भगत सिंह के साथी वो क्रांतिकारी, जिन्हें आजाद भारत में करनी पड़ी सिगरेट कंपनी में नौकरी

20 जुलाई, 2021 By: पुलकित त्यागी
क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त

“बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत पड़ती है”

यह कथन हुतात्मा क्रांतिकारी भगत सिंह द्वारा दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में 8 अप्रैल, 1929 को धमाका करने से पूर्व कहा गया था। स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह एवं उनके साथी बहरी अंग्रेज़ी सरकार तक अपनी और देशवासियों की उस आवाज़ को पहुँचाना चाहते थे, जिसे युवा क्रांतिकारियों से भयभीत गोरों द्वारा दबाने का संपूर्ण प्रयत्न किया जा रहा था। 

1857 की क्रान्ति के विफल हो जाने के बाद, भगत सिंह और उनके साथियों के इस कृत्य से पहले, किसी ने यह न सोचा था कि अंग्रेजों के विरुद्ध उन्हीं की सभा में घुसकर इस प्रकार की बग़ावत भी संभव हो सकती है। परंतु इस पूरी घटना में भगत सिंह अकेले नहीं थे उनका साथ देने वाले थे ‘बट्टू’ के नाम से चर्चित 19 वर्षीय बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt), जिनका हम आज उनकी 55वीं पुण्यतिथि पर स्मरण कर रहे हैं।

18 नवंबर, 1910 को एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में जन्मे बटुकेश्वर ने अपनी स्कूली शिक्षा कानपुर में संपन्न की। बटुकेश्वर वर्ष 1924 में कानपुर में ही चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में आए, जहाँ उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) में शामिल होकर स्वतंत्रता के युद्ध में अपना योगदान दिया।

असेंबली में बम विस्फोट का निर्णय

20 अक्टूबर, 1928 को ‘साइमन कमीशन’ के विरोध मार्च में एक अहिंसक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय को चिन्हित कर अंग्रेज़ी पुलिस द्वारा लाठियों के निरंतर वार से उनकी नृशंस हत्या कर दी गई। इसके प्रतिकार में HSRA (HRA से बदल कर रखा गया नाम)ने लाला जी की हत्या के दोषी अंग्रेज़ पुलिस अफसर जेम्स स्कॉट को मारने का विचार किया।

लाला लाजपत राय जैसे महान क्रांतिकारी की मौत का बदला लेने के बाद भी देश की जनता के बीच एचएसआरए को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिख रही थी। जनता को अपने साथ जोड़ने एवं अंग्रेज़ी सरकार के बहरे कानों में अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए आज़ाद, भगत सिंह, दत्त एवं अन्य एचएसआरए के सदस्यों द्वारा दिल्ली असेंबली में बम फेंकने का निर्णय लिया गया।

इसके बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर ने द्वारा जतिन दास नामक रसायन विज्ञान (Chemistry) के प्रोफेसर से बम बनाने का प्रशिक्षण लिया। असेंबली में धमाका करते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि किसी की जान को क्षति न पहुँचे। एचएसआरए का उद्देश्य लोगों को मारना नहीं बल्कि अंग्रेज़ी हुकूमत को अपनी उपस्थिति और विरोध की आवाज़ सुनाना था।

काकोरी षडयंत्र के नायक- अशफाकउल्लाह खाँ, राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह

जहाँ एक ओर महात्मा गाँधी द्वारा इसे ‘हिंसक’ और ‘कायरता’ पूर्ण कहा गया, वहीं दूसरी ओर एचएसआरए के इस कृत्य के बाद, पहले दिल्ली की सेंट्रल असेंबली और उसके उपरांत समस्त राष्ट्र “इंकलाब ज़िंदाबाद-साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारों से गूँज उठा।

2002 में राजकुमार संतोषी द्वारा बनाई गई फिल्म ‘द लेजेंड ऑफ़ भगत सिंह’ में भास्वर चटर्जी द्वारा बटुकेश्वर दत्त का किरदार निभाया गया 

जेल में भूख हड़ताल

बम कांड के बाद स्वयं अपनी गिरफ्तारी देने वाले भगत और बटुकेश्वर ने जेल के भीतर भी क्रांति जारी रखी। उन्होंने अंग्रेज़ पुलिस द्वारा अंग्रेज़ी कैदियों से इतर भारतीय कैदियों के साथ जेल में होने वाले भेदभाव के मुद्दों को उठाया। उन्होंने राजनीतिक कैदियों को अखबार और किताबों जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराने को लेकर एक लंबी भूख हड़ताल की।

बताया जाता है कि उनके द्वारा की गई है यह भूख हड़ताल 100 से अधिक दिनों तक चली जिसके बाद अंततः अंग्रेज़ी सरकार को घुटने टेकने पड़े। जेल से बाहर निकलने के उपरांत बटुकेश्वर को टीबी भी हो गई, इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता की जंग में अपना योगदान जारी रखा।

अज्ञातवास में कटा जीवन

1931 में भगत, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी के तख़्त पर वीरगति प्राप्त होने बाद भी बटुकेश्वर ने स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी, जिसमें वे 1942 में पुनः जेल गए। परंतु स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार द्वारा उन्हें और उनके कार्यों को उतनी ही मान्यता दी गई, जितनी कि अन्य कई बिस्मिल, आज़ाद और सावरकर जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों को।

बटुकेश्वर स्वतंत्रता की इस लड़ाई में जीवित बेशक बच गए, परंतु उन्होंने स्वतंत्रता के बाद का अपना समस्त जीवन बेहद कठिन परिस्थितियों में बिताया। राष्ट्र को स्वतंत्र कराने के लिए जान पर खेल जाने वाले इस सेनानी को स्वतंत्रता के बाद सिगरेट की कम्पनी में एजेंट के रूप में काम कर के और ब्रेड-बिस्कुट बेचकर अपना जीवन निर्वाह करना पड़ा। परिवार का पेट भरने के लिए बटुकेश्वर ने टूरिस्ट गाइड जैसे काम भी किए। 


दत्त ने भगत सिंह को बंगाली सीखने में भी मदद की थी। भगत सिंह के बलिदान के बाद उनकी माँ बटुकेश्वर दत्त को ही अपना बेटा कहती थीं। आजादी के बाद भुला दिए गए इस आजादी के नायक बटुकेश्वर दत्त ने कई बार इस बात को दोहराया कि उन्हें फाँसी दी जानी चाहिए थी।

स्वतंत्रता के बाद, सत्तासीन भारतीयों ने दत्त को औपनिवेशिक राज के उनके संघर्ष में उनकी भागीदारी के लिए कोई मान्यता नहीं दी। वह गरीबी में रहे और अपनी रीजन की जिंदगी में कष्ट झेले।

जीवन के अंतिम क्षणों में भगत सिंह की माँ विद्यावती के साथ दत्त 

वर्ष 1964 में कैंसर से पीड़ित हो जाने के बाद इस महान आत्मा ने 20 जुलाई, 1965 को अपने प्राण त्याग दिए। बटुकेश्वर का अंतिम संस्कार उनकी अंतिम इच्छा अनुसार उनके साथी स्वतंत्रता सेनानियों भगत, राजगुरु एवं सुखदेव की भाँति ही हुसैनीवाला पंजाब में किया गया।

आज उनकी 55वीं पुण्यतिथि के अवसर पर कई बड़ी हस्तियों ने उनका स्मरण करते हुए सोशल मीडिया पर विभिन्न पोस्ट साझा किए और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कीं। 






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