UP: सोशल मीडिया पर हास्य का विषय मगर किसानों के 'मन की बात' है SP की 'साँड स्कीम'- ग्राउंड रिपोर्ट

29 दिसम्बर, 2021 By: संजय राजपूत
यूपी देहात के किसानों का वोट बैंक है समाजवादी पार्टी की 'साँड योजना' का लक्ष्य

सोशल मीडिया के इस दौर में किसी एक चुनावी मुद्दे की सही या गलत मार्केटिंग किसी भी राजनीतिक दल का भूत, भविष्य और वर्तमान बदलने की क्षमता रखता है। चुनाव से ठीक पहले, ऐसा ही एक ‘चिराग’ समाजवादी पार्टी के हाथ लगा है, जो यूपी देहात में समाजवादी पार्टी का भाग्य बदलने में सक्षम है। यह है अखिलेश यादव की ‘साँड स्कीम’।

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजनितिक दल एक्शन मोड में हैं। कहीं विजय यात्राएँ चल रही हैं तो कहीं रैलियों का रेला। सत्ताधारी दल जहाँ अरबों की जनहितकारी योजनाओं का शिलान्यास कर रहा है, वहीं विपक्ष अपनी सरकार आने में जनता को आश्वासनों और वादों की पोटली थमा रहा है।

प्रदेश की जनता से ऐसा ही एक वादा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने किया और सोशल मीडिया पर लोगों को ‘मीम मैटेरियल’ मिल गया। वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार की हर योजना को अपनी बताने के चलते अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर पहले से ही ‘मीम मैटेरियल’ बने हुए हैं।

लेकिन इस बार ये जो ‘मीम मैटेरियल’ लोगों के, खासकर भाजपा समर्थकों के हाथ लगा है, ये मीम मैटेरियल से बढक़र कुछ ऐसा है, जिसे ज्यादातर लोग समझना नहीं चाहते। दरअसल अखिलेश यादव ने यूपी की जनता को एक आश्वासन दिया है कि यदि प्रदेश में सपा सरकार आती है तो सांड से टकरा कर जान गँवाने वाले व्यक्ति के परिजनों को सपा सरकार 5 लाख रुपए का मुआवजा देगी।

इस आश्वासन को अखिलेश यादव ने ’22 में बाइसाइकिल’ अभियान के साथ ट्विटर पर शेयर किया। ये ट्वीट और ये पोस्टर देखते ही देखते वायरल हो गया और इस पर मजाकिया मीम भी बनने लगे हैं।

वास्तव में इस पोस्टर में सन्देश देने की बात ही इस सन्दर्भ में एकमात्र हास्यास्पद चीज कही जा सकती है, लेकिन ऐसी ‘स्कीम’ के पीछे समाजवादी पार्टी यूपी देहात के किसानों को गंभीरता से लक्ष्य बना रही है।

प्रथम दृष्ट्या ये चुनावी आश्वासन मजाक का विषय ही लगता है, लेकिन सवाल यह भी उठता है अखिलेश यादव ने ऐसा आश्वासन दिया ही क्यों, जबकि साँडो की टक्कर से होने वाली मौतें ना के बराबर है।

किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या हैं आवारा जानवर

दरअसल अखिलेश यादव ने ग्रामीण इलाकों में योगी सरकार के खिलाफ फैली ‘एकमात्र’ नाराजगी को भुनाने के लिए बड़ा दाँव चला है। ये हम ऐसे ही नहीं कह रहे हैं। DOpolitics की टीम पिछले कुछ महीनों से चुनावी यात्रा पर प्रदेशभर के कई जिलों में ग्रामीण इलाकों को छान रही है। शहर से दूर बसे इन गाँवों में हमने ग्रामीणों से बात की। उनके मुद्दे, उनकी समस्याएँ सुनीं।


एक बात जो लोगों से बात करके स्पष्ट रूप से समझ में आई वो यह कि उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में मुकाबला सिर्फ भाजपा और सपा के बीच है। कॉन्ग्रेस और बसपा जैसी बड़ी पार्टियाँ पूरी तरह हाशिए पर है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि ग्रामीण इलाकों में बिजली, पानी, खाद, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था आदि कोई मुद्दा ही नहीं है। महँगाई जरूर एक मुद्दा है मगर वो इतना बड़ा नहीं है कि लोग सरकार बदलने की हद तक चले जाएँ।

भाजपा से इकतरफा मुकाबले में खड़े अखिलेश यादव के पास उपरोक्त में कोई भी मुद्दा नहीं है जिस पर केंद्र की भाजपा या प्रदेश की योगी सरकार को घेरा जा सके। शहर से लेकर गाँव तक के लोग, यहाँ तक कि सपा समर्थक भी इन मुद्दों पर योगी सरकार को दस में से दस नंबर देते हैं।

भाजपा विरोधी ग्रामीण महँगाई को लेकर जरूर सवाल उठाते हैं, लेकिन कानून व्यवस्था और विकास कार्यों को लेकर वह भी दबी जुबान में योगी सरकार की तारीफ ही करते हैं।

लेकिन इन्हीं ग्रामीण इलाकों में योगी सरकार के लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी भी बज रही है, जिसे शायद योगी आदित्यनाथ भी सुन रहे हैं और अखिलेश यादव भी। दरअसल योगी सरकार को लेकर ग्रामीण इलाकों में एक बड़ा बड़ा आक्रोश भी है और वह आक्रोश है, छुट्टा जानवरों को लेकर। जिस भी गाँव में DOpolitics की टीम पहुँची, लोगों ने अपनी समस्याओं की शुरुआत ही आवारा जानवरों को लेकर की।

गाँवों में हालात ये हैं कि किसानों ने आवारा जानवरों से अपनी फसलों को बचाने के लिए कँटीले तार बाँध रखे हैं। इतनी सर्दियों में लोगों को खेतों के बीच में छप्पर डालकर छोटी-छोटी सी झोपड़ियों में रात गुजारनी पड़ रही है ताकि जानवरों से अपनी फसलों की सुरक्षा कर सकें। ग्रामीणों की मानें तो यह समस्या इसलिए ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने गो-वध निषेध कानून लागू कर दिया है।

‘गो हत्या निषेध कानून तो ठीक, लेकिन किसान के बच्चे क्या खाएँगे?’

गो हत्या निषेध कानून लागू होने से बाजारों में गोवंश की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया है। योगी सरकार की हिंदूवादी छवि और सख्ती के चलते गो- तस्कर आवारा घूम रहे गाय, बछड़े या साँड को हाथ लगाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते, जबकि पिछली सरकारों में ये जानवर धड़ल्ले से कटते और बिकते थे।

ग्रामीणों का मानना है कि गोवंश की बिक्री बन्द होने की वजह से गाँव से लेकर शहरों तक गो-वंश की तादाद बढ़ती जा रही है और इसका खामियाजा भुगत रहे हैं, ग्रामीण इलाकों के किसान।

हम ग्राउंड रिपोर्ट के सिलसिले में जिस भी भाजपा समर्थक किसान से मिले, उनका यही कहना है कि ‘गाय हमारी माता है, हमारे धर्म में गाय की हत्या पर प्रतिबंध है लेकिन किसान की फसल बर्बाद हो जाएगी तो हिंदुत्व से हमारे बच्चों का पेट तो नहीं भरेगा’।

ज्यादातर ग्रामीण चाहते हैं कि गायों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा रहे लेकिन आवारा घूम रहे साँडों की बिक्री सरकार को चालू कर देनी चाहिए। दरअसल गाँवों में पशुओं के लिए चारागाह बचे नहीं हैं और ट्रैक्टर के उपयोग के चलते गाय और गो-वंश कृषि उत्पादन के काम में प्रयोग नहीं किए जा सकते।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई गोशालाएँ

ऐसा नहीं है कि योगी सरकार ग्रामीण इलाकों की इस सबसे बड़ी समस्या से अनजान है। गोवध निषेध कानून लागू करने के बाद योगी सरकार ने जगह-जगह गौशालाएँ खुलवाई, जहाँ गायों को रखने, उनके चारे और सर्दी-गर्मी से उनके बचाव के सारे पुख्ता इंतजाम भी कराए हैं। इसके लिए सरकार ठीक-ठाक फंड भी दे रही है, लेकिन सिस्टम में मौजूद भ्रष्टाचार पर शायद सरकार काबू करने में नाकाम रही।

ग्रामीणों का आरोप है की गायों के लिए आने वाला चारा ग्राम प्रधान और अधिकारियों की साँठगाँठ से ‘खा’ लिया जाता है। दिनभर गायों को गोशाला में बंद रखने के बाद रात को चरने के लिए छुट्टा छोड़ दिया जाता है, जो किसानों के खेतों में घुसकर उनकी फसलें तबाह करती हैं। कई गायें और गो-वंश कटीले तारों से घायल हो जाते हैं और तड़प-तड़प कर उनकी मौत हो जाती है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि आवारा पशु गाँव के लोगों के ही हैं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नहीं! लेकिन साथ ही वो यह भी कहते हैं कि योगी सरकार ऐसे लोगों के लिए कड़ा कानून नहीं बना पाई जो दूध दुहने के बाद जानवरों को छुट्टा छोड़ देते हैं। इसे वो सरकार की नाकामी मानते हैं। इस मामले में हमने गोशालाओं और ग्राम प्रधानों से भी बात की।

गोशाला का निर्माण क्यों नहीं है विकल्प

गोशाला संचालन करने वाले लोगों का कहना है कि सरकार सिर्फ 30 रुपए प्रति गाय देती है, जो कि बहुत कम है। रात में गायों को छुट्टा छोड़ देने के आरोप पर वह कहते हैं कि यह आरोप निराधार हैं, किसान तो चाहते हैं कि दूध दुहने के बार उनके द्वारा छोड़ी गई सारी गायें और साँड हम अपनी गोशाला में बंद कर लें, लेकिन गोशाला की सीमित क्षमता होती है। हम एक निश्चित मात्रा में ही गायों को बंद करके रख सकते हैं क्योंकि उतना ही हम को सरकार से ‘चारा’ मिलता है।

समस्या की जड़ पूछने पर गोशाला संचालक कहते हैं कि गोशाला में गायों के साथ साँड को नहीं रखा जा सकता क्योंकि वह इतना शक्तिशाली होता है कि गायों को घायल कर देता है और बाड़ तोड़कर बाहर निकल जाता है।

यही साँड छुट्टा घूमते हुए फसलों को बर्बाद करते हैं और लोगों को घायल कर देते हैं। कई बार साँडों के हमले से लोगों की मृत्यु तक हो जाती है। इस को लेकर ग्रामीण प्रदेश की योगी सरकार से खासे नाराज हैं।

नाराजगी भुनाने के लिए है अखिलेश का ‘दाँव’

सरकार के खिलाफ गाँवों में फैली इस नाराजगी को भुनाने के लिए ही अखिलेश यादव ने यह बड़ा दाँव खेला है। दिखने में तो एक छोटा सा अश्वासन और छोटा सा मीम मैटेरियल पोस्टर है, लेकिन इसमें ग्रमीण इलाकों के लिए एक बड़ा संदेश बिल्कुल साफ है कि अखिलेश यादव की सरकार आती है तो किसानों को इन छुट्टा जानवरों से छुटकारा मिल जाएगा।

अखिलेश यादव का यह संदेश ऐसे ही हवा में छोड़ा गया तीर नहीं है। अपनी चुनाव यात्राओं के दौरान हमने लगभग सभी ग्रामीणों से भी पूछा था कि क्या अखिलेश यादव के आने से आवारा पशुओं की समस्या खत्म हो जाएगी? अखिलेश आते हैं तो क्या गो हत्या कानून खत्म कर दिया जाएगा? यह जिक्र करना भी आवश्यक है कि अखिलेश यादव अपनी चुनावी रैलियों में इस तरह का कोई भी बयान नहीं दे रहे हैं।

इस पर ग्रामीणों ने पूरे विश्वास के साथ कहा था कि भले ही गो-हत्या कानून खत्म न हो, मगर अखिलेश यादव की सरकार आने के बाद चोरी छुपे ही सही, सरकारी संरक्षण में छुट्टा जानवरों की कटाई और बिक्री शुरू हो जाएगी। जो भाजपा समर्थक किसान हैं, उनका भी स्पष्ट मानना है कि छुट्टा जानवर योगी सरकार का अगले चुनावों में बड़ा नुकसान करने जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने तो ग्रामीणों और किसानों को संदेश दे दिया है।

उनका यह आश्वासन ग्रामीण इलाकों में लोगों के इस विश्वास को और भी ज्यादा मजबूत करेगा, जिसके तहत लोगों का मानना है कि अखिलेश के आने के बाद उन्हें छुट्टा जानवरों से राहत मिल जाएगी।

फिलहाल योगी आदित्यनाथ न तो गो-हत्या निषेध कानून से अपने पैर पीछे खींच सकती हैं और ना ही किसानों की समस्या बने आवारा गोवंश को नजरअंदाज कर सकते हैं। आवारा गो-वंश ने मौजूदा सरकार के लिए साँप के गले में छछूंदर जैसे हालात पैदा कर दिए है।



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