शेख-नेहरू द्वय से गुपकार तक: कश्मीर का सुल्तान बनने का ख्वाब आज भी कई दिलों में जिंदा है

05 अगस्त, 2021 By: संजय राजपूत
जम्मू कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा ख़त्म हुए दो साल पूरे हो चुके हैं

“शेख अब्दुल्ला या गोपालस्वामी हमेशा के लिए नहीं हैं, लेकिन कश्मीर का भविष्य आने वाली भारत सरकारों की ताकत और इकबाल पर टिका है। अगर हमें अपनी ताकत पर यकीन नहीं है, तो हम राष्ट्र कहलाने लायक नहीं हैं।”

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 लागू होने के बाद ये शब्द थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल के! अनुच्छेद 370 लागू करने में सरदार पटेल की भी अहम भूमिका थी। उनकी सहमति से ही यह अनुच्छेद लागू हुआ था।

अनुच्छेद 370 की कहानी शुरू होती है भारत की आज़ादी के बाद से। जम्मू कश्मीर रियासत के महाराजा न तो भारत में शामिल होना चाहते थे और न ही पाकिस्तान में! वो ‘स्वतन्त्र’ रहना चाहते थे। लेकिन पाकिस्तान हर हाल में कश्मीर चाहिए था। महाराजा हरिसिंह की जिद के बीच पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर की घेराबन्दी शुरू कर दी और कबायलियों एवं कट्टरपंथियों की मदद से कश्मीर पर हमला कर आधा राज्य कब्जा भी लिया।

दरअसल राजा हरिसिंह के भारत में न शामिल न होने की वजह शेख अब्दुल्ला थे। अब्दुला महाराज हरिसिंह के खिलाफ बगावत कर रहे थे इसलिए महाराजा ने अब्दुल्ला को जेल में बन्द कर रखा था। नेहरू चाहते थे कि अब्दुल्ला को जेल से रिहा कर के उन्हें कश्मीर की सत्ता सौंप दी जाए। अब्दुल्ला नेहरू के बेहद करीबी थे और महाराजा को डर था कि भारत में शामिल होने के बाद उन्हें राज्य से बेदखल किया जा सकता है।

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सरदार पटेल रियासती मामलों के मंत्री थे, उन्होंने राजा हरिसिंह को यकीन दिलाया कि भारत में शामिल होने के बाद उनके हितों की रक्षा की जाएगी। आखिरकार पटेल के प्रयासों से राजा हरिसिंह जम्मू और कश्मीर रियासत भारत की आज़ादी के लगभग 2 महीने बाद भारत में शामिल हुई।

26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ यानी शामिल होने का समझौते पर हस्ताक्षर कर के भारत में शामिल होने की घोषणा की। वादे के अनुरुप, जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया पटेल के करीबी जस्टिस हेमचन्द महाजन को। लेकिन नेहरू चाहते थे कि महाजन को हटा कर शेख अब्दुल्ला को जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया जाए। हालाँकि विलय के वक्त नेहरू ने महाराजा से वादा किया था कि महाजन राज्य के प्रधानमंत्री बने रहेंगे।

नेहरू अब पटेल पर महाजन को पद से हटाने का दवाब बनाने लगे। नेहरू ने खत लिखकर पटेल से कहा कि राज्य में तुंरन्त अंतरिम सरकार बनाने और शेख अब्दुल्ला को प्रधानमंत्री बनाए जाने की आवश्यकता है। पटेल के कहने पर महाजन ने जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और जम्मू कश्मीर के नए प्रधानमंत्री बने शेख अब्दुल्ला।

महाराज हरिसिंह से नेहरू ने ये वादा किया कि अब्दुल्ला सिर्फ राज्य सरकार का काम काज सम्भालेंगे और मुखिया आप ही बने रहेंगे। अब तक जम्मू कश्मीर मामले की पूरी जिम्मेदारी रियासती मंत्री सरदार पटेल के हाथों में थी, लेकिन अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री बनते ही नेहरू ने जम्मू कश्मीर मामलों का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।

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गोपालस्वामी अयंगर


नेहरू ने अपने करीबी एन गोपालस्वामी अयंगर को जम्मू कश्मीर का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया। अयंगर अब बिना पटेल को कोई जानकारी दिए राज्य से जुड़े मामलों पर मनमर्जी के फैसले लेने लगे। पटेल ने इस पर नेहरू से नाराजगी जताई। इस पर नेहरू ने पटेल से कहा कि अयंगर उनके कहने पर राज्य से जुड़े फ़ैसले ले रहे हैं।

नेहरू ने कहा कि जम्मू कश्मीर की जिम्मेदारी अब उनकी है, इसलिए पटेल इस मामले में दखल न दें। जवाब में पटेल ने अपना इस्तीफ़ा लिख दिया। पटेल के इस्तीफ़े की पेशकश के बाद में विक्टिम कार्ड खेलते हुए नेहरू ने भी यह कहते हुए इस्तीफे की पेशकश कर दी कि अगर उन्हें जम्मू कश्मीर पर पॉलिसी बनाने का हक नहीं है तो वो खुद ही इस्तीफ़ा दे देते हैं। विवाद गाँधी जी तक गया और उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए दोनों के बीच सुलह करा दी।

इस बीच 31 दिसंबर, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन के कहने पर नेहरू कश्मीर मामले को लेकर संयुक्त राष्ट्र चले गए। संयुक्त राष्ट्र में भारत की ओर से प्रतिनिधि के तौर पर नेहरू ने अपने करीबी एन गोपालस्वामी अयंगर को भेजा।

हुआ ये कि अयंगर मजबूती से भारत का पक्ष नहीं रख पाए, जबकि ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों ने भी पाकिस्तान का पक्ष लिया। भारत का अंदरूनी जम्मू कश्मीर मामला अब भारत-पाकिस्तान मामला बन गया।

लॉर्ड माउंटबेटन ने ये कहते हुए जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया कि अयंगर जैसे नाकाबिल व्यक्ति को संयुक्त राष्ट्र भेजने का फ़ैसला गलत था। इधर नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को राज्य का प्रधानमंत्री बनाकर पूरी ताकत उन्हें सौंप दी और शेख अब्दुला ने भी भारत के साथ जीने मरने का ऐलान कर दिया। सत्ता हाथआते ही अब्दुला ने बड़े फ़ैसले लेने शुरू कर दिए, उनमें सबसे विवादित फैसला था भूमि सुधार कानून लागू करने का।

अब्दुल्ला ने अप्रैल, 1949 में राज्य में भूमि के समान बँटवारे के लिए कमेटी गठित की। दरअसल राज्य की 22 लाख एकड़ खेती योग्य भूमि महाराजा की, जागीरदारों और छोटे किसानों की थी जो हिन्दू थे और इनमें कृषि मजदूरी करने वाले मजदूर मुस्लिम थे। कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही अब्दुल्ला ने अपना मनचाहा कानून लागू कर दिया।

कानून के अनुसार, 20 एकड़ से ज्यादा भूमि जिसके पास थी, वो छीन कर मुस्लिम मजदूरों को देनी तय की गई। ऐसा ही हुआ भी, जम्मू कश्मीर के हिन्दू परिवारों की जमीनें छीन कर मुस्लिमों को सौंप दी गई और जमीन के बदले कोई मुआवजा भी नहीं दिया गया। सत्ता और ताकत हाथ आते ही अब्दुल्ला ने महाराजा हरिसिंह को राज्य से बाहर निकालने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।

नेहरु जानते थे कि राज्य का मामला अब संयुक्त राष्ट्र में है और बिना अब्दुल्ला की मदद के भारत जनमत संग्रह में जीत नहीं सकता। मजबूरन नेहरू को महाराजा हरिसिंह को 6 महीने के लिए राज्य छोड़ने के लिए राजी करना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि महाराजा एक बार कश्मीर से बाहर गए, तो उनकी अस्थियाँ ही वापस लौट सकीं।

महाराजा हरिसिंह

इस बीच अब्दुल्ला की महत्वकाँक्षाएँ बढ़ गईं। वो अब ‘कश्मीर का सुल्तान’ बनना चाहते थे और वो कश्मीर को स्वतन्त्र राज्य बनाए जाने के लिए बात करने लगे। इसके लिए अब्दुल्ला ने भारत मे अमेरिका और ब्रिटेन के राजदूतों से खुफिया मुलाकातें भी शुरू कर दीं। अब्दुल्ला का भारत से मोह भंग हो चुका था। उन्होंने नेहरू से अलग संविधान सभा की माँग की, जिसे नेहरू नें तुंरन्त मान भी लिया।

शेख अब्दुल्ला जब भीमराव अंबेडकर के पास विशेष राज्य के दर्जे के लिए समर्थन माँगने गए तो अंबेडकर ने इससे स्पष्ट मना कर दिया। उन्होंने शेख को फटकार लगाते हुए कहा था कि यदि वो चाहते हैं कि भारत उनकी रक्षा भी करे, उनके लिए बुनियादी निर्माण करे, जनता को खिलाए, और फिर भी भारत के पास इस राज्य का कोई अधिकार भी ना रहे तो वो इस तरह की माँग के पक्ष में नहीं हैं।

अब्दुल्ला का कहना था कि इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के क्लॉज 7 के तहत जो रियासतें भारत में शामिल हुई थीं, उनके भीतर भारत की दखलंदाजी सिर्फ विदेश नीति, रक्षा और संचार तक सीमित थी। इन राज्यों को भारत का सँविधान मानने की मजबूर नहीं किया जा सकता था। नेहरू ने कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए हामी तो भर दी थी, लेकिन इसके सामने सबसे बड़ी समस्या थे, सरदार पटेल।

नेहरू बड़ा दाँव चलते हुए प्रस्ताव पेश करने की जिम्मेदारी अपने करीबी एन गोपालस्वामी अयंगर को सौंप ब्रिटेन चले गए। प्रस्ताव को तैयार करने से लेकर प्रस्ताव में क्या है, इसकी कोई भी जानकारी पटेल को नहीं दी गई थी। पटेल को इसके बारे में जानकारी तब मिली जब प्रस्ताव को सांसदों के समक्ष बैठक में रखा गया।

बैठक में मौलाना अबुल कलाम आजाद को छोड़कर किसी कॉन्ग्रेस नेता ने प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। प्रस्ताव को भारत के साथ धोखा बताया गया। अब सांसदों को समझाने की जिम्मेदारी पटेल पर थी। पटेल ने अगली बैठक में कॉन्ग्रेस सांसदों को प्रस्ताव के लिए राजी कर लिया।

दरअसल पटेल जानते थे कि नेहरू जानबूझ कर इस अहम प्रस्ताव को पेश करने के वक्त ब्रिटेन गए हैं और अयंगर जो भी कर रहे थे, वो नेहरू के आदेश पर ही कर रहे थे। उधर नेहरू भी ये जानते थे कि उनकी गैरमौजूदगी में पटेल उनके करीबी अयंगर के खिलाफ नहीं खड़े होंगे। पटेल के समर्थन के बाद 17 अक्टूबर, 1949 को संविधान सभा में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाला आर्टिकल 306 A पास हो गया।

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यह आर्टिकल 306 A ही आगे चलकर आर्टिकल-370 कहलाया। इस विवादित आर्टिकल को पटेल के समर्थन मिलने से उनके राजनैतिक सेक्रेटरी वी शंकर हैरान थे। वी शंकर से बात करते हुए पटेल ने कहा था:

“मैं, तुम, शेख अब्दुल्ला, गोपालस्वामी या नेहरू, हमेशा के लिए नहीं रहेंगे, लेकिन कश्मीर का भविष्य आने वाली भारत सरकारों की ताकत और इकबाल पर टिका है। अगर हमें अपनी ताकत पर यकीन नहीं है, तो हम राष्ट्र कहलाने लायक नहीं हैं।”

15 दिसम्बर, 1950 को पटेल की मृत्यु हो गई। 27 मई, 1964 को नेहरू की मृत्यु हो गई। उसके बाद कई सरकारें आई और गईं, लेकिन अस्थाई आर्टिकल 370 हटाने की ताकत और इकबाल किसी ने नहीं दिखाया।

आखिरकार सच साबित हुई सरदार पटेल की बात

कश्मीर को भारत से अलग करने वाला आर्टिकल तब हटा जब केंद्र में सरकार बनी नरेंद्र मोदी की। आर्टिकल 370 को सत्तर साल बाद 5 अगस्त, 2019 को निरस्त कर के केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी ताकत और इकबाल का परिचय दिया, उसी ताकत और इकबाल का, जिसका जिक्र कभी सरदार पटेल ने किया था।

आज इस फैसले की दूसरी बरसी है। नेहरू की महान भूलों में से एक, जम्मू कश्मीर राज्य को दिया गया विशेष दर्जा ख़त्म हुए दो साल हो चुके हैं। मोदी सरकार का दावा है कि जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटना घाटी में शांति स्थापित करने के लिए बेहद आवश्यक था।

इसके बाद से केंद्र सरकार द्वारा इलाके में कई प्रकार की घोषणाएँ की गई हैं। आम जान-जीवन काफी हद तक पटरी पर लौट चुका है। हालाँकि, आतंकवादी और चरमपंथी संगठन अभी भी कुछ हद तक इलाके में सक्रीय हैं लेकिन भारतीय सेना और सुरक्षाबलों ने उनके हौंसलों को मजबूती से रौंदा है।

मोदी सरकार ने आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बुधवार (4 अगस्त, 2021) को राज्यसभा में बताया कि पिछले करीब तीन साल में जम्मू कश्मीर में सुरक्षाबलों और आतंकवादियों के बीच 400 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 85 सुरक्षाकर्मी वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि 630 आतंकियों को मार गिराया गया है।

जून, 2021 तक पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में 664 बार युद्धविराम (सीजफायर) का उल्लंघन किया गया और सीमा पार से गोलीबारी हुई।

वहीं गुपकार गठबंधन के दल इसका अब तक विरोध कर रहे हैं। खासकर, महबूबा की पीडीपी तो इस दिन को काला दिवस के रूप में मना रही है। पीडीपी प्रमुख ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा दो साल पहले लिए गए निर्णय से भाजपा खुश है, जबकि कश्मीर शोक में डूबा है।

इस फैसले का विरोध करने वाले अधिकतर लोग ‘शेख अब्दुल्ला सिंड्रोम’ से पीड़ित हैं। उन्हें भी कश्मीर का सुल्तान बनना है। हालाँकि, यह अब उनके लिए किसी दिवास्वप्न से अधिक और कुछ नहीं!



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