विदेशी आक्रांताओं के नाम अब नहीं ढोएगी दिल्ली, शुरू हुई नए नामकरण की मुहिम

04 सितम्बर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
दिल्ली को जल्द मिल सकती है 'मुग़ल नामकरण' से मुक्ति

जब हम अपने बच्चों के नाम रखते हैं तो उनका कुछ अर्थ, कुछ उद्देश्य, पृष्ठभूमि, संदेश होता है, तभी नाम रखना सार्थक लगता है, तभी वो सुंदर भी लगते हैं। हम बच्चों का नाम राम रखते हैं, रावण नहीं। कृष्ण रखते हैं, कंस नहीं। अर्जुन, नकुल, सहदेव रखते हैं, दुर्योधन या दुःशासन नहीं।

क्योंकि रावण, कंस, दुर्योधन और दुःशासन हमारे इतिहास के खलनायक हैं। वो हिन्दू थे, मगर उनके कर्म सनातन-परम्परा, राज्य-परम्परा के खिलाफ थे, इसलिए हम उनका नाम तक अपने साथ नहीं जोड़ना चाहते। हम अपने घर, मोहल्लों के नाम कुंज, निलय, निकेतन, साकेत, द्वारका, कैलाश रखते हैं लेकिन कभी जंगल, रेगिस्तान, लंका नहीं रखते।

लेकिन अब आप अपने या अपने आसपास के शहरों के नामों पर गौर करिए। उन शहरों में बने छोटे-छोटे गाँवों के नामों पर ध्यान दीजिए। विदेशी आक्रांताओं, शासकों, प्रशासकों, अत्याचारियों के नामों पर बसे अनगिनत गाँव-शहर मिलेंगे जो प्राचीन नाम बदल कर रखे गए थे। क्या ये नाम हमें हमारी गुलामी, हमारी लाचारी, हमारे शोषण, हमारे अपमान की याद नहीं दिलाते ?

यदि नहीं, तो हम संवेदनहीन हो रहे हैं और यदि हम संवेदनशील हैं तो इन नामों को अनावश्यक ढोने की विवशता क्या है ? हम आजाद राष्ट्र हैं, आजाद लोग हैं। हमें अपनी हजारों साल की पिछली गुलामी से मुक्ति मिली है। इसके लिए हजारों-लाखों लोगों ने बलिदान दिये हैं। हम उन सपूतों की उपेक्षा कर आतताइयों का महिमामंडन करते रहें या निष्पक्ष होने का ढोंग करें तो क्या यह शर्म की बात नहीं है?

लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के दो गाँवों के लिए ये लज्जा का विषय है। इन दोनों गाँवों ने हम पुरानी भूलों को सुधारने की हिम्मत जुटा ली है। इनमें से एक गाँव हुमायूँपुर के लोगों की माँग पर गाँव का प्राचीन नाम बदल कर हिन्दुओं के आराध्य भगवान ‘हनुमान’ पर करने के लिए दक्षिण दिल्ली नगर निगम में प्रस्ताव पेश किया गया है। वहीं, मोहम्मदपुर का नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई है।

सफदरजंग एन्क्लेव से भारतीय जनता पार्टी की पार्षद राधिका अबरोल ने शुक्रवार को प्रस्ताव दिया कि हुमायूँपुर गाँव का नाम बदलकर ‘हनुमानपुर’ किया जाना चाहिए। दूसरे गाँव मोहम्मदपुर का नाम बदलने के माँग की जा रही थी। पिछले महीने मोहम्मदपुर गाँव का नाम माधवपुरम करने के लिए साउथ एमसीडी के मेयर मुकेश सूर्यान ने गाँव का नाम बदलने की मंजूरी दे दी है।

हालाँकि मेंयर की मंजूरी के बाद भी गाँव का नाम बदलना आसान नहीं होगा क्योंकि गाँव का नाम तभी बदला जा सकता है, जब दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी इस प्रस्ताव पर मंजूरी दे।

दिल्ली सरकार के अफसरों ने एक समुदाय के नाराज होने की संभावना के चलते इस प्रस्ताव को केजरीवाल सरकार के पास भेजने से स्पष्ट मना कर दिया है।

हुमायूँपुर का नाम होगा हनुमानपुर

पुरातत्व विभाग, दिल्ली के पूर्व निदेशक और दिल्ली के 365 गाँवों पर अध्ययन करने वाले डॉ धरमवीर शर्मा बताते हैं कि बात सिर्फ दो गाँवों की नहीं है। दिल्ली में लगभग 365 गाँव हैं और अधिकतर गाँवों के नामों में विदेशी आक्रमणकारियों के नाम पर आज भी पहचान ढो रहे हैं।

उनका कहना है कि पहले दिल्ली पंजाब का ही हिस्सा था। जब पंजाब से अलग होकर दिल्ली सूबा बना तो, यह हरियाणा की राजधानी थी। पुरातत्व विभाग को इसके पुख्ता साक्ष्य भी मिले हैं। तेरहवीं शताब्दी में मिला सरवन अभिलेख इसकी पुष्टि करता है, जिसमें ‘इंद्रप्रस्थ मौजा हरियाणा’ लिखा हुआ है।

हुमायूँपुर गाँव

दिल्ली ढिल्ली, ढिल्लू और ढिल्लिका होने से पहले पहले एक गाँव था, जो बाद में दिल्ली के रूप में विकसित हुई थी। यह गाँव था, किलोकड़ी। जब यहाँ पर राजा ढिल्लू ने कील लगाई तो इसका नाम किलोकड़ी पड़ गया। इसी तरह से दिल्ली स्थित महरौली का नाम मिहिरावाली था, जो आचार्य मिहिर के नाम पर रखा गया था।

डॉ धरमवीर का कहना है कि जो इतिहास पाँच सौ सालों में पढ़ाया गया है, वह गाइड की कहानियों के अलावा कुछ नहीं है। पौराणिक इतिहासकार नीरा मिश्र का कहना है कि दिल्ली में गाँवों के नामों के साथ मुगलों के समय में बहुत खिलवाड़ हुआ है। पहले हौज खास और सिरी फोर्ट के इलाके का नाम शाहपुर जट था।

इसी तरह मनीष के गुप्ता बताते हैं कि एक बार भयावह बाढ़ आने के बाद यमुना पार के इलाके का नाम पटपड़गंज नाम पड़ा क्योंकि यहाँ सब कुछ ‘पट’ पड़ गया था वरना मुगल शासनकाल में इस जगह का नाम साहिबगंज हुआ करता था जो कि किसी मुगल बादशाह की प्रेमिका के नाम पर था।

हुमायूँपुर में कभी था शिव और हनुमान मंदिर

हुमायूँपुर दक्षिणी दिल्ली का शहरीकृत गाँव है। इसे पहले हनुमानपुर के नाम से जाना जाता था। गाँव के बुजुर्गों का कहना है कि उस वक्त यहाँ फोगाट, महले, टोकस, गहलोत और गरसे गोत्र के लोग आए थे और गाँव की नींव रखी थी। तब गाँव की आबादी काफी कम थी, लेकिन आज यह बढ़कर हजारों तक पहुँच गई है।

गाँव के कुछ बुजुर्गों का कहना है कि यहाँ प्राचीन समय में एक शिव और हनुमान का मंदिर था जिसको तुगलक के समय में तोड़कर एक गुंबद का रूप देने के बाद कोई गुमनाम सी कब्र बनाकर इस्लामीकरण कर दिया गया। गाँव में साढ़े छः सौ वर्ष पुराना गुंबद यह बताता है कि इस गाँव का अस्तित्व कम से कम 600 वर्ष पुराना है।

मुगल आक्रांता हुमायूँ के पुत्र जलालुद्दीन अकबर ने लंबे समय तक देश पर राज किया था। चूँकि अकबर ने अपनी राजधानी आगरा को बनाया था, इस कारण दिल्ली में उसने अपने पिता हुमायूँ की याद में इस क्षेत्र का नाम बदलकर हुमायूँपुर कर दिया।

गाँव मोहम्मदपुर का नाम ‘माधवपुरम’

हुमायूँपुर के बाद जिस गाँव का नाम बदले जाने की चर्चा सबसे ज्यादा है वो है, मोहम्मदपुर। मोहम्मदपुर गाँव का प्राचीन नाम माधवपुर था। इतिहासकार मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान को हराकर मोहम्मद गौरी ने उत्तर क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था।

मोहम्मदपुर गाँव

इसके बाद अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को गवर्नर बना कर, मोहम्मद गौरी वापस गजनी लौट गया था। अपने मालिक मोहम्मद गौरी की इच्छानुसार कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में इस्लाम को फैलाने की कोशिशें शुरु की और पहले चरण में उसने स्थानों के नाम बदलने प्रारंभ किए।

इसी क्रम में माधवपुर गाँव का नाम बदलकर मोहम्मद गौरी के नाम पर मोहम्मदपुर कर दिया गया। पूर्व में मोहम्मदपुर क्षेत्र का व्यापारिक केंद्र था और यहां सब्जियों और अनाजों का बड़ा कारोबार होता था। आज भी माधवपुर नाम से सब्जी का मार्केट यहाँ स्थित है। मोहम्मदपुर के नजदीक ही मोहम्मद बिन तुगलक में बेगमपुरी मस्जिद का भी निर्माण कराया था।

इलाके के पार्षद भगत सिंह टोकस के अनुसार पूर्वजों के पूर्वज बताते आए हैं कि गाँव का मौजूदा नाम मुगलों का दिया हुआ था, इससे पहले इसका नाम भगवान श्रीकृष्ण के नाम पर माधवपुर था।

इस इलाके के निवासी और भाजपा के मंडल अध्यक्ष हरि सिंह का कहना है कि गाँव के प्राचीन नाम को फिर से स्थापित करने के लिए बरसों से प्रयास चल रहा था।

मोहम्मदपुर का प्रसिद्ध मंदिर

वो कहते है कि पूर्वज उन्हें बताते हैं कि यहाँ पर पहले एक चुंगी भी हुआ करती थी। गाँव निवासी सत्तर वर्षीय वेद प्रकाश का कहना है कि जब वे हरियाणा से 1965 में इस गाँव में आए थे, तब यहाँ पर दो गुंबद नजर आते थे। लेकिन इस गाँव में न तो कभी मुस्लिम समुदाय के लोगों के रहने के प्रमाण मिले और न ही इस गाँव के इतिहास के बारे में ऐसा पता चला है कि यह केवल मुगलों के समय ही बसाया गया था।

आततायियों के नाम ढोने को तैयार नहीं अब देश

राजधानी के गाँवों का इतिहास और नाम ये बताते हैं कि केवल दिल्ली ही विदेशी आक्रांताओं का शिकार नहीं हुई, बल्कि यहाँ पर बने छोटे बड़े गाँवों के नामों पर भी आक्रांताओं ने समय-समय पर अपने निशान छोड़े और लकीर की फकीर बनी दिल्ली उन नामों के बोझ को सालों बाद तक ढोती रही, लेकिन अब बदलाव की बयार बहने लगी हैं।

ज़रा सोचिए, हाल ही में परिवर्तित पंडित दीनदयाल उपाधायाय जंक्शन का पहला नाम मुग़लसराय था। क्यों? सिर्फ़ इसलिए क्यूँकि मुग़लों ने हिंदुस्तान और हिन्दुस्तान की जनता पर राज किया था।

हिन्दुस्तान की बच्चियों के साथ दुष्कर्म किए, हमारे हजारों साल पुराने सनातन धर्म बदलने को मजबूर किया। सुन कर ऐसा लगता है जैसे नंगी पीठ पर कोड़े बरसाए जा रहे हों।

जो ‘नाम’ गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हमारे अस्तित्व की याद दिलाए, हमारी पूर्वज माँ बहनों पर हुआ अत्याचार याद दिलाए, जो नाम हमारी पीड़ा को बार बार उभारे, उसका अस्तित्व मिटना ही लोक-हित में हैं।

इस भूमि पर प्राण न्योछावर करने वाले बलिदानियों के नामों का अकाल नहीं है, जो ये देश घुसपैठियों, बलात्कारियों, हत्यारों और लुटेरों के नाम ढोता रहे।



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