‘सिर्फ हिन्दू प्रोफेसर चाहिए’: जानिए क्यों बौखलाया सेकुलर समुदाय

21 अक्टूबर, 2021 By: पुलकित त्यागी
'सिर्फ हिन्दुओं' की भर्ती से वामपंथी-इस्लामी दलों में खलबली

तमिलनाडु के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोवमेंट (Hindu Religious and Charitable Endowments Department) के एक कॉलेज द्वारा विभिन्न पदों को भरने को लेकर विज्ञापन निकाले गए, जिसमें संस्था ने लिखा कि पदों पर केवल हिंदू धर्म के लोग ही इन पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं।

इस विज्ञप्ति की घोषणा के विरुद्ध ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर लोगों ने भारी विवाद खड़ा कर दिया। इनका कहना है कि यह ‘नियमावली’ के विरुद्ध है। हालाँकि, वास्तविकता यह है कि यह संस्था भले ही सरकारी विभाग के अंतर्गत आती हो परंतु इसका परिचालन पूरी तरह मंदिर के अनुदान से चलता है।

क्या है मामला

13 अक्टूबर, 2021 को तमिलनाडु के कोलाथुर में अरुल्मिगु कपालेश्वरार आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज के लिए टीचिंग और नॉन टीचिंग पदों को भरने के लिए विज्ञापन निकाले गए। इनमें यह लिखा गया था कि इन पदों पर केवल हिंदू धर्म के मानने वाले आवेदन कर सकते हैं। 

इसे लेकर कई वामपंथी और इस्लामी समूहों द्वारा विरोध प्रारंभ हो गया और कहा जाने लगा कि सरकार द्वारा चलाए जाने वाले विभाग पंथ के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते और इस तरह केवल हिंदुओं के लिए पद आरक्षित नहीं कर सकते।


इन लोगों ने बिना तथ्य जाने इस पर ‘ट्विटर आउटरेज’ प्रारंभ कर दिया और इसे असंवैधानिक और पक्षपाती निर्णय बताते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) तक को टैग किया जाने लगा। कई लोगों ने इसे राजनीतिक रंग देते हुए यह भी लिखा कि तमिलनाडु में डीएमके की सरकार जानबूझकर ऐसा कर रही है और वे हिंदुओं को आकर्षित करना चाहती है।



मंदिर का ही है सारा पैसा 

इस पूरे प्रकरण और विवाद के बीच तथ्य यह है कि असल में जिन पदों के विषय में वाद-विवाद किया जा रहा है उन पर दिए जाने वाले वेतनों का पैसा असल में हिंदुओं के मंदिरों से ही आता है।

दरअसल हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोवमेंट विभाग को सरकार द्वारा चलाया जाता है परंतु संस्था की नियमावली में यह साफ तौर पर लिखा गया है कि ‘वेतन और स्थापना पर होने वाला पूरा खर्चा संबंधित धार्मिक संस्था की ओर से वहन किया जाएगा’


इसके साथ ही नियमावली में यह तक लिखा गया है कि धार्मिक संस्था का हर कर्मचारी हिंदू धर्म में मान्यता रखने वाला होना चाहिए।

इससे यह साफ होता है ताकि संस्था के सभी पदों पर दिए जाने वाले वेतन और संस्था के अन्य खर्चों के लिए पैसा किसी राज्य या केंद्र सरकार के से नहीं बल्कि मंदिर में चढ़ाए गए दान से आता है।

पूरे विवाद और भ्राँति का कारण ये भी था कि इससे पहले आज तक इस संस्था द्वारा इस बात पर न तो ध्यान दिया गया और न ही इसके पदों को भरने के लिए हिन्दुओं द्वारा कोई विशेष दावा किया गया।

पहली बार हिंदू संस्था द्वारा हिंदुओं का पैसा जब हिन्दुओं के ही वेतन में खर्च करने को लेकर बात हो रही है तो सभी वामपंथी और इस्लामी गिरोह संविधान और नियमावली जैसे शब्दों का प्रयोग करके विलाप पर उतर आए हैं। 

इसके अलावा सोशल मिडिया पर किसी भी कुतर्क पर विलाप कर संयुक्त राष्ट्र को टैग करने का प्रचालन भी बढ़ने लगा है। इस मुद्दे पर भी कई निराश युवकों ने UN को भी टैग किया है, जिसके जवाब में उन्हें कई रचनात्मक उत्तर भी लोग दे रहे हैं।

अब देखना सिर्फ यही बाकी रह गया है कि किसी दिन कोई समुदाय विशेष का व्यक्ति अपनी बकरी खोने की बात ट्विटर पर लिखे और साथ में UN और उसके पदाधिकारियों को टैग कर यह दावा कर बैठे कि उसके साथ भारत में हिन्दुओं द्वारा ज्यादती की जा रही है।



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