दिल्ली दंगे: कॉन्स्टेबल रतनलाल की हत्या के 5 आरोपितों को HC ने दी जमानत

03 सितम्बर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल हत्याकांड में 5 आरोपितों को जमानत

पिछले साल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को हिलाकर रख देने वाले उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या और एक डीसीपी को सिर में चोट पहुँचाने के पाँच आरोपितों को शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत दे दी।

हाईकोर्ट के जस्टिस न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने पिछले महीने 11 जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। जस्टिस प्रसाद ने शुक्रवार को 11 में से 5 मामलों में पाँच आरोपितों – मोहम्मद आरिफ, शादाब अहमद, फुरकान, सुवलीन और तबस्सुम को जमानत देने का फैसला सुनाया।

जमानत देते हुए कोर्ट ने अभियोजन पक्ष से पूछा कि वीडियो साक्ष्य के अभाव में और 15 महीने से अधिक समय तक जेल में रहने के बावजूद आरोपित व्यक्तियों को हिरासत में क्यों रखा जाना चाहिए?

बता दें कि आरोपितों को 11 मार्च, 2020 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वह न्यायिक हिरासत में हैं और उनकी गिरफ्तारी को 17 महीने हो चुके हैं।

हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल एसवी राजू और विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद के साथ आरोपितों की ओर से पेश विभिन्न वकीलों की दलीलों पर विस्तार से सुनवाई की।

दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपितों की जमानत मंजूर करते हुए कहा, “यह सुनिश्चित करना न्यायालय का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य अपनी विशेष शक्ति का दुरुपयोग करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन न करन पाएँ। जमानत नियम है और जेल अपवाद है, और जमानत देने के मामले में न्यायालयों को अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना चाहिए। न्यायालयों का कर्तव्य है कि कानून किसी व्यक्ति को लक्षित करके उसका उत्पीड़न करने का एक उपकरण न बने।”

आरोपित मोहम्मद आरिफ की ओर से पेश वकील तनवीर अहमद ने दलील देते हुए कहा, “जमानत न्यायशास्त्र एक अभियुक्त की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करता है। यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुरक्षित करने और यह सुनिश्चित करने के बीच जटिल संतुलन है।”

तनवीर अहमद मीर ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किए गए पुलिस कॉन्स्टेबल गवाहों के वीडियो फुटेज और बयानों के बीच विसंगतियां थीं। उन्होंने दलील दी कि कॉन्स्टेबल के उक्त बयान घटना के काफी समय बाद और देरी से दर्ज किए गए थे।

उन्होंने कहा कि यह हमारे संविधान में निहित सिद्धांतों के खिलाफ है कि एक आरोपित को मुकदमे के लंबित रहने के दौरान सलाखों के पीछे रखा जाए।

आरोपित शादाब अहमद के वकील रेबेका जॉन ने यह कहते हुए जमानत देने का अनुरोध किया कि दिल्ली पुलिस की जाँच में खामियां और विरोधाभास थे। वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने दलील दी कि जहाँ दंगे हुए, अहमद उस अपराध स्थल पर मौजूद नहीं था।

वहीं, आरोपित फुरकान की ओर से पेश वकील दिनेश तिवारी ने कहा कि वह पुलिस द्वारा पेश की गई किसी भी वीडियो क्लिपिंग में नहीं देखा गया था और वह दंगो के लिए योजना बनाने वाली किसी सभा में मौजूद नहीं था।

आरोपित सुवलीन का बचाव करते हुए उसके वकील दिनेश तिवारी ने तर्क दिया कि उसके खिलाफ कोई गवाह नहीं है, कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं है। अभियोजन का दावा है कि हिंसा पूर्व नियोजित है। लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाता हो कि मेरे मुवक्किल ने ऐसी किसी बैठक में हिस्सा लिया हो।

अभियोजन पक्ष ने किया जमानत का विरोध

अभियोजन पक्ष ने यह कहते हुए जमानत का विरोध किया था कि आरोपितों के खिलाफ आरोप जघन्य हैं और यह कोई साधारण मामला नहीं है।

अदालत के समक्ष पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि वीडियोग्राफी के माध्यम से आरोपित व्यक्तियों की पहचान करने का कार्य ‘अजीब’ था।

राजू ने कहा, ” आरोपितों की पहचान के लिए पुलिस ने फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर की सहायता ली लेकिन अपराध की प्रकृति और बड़ी संख्या में लोगों भीड़ के बीच वीडियोग्राफी में एक आरोपित की पहचान न हो पाना कली बड़ी बात नहीं है। सिर्फ इसलिए कि उनकी पहचान नहीं की गई है, उन्हें दोषमुक्त नहीं किया जा सकता है।”

सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा, “अगर वीडियो फुटेज से किसी व्यक्ति की पहचान हो जाती है, तो यह एक बोनस है, लेकिन अगर नहीं हुई, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भीड़ का हिस्सा नहीं था।”

क्या था आरोप

एक कॉन्स्टेबल के बयान पर दिल्ली पुलिस ने FIR 60/2020 दर्ज की थी, जिसमें कहा गया था कि 24 फरवरी, 2020 को वह चांद बाग इलाके में अन्य स्टाफ सदस्यों के साथ कानून व्यवस्था की व्यवस्था की ड्यूटी पर था।

कॉन्स्टेबल ने शिकायत में बताया गया कि दोपहर 1 बजे के करीब प्रदर्शनकारी डंडा, लाठी, बेसबॉल बैट, लोहे की छड़ और पत्थर लेकर मुख्य वजीराबाद रोड पर जमा होने लगे।और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों को अनसुना कर हिंसा पर उतारू हो गए।

कॉन्स्टेबल के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को बार-बार चेतावनी देने के बाद भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल और गैस के गोले दागे गए मगर हिंसक प्रदर्शनकारियों ने लोगों के साथ-साथ पुलिसकर्मियों को भी पीटना शुरू कर दिया, जिससे उन्हें खुद अपनी दाहिनी कोहनी और हाथ में चोट लग गई।

आगे उसने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने डीसीपी शाहदरा, एसीपी गोकुलपुरी और हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल पर हमला किया, जिससे वे सड़क पर गिर गए और गंभीर रूप से घायल हो गए।

सभी घायलों को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ यह पाया गया कि एचसी रतन लाल की पहले ही चोटों के कारण मृत्यु हो चुकी थी और डीसीपी शाहदरा बेहोश थे और उन्हें सिर में चोटें आई थीं।



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