क्या वाकई सरकार निकम्मी है? या हमारा भी योगदान है?

18 अप्रैल, 2021 By: अजीत भारती
कुम्भ को हॉटस्पॉट बताने वाले रमजान की भीड़ पर चुप हैं (प्रतीकात्मक चित्र/साभार: इकोनॉमिक टाइम्स)

पिछले साल जब हम इसी समय में जनता कर्फ्यू, थाली पीटने, टॉर्च जलाने आदि का उपहास कर रहे थे, उस समय हमारे सामने इटली और अमेरिका की सर्वोच्च स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की विवशता का उदाहरण था। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी थी, उसे आधार मान कर कुछ 50-65 करोड़ संक्रमण और एक-डेढ़ करोड़ मृत्यु का आँकड़ा अलग-अलग शोधकर्ता और ‘कोरोना मामलों के जानकार’ बता रहे थे।

नौ महीने बीतते-बीतते, भारत की जनसंख्या और मृत्यु दर पूरे विश्व में एक मिसाल बन कर उभरी। ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था के रहते हुए भी अप्रत्याशित सफलता। कोरोना की तीन वैक्सीन तैयार हुई, 11 करोड़ लोगों को दिया गया, और लगा कि महामारी नियंत्रण में आ चुकी है। इसके पहले से कुम्भ की तैयारी चल रही थी, चुनाव के दिन सार्वजनिक हो चुके थे।

अब दोबारा वायरस के नए संस्करणों ने पिछले साल से अधिक भयावह रूप ले कर आक्रमण किया है। वही खबरें और हेडलाइन वापस सामने हैं: मौत का आँकड़ा छुपा रही है सरकार, मौत का तांडव जारी, अस्पतालों में बेड नहीं हैं, ऑक्सीजन की कमी हो गई है, लोग सड़कों पर मर रहे हैं, दवाई नहीं मिल रही है आदि।

ये सारी खबरें सत्य ही हैं, इससे कोई इनकार नहीं। मौत के आँकड़े और जलती लाशों की संख्या में कई जगहों पर भारी अंतर है। लेकिन, इतना होने पर भी एक खास तरह के लोगों की विकृत मानसिकता सिर्फ यह साबित करने पर आमादा है कि ये मोदी सरकार की असफलता है और उसने देश को डुबा दिया। जबकि, मूर्ख व्यक्ति भी यह बात जानता है कि स्वास्थ्य सेवाएँ राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी हैं। जहाँ केन्द्र की मदद की आवश्यकता थी, वहाँ वो फंड से अथवा अन्य माध्यमों से सहायता कर ही रहे हैं।

दो कुतर्कों पर बात करूँगा। पहला है, मंदिर और अस्पताल वाला; दूसरा है कुम्भ और चुनाव वाला। मंदिर की जहाँ तक बात है तो कौन-सा मंदिर सरकार ने बनवा दिया? नाम बताओ। किस मंदिर के चंदे के लिए किस सरकार का कौन सा मंत्री कोरोना का काम छोड़ कर सड़कों पर घूम रहा था? क्या इस सरकार ने सोलह एम्स नहीं बनवाए? पीजी की सीटें 80% किसके कार्यकाल में बढ़ी? सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की संख्या में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी किसके कार्यकाल में हुई? जवाब है: मोदी के। इसलिए बकचोदी वहीं करो, जहाँ लोग तथ्य नहीं जानते।

पीपीई आयात से पीपीई निर्यात तक; वेंटिलेटर के आयतक से, उसके निर्यातक तक; वैक्सीन के लिए इजरायल, अमेरिका के मुँह ताकने से दुनिया में सबसे पहले तीन वैक्सीन बनाने और दूसरे देशों को फ्री में और दाम ले कर वैक्सीन देने तक, यही वो देश था और यही सरकार थी। जब लोग अर्थव्यवस्था के डूबने की आशा देख रहे थे, तब हम रिकवर कर रहे थे।

कुम्भ पर जब बोलते हो, तो किस आँकड़े के आधार पर? महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे साल के किस महीने हरिद्वार के वर्तमान आँकड़ों से कम आँकड़े देते रहे? बंगाल-असम के कोविड के आँकड़े ज्यादा हैं या फिर राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के? हॉटस्पॉट कुम्भ कैसे हो गया? रमजान की भीड़ों पर क्यों चुप हो? तब्लीगी को कितना डिफेंड किया था जो न टेस्टिंग करा रहे थे (छुप रहे थे हर जगह), न ही बता रहे थे, बल्कि थूक रहे थे हर जगह। ये सवाल तो हर बार पूछे ही जाएँगे। कुम्भ का डेटा निकालो, चनाव वाले राज्यों का निकालो और महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली का निकालो, इसके बाद विश्लेषण करो। नहीं कर पाओगे क्योंकि मोदी को ब्लेम करने के लिए कुछ नहीं मिलेगा।

इसके आगे एक बात और। क्या हमने अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाईं? मास्क लगाना, हाथ धोना, दूरी बनाए रखना, पब्लिक में न जाना आदि बुनियादी बातों पर हमने कितना ध्यान रखा? जानता हूँ कई लोग कहेंगे कि वो हर एक निर्देश का पालन करते रहे, फिर भी हो गया। ये भी सच है, लेकिन पिछले तीन महीने में मैं बिहार, यूपी, बंगाल, उड़ीसा और दिल्ली घूम कर आया हूँ और आश्यर्चजनक रूप से मैं उन पाँच प्रतिशत लोगों में होऊँगा जो हजारों की भीड़ में मास्क पहने हुए थे।

हम वैक्सीन की बात सुन कर निश्चिंत हो चुके थे। हम गिरते आँकड़ों को देख कर आश्वस्त हो चुके थे। हमने निर्देशों का पालन करना छोड़ दिया। आज वायरस वापस आ गया है। हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के मूलभूत ढाँचों में कोई सुधार नहीं हुआ है, बस हमने पीपीई, मास्क, वेंटिलेटर आदि बनाने की प्रक्रिया तीव्र कर दी और उसमें हमने कमियों पर विजय पा ली। हॉस्पिटल नहीं बने एक साल में, क्योंकि बनते नहीं इतनी जल्दी। मेक-शिफ्ट कोविड बेड फैसिलिटी बनाई जाती है, और बनाई जा रही है।

हम में से ही कई ऐसे लोग हैं जो अर्थव्यवस्था पर भी चिंता कर रहे थे, फिर उनको गरीबों की भी चिंता हुई कि सरकार उनको भोजन नहीं दे रही, फिर उन्हें यह चिंता भी खाने लगी कि दवाइयाँ और इलाज सस्ते में उपलब्ध नहीं है। आप मुझे ये बताइए कि ये सारे काम करने के बाद पैसा कहाँ से आएगा? यूपी लगातार कोविड की मॉनिटरिंग करता रहा, महाराष्ट्र ने क्यों नहीं किया? आज हरिद्वार के चार सौ कोविड पॉजिटिव हॉटस्पॉट हैं, लेकिन महाराष्ट्र के बासठ हजार पर आप कह रहे हैं कि वहाँ का मुख्यमंत्री पारदर्शिता दिखा रहा है! फिर तो देश के आँकड़े अगर बढ़ रहे हैं तो मोदी पारदर्शिता दिखा रहा होगा! है कि नहीं?

चुनाव होंगे, रैलियाँ होंगी, नमाजें होंगी और कुम्भ बीच में बंद होगा। कुम्भ बंद होगा क्योंकि कुम्भ में जाने वाले इस पाप को अपने सर नहीं लेना चाहते। कुम्भ वालों और रमजान वालों में बुनियादी फर्क यही है कि एक बारह साल में एक बार होने पर भी इसे बंद कर लेगा और दूसरा हर साल होने पर भी, बंद नहीं करेगा। आप में और दूसरों में भी बुनियादी फर्क यही है कि आपको कुम्भ एक क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी और ग़ैरज़िम्मेदार आयोजन दिखता है, जबकि महाराष्ट्र का अपराध आपको एक ईमानदार मुख्यमंत्री दिखाता है।

जब वैक्सीन के आवश्यक इन्ग्रेडियेंट्स के निर्यात पर कई राष्ट्रों ने प्रतिबंध लगा रखा है तो मोदी क्या मंत्र फूँक कर ले आए? आपको क्या लगता है साल भर में अस्पताल बन जाते हैं? अमेरिका की हालत साल भर खराब ही रही है। इटली साल भर लाशें ही दफनाता रहा है। यहाँ एक बेकार स्वास्थ्य व्यवस्था को आप एक साल में ठीक कर देना चाहते हैं और ये भी पूछते हैं कि फिस्कल डेफिसिट कैसे बढ़ रहा है, अम्बानी को देश से निकालो और गरीबों को फ्री में भोजन ही नहीं पैसे भी दो।

मैंने भी खूब खबरें सुनीं, लोगों के फोन भी आए कि फलाँ बीमार हैं, उसे बेड नहीं मिल रहा, वहाँ ऑक्सीजन की कमी है, यहाँ दवाई ब्लैक में लेना पड़ा रहा है। लेकिन क्या करूँ? इसमें अपनी राजनीति और खेमेबाजी करूँ कि वस्तुस्थिति और संदर्भों को देखे बिना सीधा मोदी पर पिल जाऊँ? क्या हम ये नहीं जानते कि पूरा विश्व दोबारा सेकेंड वेव की चपेट में है? क्या हम ये नहीं जानते की हमारी जनसंख्या कितनी है और अस्पताल कितने? क्या हम ये नहीं जानते कि पिछले साल वेंटिलेटर के नाम पर कितना पैनिक बाँटा गया था और आज दोबारा ऑक्सीजन के नाम पर कितना बाँटा जा रहा है? आप जिम्मेदार हैं तो पैनिक मत बाँटिए। सकारात्मक आलोचना करना है तो कीजिए लेकिन रैली होने पर मोदी को गाली, लेकिन संजय राउत, अशोक गहलोत, ममता और राहुल गाँधी को क्लीन चिट दे कर फर्जी का गाल मत बजाइए।

आप मुझे कुछ समाधान बताएँ कि राज्य सरकारों से ऐसा क्या मिस हुआ जो स्थिति इतनी भयावह है। मोदी को गाली दे दो, लेकिन ये भी बताओ कि किस राज्य में मोदी ने सबसे ज्यादा वैक्सीन दी, और कौन से राज्य आज भी सबसे ख़राब स्थिति में हैं। स्वास्थ्य सेवा राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, कोरोना को रोकने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की ही है। अगर आपने किसी भी कारण से उसे रोकने में सफलता नहीं पाई तो मोदी जिम्मेदार नहीं है। आँकड़ो और तर्क पर बात कीजिए, गरियाने के लिए मुहूर्त नहीं निकालना होता, वो तो कभी भी कर सकते हैं।



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