ब्राह्मण घृणा और विपक्ष: जातिगत दंगों की प्रतीक्षा इनका प्लान बी है

05 अगस्त, 2021 By: अजीत भारती
राहुल गाँधी के लिए बलात्कार की घटना एक इवेंट बन चुकी हैं

दिल्ली में एक कथित गैंगरेप और हत्या की घटना सामने आई। इसको कवर करने वाले अखबारों और चैनलों में ‘प्रीस्ट’ या ‘पुजारी’ शब्द पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसा ही जोर कठुआ कांड में ‘देवीस्थान’ और ‘मंदिर’ पर दिया जा रहा था। घटना में जो हुआ वह तो मैं आगे बताऊँगा ही, लेकिन ब्राह्मणों को ले कर जो घृणा का माहौल लगातार बनाया जा रहा है, वो अप्रत्याशित है।

माहौल तो इस स्तर तक बनाया जाता है कि रेप असलम करता है, फोटो में भगवा वस्त्र पहने ‘पुजारी’ दिखाया जाता है और हेडलाइन में ‘तांत्रिक’ लिखा जाता है। इतने मुल्ले और मौलवी मस्जिदों और मदरसों में छोटी बच्चियों का रेप लगभग हर दिन कर रहे हैं, आपने कभी ये हेडलाइन पढ़ी?

ख़ैर, मीडिया के हेडलाइन से इतर आज सिर्फ ब्राह्मण घृणा पर ही बात करूँगा। यूँ तो, ब्राह्मणों के प्रति एक द्वेष हमारे समाज में सलीम-जावेद से भी पहले से घोला जा रहा है। वामपंथियों ने स्वतंत्र भारत में बने फिल्मों से ले कर कला के हर आयाम में ब्राह्मणों को लालची, व्यभिचारी, ठग, धूर्त, गंजेड़ी, स्मैकिया और बलात्कारी बना कर दिखाया है।

विस्तृत जानकारी के लिए आप ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ ट्विटर हैंडल पर जाइए, वहाँ आपको हर दिन हिन्दी फिल्मों की कलाकारी दिखेगी। जब कोई भी विचार या आक्षेप, बार-बार फिल्मों के जरिए समाज मे। डाला जाता है, तो गाँव में ब्राह्मणों की दयनीय स्थिति हर दिन देखने वाला व्यक्ति भी, उस फ़िल्मी कहानी को सामाजिक वास्तविकता मान लेता है।

आज सत्य यह है कि पूजा-पाठ करवाने वाले ब्राह्मणों को हम पाँच घंटा बिठाने के बाद इक्यावन रुपया दक्षिणा नहीं देना चाहते। हम आशा रखते हैं कि उसे सत्यनारायण भगवान की पूजा से ले कर दुर्गासप्तशती, गरुड़ पुराण और चारों वेद कंठस्थ हों, वो हमारा विवाह करवाए तो मंत्र बोल कर उसका अर्थ भी समझाए, लेकिन फिल्मों का ऐसा कुप्रभाव है कि उसका पारिश्रमिक तय करते वक्त हमें लगता है कि ये तो लुटेरा है, इसको पैसे क्यों देना। ब्राह्मण इसी सामाजिक विद्वेष और बॉलीवुडिया दृष्टिकोण के थोपे हुए पाप का प्रायश्चित करता दिखता है।

निराला की ‘पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को, मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता — दो टूक कलेजे के करता, पछताता, पथ पर आता’, आज के समय में किसी भिक्षुक की नहीं, मेरे और आपके गाँव के उन ब्राह्मणों की दशा नहीं नियति बन चुकी है जो रामनवमी में ध्वजा गाड़ने से ले कर दुर्गा पूजा के कलश स्थापन तक आपके पुण्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

हम रोते हैं न कि भाई, सही ब्राह्मण नहीं मिलते पूजा करवाने को, तो अपने आप को देखो कि क्या तुमने उसे सही दक्षिणा दी? याचना उसका कर्म है, दान तुम्हारा धर्म है, वह तुम्हारे घर से सामान चुरा कर नहीं भाग रहा, वह तुम्हारे मृतक पिता के लिए वैतरणी पार करवाने का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है और तुम्हें अपनी एक बछिया देते हुए उस ब्राह्मण में लालच दिख जाता है।

सत्य यह है कि हम मंदिरों में हर शाम दिया और आरती चाहते हैं, लेकिन दान-पात्र में दस का नोट तक नहीं गिरा पाते। सत्य यह है कि हमें शहरों के नुक्कड़ों और पार्कों के बगल में बने छोटे मंदिरों में सफाई चाहिए, लेकिन हम उस झाड़ू या पोछे के लिए भी पैसों का इंतजाम नहीं करते। इसके उलट, हम मन में यह अवधारणा बना लेते हैं कि दानपेटी के पैसे निकाल कर यह पुजारी जुआ खेलता होगा। हमारा सत्य यही है कि हम निहायत ही नीच सोच रखने वाले लोग हैं जिन्होंने अपने समाज के किसी भी अंग को यथोचित सम्मान नहीं दिया। हम जहाँ भी हैं, वहाँ से नीचे के लोगों को हिकारत भरी दृष्टि से देखते हैं, और ऊपर वाले को चोर समझते हैं।

मंदिर का पुजारी गद्दे पर नहीं सोता, न ही उसके वस्त्र रेशम के होते हैं। परंतु हाँ, हमारे पुजारी को अवश्य ही गद्दे पर सोने का विकल्प और रेशम पहनने का विकल्प होना चाहिए। वो हमारी भीरुता और निकृष्टता के बीच, हमारे आराध्यों को सहज भाव से, एक लंगोट में, देह किसी तरह से ढकते हुए, कुपोषित शरीर के साथ भी, जितना हो सकता है, उससे कहीं ज्यादा करता है। इसलिए, हमारा कर्तव्य है कि हम इन पुजारियों के साथ, इन पुरोहितों के साथ, इन ब्राह्मणों के साथ खड़े हों क्योंकि बाकी तो विरोध में हैं ही। वो तो चाहते हैं कि अपवादों को उदाहरण बना कर, फिल्मों के माध्यम से, मीडिया की हेडलाइनों में डाल कर एक पूरे समाज को कलंकित किया जाए। फिर हम लोग भी, उसी कहानी को, उसी कथ्य को सत्य मान कर निष्काम भाव से हमारे मंदिरों, हमारे इहलोक और परलोक दोनों की चिंता करने वाले ब्राह्मणों और पुजारियों को चोर-उचक्का समझने लगते हैं।

आज जिस तरह की हेडलाइन हम पढ़ रहे हैं, वो उस नौ साल की बच्ची के न्याय के लिए नहीं है। उस बच्ची को न्याय दिलाने की इच्छा, जोकर राहुल गाँधी या ठग केजरीवाल के लिए कदाचित् उसकी चिता से निकाले गए पैरों के अवशेष से भी कम ही है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि राहुल गाँधी की पार्टी द्वारा शासित राजस्थान में प्रति दस हजार व्यक्ति बलात्कार की संख्या सबसे ज्यादा है। जब हाथरस के कथित रेप पर, जो कि आज तक साबित न हो सका, ये लोग नौटंकी करने गए थे, उसी समय राजस्थान में कई दलित लड़कियों का रेप समुदाय विशेष के दरिंदों के द्वारा किया गया था, पीड़िता ने वीडियो बना कर राहुल गाँधी से गुहार लगाई थी, वो वहाँ नहीं गया।

ये नकारे, दो कौड़ी का नशेड़ी नेता लोग, हर ऐसी दुर्घटना पर पहचानों और विशेषणों की तलाश में, बच्चियों के रेप तक को गायब कर देते हैं। कुछ ही दिन हुए हैं उस घटना को और मीडिया के हेडलाइनों और नेताओं के बयानों में बच्ची की पीड़ा की जगह पुजारी और ब्राह्मण शब्द छाया हुआ है।

आपको लगता है कि यह सब संयोग मात्र है? आपको लगता है कि अखलाख पर चर्चा संयोग था, रोहित वेमुला पर चर्चा संयोग था, तबरेज पर चर्चा संयोग था, हाथरस पर चर्चा संयोग था? इतने बड़े देश में आप किसी भी बड़े राज्य पर उँगली रख दीजिए वहाँ आपको हर दिन रेप की खबरें मिल जाएँगी। आपको जैसा रेप चाहिए वैसा रेप मिल जाएगा। क्षमा कीजिएगा कि मैं संवेदनहीनता के साथ बार-बार रेप को ऐसे बोल रहा हूँ जैसे दुकानों में कपड़े दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या करूँ, इन अधम और खल आचरण वाले नेताओं ने बच्चियों के बलात्कारों को शोरूम में टँगे वस्त्रों से ज्यादा समझा ही नहीं है।

चुनावों के समय ये अबोध बालिकाओं के रेप की विंडो शॉपिंग पर निकलते हैं, और जहाँ मतलब का पैटर्न दिखता है, वहाँ घुस जाते हैं। फिर इनको ब्रांड्स चाहिए होते हैं कि भैया, जरा ब्राह्मण वाला कोई हो तो दिखाना… नहीं, नहीं, मुस्लिम वाला नहीं चलेगा, हम तो वो देखते भी नहीं, आप बस ठाकुरों और ब्राह्मणों वाला दिखाना, उसमें भी लड़की दलित हो तो अच्छा है। फिर ये उम्र पर खेलते हैं, उसके माँ-बाप को निचोड़ते हैं, उनसे बयान दिलवाते हैं।

याद है या भूल गए कि हाथरस वाले मामले में एक वामपंथन घूँघट काढ़े हुए, सप्ताह-दर-सप्ताह मीडिया को लड़की की भाभी बन कर बयान देती रही? ये इतनी हरामी ब्रीड है कि गाली न दूँ तो मेरे रोमछिद्रों में अग्नि की तपन महसूस होती है और लगता है कि इस पर चुप रहने का पाप मुझ पर चढ़ेगा।

नौ साल की बच्ची को चार लोगों ने कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार के बाद, हत्या कर के, उसकी माँ को बुला कर चिता पर रख कर जला दिया। अभियुक्त जेल में हैं, पुलिस ने साक्ष्य इकट्ठा कर लिए हैं और उनकी फोरेंसिक जाँच की जा रही है। कानून के दायरे में जो भी हो सकता है, हो चुका है। अभियुक्तों ने यह कहानी बताई कि बच्ची कूलर से पानी लेने आई तो उसे करंट लग गया और वो मर गई।

मृतका की माता के अनुसार, अभियुक्तों ने उन्हें वहाँ बुलाया और कहा कि जल्दी अंत्येष्टि कर दो वरना डॉक्टर किडनी निकाल लेंगे। जब तक माँ कुछ कर पाती, लकड़ियाँ चौक दीं गईं, और आग लगा दी गई। माँ ने पिता को फोन किया और समुदाय के सौ-पचास लोग इकट्ठा हो गए। उन्होंने चिता को बुझाया और पुलिस के लिए बिटिया के पाँव मात्र बचे थे, उसे सौंपा। हम नहीं जानते कि बलात्कार हुआ या नहीं, लेकिन मैं यह मान कर चल रहा हूँ कि हुआ और उसी पर चर्चा भी करूँगा क्योंकि सब यही कह रहे हैं, फिर भी इसमें जो हिन्दू समाज और ब्राह्मण को लिए घृणित शब्दों का प्रयोग हो रहा है, उस पर बात आवश्यक है।

दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद अब इसके विशेषणों पर चर्चा करते हैं। उस नौ साल की बच्ची का सबसे बड़ा विशेषण एक बच्ची होना था, लेकिन उसकी पूरी पहचान को गौण करते हुए उसे एक ‘दलित’ बना दिया गया। उस नौ साल की बच्ची की सबसे बड़ी पीड़ा उसका कथित बलात्कार था, लेकिन उसकी सारी पीड़ा की उपेक्षा करते हुए उसे ‘निर्भया’ और ‘हाथरस अगेन’ में समेटा गया।

उस बच्ची की व्यक्तिगत पीड़ा को जातिगत और राजनैतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। ऐसी ‘पीड़ा’ जब ‘मुद्दा’ बन जाती है, तब उसके कई बाप पैदा हो जाते हैं। दिल्ली के सराय काले खाँ में दलितों की एक पूरी बस्ती को मुस्लिमों ने दंगों में झोंक दिया और खून की होली खेलने की धमकी दी, तब मुद्दों के नाजायज बाप गायब थे। तब ये भीम आर्मी, राहुल गाँधी, केजरीवाल एक शब्द भी बोलते नहीं दिखे।

आपको पता है कि रोहित वेमुला की माँ कहाँ है? नजीब अहमद के परिवार का क्या हाल है? अखलाक, तबरेज, जुनैद पर कोई फॉलोअप है आपके पास? हाथरस पर क्या हुआ आप जानते हैं? आखिर इन मामलों का अंतिम परिणाम आने पर आपको क्यों नहीं बताया जाता? बात बस यह है कि मीडिया जब इनसे मिलने जाता है तो परिवार से कहा जाता है कि कैमरे पर थोड़ा रो देना, तो लोग दवाब बनाएँगे।

आप उस माँ को नाटक करने को बोल रहे हैं जिसके नौ साल की बच्ची का गैंग रेप हुआ है और उसे जबरन जला दिया गया? अरे कैसे संस्कार दिए हैं तुम्हें तुम्हारी माँ ने? तुम नेता हो और तुम उन परिवारों से मिलने जाते हो, उन्हें ढाढस दिलाते हो और तुम्हारे साथ पूरा कैमरा क्रू होता है, तुम्हारी डिजिटल मीडिया टीम वहाँ से आने वाली तस्वीरों को तुम्हारे निकलने से पहले ट्वीट और पोस्ट किया जाता है, और तुम कहते हो तुम्हें सहानुभूति है!

सहानुभूति का अर्थ भी समझते हो? जब समाज के नेता बलात्कार पीड़िता के परिवार के साथ फोटो खिंचवाने के लिए उनसे मिलने जाते हैं, तो यह दुष्कृत्य उस माँ की आशाओं के साथ बलात्कार करना है। तुम सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनीति के लिए एक पीड़िता को गन्ने के उस अवशिष्ट की तरह चूस कर अलग कर देते हो, जिसका रस तुमने निकाल लिया है।

ब्राह्मणों पर निशाना साधना, सामाजिक कभी रहा ही नहीं। आप यह सोचिए कि श्मशान में किस तरह का ब्राह्मण रहता है? आप में से किसी के घर में कोई मृत्यु हुई हो, और आपने अंत्येष्टि में भाग लिया हो तो आपको पता होगा कि श्मशान का पुजारी, ब्राह्मण या जिस भी नाम से आप बुलाते हैं, वो कौन होता है।

पहली बात तो यही है कि वो पुजारी तो होता नहीं, जो कहा जा रहा है। दूसरी बात, यही नेता और राजनैतिक रंग देने वाले सामान्य लोग यह भी कह रहे हैं कि वो तो दारू पीता था, जुआ खेलता था, लड़कों से मसाज करवाता था, तो फिर किस मानदंड से वो ब्राह्मण है? तीसरी बात, जब आपकी जानकारी में ऐसा होता था, तो कितनी बार पुलिस को उसकी जानकारी दी गई? आप तो फिर इस प्रतीक्षा में थे कि कुछ अनिष्ट हो जाए तो फिर अपनी झोली से ऐसे विशेषण निकालेंगे?

मेरा प्रश्न बस यह है कि जब राधे श्याम, कुलदीप, लक्ष्मी नारायण और मोहम्मद सलीम ने मिल कर रेप किया तो इसमें से एक व्यक्ति की पहचान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कैसे हो जाती है? क्या किसी अभियुक्त ने यह कहा कि पुजारी ने सबसे ज्यादा रेप किया? जब नैरेटिव में इतनी नीचता आ ही गई है तो मैं भी उसी स्तर के गिरे हुए प्रश्न पूछूँगा कि मोहम्मद सलीम का नाम सबसे ऊपर क्यों नहीं लिया जा रहा? कुलदीप और लक्ष्मीनारायण की जाति क्यों नहीं बताई जा रही है?

इन प्रश्नों के उत्तर नहीं होते क्योंकि ये प्रश्न नहीं राजनीति के मुद्दे हैं। मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, उत्तर नहीं दिए जा सकते। प्रश्न यह है कि क्या यह मामला दिल्ली के लिए है? या फिर यह मामला उत्तर प्रदेश के लिए है? आप यह समझिए कि ऐसे मामलों की आवृत्ति कितनी कम है कि हर पार्टी सूअरों की तरह एक साथ इकट्ठा हो जाती है। इसके इतर मौलवियों द्वारा मस्जिदों में रेप की घटनाएँ हों, मुस्लिम दरिंदों द्वारा दलितों, हिन्दू बच्चियों की लड़कियों की रेप की घटनाएँ हों, इन पर कभी भी कोई नैरेटिव नहीं बनाए जाते, चर्चा तक नहीं होती। वो इसलिए नहीं होती क्योंकि ये मेनस्ट्रीम बात है।

जिस दिन NCRB ने बलात्कार के अभियुक्तों के नाम साथ, कॉलम में मजहब डालना शुरु कर दिया, उस दिन स्पष्ट हो जाएगा कि बलात्कार करने में सबसे आगे कौन सा मजहब है और ‘रेप जिहाद’ क्या है। लेकिन सबका विश्वास जीतने वाली सरकार हो या फिर मुस्लिम तुष्टिकरण से वोट बैंक बनाती सरकारें, कोई भी ये आँकड़े नहीं देना चाहता। देश में जाति आधारित जनगणना होती है, देश में दलित समाज के पीड़ितों का भी आँकड़ा दिया जाता है, फिर अभियुक्तों के आँकड़े क्यों नहीं आते?

रेप की खबरों की रिपोर्टिंग का हाल यह है कि कई बार आपको अभियुक्तों के नाम तक नहीं बताए जाते, और आप आँख मूँद कर मान लीजिए कि वैसे हर मामले में बलात्कारी कोई मजहबी सूअर ही होता है। लेकिन ब्राह्मण शब्द में, हिन्दू की पहचान समाहित है। इसलिए, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को लुभाने की बात करती एक पार्टी सत्ता में आना चाहती है, उनके वोट ले कर, वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ, और वामपंथी चिरकुट जिनका पूरा पोलित ब्यूरो ब्राह्मणों से भरा हुआ है, वो इस प्रतीक्षा में हैं कि भारत की हर गली में जातिगत दंगे हो जाएँ।

हिन्दू-मुस्लिम दंगों की कोशिशें तो दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों से आरंभ हो गई थी, लेकिन भारत की विखंडनकारी शक्तियों के पास प्लान ‘बी’ और ‘सी’ भी तो होना चाहिए। कास्ट रायट्स या जातिगत दंगे वही प्लान बी हैं। इन्हें हर जगह सामाजिक दरारें खोजनी हैं और उसमें राजनैतिक लकड़ी ठूँस कर उसे चौड़ा करते-करते अलग कर देना है।

अराजकता इनका इंधन है। इनके पारम्परिक हथकंडे चल नहीं पा रहे, कट्टरपंथी मदरसों और नक्सलियों की फंडिंग पर शिकंजा कस कर लगभग बंद कराया जा चुका है, इसलिए इन्हें अब जातिगत दरारों का ही सहारा है। ये अगर उसे हवा नहीं देंगे, तो इनकी राजनैतिक प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी। इतना पतित होना इनकी विवशता है। इनकी माँ इन्हें समझाती होंगी कि बेटा जीवन में नौ साल की बच्ची के रेप तक को एक्सप्लॉइट न कर पाए, तो क्या करोगे जीवन में। ‘जी, मम्मी जी’, बोल कर ये निकल जाते होंगे। जिस व्यक्ति को सुबह की बात दोपहर तक याद नहीं रहती, वो एक दलित को न्याय दिलवाएगा?

न्याय दिलवाना है? रेप टूरिज्म चल रहा है न राहुल गाँधी, और ठग केजरीवाल, बंगाल में भी रेप हो रहे हैं, राजस्थान में भी। बंगाल जरा घुस कर दिखा दो जहाँ हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कोर्ट को बताया है कि बलात्कार पीड़िताओं को न्याय तो छोड़िए, थाने में रिपोर्ट तक नहीं दर्ज कराई गई है। ये करेंगे बलात्कार पीड़िताओं की बात? ये सामाजिक निठल्ले और राजनैतिक आवारा लोग न्याय दिलवाएँगे? ये गली-मुहल्ले के वो लौंडे हैं जो दूसरों के घर जा कर दिन में सामान चुराते हैं, शाम में दारू पीते हैं, और अगली सुबह घर के मालिक से कहते हैं कि बहुत बुरा हो गया चाचा, हम खोजेंगे चोर को।

ब्राह्मण और साधु यहाँ लिंच होता है, और ये दोगले कुछ नहीं बोलते। मायावती के सलाहकार हों या किसी भी पार्टी की केन्द्रीय समितियों के सदस्य, हर जगह देश की दिशा और दशा तय करने वाले ब्राह्मण आपको मिल जाएँगे। मैं यह नहीं कह रहा कि वो ब्राह्मण हैं इसलिए वहाँ हैं, मैं बस आपको उनकी महत्ता समझा रहा हूँ कि जन्म के अधिकार से चलने वाली पार्टियों में, जो मुस्लिम और दलित तुष्टिकरण पर एक-एक पाँव रख कर चलती है, वहाँ ब्राह्मण कोर कमिटी में भजन गाने के लिए नहीं होता। ये पार्टियाँ भी उनका महत्व जानती हैं कि जातिगत समीकरण हों या फिर जीत की योजना बनाना, हर जगह वही ‘सवर्ण’ याद आता है, जिसे ये साल भर गरियाते रहते हैं। अगर इतनी घृणा है तो हर ब्राह्मण को अपनी पार्टियों से निकाल कर दिखा दो।

उसके उलट, राहुल गाँधी तो जंघिया के ऊपर जनेऊ पहन कर गोत्र बता रहा था न? माँ ईसाई, बाप के बाप पारसी, बाप की माँ के बाप स्वयं के (1929 में) हिन्दू होने पर संदेह जताते हों, और तुम्हारा जनेऊ बचा हुआ है? जनेऊ बचा हुआ भी कब दिखता है जब चुनाव आते हैं। वही ब्राह्मणत्व याद आता है जिसे आज तुम्हारे पार्टी और उसके द्वारा पोषित मीडिया हिन्दुत्व को नीचा दिखाने के लिए हर ऐसे बलात्कार को एक उदाहरण बना कर प्रचारित करना चाहता है।

समाज के हर व्यक्ति से मेरी प्रार्थना है कि आप इन नेताओं के चक्करों में मत पड़िए। बच्ची का बलात्कार एक जघन्य कृत्य है, और अपराधियों को फाँसी मिलनी चाहिए, लेकिन क्या इस अपराध की जड़ में बच्ची का दलित होना एक कारण था, या फिर उन चार हैवानों के आगे सिर्फ एक लड़की होना। अपवादस्वरूप हुए वैयक्तिक अपराधों को सामाजिक उदाहरणों की तरह दिखाना यही बताता है कि कॉन्ग्रेस या वामपंथी पार्टियों को बच्ची की नहीं, विशेषणों की चिंता है। वहीं, हमारे समक्ष चिंता का विषय बच्ची का बलात्कार और उसकी हत्या होना चाहिए, न कि उसकी पहचान, जाति और कौन सा नेता सबसे पहले पहुँच कर ट्विटर पर फोटो लगा रहा है।



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