एक उम्मीद का नाम, आरिफ मोहम्मद खान

07 मई, 2022 By: विजय मनोहर तिवारी
'आरिफ मोहम्मद खान एक उम्मीद का नाम हैं। एक ऐसी उजली उम्मीद जो हर भारतीय से की जानी चाहिए। वह हिंदू हो या मुसलमान।'-विजय मनोहर तिवारी का लेख

मैं कॉलेज में पढ़ता था, जब शाहबानो का केस दुनिया भर में चर्चा का विषय बना। तब मैं नहीं जानता था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ क्या होते हैं और क्यों होते हैं? मैं संडे ऑब्जर्बर और संडे मेल नाम के दो वीकली अखबार नियमित पढ़ता था।

शाहबानो के मामले में शाहबानो से ज्यादा एक और नेता को सुर्खियों में देखा था और मेरा ध्यान उन पर कॉलेज से निकलने के बाद भी लगातार बना रहा। वह तत्कालीन केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान थे, जो भारत को इक्कीसवीं सदी में ले जाने पर आमादा युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के फैसले से खुलकर असहमत थे।

वह शाहबानो के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में पलटने का निर्णय था। वह तुष्टिकरण की घृणित राजनीति का अंतिम नमूना था, जिसके तत्काल बाद कॉन्ग्रेस की रसातल यात्रा आरंभ हो गई थी।

कॉलेज के विद्यार्थी के रूप में राजीव गाँधी जैसे पढ़े-लिखे और एक अलग पेशेवर पृष्ठभूमि से आए प्रधानमंत्री हमारे लिए एक आकर्षक चेहरा था। मगर आकर्षण और साहस एक साथ हों, यह आवश्यक नहीं है। राजीव गाँधी इतने साहसी नहीं थे कि मुस्लिम बिरादरी की कुरीतियों के खिलाफ और महिलाओं को न्याय दिलाने के पक्ष में खड़े होते। कठमुल्लों के आगे झुकना आसान था।

उनके आकर्षण की कलई उतर गई थी। वे संयोग से प्रधानमंत्री बने थे और एक त्रासद अंत ने उनकी कहानी खत्म कर दी थी। उनके साथ ही कांग्रेस का जनाजा भी लोकतांत्रिक कब्रगाह की तरफ चला गया। मगर उनके नेताओं ने कभी अपने पतन की सरल समीक्षा भी नहीं की। वे जहाँ भी बचे खुचे हैं, आज भी एक्सपायरी डेट के हो चुके एकपक्षीय सेक्युलरिज्म की सड़ाँध मारती लाश को ढो रहे हैं।

मैं बात आरिफ मोहम्मद खान की कर रहा हूँ, जिनका चेहरा मेरे जेहन में हमेशा टिका रहा। मैंने उनके विचार लेखों में पढ़े, टीवी की बहसों में सुने और इंटरव्यूज में लगातार उन्हें गौर से सुनता रहा। अपने आसपास और टीवी पर चमकने वाले हर पार्टी के मुस्लिम चेहरों और तथाकथित आलिमों (शेरवानी और टोपी जिनके आसमानी लिबास हैं। शक्ल सूरत सुभानअल्लाह।) के बीच आरिफ साहब एक अलग ही शख्सियत महसूस हुए।

2012 के यूपी के विधानसभा चुनावों में मैं दो महीने वहाँ था। मुझे याद है लखीमपुर खीरी से बहराइच जाते हुए मैंने उन्हें फोन किया था। लेकिन तब वे सक्रिय राजनीति से दूर अपने अध्ययन और चिंतन की दुनिया में शायद एकाकी थे और गुजारिश कर रहे थे कि मेहरबानी करके उनसे चुनाव और सियासत पर कोई बात न की जाए।

जो शख्स केंद्र में मंत्री रहा हो और जिसके सामने पूरी उम्र सत्ता में रहने के लिए पड़ी हो, जिसने अपने ही प्रधानमंत्री के निर्णय से असहमति में सरकार से इस्तीफा दिया हो और शाहबानो जैसा ज्वलंत मसला भी उन्हीं की कौम से जुड़ा रहा हो, एक ऐसा मसला जिसमें पूरी कौम एक तरफ हो और वह कॉन्ग्रेस का वोट बैंक हो, एक आम मुसलमान नेता से आप ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपने करिअर को दाँव पर लगाकर अपनी ही कौम के निशाने पर आ जाएगा। ऐसा जानलेवा जोखिम लेना हर किसी के बूते की बात नहीं है।

सिर्फ आरिफ मोहम्मद खान ही ऐसा कर सकते थे, क्योंकि केवल सियासत और सियासत से फायदे बटोरने की मनोवृत्ति वाले दूसरों जैसे मुस्लिम नेता नहीं थे। सांसद के रूप में चुने जाने के बाद उन्होंने खुद को मुस्लिम नेता के रूप में चित्रित करने पर भी आपत्ति उठाई।

उन्होंने साफगोई से कहा कि उन्हें सबने वोट दिए। अब जीतकर मैं मुस्लिम नेता बन जाऊँ तो उनको धोखा दूँगा, जो मुस्लिम नहीं हैं। मुझे मुस्लिमों का नेता मत कहिए।

मजबूत रीढ़ की हड्‌डी और साफ-सुथरे दिमाग वाला नेता ही ऐसा कह सकता है और इंसाफ और सच के लिए अपने आप को दाँव पर लगा सकता है। आरिफ साहब ने अपनी आत्मा की आवाज सुनी और पूरी दृढ़ता से सामने आए।

यह सामने आना उनके लिए एक लंबे वनवास का विषय बन गया। मगर वे एक राजनेता से ज्यादा एक अध्येता हैं। अपने दिमाग को तीन सौ साठ डिग्री पर खोलकर रखने वाले उदार हृदय भारतीय, जिनके जेहन में भारत बसता है। जिनके दिल में भारतीयता धड़कती है।

मुसलमान उन्हें किस नजर से देखते हैं, मुझे रजत शर्मा के साथ उनके एक लंबे इंटरव्यू की याद है, जिसके लाइव प्रसारण के दौरान मुस्लिम युवाओं ने उन्हें क्या-क्या नहीं कहा था। यह सोच का फर्क है। इसकी परवाह किए बिना आरिफ साहब ने हमेशा वही बात कही, जो देश के हित में थी, समाज के हित में थी, आम नागरिकों के हित में थी, वह चाहे किसी धर्म या मजहब को मानने वाला क्यों न हो।

यही वजह है कि मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं के बीच उनकी स्वीकार्यता काफी ज्यादा रही है। उन्हें संजीदगी से सुना जाता है और उनकी बातों पर गौर किया जाता है।

आदि शंकराचार्य की जयंती के मौके पर भोपाल के एक भव्य सभागार में वे कल केरल से आए और यह कहते हुए बहुत भावुक थे कि वे आदि शंकर की जन्मभूमि से आए हैं। उस राज्य के मुखिया हैं और एक ऐसी जगह पर बुलाए गए हैं, जहाँ खुद आदि शंकर बहुत कम उम्र में अपने गुरू की तलाश में पैदल चलकर आए थे।


आरिफ मोहम्मद खान ने आदि शंकर के जीवन के कई प्रसंग और उनकी कई रचनाओं का उल्लेख किसी अफसर के लिखे हुए भाषण की तरह नहीं किया। वे ऐसा कभी नहीं करते। अपने पचास साल के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के लिए दिमाग के हर खिड़की-दरवाजे को खोलकर रखा है और इस अभ्यास में भारत की सनातन ज्ञान परंपरा के अमृत को भी चखा है।

उनमें भारत के ऋषियों की सर्वश्रेष्ठ और मंगलकारी शिक्षाओं का उल्लेख करने का साहस है। पढ़ते बहुत लोग हैं। समझते भी बहुत लोग हैं। स्वीकार कम लोग करते हैं। व्यक्त और भी कम कर पाते हैं। खासकर जब वे इस्लाम के ऐसे सख्त दायरे से आते हों,जहाँ किसी और धर्म की श्रेष्ठ बातों को स्वीकार करना तो दूर उस तरफ झाँकना भी कुफ्र है।

आरिफ मोहम्मद खान ने कहा-

“जिस राज्य ने विश्व को आदि शंकर जैसा एक सूत्र में पिरोना वाला महापुरुष दिया, वहाँ से उनकी गुरू भूमि पर आने का अवसर मेरे लिए सौभाग्य की बात है। शंकर ने कभी ये दावा नहीं किया कि ये ज्ञान उनका है। उन्होंने समय के साथ संस्कृति पर इकट्ठा धूल को साफ किया। समाज को आगे बढ़ने के लिए एकता जरूरी है। एकता का आधार क्या हो, रंग, भाषा या आस्था? भारत की सभ्यता ने सत्य को एक ही बताया। संतों ने अपने तप से मनुष्य के लिए मार्ग खोजे। आज विश्व को अद्वैत की जरूरत है।”

उन्होंने कहा कि संसार में विविधता का इतिहास हज़ारों साल का है। लेकिन हम दुनिया को नहीं बता सके कि भारत भूमि ज्ञान की भूमि रही। विवेकानंद ने कहा था कि विविधता के बीच एकता की खोज ही ज्ञान है। आदि शंकर ने चारों मठों को चार वेद वाक्य दिए जिनके मनुष्य मात्र के लिए महान अर्थ है। मनुष्य में असीमित संभावनाओं को उन्होंने देखा। उन्होंने सारे भेद हटाकर हर मनुष्य को मोक्ष का अधिकारी बताया।

अब जिसके नाम के आगे खान लगा हो, जो आरिफ के साथ मोहम्मद भी हो, उसके मुंह से मोक्ष की बातें। भारत की महान ज्ञान परंपरा के उल्लेख। ऋषियों की अमर वाणी और वो भी शुद्ध संस्कृत में। संतों के तप के प्रति गहरा आदर। तौबा-तौबा!

भारत के दूषित सेक्युलर माहौल में यह उल्टी गंगा के बहने का एक नमूना लगता है। लेकिन आरिफ मोहम्मद खान इसीलिए आरिफ मोहम्मद खान हैं। करोड़ों हिंदुओं के मन में इस्लाम के प्रति जितनी भी श्रद्धा और आशा है तो वह ऐसी ही विभूतियों की वजह से है वर्ना खरगोन से लेकर जोधपुर तक गलियों से उबलती दीनदारों की भीड़ अपना अपने दीन का परिचय स्वयं दे रही है।

कर्नाटक में हिजाब से लेकर महाराष्ट्र में लाउड स्पीकर तक और बीच में कर्कश हैदराबादी आलाप एक दूसरी ही दुनिया के दर्शन करा रहे हैं, जिनसे पूरी दुनिया ही हलाकान है। यह कल्पना ही की जा सकती है मुस्लिम समुदाय की शक्ल तब क्या होगी, जब आरिफ मोहम्मद खान जैसे लीडर सर्वस्वीकार्य होंगे। इसके लिए सब तरह की जमातों की जकड़न से छुटकारा जरूरी है और उनसे भी मुक्ति, जो शेरवानी-टोपी पहनकर कौम को फसाद में धकेलने में लगे हैं।

आरिफ मोहम्मद खान अभी तिरुवनंतपुरम् के राजभवन में हैं और आम भारतीय उन्हें भविष्य में दिल्ली की रायसीना पहाड़ी के उस पते पर देखना चाहते हैं, जिसके लिए वे भारत माता के एक सुयोग्य पुत्र हैं।

कल भोपाल के सभागार से निकले ऐसे कई दर्शक और श्रोता थे, जो यह शुभकामना उनके लिए व्यक्त कर रहे थे। आरिफ मोहम्मद खान एक उम्मीद का नाम हैं। एक ऐसी उजली उम्मीद जो हर भारतीय से की जानी चाहिए। वह हिंदू हो या मुसलमान।

अपनी उन जड़ों से जुड़ा हुआ, जो हजारों साल की भारत की सनातन यात्रा में बहुत गहरी हैं। ऊपर हमारी पहचानें जो भी हों, जैसी भी हों लेकिन पत्तों पर नया रंग पोत देने से जड़ें नहीं बदल जातीं।



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