मुड़ मुड़ के देखता हूँ: पंजाब के अतिवादियों के समक्ष सरकार बहादुर के झुकने का इतिहास

08 जनवरी, 2022 By: आनंद कुमार
पंजाब के अतिवादियों के समक्ष पहले भी कई बार झुकी है दिल्ली

बैसाखी आने वाली थी और उस वक्त पंजाब में अकाली दल की सरकार थी। पंजाब सरकार से संत निरंकारी समुदाय के लोगों ने एक आयोजन की इजाजत माँगी और इजाजत मिल भी गई। ये इजाजत मिलना खुद में ही एक आश्चर्य का विषय था। कुछ लोग पूछेंगे क्यों?

ये सवाल इसलिए करना पड़ता है क्योंकि अपने अलावा किसी से मतलब न रखने वाले आम हिन्दुओं को मतलब ही नहीं होता कि कहाँ क्या चल रहा है! फिर हम जिस दौर की बात कर रहे हैं, वो कॉन्ग्रेसी शासन (या शोषण) का काल था और उसमें नेता ये मानकर चलते थे कि लोग भूल जाते हैं। जनता की याददाश्त कामज़ोर ही रहे, इसके लिए वो भरपूर कोशिश भी करते थे।

खैर संत निरंकारी समुदाय वर्ष 1929 में बाबा बूटा सिंह द्वारा स्थापित एक धार्मिक संप्रदाय है। परंपरागत सिखों का एक बड़ा वर्ग निरंकारियों को सिख ही नहीं मानता। बाबा बूटा सिंह ने 1943 में सम्प्रदाय के धर्मगुरु की गद्दी बाबा अवतार सिंह को सौंप दी थी। बाबा अवतार सिंह विभाजन के बाद दिल्ली आ गए और 1947-48 से संत निरंकारी मिशन भारत में ही निबंधित एक धार्मिक सम्प्रदाय है।

जुलाई 2018 से सदगुरु माता सुदीक्षा जी इसकी छठी प्रमुख हैं और अब इसके 3000 केंद्र बताए जाते हैं, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। जिस अकाली दल की सरकार के दौर की हम बात कर रहे हैं, वो 1948 में भारत में इसके निबंधित होने के काफी बाद और आज से करीब चालीस वर्ष पहले की बात है।

तब तक स्थितियाँ बदलने लगी थीं और 1970 के दौर में पंजाब से कई सिख, कमाने के लिए कनाडा जाने लगे थे। जब 13 अप्रैल, 1978 को पंजाब की अकाली दल सरकार ने संत निरंकारी सम्मलेन की इजाजत दी थी, उस वक्त तक भिंडरावाले का ज़ोर बढ़ चुका था और बब्बर खालसा जैसे आतंकी संगठन भी अस्तित्व में आने लगे थे।

भिंडरावाले ने अमृतसर में होने वाले शांतिपूर्ण संत निरंकारी आयोजन का विरोध करने का आह्वान किया। जो लोग भिंडरावाले के नाम से वाकिफ़ हैं, उन्हें ये भी अंदाज़ा होगा कि ये कोई शांतिपूर्ण विरोध नहीं होने वाला था। भिंडरावाले ने अखंड किरांती जत्था के फौजा सिंह के साथ वहाँ जाकर निरंकारियों के उस वक्त के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह के टुकड़े कर डालने का आह्वान किया था।

भिंडरावाले और फौजा सिंह के नेतृत्व में करीब 200 सिखों का जत्था स्वर्ण गुरूद्वारे में भिंडरावाले के उग्र भाषण पर भड़क कर निकला। वहाँ पहुँचने पर फौजा सिंह ने निरंकारी प्रमुख गुरुबचन सिंह का सिर अपनी तलवार से काटने की कोशिश की और गुरुबचन सिंह के अंगरक्षक ने फौजा सिंह को गोली मार दी। भिंडरावाले भागने में कामयाब हो गया।

इसके बाद जो हिंसा भड़की, उसमें कई लोगों की मौत हुई। सरकारी और दूसरे आँकड़ों के मुताबिक भिंडरावाले के दो समर्थक, अखंड किरांती जत्था (फौजा सिंह) के ग्यारह लोग और तीन निरंकारी इस हिंसा में मारे गए थे। इस मामले में अकाली दल सरकार ने 62 निरंकारियों पर 13 सिखों की हत्या का मुकदमा किया। ये मुकदमा पड़ोसी राज्य हरियाणा में चलना शुरू हुआ।

निरंकारियों के पास आयोजन की अनुमति थी। भिंडरावाले ने स्वर्ण गुरूद्वारे में लोगों को भड़काने वाला भाषण दिया था। उसके बाद अखंड किरांती जत्था के फौजा सिंह और उसके साथियों ने भिंडरावाले के साथ मिलकर हमला किया था। तो ज़ाहिर है जब मुकदमा चला तो सभी 62 के 62 निरंकारी आत्मरक्षा में बाइज्जत बरी हो गए।

निरंकारियों को मीडिया का समर्थन भी मिला था और सिखों का मानना था कि ये उन्हें बदनाम करने की साजिश है! इससे भिंडरावाले का समर्थन भी बढ़ा। इस घटना की एक और परिणति भी हुई। जरनैल सिंह भिंडरावाले की दमदमी टकसाल के समर्थन से उस दिन ये घटना हुई थी और उसने अलग सिख देश की माँग के साथ ‘दल खालसा’ को स्थापित कर डाला।

दूसरी तरफ अखंड किरांती जत्था के फौजा सिंह की विधवा बीबी अमरजीत कौर के समर्थन से दो जत्थेदारों ने ‘बब्बर खालसा’ स्थापित की।

राजनीति के विचित्र मोड़ देखने के लिए ये घटनाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। अखंड किरांती दल के जत्थेदार तलविंदर सिंह परमार के नेतृत्व में बब्बर खालसा ने हिंसक तरीकों से अपनी लड़ाई आगे बढ़ाई। बब्बर खालसा से जुड़े रणजीत सिंह ने करीब दो साल बाद 1980 में निरंकारियों के दिल्ली स्थित मुख्यालय में एक बढ़ई बनकर घुसपैठ कर ली।

एक राइफल लेकर उसने 24 अप्रैल, 1980 की शाम घात लगाकर हमला किया और एक खिड़की से निरंकारियों के प्रमुख बाबा गुरुबचन सिंह को गोली मार दी। वो भागने में कामयाब हो गया। रणजीत सिंह के मुताबिक ये 28 सिखों की हत्या का बदला था।

उसने तीन वर्ष बाद 1983 में आत्मसमर्पण किया। वो तेरह साल जेल में था। तिहाड़ जेल में रहने के दौरान ही 1990 में उसे अकाल तख़्त का जत्थेदार बना दिया गया था।

ज़मानत मिलने पर उसने 1996 में अकाल तख़्त के जत्थेदार का पद संभाला। अगले ही वर्ष 1997 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उसकी ज़मानत रद्द कर दी। इस दौर में दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे भाजपा के मदन लाल खुराना ने रणजीत सिंह के समर्थन में जमकर अभियान चलाया था। ज़मानत रद्द होने के बाद रणजीत सिंह ने वापस जेल जाने, आत्मसमर्पण करने से साफ़ इनकार कर दिया।

राजनैतिक रूप से देखा जाए तो भाजपा को मदन लाल खुराना के रणजीत सिंह के समर्थन से कोई ख़ास लाभ पंजाब में होता तो नहीं दिखा। जो भी हो, सरकार बहादुर ने रणजीत सिंह के आत्मसमर्पण से इनकार के फ़ौरन बाद उसकी बाकी की सजा माफ़ कर दी। शायद सरकार बहादुर अपनी कमज़ोरी ढकना चाहती थी। रणजीत सिंह पर मुकदमा ख़त्म हुआ और उसे दोबारा गिरफ्तार करने की नौबत ही नहीं आई।

इस वक्त तक 1978 की घटना के बाद स्थापित हुए बब्बर खालसा को पाँव जमाने का अच्छा ख़ासा समय मिल चुका था। भारत में कम मगर आर्थिक और नैतिक समर्थन के लिए इसे कनाडा और जर्मनी जैसे देशों में काफी लोग मिल चुके थे।

भारत सरकार, जो कि खुद ही बब्बर खालसा के सामने 1997 में कमजोर पड़ती दिखती है, उसकी बातों पर 1980 के दौर में कोई और सरकार कितना ध्यान देती? कनाडा की ‘ओह सो लिबरल’ सरकार ने बब्बर खालसा को आतंकी मानने से इनकार कर दिया। भारत की रॉ ने जो सन्देश भेजे उन पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसका नतीजा क्या हुआ, ये आगे देखेंगे।



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