बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहोगे क्या - प्रेमचंद और न्यायपालिका

17 अक्टूबर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
न्यायपालिका क्या सिर्फ बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहती?

“क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?”

प्रेमचंद की लिखी कहानी ‘पंच-परमेश्वर’, ‘मानसरोवर’ के सातवें भाग में तो आती ही है, साथ ही ये कहानी कई जगह विद्यालयों के पाठ्यक्रम में ही होती है। इसलिए ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे’ कहते ही अलगू चौधरी, याद आ ही जाते हैं। साथ ही ये भी याद आ जाता है कि खाला के कहे इस एक वाक्य ने जुम्मन का साथ देने के बदले ईमानदारी दिखाने की याद भी उन्हें दिला दी थी।

यहाँ अगले ही वाक्य में प्रेमचंद खुद ही कह देते हैं, “हमारे सोए हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाए, तो उसे खबर नहीं होती, परन्तु ललकार सुन कर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता।” सवाल है कि आज ये ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे’ का बड़ा सा सवाल पूछेगा कौन?

इस सन्दर्भ में भारत के लॉ कमीशन की ओर से बीपी जीवन रेड्डी द्वारा उस समय के कानून मंत्री रहे जेठमलानी जी को भेजी गई 173वीं रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है। ये चिट्ठी 13 अप्रैल, 2000 की है जिसके साथ जुड़ी रिपोर्ट ‘प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिज्म बिल, 2000’ पर थी।

इस रिपोर्ट के तीसरे अध्याय में काफी कुछ ऐसा लिखा है जो महत्वपूर्ण हो जाता है। इसमें कहा गया है कि आतंकवाद खुद में एक ऐसा कृत्य है जिसका उद्देश्य ही आम लोगों में डर फैलाना है। इसकी वजह से अपने आँखों के सामने हो रहे अत्याचार को देखकर भी वो मूकदर्शक बन जाते हैं। वो पुलिस-प्रशासन को इस सम्बन्ध में कोई सूचना देने से हिचकिचाने लगते हैं और सहयोग करने से बचते हैं। ऐसे मामलों में गवाह नहीं मिलते क्योंकि लोगों को अपनी खुद की सुरक्षा अपने परिवारों की सुरक्षा का डर होता है।

इसके आगे ये रिपोर्ट बताती है कि पंजाब के आतंकवाद के दिनों में जज ऐसे डरे हुए थे कि वो आतंकवादियों के खिलाफ कोई मुकदमा अपनी अदालत में लेना ही नहीं चाहते थे। रिपोर्ट ये भी कहती है कि जम्मू कश्मीर में अभी (अप्रैल 2000 में जब ये रिपोर्ट जमा हुई) तब जैसे ही हालात हैं और इसकी वजह से आतंकियों के खिलाफ चल रहे मुकदमों में देरी हो रही है।

ऐसे में स्वतंत्र सबूतों या शांति के काल जैसा अदालती कार्रवाई का होना व्यावहारिक नहीं लगता। इसी वजह से ऐसे कानून (यानि पोटा) की जरूरत है। ये रिपोर्ट ‘प्रिवेंशन ऑफ़ टेररिज्म बिल, 2000’ जो ‘पोटा’ नाम के कानून की तरह लागू हुआ था, उसके बारे में थी और ये न्यायाधीशों के डर की बात कर रहा है।

हालिया दौर देखें तो तब की इस रिपोर्ट में न्यायाधीशों और न्यायिक व्यवस्था में काम करने वालों के जिस डर की बात की गई है, वो विचित्र नहीं लगती। अदालतें जिन मामलों का ‘स्वतः संज्ञान’ लेती रही हैं, उन पर एक नजर डाली जाए तो ये विचित्र सी बात स्पष्ट दिखने लगती है।

अगर धार्मिक मामलों से जुड़े फैसलों को देखा जाए तो हम पाते हैं कि हाल के दौर में कई बार अदालतों ने मंदिरों में बलि को रोकने का फैसला दिया है। ये तब है जबकि अपने-अपने तरीके से धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन की छूट भारत का संविधान (अनुच्छेद 25 के तहत) सभी धर्मों के लोगों को देता है। कभी जल्लीकट्टु पर प्रतिबन्ध लगता है तो कभी दही-हाँडी की ऊँचाई  तय होने लगती है।

‘धर्म के नाम पर बलि नहीं होनी चाहिए’ का तर्क भी केवल एक बहुसंख्यक समुदाय को सुनाया जाता है, अन्य के लिए ये नियम लागू नहीं। कुछ ये भी बताने लगते हैं कि बलि से पर्यटक मंदिरों में नहीं आएँगे, जबकि मंदिर धार्मिक स्थल होते हैं, कोई पर्यटन स्थल होते ही नहीं!

भीड़ लगेगी ये कहकर पंडाल में कितने लोग आएँगे, मूर्तियाँ कितनी ऊँची होंगी ये तय किया जाने लगता है। दूसरे समुदायों के पर्वों के समय किसी डर से ये बातें लोग भूल जाते हैं क्या? ये तो मत कहिए कि डर नहीं होता या न्यायाधीशों और कानून व्यवस्था के लिए काम कर रहे लोगों को नहीं लगता क्योंकि ये तो रिपोर्ट में लिखा हुआ तथ्य है। कभी सन 2000 में डर था और फिर बीस साल में डर ख़त्म हो गया, ऐसा तो किसी रिपोर्ट ने बताया नहीं न! बताया है क्या?

छः महीने तक शाहीन बाग़ इलाके को जाम रखकर पूरी दिल्ली को बंधक बनाए रखा जाए और वो कोई आदेश देने जैसा मामला न लगे, ऐसा तो भारत में ही होता है। उसके बाद फिर दंगे हो जाएँ और उसमें दिलबर नेगी जैसे कहीं बाहर से आए विस्थापित मजदूर की या विकास शर्मा जैसे सरकारी कर्मचारियों की हत्याएँ होती रहें, उस समय कुछ नजर नहीं आता।

कोई खुद को किसान बताकर दिल्ली पहुँचने वाले रास्तों को रोक दे और वो अदालतों को दिखे ही न? वहीं पटाखों से होने वाला प्रदुषण दिखने लगे, पराली जलाने जैसे, निर्माण से जुड़े जो बड़े कारण हैं वो न दिखें तो क्या सोचा जाए? ऐसा कैसे हो सकता है कि हर बात पर सवाल करने वाले ये न पूछें कि 26 जनवरी, 2021 को जो दिल्ली में पुलिसकर्मियों के साथ हो रहा था, वो आखिर था क्या!

हर बार जब कोई रिटायर होता है तो उसे अचानक याद आने लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया में सुधारों की जरुरत है। इसके बाद भी न्यायिक व्यवस्था फिरंगियों के दौर वाली चलती है। ये बार-बार दोहराया जाता है कि ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ और तारिख पर तारिख फिल्मों का डायलॉग बन जाता है।

जबरन कोई खुद को ‘सीजर्स वाइफ’ यानी, हर सवाल से परे मान ले, ऐसा लोकतंत्र में तो नहीं चलता। अगर विधायिका से, कार्यपालिका से, और पत्रकारिता से भी सवाल किए जा सकते हैं तो न्यायपालिका को ‘सीजर्स वाइफ’ की तरह सवालों से परे तो नहीं माना जाना चाहिए।

बार-बार की ऐसी स्थितियों से उम्मीद है नींद खुलेगी। कानून अपनी आँखों से पट्टी हटाएगा क्योंकि जिन्दा कौमें बदलाव तो लाती ही रहती हैं और ‘इंडिया देट इज भारत’, अभी जिन्दा है!



सहयोग करें
वामपंथी मीडिया तगड़ी फ़ंडिंग के बल पर झूठी खबरें और नैरेटिव फैलाता रहता है। इस प्रपंच और सतत चल रहे प्रॉपगैंडा का जवाब उसी भाषा और शैली में देने के लिए हमें आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आप निम्नलिखित लिंक्स के माध्यम से हमें समर्थन दे सकते हैं:

ताज़ा समाचार