़े हुए हैं, आप खरीद लो। वाकई, अमेरिका के पास लाखों डोज थे, लेकिन वो तय नहीं कर पा रहा था कि कहाँ रखे, किसे दे। भारत को नहीं दिया। भारत में उत्पादन धीमा अवश्य हुआ लेकिन बंद नहीं। दूसरी बात यह भी थी कि फायजर की वैक्सीन भारतीय जनसंख्या पर उतनी कारगर नहीं थी, न ही उन्होंने ICMR द्वारा तय मानदंडों को पूरा किया था। ऐसी स्थिति में वह वैक्सीन लेना उचित नहीं था, और भारत ने नहीं लिया।

भारत बायोटेक ने कल ही यह ऐलान कर दिया कि वो अब अपनी वैक्सीन के लिए भारत से ही सारी चीजें लेंगे, अमेरिका की आवश्यकता नहीं है। इसमें थोड़ी देरी होगी, लेकिन हमें ऐसे लीचड़ राष्ट्रों का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा।

एक और बात, जो शायद जेक सलिवन को पता होगी कि अमेरिका में जो m-RNA आधारित वैक्सीन का उत्पादन हो रहा है, उसमें जाने वाला अत्यधिक संवर्धित फॉस्फोलिपिड मुंबई की एक कम्पनी उन्हें निर्यात करती है। दुर्भाग्य से, या उनके सौभाग्य से, भारत ने उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। चाहे ट्रम्प के कहने पर हायड्रोक्सीक्लोरोक्वीन देना हो, या फॉस्फोलिपिड, भारत ने कभी भी मानवता के विरोध में जाने वाला आचरण नहीं किया।

लेकिन हाँ, जब आप बातचीत की टेबल पर बैठते हैं, तब तो सामने वाले की बाँह मरोड़ने वाली नीति का प्रत्युत्तर उसी भाषा और शैली में आवश्यक हो जाता है। आप ही सोचिए कि अचानक से अमेरिका ने, जो कल तक कहता रहा कि वो पहले अपने राष्ट्र के बारे में सोचेंगे (जबकि हमारे वैक्सीन के अवयवों के निर्यात से उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था), आज कैसे ‘हम इस विपदा की घड़ी में भारत के साथ खड़े हैं’ कह कर रुदन करने लगा?

विश्व बदल रहा है और बायडन जैसे दलाल, जिनका बेटा चीनियों के साथ व्यापारिक संबंध रखता है, वो हमेशा दलाली ही करना चाहेगा। लेकिन, अब के बहुध्रुवीय विश्व में अमेरिका अकेला अपनी मनमानी नहीं कर सकता। चीन के कहने पर मोदी को कमजोर करने का प्रयास तो किया जा सकता है, लेकिन आत्मनिर्भर होते भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक उत्तरदायी राष्ट्र के रूप में उठती हुई महाशक्ति को कोई रोक नहीं सकता।

यूएन की चुप्पी और अमेरिकी मित्र राष्ट्रों के मुँह पर चिपका टेप लम्बे समय नहीं उतरा। यूएन ने एक शब्द नहीं बोला। अब जा कर ब्रिटेन समेत कई देश, जहाँ की मीडिया अपने देश की घटिया स्थिति को दरकिनार कर भारत की छवि लाशें दिखा कर बर्बाद करने की कोशिश में लगा था, भारत की ‘सहायता’ को आगे आए हैं।

भारत की सहायता एक विवशता है इनकी

नहीं, हम इतने भी आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं कि मरते लोगों के बीच इस तरह की सहायता को ठुकरा दें। भावुकता में हम ऐसा कर सकते हैं, लेकिन इनसे निपटने के और मौके मिलेंगे। चाहे राफेल का व्यापार अमेरिका की जगह फ्रांस को चला गया हो, या फिर भारत अपने ही यहाँ बनी वैक्सीन का उपयोग कर अमेरिकी दवाई कम्पनियों के 40-50 बिलियन डॉलर का बाजार उन्हें देने से मना कर रहा हो, या फिर उनके चर्चों द्वारा फंडेड कन्वर्जन पर FCRA आदि द्वारा कुठाराघात हो, अमेरिका और उसकी लॉबी को स्थान विशेष में दर्द तो हुआ ही है।

हम विश्व का सबसे बड़ा बाजार हैं, और हम विश्व में अपनी उत्पादन क्षमता भी विकसित कर लेंगे। सबसे कम समय में वैक्सीन बना लेना, वो भी तब जबकि वामपंथी हमारी ताली, थाली और टॉर्च पर मजे लेते रहे, आखिर गोरी चमड़ी वाले नस्लभेदी अमेरिकियों के गले कैसे उतरेगा। डेमोक्रेट पार्टी के पुरोधाओं ने विश्व में सबसे अधिक युद्ध-ग्रस्त इलाके बनाए जहाँ मानवता रोती नहीं, रेंगती और अपने मृत्यु की कामना करती है।

वो यह सब सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि उनके यहाँ बनने वाले हथियार बिकें। जो राष्ट्र हर दिन 42 लोगों की हत्या (आत्महत्या के अलावा) बंदूकों के कारण होता देखता है, लेकिन लॉबी की मजबूरी में कभी भी प्रतिबंध नहीं लगाता, उसे भारत में गिरती लाशों से क्या मतलब होगा? जिस राष्ट्र में हत्यारों की लॉबी इतनी सक्षम और संगठित है कि हर सौ व्यक्ति पर 120 बंदूकें हों, उसके लिए हरिश्चंद्र घाट पर जलती चिताओं को तीन से तीस हो जाने का असर क्यों पड़ेगा?

ये नस्लभेदी गोरे, कमला हैरिस को आगे कर के ‘फ्रर्स्ट ब्राउन फीमेल वाइस प्रेसिडेंट’ तो कह सकते हैं क्योंकि आज के दौर में यह उनके समाज की राजनैतिक विवशता है वरना ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ के पीछे के वामपंथी आने वाले समय में और भी आग लगाएँगे। परंतु, एक मूलतः श्वेत राष्ट्र के लिए किसी अश्वेत राष्ट्र की, गैर-ईसाई सरकार द्वारा वैक्सीन पहले बना लेने पर भी, उनकी अभिजात्यता और फॉल्स सेन्स ऑफ सुपिरियॉरिटी (यानी हम गोरे हैं तो तुमसे बेहतर ही होंगे), उन्हें इस बात के लिए कभी तैयार नहीं कर पाएगा कि वो हमारी वैक्सीन ले कर दान बचा लें।

यही अपराधबोध उन्हें फिल्मों की गुणवत्ता नहीं, उसमें काम करने वाले लोगों की नस्ल, लिंग, सेक्सुअल ओरिएंटेशन, चमड़ी के रंग आदि के आधार पर ऑस्कर देने को मजबूर करती है। हर क्षेत्र में क्वालिटी की जगह बाकी की हर पहचान जो कि ब्लैक, ब्राउन, एशियन, वूमन, वूमन ऑफ कलर, क्वीयर, समलैंगिक आदि के रूप में प्रभावशाली बन कर मूल उद्देश्य को ठक लेती है, उसे ही प्रचारित किया जाता है। इसीलिए, वो राजनेता नहीं, एक आइडेंटिटी को चुनते हैं, और अपने लगभग ढाई सौ सालों के इतिहास में पहला अश्वेत राष्ट्रपति, पहली महिला उपराष्ट्रपति जो भूरे रंग की, पहली वूमन ऑफ कलर जिसे बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर मिला हो आदि कर के लहालोट होते हैं।

ये उनकी उपलब्धि नहीं, शर्मिंदगी के आँकड़े हैं, जिन्हें वो सेलिब्रेट कर रहे हैं क्योंकि इनके पापों का घड़ा विशाल है, जो रिस-रिस कर बहता है, और इनकी जनसंहारवादी, स्लेव ट्रेड करने वाले, औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक समझने वाले, समलैंगिकों को जिंदा जलाने वाले, अश्वेतों को कीड़ों की तरह मानने वाली सामाजिक सोच को ढकने की कोशिश है।

नस्लवाद जिनके गुणसूत्रों में गहरे गुँथा हुआ है, वो एक कथित नीची नस्ल वाले अश्वेत राष्ट्र की मदद नहीं लेंगे, वरना उनकी मीडिया और समाज ही उन्हें नोच कर खा जाएगा। जिस राष्ट्र के कम्पनियों के लिए अरबों डॉलर का व्यापार उसी राष्ट्र के नागरिकों के जीवन से ज्यादा आवश्यक हो जाता है, वो कुछ लाशें क्यों नहीं गिरने देगा? कमला हैरिस को पड़ोस की चाची मान कर, घंटी बजा कर ‘चाची चायपत्ती होगी क्या’ के दिवास्वप्न देखने वाले क्या स्वयं को आईने में देख पा रहे होंगे?

कमला हैरिस जैसी दुष्टा किसी प्रतिभा के कारण वहाँ तक नहीं पहुँची, बल्कि अपने ही सामूहिक इतिहास के रक्तपात और पक्षपाती रवैये के अपराधबोध में ग्रस्त एक समाज की राजनैतिक मजबूरी के परिणाम के रूप में वो आज वहाँ की उपराष्ट्रपति है। इसलिए, ‘चाची चीनी मिलेगी क्या’ वालों के मुँह में चाची ने जो करेला और नीम निचोड़ा है, वो हमें याद रहेगा। जिह्वा से कड़वाहट चली जाएगी लेकिन उस समय को याद करके मुँह की ग्रंथियाँ कालांतर में भी उसी स्वाद को जीभ पर ले आएगी।

उभरता भारत पहले भी आँख का काँटा था, आज भी है

‘सोने की चिड़िया’ वाला वाक्यांश हम सबने अपने जीवन में एक-एक बार तो सुना ही होगा। इसी चिड़िया के पंख कतरने, अंडे चुराने की कोशिश लगभग हजार सालों से होती ही रही है। मुसलमानों से ले कर ईसाईयों ने लगातार हमले किए, लूट-पाट मचाई, हत्याकांड किए, लेकिन दोनों ही साम्राज्यवादी मजहब, अपने अंतिम लक्ष्य में सफल नहीं हो सके: भारत का ईसाईकरण या इस्लामीकरण। यह नहीं हो पाया, और आज भी एक अरब हिन्दू इनकी आँखों में खटकते हैं।

इसीलिए, चाहे कन्वर्जन हो या कोई और तरीका, विश्व के दो सबसे बड़े मजहब आज भी भारत को तबाह करने के लिए उद्यत हैं। लेकिन, अपनी रीढ़ सीधी करते भारत के लिए आत्मा का यह व्यापार अब गवारा नहीं। कुछ सरकारों ने निजी संपत्ति बनाने या परिवार का भविष्य संरक्षित करने के लिए अमेरिका की गोद में बैठने को चुना था, लेकिन अब वह संभव नहीं हो रहा। अब चर्चों के अजेंडे को मूक सहमति देने वाला भारत इन्हें दिखता नहीं, तो और तरीकों से हम पर हमले किए जा रहे हैं।

वैक्सीन बनाने की गति पर अमेरिका द्वारा यह हमला प्रत्यक्ष था क्योंकि एक अविकसित राष्ट्र ने 10, 11, 12 और 13 करोड़ लोगों को सबसे तेजी से वैक्सीन दिया और उसकी सटीकता भी विश्व में सबसे अच्छी रही। यह आखिर एक अकड़ू राष्ट्र को कैसे अच्छा लगेगा जबकि वो चाहते हैं कि भारत भी पाकिस्तान की तरह उनके द्वारा फेंके गए टुकड़ों पर पले और याचनामिश्रित भाव से देख कर कहे कि ‘अमेरिका को ऐसे महामारी के समय में मानवता के नाते भारत की मदद करनी चाहिए’।

जबकि, भारत न तो गिड़गिड़ाया, न ही मानवता की दुहाई दी और अपने डिप्लोमेटिक प्रयासों से, बिना आत्मसम्मान गँवाए, अपनी शर्तों पर अमेरिका को मनाया। वैश्विक पटल पर हमारा कद बढ़ा ही है, अमेरिका ने स्वयं को ही नंगा किया है। हमने छोटे राष्ट्रों की मदद की, जहाँ अमेरिका अपनी वैक्सीन भी बेचता और अपनी हत्यारी सेना के लिए बेस भी बनवाता। हमने उनसे कोई वादा नहीं करवाया, हमने कोई एयरबेस नहीं माँगा। हमने वही किया जो विश्व के कल्याण हेतु आवश्यक था।

चाहे ये दवाइयों का दलाल बायडन हो, या यह सर्पिणी जैसे आचरण वाली दुष्टा कमला हैरिस, इन्हें यह समझना होगा कि यह सदी भारत की है, और यह सदी सनातन धर्मावलम्बियों के उत्थान की सदी है जो विश्व की राजनीति को परिभाषित करेगी। काल का चक्र घूमता है, समय सदैव एक-सा नहीं रहता। हमने करोड़ों खोए हैं, फिर भी उठे। कोरोना भी जाएगा, हम वापस उठेंगे, एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में जो विश्व कल्याण के लिए नेतृत्व करेगा, न कि हत्यारे व्यापारियों और सेनाओं को लिए।



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