भारत एवं इजराइल सम्बन्ध: 'अरब तुष्टिकरण' वाले नेहरू से लेकर नरेन्द्र मोदी तक

13 मई, 2021 By: पुलकित त्यागी
नेहरू से लेकर पीएम मोदी तक भारत-इजराइल संबंध मजबूत ही हुए हैं

भारत-इजराइल संबंध आज काफी परिपक्व एवं मधुर हैं। दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंध समय के साथ और अधिक स्थिर एवं मजबूत हो रहे हैं। लेकिन ऐसा तब नहीं था जब इजराइल एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्म ले ही रहा था। यह वो समय था, जब अरब देशों की कड़ी आपत्ति के बीच इजराइल अपनी भूमिका तैयार कर रहा था।

नए राज्य के निर्माण को अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ा था। इस बीच अरब एवं मुस्लिम तुष्टिकरण तथा इजराइल की मान्यता में से किसी एक को चुनने का प्रश्न किसी और के नहीं बल्कि पहले भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने था।

इज़राइल – फिलिस्तीन; ये दो नाम सुनते ही पहला शब्द जो मस्तिष्क में आता है वह है संघर्ष! इसका कारण भी स्पष्ट है। वर्ष 1948 में इज़राइल के एक विशिष्ट देश बनने से लेकर आज तक इज़राइल – फिलिस्तीन का यह भाग अगर किसी चीज़ के लिए निरंतर चर्चा में रहा है तो वह है अपनी सीमाओं को लेकर संघर्ष

जहाँ एक ओर इज़राइल इस क्षेत्र पर अपना ऐतिहासिक दावा रखता है, वहीं फिलिस्तीनी भी विरोध में वहाँ से हटने का नाम नहीं लेते।

हमास जैसे फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हर यहूदी का सिर कलम करने का स्वप्न देखते हैं तो इज़राइल भी अपने अस्तित्व मात्र की रक्षा के इस युद्ध में किसी आतंकी गतिविधि का प्रतिकार करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। 

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मानचित्र में इज़राइल, जिसमें यरूशलम और गाजा पट्टी भी नजर आ रही है

इस भूभाग पर स्वामित्व स्थापित करने और अपने अधिकार का दावा करने के कारण विभिन्न समय पर क्षेत्र में अराजकता की स्थिति बनी रहती है और हर बार युद्ध जैसा माहौल बनने पर समस्त विश्व दो भागों में बंट जाता है।

भारत में भी जहाँ एक ओर वामपंथी एवं इस्लामी धड़ा फिलिस्तीन, मूलतः मुस्लिमों के समर्थन में खड़ा दिखता है तो वहीं दक्षिणपंथी एवं हिंदू इज़राइल के साथ नजर आते हैं।

सांस्कृतिक एवं भौगोलिक हैं भारत के इज़राइल समर्थन के कारण 

स्वतंत्रता के बाद विभाजन की विभीषिका देखने और भूगोल के आधार पर भारतीय हिन्दू स्वयं को इज़राइल की भाँति ही इस्लामी मुल्कों से घिरा देखकर स्वयं को यहूदियों से संबंधित अनुभव करते हैं। जबकि, सभ्यता की दृष्टि से यूनानी, रोमन आदि के लगभग समाप्त हो जाने के उपरांत यहूदी धर्म (Judaism) तथा हिंदू धर्म, ये 02 ही ऐसी प्राचीन संस्कृति हैं, जो विश्व में शेष बची हैं। यही एक वजह भी है कि विभिन्न अवसरों पर ये दोनों एक-दूसरे के समर्थन में आगे नजर आते रहते हैं। 

राजनीति ने भी निभाई है बड़ी भूमिका 

इसका एक मुख्य राजनीतिक कारण भी है। भारत तथा इज़राइल कुछ महीनों के अंतर भर पर स्वतंत्र हुए थे। जिसके बाद, भारत ने कई वर्षों तक इज़राइल को देश के रूप में मान्यता प्रदान नहीं की।

इसकी वजह थे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने मुख्यतः ऐसा भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण कर अपनी राजनीति चमकाने तथा अरबी देशों को प्रसन्न करने के लिए किया।  वजह यह थी कि भारतीय मुस्लिम फिलिस्तीनयों का समर्थन करते थे, इसलिए उन्हें प्रसन्न रखने के लिए नेहरू द्वारा इज़राइल की ओर कड़ा रुख अपनाया गया।

इसी कारण भारत ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यूनाइटेड नेशन (UN) में भी इज़राइल एवं फिलिस्तीन को अलग-अलग देश घोषित करे जाने के निर्णय के विरोध में मत दिया था। संयुक्त राष्ट्र ने इज़राइल और फ़िलिस्तीन, दो राष्ट्र बनाने का प्रस्ताव पास किया था।

हालाँकि, ‘फ़िलिस्तीन के बँटवारे के खिलाफ़ खड़े नेहरू’ इसमें ‘हार’ गए क्योंकि इसके समर्थन में 33 मत एवं 13 मत विरोध में पड़े थे। तथा मई 14, 1948 को इज़राइल को अलग देश घोषित किया गया। 

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प्रधानमंत्री नेहरू व इज़राइली डिप्लोमैट माइकल मिशैल (1950)

हालांकि इज़राइल द्वारा विभिन्न अवसरों पर भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया है। जैसे 1938 में आगे चलकर इज़राइल के राष्ट्रपति बने हैम वीज़मैन ने नेहरू से एक भेंट के दौरान कहा था,

“अगर आप हमें नैतिक रूप से गलत मानते हैं तो दोनों देशों के बीच वार्तालाप संभव नहीं, परंतु अगर आप (नेहरू) यह स्वीकार करते हैं कि हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं का एक नैतिक आधार है, तो दोनों देश साथ आगे बढ़ने का सोच सकते हैं’

अपनी स्वतंत्रता के बाद भी इज़राइल के विदेश मंत्री शेरटोक ने अपने पत्र में नेहरू से यह अनुरोध किया कि वे इज़राइल को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता प्रदान करें। जिसका जवाब नेहरू ने भारतीय मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए एक वार्ता के दौरान दिया था जिसमें उन्होंने कहा-

“हम इस मामले पर कोई पक्ष नहीं रखना चाहते, भारत इस संघर्ष में वर्तमान स्थिति में या तो कूटनीतिक रूप से या अन्यथा प्रभावी भूमिका नहीं निभा सकता। हम केवल कुछ समय के लिए घटनाओं को देख सकते हैं, यह आशा करते हुए कि एक अवसर आएगा जब हम शांति और ध्यान के हित में अपने प्रभाव का उपयोग कर सकेंगे।

1949 में UN में प्रवेश के लिए होने वाले चुनावों में भी भारत ने इज़रायल के विरोध में मत रखा, जिसका भी कोई लाभ न हुआ और इज़राइल को UN में सफलतापूर्वक सदस्यता प्राप्त हुई।

यूएसए ने वर्ष 1917 के ‘बलफोर घोषणापत्र’ का समर्थन किया था (आर्थर बलफोर एक ब्रिटिश विदेश सचिव थे), जिन्होंने फ़िलिस्तीन में एक यहूदी राष्ट्रीय घर की स्थापना का आह्वान किया था। यह घोषणापत्र ब्रिटेन की ओर से था, जिसमें कहा गया कि फ़िलिस्तीन में यहूदियों का नया देश बनेगा।

लगभग 2.5 साल तथा 60 अन्य देशों द्वारा स्वीकृति के उपरांत भारत ने सितंबर, 1950 में इज़राइल को एक अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दी, जिसके बाद नेहरू ने कहा-

“हम बहुत पहले इज़राइल को मान्यता दे चुके थे, क्योंकि इज़राइल एक तथ्य है। अरब देशों में अपने मित्रों की भावनाओं को ठेस न पहुँचाने की हमारी इच्छा के कारण हम इससे परहेज़ करते रहे।

यह जानते हुए कि अन्य देशों का समर्थन हासिल करने के लिए भारत का समर्थन महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि तब तक उपनिवेशवाद का दौर बीतने लगा था और फलस्वरूप एशिया और अफ्रीका में नए स्वतंत्र राष्ट्रों ने जन्म लिया, इजराइल ने असमंजस में पड़े भारत को नए यहूदी राष्ट्र को मान्यता देने के लिए मनाने के लिए हर संभव दाँव खेला।

यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू को मनाने के लिए इजराइली नेतृत्व ने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को, जो यकीनन वैश्विक यहूदी समुदाय के सबसे प्रसिद्ध सदस्य थे, तक की मदद ली। आइंस्टीन ने नेहरू को पत्र लिखा, लेकिन नेहरू ने तब भी इजराइल का समर्थन नहीं किया।

पीवी नरसिम्हा राव से समझा एकमात्र यहूदी राष्ट्र से मित्रता का महत्त्व 

मान्यता देने के बावजूद भी भारत और इज़राइल के मध्य राजनयिक संबंध स्थापित होने में तकरीबन 42 साल लग गए। कई वर्षों तक वैश्विक पटल पर भारत ने इज़राइल को एक मित्र के रूप में नहीं देखा। बावजूद इसके कि 1962 चीन युद्ध के दौरान इज़राइल ने भारत को अस्त्र-शस्त्र मुहैया कराने में सहायता की थी।

इज़राइल और भारत के अच्छे संबंध प्रारंभ 90 के उस दशक में हुए जब सोवियत संघ के टुकड़े हो जाने पर भारत को सैन्य मदद प्रदान करने के लिए रूस का सहारा न बचा। तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा इस परिस्थिति को गूढ़ता से समझा गया, जिसके बाद इज़राइल के साथ द्विपक्षीय लेन-देन तथा मित्रता प्रारंभ हुई।

भाजपा शासनकाल में सम्बन्ध और मधुर 

जैसा कि कहते हैं कि एक अच्छे मित्र की पहचान बुरे समय में होती है, तथा एक राष्ट्र के लिए युद्ध से अधिक बुरा समय कोई नहीं होता। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इज़राइल द्वारा भारत को संपूर्ण सैन्य मदद देने के बाद भारत की सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने में भी सहायता की गई। यह कहना भी अनुचित न होगा कि इज़राइल और भारत की मित्रता मूलतः भारत में भाजपा के उदय के साथ ही प्रारंभ हुई।

कारगिल युद्ध के दौरान भाजपा सरकार ने इस तथ्य को समझा कि युद्ध में इज़राइल ने भारत के सैन्य बल को बढ़ाने के लिए उन्हें आवश्यक शास्त्रों जैसे कि लेज़र गाइडेड मिसाइल तथा फाइटर जेट प्रदान किए थे, जिनके कारण ही भारत पाकिस्तानी सेना से लोहा ले पाया तथा अपनी सीमाओं को सुरक्षित रख पाया। 

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तत्कालीन इज़राइली प्रधानमन्त्री एरिल शेरोन के साथ अटल बिहारी वाजपेयी  (वर्ष 2003)

दोनों देशों की वर्तमान स्थिति 

इस सबसे बढ़कर पिछले कुछ वर्षों में भारत एवं इजराइल की मित्रता और अधिक ठोस हुई है। इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की वैश्विक स्तर पर छवि एक दक्षिणपंथी नेता की है। भारत में वर्ष 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता पाने वाली भाजपा सरकार ने इज़राइल के साथ द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक बढ़ाने पर जोर दिया है। 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू

जिसके उपरान्त अमरीका तथा रूस के बाद इज़राइल भारत के साथ लगभग $1 बिलियन के सैन्य उपकरणों का निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। वर्ष 2017 में भारत ने इज़राइल के साथ $2 बिलियन का सौदा किया, जिसमें भारत ने इज़राइल से मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम खरीदने की स्वीकृति दी है। 

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशंसक उनकी कूटनीति की बहुत सराहना करते हैं। इस क्षेत्र में भी वैश्विक कूटनीति को ध्यान में रखकर एक ओर से फिलिस्तीन को हल्का-फुल्का नैतिक समर्थन प्रदान करने के साथ-साथ भारत ने इज़राइल के साथ अपने मधुर संबंध बनाए हुए हैं तथा दोनों देशों की मित्रता दिन-प्रतिदिन और अधिक शक्तिशाली रूप में विकसित हो रही है।



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