ईद और बकरा: दिवाली पर ज्ञान देने वालों का इंटरनेट पर बज रहा बाजा

21 जुलाई, 2021 By: संजय राजपूत
लिबरल्स का दोहरापन ईद पर हो रहा है 'वायरल'

भारत में आज मुस्लिम समुदाय में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार मनाया जा रहा है। बकरीद के दिन कई करोड़ों बेकसूर और बेजुबान जानवरों की हत्या कर दी जाती है। निर्दयता के साथ की गई ये हत्याएँ अल्लाह के नाम पर की जाती हैं।

पशुओं की हत्याएँ खुले आम सड़कों पर और मैदानों में होती हैं, लेकिन पशु प्रेमी गैंग इन हत्याओं पर शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन जमीन में धँसा लेता है। इन पशुओं के वध से बहा खून साफ करने में लाखों लीटर पेय-जल बर्बाद होता है, लेकिन पर्यावरण संरक्षक बॉलीवुड गैंग बिल्ली की तरह आँख बंद कर के बैठ जाता है।


पशुओं से दूध निकालने को भी ‘क्रूरता’ की श्रेणी में रखने वाला कथित ‘जीव-चिंतक’ पेटा इंडिया ईद के एक दिन पहले ही छुट्टी लेकर होनोलूलू चला जाता है। मकर संक्रांति पर चिड़िया की चिंता में दुबली कूल डूडनी सेकुलरनियाँ उछल-उछल कर ईद की बधाई देने लगती हैं।

मकर संक्रांति पर चिड़िया बन कर ‘सेव बर्ड्स’ की तख्ती पकड़ के सड़क किनारे बैठने वाली एक्टिविस्ट गलती से भी ‘बकरी’ बनकर ‘सेव गोट्स’ की तख्ती नहीं पकड़ेगी क्योंकि इन्हें पता है, आज न बकरे सेफ हैं और न बकरियाँ। दही-हांडी से लेकर पतंग की डोर तक की लंबाई तय करने वाला देश का न्यायालय हज़ारों पशुओं की हत्या पर मूक दर्शक बना रहता है।


हिन्दू घृणा से सनी ये लॉबी बकरीद पर बकरे की टाँग नोचते हुए इसे ‘शांति और मानवता’ का त्योहार बताते नहीं थकती, लेकिन जैसे ही कोई हिन्दू त्योहार आता है सारे ‘साँप’ बिलों से निकलकर ज़हर उगलने लगते हैं। इन्हें शिवलिंग पर चढ़ने वाले दूध की बर्बादी नज़र आती है, लेकिन सड़कों पर बहता करोड़ो लीटर पशुओं का खून नज़र नहीं आता।

सागरिका घोष को प्रदूषण की चिंता सिर्फ दीवाली के वक्त ही होती हैं। दोहरे चरित्र के सबसे ऊँचे पायदान पर बैठी ये स्वघोषित पत्रकार सिर्फ हिन्दू त्योहारों से होने वाले कथित वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण पर बीन बजाती हैं।


पटाखों से होने वाले कुछ घंटे के ‘प्रदूषण’ से दमा का शिकार हुई कथित सेकुलर ‘आरजे’ सायमा को क्रिसमस और आँग्ल नववर्ष पर फूटने वाले पटाखों से मधुर ‘आयतें’ निकलती महसूस होती हैं जिनसे वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है।


दोहरे चरित्र के सबसे ऊँचे पायदान पर बैठी जिहादी पत्रकार राणा अय्यूब इको फ्रेंडली दीवाली मनाने का संदेश देती है, लेकिन बकरीद पर कटते पशुओं को वो अल्लाह के प्रति सेक्रिफाइस बताती है। सेकुलर बुर्का पहने और अपने मज़हब के प्रति पूर्ण समर्पित ये जिहादी पत्रकार हिन्दू त्योहारों पर जहर उगलना कभी नहीं भूलती।


ट्विटर की पूर्व निदेशक और स्वघोषित अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविद तथा पशु-प्रेमी महिमा कौल दीवाली के पटाखों से होने वाली आवाज़ से कुत्तों के डरने के प्रति संवेदनशील दिखती है, लेकिन बकरीद पर होने वाली पशुओं की सामूहिक हत्या पर चुप है। इन हत्याओं पर एक भी ट्वीट करने की हिम्मत ये पशु प्रेमी नहीं जुटा पाई।


हो सकता है ‘इस्लामोफ़ोब’ कहलाने या ‘गर्दन’ उतारे जाने के डर से इन लोगों में इस सामूहिक पशु हत्या पर बोलने की हिम्मत न हो तो क्यों जरूरी है कि हिन्दू त्योहारों पर पशु प्रेमी या पर्यावरण प्रेमी होने का ढोंग किया जाए?


अगर ये गैंग वाकई पशु-प्रेमी, पर्यावरण प्रेमी होता तो एक लाइन का ट्वीट करने की हिम्मत जरूर दिखाता जिसमें बिना वजह मार दिए गए करोड़ों पशुओं के लिए संवेदना दिखाई देती। ये गैंग गलती से भी खुद को निष्पक्ष दिखाने के लिए भी किसी अन्य धर्म के त्योहारों पर टिप्पणी नहीं कर सकता।

मकर संक्रांति पर चिड़िया बन के अजेंडा चलाने वाली एक्टिविस्ट आज अपने किसी मुस्लिम मित्र के घर नहारी-नल्ले नोचती दिखाई देंगी। प्रियंका चोपड़ा का दमा तभी उखड़ता है, जब दिवाली आती है। बॉलीवुड पानी बचाने की बात तभी करता है, जब होली आती है।

मुस्लिम-ईसाई त्योहारों पर फेविकोल पी लेने वाली इस ‘सेकुलर-जिहादी लॉबी’ का सिर्फ हिन्दू तीज-त्योहारों पर ढोंग कोई नया नहीं है। नाटक कोई नई बात नहीं है। बाकि मजहबों के त्योहारों पर बधाई और हिन्दू त्योहारों पर सीख का इनका अजेंडा बहुत दिन चला लेकिन अब वक्त बदल गया है।

ये अखबार का नहीं, सोशल मीडिया का दौर है। आपका लिखा हुआ ‘कुछ भी’ अब अगले दिन कचड़े के डब्बे में नहीं जाता बल्कि सालों पहले का भी आपका दिया हुआ ‘ज्ञान’ आपके मुँह पर मार दिया जाता है। लिबरल हिन्दू युवाओं के मन में उनके धर्म तीज त्योहारों के प्रति घृणा पैदा करने का ये अजेंडा अब अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है।

दिवाली पर केवल एक रात में हुआ कुछ घण्टे का ध्वनि प्रदूषण पशुओं की चिंता में इन्हें दुबला कर देता है, लेकिन बकरीद पर करोड़ो जानवरों की निर्दयता से हत्या इन्हें जरा भी विचलित नहीं करती है। सिर्फ एक धर्म को निशाना बनाने के लिए पशु चिंतक और पर्यावरण चिन्तक बनने का पाखंड बन्द होना चाहिए। सशर्त पशु चिंतन का ढोंग अब नहीं चलेगा।



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