ऑर्थो तेल लगा कर घुटने तो बचा लोगे, ‘मूड स्विंग्स’ का क्या करोगे जावेद साहब?

17 सितम्बर, 2021 By: पुलकित त्यागी
जावेद अख्तर ने शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ में अपने बेहूदा बयान की मंकी बैलेंसिंग की है

जय श्री राम वालेकुम जावेद साहब। जी नहीं सेक्युलरोना वायरस के गंगा जमुनी वेरिएंट से ग्रस्त नहीं हुआ हूँ। बस कथित शायर, लेखक, गीतकार, मार्क्स के खुशनसीब मानस पुत्र और एक बदनसीब बाप से गुफ्तगू करते समय ‘फरहान बैलेंसिंग’ करने का एक नाकाम सा प्रयास कर रहा हूँ।

वैसी ही फरहान बैलेंसिंग जैसी बड़े अख्तर साहब ने शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में अपना लेख छापने के कृत्य को करके की है। अब बताइए क्या इस व्यंग्य को आगे ले जाने की आवश्यकता है? शुरुआत के एक मिनट में ही सदी की सबसे बड़ी विडंबना हो गई। यहांँ जनता पेट्रोल के दामों में अच्छे दिन तलाश कर रही है वहाँ कट्टर वामी-इस्लामी सरकते-सरकते इतने राइट हो गए कि अब ‘सामना’ में लेख छापे जा रहे हैं।

तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना आतंकी संगठन तालिबान से करने के कुछ दिनों बाद ही रूहानी तेल की मालिश से लोगों के घुटने सुधारने का दावा करने वाले जावेद साहब स्वयं घुटनों पर दिखे।

वैसे जब आपके पूरे खानदान का संयुक्त आईक्यू अपनी पसंदीदा विचारधारा से ग्रस्त पार्टी के सांसदों की संख्या के बराबर हो तो आपसे वैसे भी कुछ विशेष समझदारी से भरा बोलने की आशा रह नहीं जाती है। ऐसा नहीं है कि जावेद साहब इस उम्र में आकर ऐसे हुए हैं, जिस विचारधारा से वे आते हैं वह विचारधारा उम्र, लिंग, पंथ, सेक्सुअलिटी हर चीज़ से ऊपर उठ चुकी है।

अधिकतर लोग कहते हैं कि एक उम्र के बाद मनुष्य सठिया जाता है और बेबुनियादी कुतर्की बकवास करने लगता है, परंतु वामपंथी मानते हैं कि Why Should Senior Citizens Have All The Fun और इसी कारण ये लोग 17 की उम्र से ही 70 वाले लक्षण दिखाने लगते हैं।

देखिएगा आपको भी 20-30-50-70 हर उम्र का वामपंथी अपनी देह के विभिन्न छिद्रों से विभिन्न प्रकार का पैखाना करता दिख जाएगा। कई तो इसमें भी विभिन्न रंगों की विष्ठा फैलाकर वर्सेटिलिटी तक मुहैया करा देते हैं। You Know For Obvious Reasons.

तो जादू चचा ने संघ और तालिबान की तुलना के बाद पड़ने वाली गालियों को बैलेंस करने के लिए नितंभों से सेकुलरिज्म का इंद्रधनुष छोड़ती महाराष्ट्र सरकार यानी शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ का सहारा लिया।

इसमें गीतकार साहब ने लिखा कि लोगों ने उनकी बात का गलत अर्थ निकाला। असल में हिंदू तो दुनिया में सबसे सभ्य और सहिष्णु बहुसंख्यक हैं क्योंकि हिंदुस्तानी स्वभाव से कट्टरपंथी नहीं होते और उदारवाद उनके डीएनए में है। इस बात पर अभी भी शोध जारी है कि ये DNA भागवत साहब के बयान वाला ही है या फिर अलग। 

गुप्त सूत्रों से पता चला है कि दूसरी बार प्यार में धोखा मिलने के कारण तलाक लेकर अपनी तीसरी बेगम की तलाश में तुर्की जाकर सेटल हो चुके आमिर खान जावेद साहब का यह कथन सुनकर लाल सिंह चड्ढा की स्क्रिप्ट पर आयोडेक्स मल के चाट गए और इस वक्त अपने पीके फिल्म के लुक में तुर्की की सड़कों पर नाचते हुए ‘बेवफा-बेवफा बेवफा निकली है तू’ गाना गा रहे हैं। 

बेबी अख्तर यानी फरहान ने डैडी कूल का यह ‘मूड स्विंग’ देख कर चैन की साँस ली और अपने आलोचकों को बीच की उँगली दिखाई है। उन्होंने अपने विरोधियों पर निशाना साधते हुए यह भी कहा कि सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए उनके बयान पर उन्हें ‘डंबेस्ट अख्तर’ की उपाधि देने वालों वालों के मुँह पर यह एक ज़ोरदार तमाचा है। डैडी ने आज यह सिद्ध कर दिया कि वे इस रेस में उनसे कहीं आगे हैं।

जावेद साहब ने अपने पुराने बयान में यह भी कहा था कि जिस तरह तालिबान मज़हब के आधार पर इस्लामी राज्य स्थापित कर रहा है, उसी तरह दक्षिणपंथी हिंदू भारत में हिंदू राष्ट्र स्थापित करना चाहते हैं।

यह तथ्य उन्होंने उसी जादुई किताब में पढ़ा था जहाँ उन्होंने अलग-अलग 420 प्रकार के जेंडरों का ज्ञान लिया था और बताया था कि हमें लोगों को HE-SHE-HIM-HER की जगह HESH और SHIM कहकर संबोधित करना चाहिए। वैसे इस प्रकार के विचार अक्सर हैश का अधिक इस्तेमाल करने से भी आते हैं।

जावेद अख्तर के साथ-साथ अपने बच्चों के लिए चिंतित नसीर भाई ने भी अफगानिस्तान और तालिबान को लेकर कुछ दिनों पहले चिंता व्यक्त की थी। वैसे उनकी अपने बच्चों की चिंता पर कई दक्षिणपंथियों ने उन्हें ट्रोल किया था जिसके मैं निजी तौर पर सख्त खिलाफ हूँ। जैसी अदाकारी और फ़िल्मी इतिहास उनके दोनों सुपुत्रों का रहा है, एक पिता के लिए चिंता लाज़मी है। 

नसीर साहब की बात करें तो मौसम के हिसाब से विचारों में परिवर्तन दिखाते हुए यह सब्जेक्ट भी विचित्र बातें करता देखा गया। उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिमों का एक धड़ा अफगानिस्तान में तालिबानी शासन की वापसी का जश्न मनाता देखा गया, यह स्थिति बेहद भयावह है।

इस कथन से बड़ी विडंबना यह है कि नसीर भाई ने यह कथन ‘द वायर’ की आरफा खानम शेरवानी के साथ एक साक्षात्कार के दौरान कहा। उम्र के आधार पर नसीर भाई को बेनिफिट आफ डाउट देते हुए मैं यही कहना चाहूँगा कि नहीं शायद भूल गए होंगे कि असल में गंगाधर ही शक्तिमान है।

नसीरुद्दीन शाह की इस टिप्पणी के बाद दक्षिणपंथियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। कई लौंडे तो इतने उत्साहित हो गए कि व्हाट्सएप पर ‘क्या नसीरुद्दीन शाह का असली नाम नारायण दत्त शर्मा है’ के मैसेज फॉरवर्ड करते देखे गए।

सारी गलती इनकी भी नहीं है भारतीय राइट विंग के अधिकतर लोगों की हालत मैकेनिकल इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष के छात्रों जैसी ही है। जैसे यह प्रेम का प्यासा नर कॉलेज के हर कल्चरल फेस्ट पर किसी भी जीवित मादा की मंद से मुस्कान पर मर जाने के लिए भी तत्पर रहता है।

उसी प्रकार भारतीय राइट विंग वामपंथियों द्वारा अपने समर्थन में किए गए निल बटा सन्नाटा प्रतिशत के भी बयान पर भी ऐसा चरमसुख लेने लगता है जैसा राहुल गाँधी के वेट ऐब्स देख कर वामी कन्याएँ, और पुरुष और मैं। 

गलती पूरी तरह इनकी भी नहीं है। अब घर में जिस बच्चे को Parle-G तक नसीब न हो उसे पड़ोसी जब रोस्टेड ऐल्मोंड्स गार्निशद  विद चोको चिप्स खिलाएगा तो उसका चंचल मन बह जाना स्वभाविक है। सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि व्यंग्य का यह अंतिम वाक्य पूर्णतः काल्पनिक था और इसका संघ और भाजपा से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।



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