हिजाब से ढक जाएगी सर की रूसी... तालिबान के 101 फायदे, जो 'अनपढ़ संघी' नहीं जानते

18 अगस्त, 2021 By: पुलकित त्यागी
आतंकवादी नहीं, मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं तालिबानी

सरकी जो सर से वो धीरे-धीरे, पागल हुआ रे मैं धीरे-धीरे… 

प्रस्तुत पंक्तियाँ एक तालिबानी ‘Saint’ अपने अंदरूनी चित्त की प्रगाढ़ भावनाओं की व्याख्या करते हुए कहता है। इन पंक्तियों में यह कविराज रूपी ‘Saint’ बता रहा है कि किस प्रकार एक अफगान जलेबी के सर से 1 मिलीमीटर हिजाब भी इधर से उधर होता देख उसके 5 किलो के सर में रखे 50 ग्राम के मस्तिष्क के सभी तार हिलने लगते हैं और वह उस महिला को रॉकेट लॉन्चर से उड़ाने से स्वयं को रोक नहीं पाता।

अफगानी मोमिना ये नहीं समझती है कि आखिर क्यों उसे धीरे-धीरे अपने सर से हिजाब सरकाने की आवश्यकता हो रही है, जबकि साउथ दिल्ली की शनाया स्टारबक्स की कैरेमल फ्रैपेचीनो सिप करते हुए अपने 12वीं जनरेशन के आईफोन से कब का ‘Hijaab is a choice.. Burkha is love.. you go girl XOXO’ ट्वीट कर चुकी है।

दुनिया जानती है कि हिजाब और बुर्का लिबरलिज़्म के प्रतीक हैं। लेकिन शायद ऐसा प्रतीत होता है कि इन मानसिक रूप से विक्षिप्त अफगानी महिलाओं को लिबरल बनने का कोई मूड ही नहीं है, इन्हें तो केवल अपनी जान प्यारी है।

अज्ञानी है अफगान की आवाम 

उसी तरह अफगानिस्तान की समस्त आबादी को तालिबानी लिबरेशन का महीन सा भी इल्म नहीं है। ये मूर्ख शिरोमणि हवाई जहाज़ों पर लटक-लटक कर इस प्यारे लिबरल मुल्क को छोड़कर भाग रहे हैं, जबकि अफगानिस्तान में तो पेट्रोल भी केवल ₹50 लीटर है। केवल ₹500 के तेल में चाणक्यपुरी का मॉन्टी अपनी ‘NO FARMER NO FOOD’ के स्टीकर लगी होंडा सिटी में अपने मित्र शादाब के साथ पूरे दिन काबुल की गलियों में खालिस्तान के स्वप्न देखते हुए गेड़ियाँ मार सकता है।

बस जब तक उसके हिंदू सिख होने के कारण कोई अपनी क्लाश्निकोव से उसकी छाती में छेद न कर दे। उसी प्रकार जिस प्रकार अफगानिस्तान में बसे सिखों और हिंदुओं की छातियों में वर्षों से किए जा रहे हैं।


वो कहते हैं न कि हीरे की परख़ केवल जौहरी ही जानता है इसी तरह आपको तालिबानी लिबरल आज़ादी का आनंद तब तक अनुभव नहीं होता है, जब तक आप ग़ुलाम न रहे हों। इसी तरह अफगानों को तालिबान द्वारा क्षेत्र में लाई जा रही आज़ादी की कद्र नहीं है। तालिबान ने अफगानिस्तान में गाय तक खाने की छूट दे रखी है, परंतु तब भी अफ़ग़ान अपने देश में रहना नहीं चाहते। इनसे कोई कहे कि जाकर पूछिए कभी दर्द केरल के वामपंथियों और छोटे ओवैसी जी का।

अफगानिस्तान में संघ की शाखाएँ तक नहीं लगती हैं, न ही जन-गण-मन पर खड़ा होने की बाध्यता है। यह खबर सुनकर महान निर्देशक अनुराग कश्यप एक अन्य पदार्थ समझकर घर में रखी मैदा को नाक से सुड़क गए हैं और तब से त्रिशंकु होकर पूरे मोहल्ले में तालिबान को हिन्दू आतंकवाद से तोलने वाली स्वरा का घाघरा पहने नाच रहे हैं।


मैदा सीने में जम जाने के कारण उनकी हालत नाज़ुक हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्हें सुनिश्चित किया गया है कि यह कोरोना संक्रमण नहीं बल्कि उनके द्वारा स्वयं की गई बकरचिट्टी का परिणाम है। 

सूत्रों की मानें तो अनुराग बदहवास हालत में बड़बड़ा रहे थे कि अगर ऑक्सीजन नहीं मिला तो प्रधानमंत्री मोदी उन्हें स्वयं माउथ-टू-माउथ रेस्पिरेशन देने दिल्ली से सीधा मुंबई बुलाए जाएँ। पीएम से नीचे कोई उन्हें मंजूर नहीं। अंततः डॉक्टर ने उन्हें उन्हीं के द्वारा लिखे गए एक संवाद ‘चुप कर अपशब्द’ चिल्लाते हुए इंजेक्शन देकर बेहोश किया।   


फिटनेस और YOLO का प्रचारक तालिबान 

सोचिए, अगर तालिबान न होता तो क्या अमेरिकी सेना कभी गरीब अफ़ग़ानियों को अपने करोड़ों-अरबों के हवाई जहाज़ों में बैठने तक का मौका देती? इस बात का श्रेय तालिबान को ही जाना चाहिए कि अफ़ग़ानियों को अमेरिकी वायुसेना के जहाज़ों से स्काईडाइविंग करने तक का अवसर प्राप्त हुआ। यह अलग बात है कि उन्हें यह अवसर केवल एक ही बार मिल पाया।

संघी ट्रोलों और कुफ़्फ़ारों को ‘गुड तालिबान’ और ‘बेड तालिबान’ में अंतर तक नहीं पता है। तालिबानी ‘Saints’ के फुल ऑफ लाइफ एवं वॉन्डरलस्ट एटीट्यूड का अंदाज़ा उनकी जिम करते हुए वीडियोज़ एवं एम्यूज़मेंट पार्कों में गाड़ियाँ चलाते चित्रों को देखकर ही लगाया जा सकता है।


ये वीडियोज़ जब तिहाड़ में बैठे उमर ख़ालिद तक पहुँचीं तो उन्होंने न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर की है। इसमें उमर ने कहा है कि तालिबानी जब एक पूरे देश को जलाकर भी एम्यूज़मेंट पार्क में झूलों का आनंद ले सकते हैं, तो उमर ने भी तो पूरी दिल्ली जलाई थी। उन्हें कम से कम जेल में एक सी-सॉ की व्यवस्था तो दी ही जानी चाहिए।


‘अल्ट्रा प्रो मैक्स’ फेमिनिस्ट तालिबान 

पितृसत्तात्मक हिंदुओं का एक धड़ा तालिबान द्वारा अफगानी महिलाओं के लिए बुर्का अनिवार्य करने को लेकर भी सवाल खड़े कर रहा है। ऐसे लोगों को मधुर गीत ‘मुस्लिम कौम की बेटी हूँ.. मैं पर्दा करती हूँ’ सुनना चाहिए, जिससे इनके बंद मस्तिष्क के कपाट खुलें और ये लोग जानें कि पर्दा गुलामी की नहीं अपितु आज़ादी के निशानी है।

ट्विटर पर तो कई लोगों ने बुर्के के फायदे गिनाना भी प्रारंभ कर दिया है। उनका कहना है कि बुर्का महिलाएँ अपनी मर्ज़ी से पहनती हैं ताकि आसपास कुत्सित मानसिकता वाले पुरुष उन्हें घूर न सकें।

हालाँकि इस प्रकार के ट्वीट करने वाले लोग यह व्याख्या नहीं दे पाए कि बुर्के में से इस प्रकार की कौनसे रूहानी लेज़र निकलते हैं, जो घटिया मानसिकता वाले पुरुषों के नेत्रों पर सीधा हमला करते हैं?

मीडिया फ्रेंडली तालिबान 

तालिबानी राज में अफगानिस्तान में मीडिया को फासीवादी मोदी सरकार से भी अधिक स्वतंत्रता प्राप्त है। ट्विटर पर कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जहाँ महिला पत्रकारों को पूरी स्वतंत्रता से रिपोर्टिंग करने की अनुमति दी जा रही है। केवल शर्त यह है कि उन्हें हिजाब पहनकर रिपोर्टिंग करनी होगी।

यह समाचार सुनते ही भारत के सर्वज्ञाता परमज्ञानी महान पत्रकार रवीश कुमार ने फौरन अपना लाल माइक पैक किया और सरोजिनी नगर मार्केट से झटपट थोक की मात्रा में हिजाब खरीद लिए हैं। जिसके बाद रवीश अफगानिस्तान की पाक भूमि पर ग्राउंड रिपोर्टिंग करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 


रवीश अफगानिस्तान के बेरोज़गार युवाओं से बात करने के लिए काबुल का मुखर्जी नगर ढूँढ रहे हैं, परंतु उन्हें अब तक कोई बेरोजज़गार युवा नहीं मिला है क्योंकि लगभग सभी गबरू जवान एके-47 उठाकर काम पर लग चुके हैं। यह खबर सुनकर रवीश ने प्राइम टाइम में रिपोर्ट चलाने का फैसला किया है कि जब कल के आए तालिबानी युवाओं को रोज़गार देने में सक्षम हैं तो फासीवादी मोदी सरकार गत 7 वर्षों में भी ऐसा क्यों नहीं कर पाई है?

तालिबान की वकालत में प्रगतिशील विचारक यह तर्क भी देने लगे हैं कि हिजाब से उनके सर की रूसी नहीं दिखती। मगर अनपढ़ संघियों को इस बात में तब तक दम नजर नहीं आएगा जब तक उनके अपने सर पर रूसी नहीं उतर आती। यह फासीवाद का चरम ही कहा जाएगा कि लोग तालिबान की अच्छी तस्वीर पेश कर रहे हैं लेकिन आपको बस उनके सीने से चिपकी AK47 ही नजर आ रही है। क्या इस दिन के लिए गाँधी जी ने बिना ढाल और खड्ग के आजादी दिलाई थी?

#MudiMustRejien  

अभी तो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को केवल दो ही दिन हुए हैं और अभी से इस्लामी मुल्क और शरिया के रुझान विश्व के सामने आने लगे हैं। तालिबान को थोड़ा और समय दिया जाए तो ये लोग इस्लामी कानूनों के और भी कई फायदे विश्व पटल पर प्रस्तुत करेंगे और धीरे-धीरे यूरोप से होते हुए सात समंदर पार कर अमेरिका की धरती को भी शरिया से आबाद करेंगे। ताकि कमला हारिस एक बार पुनः अपनी मधुर वाणी में स्लीपी जो को बता सकें कि ‘We did it Joe, We did it’.  



सहयोग करें
वामपंथी मीडिया तगड़ी फ़ंडिंग के बल पर झूठी खबरें और नैरेटिव फैलाता रहता है। इस प्रपंच और सतत चल रहे प्रॉपगैंडा का जवाब उसी भाषा और शैली में देने के लिए हमें आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आप निम्नलिखित लिंक्स के माध्यम से हमें समर्थन दे सकते हैं:

ताज़ा समाचार