उत्तराखंड: 43 साल बाद लकड़ी के पुल से फिर तैयार हुई भारत-तिब्बत की पैदल गर्तांगली

24 अगस्त, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
भारत-तिब्बत के बीच गर्तांगली समुद्र तल से 11,000 फीट की ऊँचाई पर एक खड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई है

भारत से पड़ोसी तिब्बत जाने के लिए पैदल पथ गढ़तांग गलियारे को 43 वर्षों के बाद पुनः साहसिक पर्यटन के लिए खोल दिया गया है। इस पर एक लंबे समय से मरम्मत का कार्य चल रहा था। यह भी कहा जा रहा है कि इसे आगे आने-जाने के लिए एवं व्यापार संबंधी गतिविधियों के लिए भी तैयार किया जाएगा।

तिब्बत पर चीन का कब्ज़ा हो जाने के कारण अधिकतर तिब्बत के निवासी शरणार्थी के तौर पर भारत में आकर बस गए थे। ऐसे में भारत के तिब्बत क्षेत्र से रिश्ते और आना जाना पूरी तरह से समाप्त हो गया था।

इसके साथ ही इस क्षेत्र से भारत का व्यापार संबंधित कार्य भी लगभग बंद हो गया था। अब लगभग 40 वर्षों बाद वर्ष 2017 में भारत और तिब्बत के बीच के इस मार्ग की पुनः मरम्मत प्रारम्भ हुई और अब इसे साहसिक पर्यटन के लिए तैयार कर दिया गया है।


सदियों पुराना है इतिहास

स्थानीय लोगों की मानें तो 17वीं शताब्दी में पेशावर के पठानों के साथ स्थानीय जनता ने मिलकर, समुद्रतल से 11,000 फीट की ऊँचाई पर, जाड़ गंगा घाटी में गाँव नेलांग, जाढुङ्ग व भोट क्षेत्र के आवागमन के लिए हिमालय की खड़ी पहाड़ी को काट कर आने-जाने के लिए एक मार्ग तैयार किया था।

इसे दुनिया का सबसे खतरनाक रास्ता भी कहा जाता था। इसके निर्माण की प्रेरणा गाँव नेलाँग के निवासी सेठ धनीराम से प्रेरित होकर मिली थी। आगे चलकर इसे गर्तांगली के नाम से जाना गया।

यह सीढ़ीनुमा मार्ग 140 मीटर लंबा लकड़ी से तैयार किया गया था और यह भारत-तिब्बत व्यापार का सदा से साक्षी रहा था। नेलाँग/बगोरी के निवासी श्री नारायण नेगी और प्रधान सरिता रावत के बताया कि वर्ष 1962 से पूर्व भारत-तिब्बत के व्यापारी और गाँव जाढुङ्ग, नेलाँग के स्थानीय निवासी घोड़े-खच्चर व भेड़-बकरियों पर सामान लादकर इसी रास्ते से आया-जाया करते थे।

चित्र साभार- भारत भूषण गैरोला


भारत-चीन युद्ध के बाद लगभग दस वर्षों तक सेना द्वारा भी इसी मार्ग का उपयोग किया गया था, परंतु पिछले 40 वर्षों से गर्तांगली (Gartang Gali bridge) का उपयोग और रखरखाव न होने के कारण इसका अस्तित्व मिट सा गया था। 

बता दें कि उत्तरकाशी ज़िले की नेलाँग घाटी चीन सीमा से लगती है। सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण इस क्षेत्र को इनर लाइन क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। यहाँ पूरे क्षेत्र में सेना की कड़ी चौकसी रहती है और बिना अनुमति के आने-जाने पर रोक लगी है। 

तिब्बत के साथ व्यापार सम्बन्ध 

काफी समय पूर्व नेलाँग घाटी भारत-तिब्बत के व्यापारियों से भरी रहा करती थी। तिब्बत के कई व्यापारी ऊन, चमड़े से बने वस्त्र और नमक लेकर सुमला, नेलाँग की गर्तांगली होते हुए उत्तरकाशी आया करते थे। उस समय उत्तरकाशी में बाज़ार भी लगा करता था। इसी कारण उत्तरकाशी को बाड़ाहाट यानी बड़ा बाज़ार के नाम से भी जाना जाता है। 

अब ये मार्ग पर्यटन और ट्रैकिंग पर जाने वालों के लिए एक नया पर्यटन स्थल बन गए हैं। कई ट्रैकर जैसे राहुल पंवार, सुरजीत सिंह, संजय सिंह पंवार, अंकित ममगई और तिलक सोनी इस नए बने मार्ग से गुज़रने वाले पहले यात्री सदस्य बने।



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