न्यायपालिका रोस्ट: 'अनंत सिंह' की जुडिशरी है ये

25 जून, 2021 By: अजीत भारती
न्यायपालिका या अनंत सिंह जी की न्यायपालिका?

जुडिशरी या न्यायपालिका और इसके मीलॉर्ड लोग, अपने नित नए करतबों के कारण ‘अनंत सिंह की न्यायपालिका’ बनते जा रहे हैं। अब इन्हें मीलॉर्ड कहें या मीलहसुन, समझ में नहीं आता। ज्ञान तो ऐसे देते हैं जैसे वेदव्यास इनके ही सामूहिक प्रयासों से उत्पन्न हुए थे और इनके निजी निर्देशों के आधार पर महाभारत की रचना की गई थी। स्वयं को ब्रह्मा मान कर चल रहे माननीयों के कुछ कार्यों को देखा जाए तो वो माननीय का तो पता नहीं परंतु बेईमाननीय अवश्य कहे जा सकते हैं।

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यहाँ के नियम इतने फ्लेक्सिबल हैं कि प्रभाव का वजन अमूमन न्याय की तराजू के संतुलन को एकतरफा बना देता है। बीस-बीस सालों से न्याय की उम्मीद में चप्पल घिसते गरीब की दुर्गति की बातें हर न्यायाधीश के किसी लैक्चर में आपको सुनाई दे जाएगी, लेकिन दस दिन पहले स्वयं ही अपनी सर्जरी के सफल होने और स्वस्थ होने के ट्वीट करने वाली राणा अय्यूब को, यही न्यायपालिका उसी आधार पर एंटिसिपेटरी बेल दे देती है जिसमें यह लिखा है कि उनकी रीढ़ में समस्या है।

अगर न्यायपालिका के न्यायाधीश राजनैतिक या आर्थिक प्रभाव में नहीं होते हैं तो फिर किसी अर्णब गोस्वामी को, वही बॉम्बे हायकोर्ट बेल क्यों नहीं दे पाता? क्या वहाँ के जज साहब आम आदमी को इतना चूतिया समझते हैं कि हमें यह समझ में नहीं आता कि 2018 के आत्महत्या को उकसाने वाले केस को उसी वक्त दोबारा क्यों खोला गया जब टीआरपी स्कैम के बहाने उद्धव ठाकरे को अर्णब हर रात ललकार रहा था?

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जरा यही सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र ऑडिट करवा ले और पब्लिक में यह जानकारी रखे कि हायकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों का पारिवारिक इतिहास कितना ‘जुडिशियल’ रहा है, आम जनता को बताया जाए कि एक ही परिवार के लोग वकील से जज, किस नियम से बनते हैं और उस नियम को बनाने वाले कौन हैं? हमें यह बताया जाए कि हर बात पर चिंतित रहने वाले जजों की सम्पत्ति आखिर सूचना के अधिकार के दायरे में क्यों नहीं है? आखिर हमें भी तो पता चले कि उनकी सेलरी कितनी है और जीवनशैली किस स्तर की और किस शहर में उनके कितने मकान हैं। ऑब्जेक्शन! सस्टेन्ड!! हर तरह से स्वयं को एक सुरक्षित कवच में कैद किए इस न्याय व्यवस्था ने भी राष्ट्र का उतना ही नुकसान किया है जितना सड़ी हुई राजनीति, बिकी हुई ब्यूरोक्रेसी और नैरेटिव का खेल खेलने वाली मीडिया ने।

आप बाकी तीनों पर बोल सकते हैं, यही न्यायालय आपको सुरक्षा भी देती है लेकिन आप इन पर प्रश्न कर दें तो वैसे ही बिलबिलाते हैं जैसे कुत्ते की पूँछ पर किसी ने लात रख दी हो। लेकिन यह लोकतंत्र है, और संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। संविधान में यह नहीं लिखा कि हम अपनी भ्रष्ट जुडिशरी पर प्रश्न नहीं कर सकते। ये बात और है कि मीलॉर्डों ने स्वयं को ही संविधान मान कर अपने ऊपर किए गए सवालों को यह कह कर अवमानना में डाल देते हैं कि ‘लोगों का विश्वास डिग जाएगा’।

ये माननीय किस गुणवत्ता की चरस फाँकते हैं मुझे नहीं पता, लेकिन अपने कॉलेजियम के सुरक्षा कवच की गुलाबी दुनिया से बाहर झाँके तो पता चलेगा कि न्यायपालिका पर विश्वास करना लोगों की मजबूरी है क्योंकि वो वहाँ से ऊपर कहीं जा ही नहीं सकते। वस्तुतः, जब एक भ्रष्ट नेता यह कहता है कि उसे न्यायपालिका पर विश्वास है, तो उसका मतलब यह होता है कि उसे इस संस्था की सड़ाँध पर विश्वास है। और जब वही बात वैसे लोग कहते हैं जो निर्दोष हैं, तो वो यह बात विवश हो कर कहते हैं क्योंकि वो अपने सही उद्गार प्रकट कर के कोर्ट को नाराज नहीं करना चाहते।

न्यायपालिका अगर अपने ऊपर आम नागरिकों का सहज विश्वास लाना चाहती है तो उसे फैसले कानून की किताबों के अनुसार, आँख पर पट्टी बाँध कर, सामने वाले की पहचान से इतर हो कर देने होंगे।

जबकि, होता इसके बिलकुल उलट यह है कि न्यायालय की रजिस्ट्री से ले कर वकील और जज तक, यह देखने में ज्यादा रुचि लेते हैं कि जिसने याचिका डाली है उसका नाम क्या है, पावर पोजिशन क्या है, उसका मजहब क्या है, उसके ट्विटर पर कितने फॉलोवर हैं और तब जा कर याचिका में क्या है, यह देखा जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो गरीबों की चप्पल घिसने के पुराण बाँचने वाले जज प्रभावशाली लोगों की बेल एप्लिकेशन एक दिन में नहीं सुनते। फिर से कह रहा हूँ कि आम जनता चूतिया नहीं है, जजों को चाहे जितना भी विश्वास हो इस बात पर।

क्या हमने यह नहीं देखा है कि बंगाल में हो रही हिंसा पर लगातार याचिकाएँ लगाने वालों को कोई प्राथमिकता नहीं दी गई, जबकि वहाँ जानें जा रही थीं, बस्तियाँ जल रही थीं और लोग गाँव छोड़ कर भाग रहे थे। स्वतः संज्ञान लेना तो दूर, आँखों में कील घोंपने पर भी हमारे मीलहसुनों को वो लाशें नहीं दिखीं। क्या पता नेटफ्लिक्स पर कोई सिरीज आ गया होगा तो बिंज वाचिंग में व्यस्त रहे होंगे।

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कन्विक्टेड, २२ साल के ट्रायल के बाद सजा सुनाए गए आतंकियों के मानवाधिकार के लिए ब्लैकमेल होता है ये कोर्ट और फिर कहता है कि अगर वो ऐसा न करते तो लोगों की आस्था न्याय व्यवस्था से उठ सकती है! शर्म नहीं आती इस कोर्ट के न्यायाधीशों को जो आतंकियों के लिए रात में कोर्ट खोलते हैं और गरीब न्याय की आस में तीन-तीन पीढ़ियों तक चप्पल घिसता खप जाता है! कैसे माफ कर दें इन पापियों को जो वकीलों के हाथों ब्लैकमेल होते रहते हैं?

आखिर सुप्रीम कोर्ट के जजों को ममता के मामलों से टेक्निकेलिटी के आधार पर भागते हुए देख कर थूकूँ नहीं तो क्या करूँ? क्या संदेश दे रहे हैं आप जनता को? कि किसी खास राज्य के जजों से हम निष्पक्षता की उम्मीद न रखें? या फिर यह कि लाशों की कतार लगाने वाली सत्ता और बदले की भावना से किए गए बलात्कारों की राजधानी बन चुके प्रदेश की मुख्यमंत्री से आपको डर लगता है?

अपनी नपुंसकता का प्रदर्शन तो इन्होंने प्रशांत भूषण वाले केस में खूब किया है। प्रशांत भूषण के ऊपर जिस तरह के आरोप थे, और जैसे-जैसे शब्दों का इस्तेमाल प्रशांत भूषण ने कोर्ट के जजों को लिए किया, उसके लिए माफी माँगना तो दूर, वो लगातार सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाता रहा। क्या उखाड़ लिया कोर्ट ने? एक रुपए का फाइन लिया गया। वो देते हुए भी इस लंठ आदमी ने सुप्रीम कोर्ट को उसकी जगह दिखा दी।

वहाँ सुप्रीम कोर्ट अपने लिबास के कालेपन की चमक बचाए रखने के लिए एक प्रभावशाली वकील के आगे घुटनों पर बैठ कर चाबुक चलाने की विलक्षण बातें कर रहा था। जबकि प्रशांत भूषण के लिए पूरी न्याय व्यवस्था उसकी निजी रखैल जैसी लग रही थी जहाँ वो उन्हें नचाता रहा, और वो नाचते रहे। मीडिया में बयान आया कि इसमें सजा देने से कोर्ट की गरिमा गिर जाएगी। फिर अपने नाम में से न्यायालय हटवा दो और गरिमालय करवा लो।

न्याय वह है जहाँ ज्ञान और प्रभाव के स्तर को देख कर, एक ही अपराध के लिए समानुपातिक दंड का प्रावधान होता है, यहाँ उल्टा है। आप गरीब हैं तो जेल में सड़ते रहिए, अमीर हैं तो चिंकारा मार कर, फुटपाथ पर सोते लोगों के ऊपर गाड़ी चढ़ा कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को अपने लिंग के अग्रभाग पर बिठा कर घूमते रहिए।



प्रेग्नेंट हैं तो बेल दे दीजिए, रीढ़ की हड्डी में दर्द है तब दे दो, मर्दाना कमजोरी की दवा खा रहे हैं इसलिए दे दो… मतलब बेल न हुआ, घंटा हो गया कि जो चाहे बजा कर ले लेता है। ये तो बड़ी अच्छी व्यवस्था हो गई है कि अपराध कर के सेक्स कर लो। माँ बने तो प्रेग्नेंसी का हवाला दो, बाप बने तो कह दो कि बच्चे की माँ का ध्यान रखना है, घर में दो ही लोग हैं। और आप यह मान कर चलिए कि एक जज, जो मोटिवेटेड हो, वो आपको पिता बनने के नाम पर भी मानवीय आधार पर बेल दे देगा, वहीं दूसरा जज, उसी व्यक्ति को यह कह कर बेल नहीं देगा कि अपराध करते वक्त सोचना चाहिए था कि आगे बच्चे होंगे तो उनका ख्याल कौन करेगा।

बेल अगर एक अधिकार है, जैसा कि कई बार कोर्ट ने कहा है, फिर वो अधिकार हर मामले में सब्जेक्टिव क्यों हो जाता है? या तो सबको दो, और कहो कि जेल भरे हुए हैं, अभियुक्त घर में रहे और तारीख पर पेश होता रहे, या फिर जो नियम हैं, चाहे बेल फाइल करने के हों, सुनवाई के हों, बेल देने के हों, वो सब पर समान रूप से लागू हों। लेकिन नहीं, जैसा माहौल है, और जिस मीडिया के दवाब में न्यायपालिका कार्य करती है, उसमें अपराधियों का संभोग करना सबसे अच्छा मार्ग दिखता है।

दस हिन्दुओं को जला दो, घर आ कर बीवी के साथ सेक्स कर लो, चार महीने बाद बीवी कोर्ट में पहुँच जाएगी और बच्चे पालने के लिए एक अपराधी को बेल मिल जाएगी। क्यों? क्योंकि उसके वकील ने ‘मानवाधिकारों की बात’ से शुरु किया और कोर्ट को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाया।

कोई बुड्ढा है, स्वयं को कवि कहता है तब उसके लिए उदारता की माँग उठती है। न्याय में आखिर उदारता या सख्ती की उम्मीद ही क्यों? न्याय तो अपनी परिभाषा के दायरे में हर तरह के भावों से ऊपर होना चाहिए। न्याय का मतलब न्याय है, और वही सबसे बड़ी उदारता है कि तुम्हारे साथ न्याय हुआ है।

यहाँ वकील से ले कर जज तक इस बात पर टाइम पास करते हैं कि वो तो कवि है, प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बना रहा था, या दंगों में उसका हाथ था, तो उसका मार्मिक कविताओं के नाम पर, उसकी ‘अवस्था’ देख कर उसे छूट दी जाए, बेल दे दी जाए? क्यों? बाकी लोग जो चिंदी-चिंदी मामलों में फँसे हुए हैं, अंडरट्रायल हैं, घरों से दूर हैं, बेल के लिए पैसे या बड़े वकील नहीं कर सकते, वो क्या इन्हीं न्यायालयों की लाचारी के कारण अपनी सजा से ज्यादा समय अंडरट्रायल हो कर कैद में नहीं बिताते?

ऐसा नहीं है कि माननीय और मीलहसुन इन बातों को नहीं जानते। जानते हैं, और किसी रैंडम सेमिनार में चिंतित होते दिख जाते हैं। जी, चिंतित हो लिए, और क्या चाहिए, वहीं से खड़े हो कर फैसला सुना दे? एक जज चिंतित हो गया, पता है आपको कितना स्ट्रेस होता है? आपको घंटा पता नहीं है।

एक मित्र के साथ की गई एक चर्चा याद आ गई जब उन्होंने अपना अनुभव बाँटा था। सुप्रीम कोर्ट में हमारे एक मित्र किसी कार्यवश गए थे, बेल चाहिए थी। वकील साहब ने आठ लाख ले रखे थे, और कहा था कि बेल तो मिल ही गई समझो। बेल नहीं मिली, पैसे भी वापस नहीं हुए, तो मित्रवर मुँह लटकाए बैठे थे।

वहीं बैठे एक गार्ड ने पूछा: बेटा, यहाँ न्याय की उम्मीद से आए हो क्या? इन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट है, सर्वोच्च न्यायालय! यहाँ न्याय नहीं मिलेगा तो क्या मिलेगा। गार्ड रिंकिया के पापा की तरह हीं-हीं हीं-ही हँस दिया और बोला: यहाँ न्याय के अलावा सब कुछ होता है

इलाहाबाद हायकोर्ट के बारे में प्रचलित है कि आपके पास पैसा है, और आप केस हार गए तो आपसे वकील से बड़ा चूतिया धरती पर कोई नहीं। मैं गाली नहीं दे रहा, ये वहीं के एक वकील ने अपने उस क्लायंट से कहा था जो यह कह रहा था कि उसने अपने वकील को उतने पैसे दिए जितने उसने माँगे थे। जस्टिस काट्जू ने इसी कोर्ट को भारत का सबसे भ्रष्ट कोर्ट कहा था।

एक बार नहीं, बार-बार उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के बारे में कहा था कि वहाँ लगता है कुछ सड़ गया है। एक जज के बारे में उन्होंने स्वयं ही बताया कि जजों के एजेंट होते हैं जो पैसे अरेंज करते हैं। यही बात, मेरे मित्र को दूसरे वकील ने आश्चर्य के साथ कहा था कि जब पैसे हैं, तो वकील ने जज से सेटिंग कैसे नहीं की!

खैर, आप सब के अनुभव में जज साहिबानों की मीलॉर्डगीरी के किस्से तो सामने आए ही होंगे। कोई ब्लैक लेवल और ढाई लाख ले कर मानता है, किसी को किसी और तरह के मनोरंजन की दरकार रहती है, कुछ लोग काइंड में ज्यादा ट्रांजेक्शन करते हैं।

जब सर्वोच्च न्यायालय ही, उच्च न्यायालय के ऊपर भ्रष्टाचार और चाचा-भतीजा के न्यायालयों वाली बातें कहती है, तो फिर मेरे आपके कहने से क्या फर्क पड़ता है। हम और आप तो बस कहानियाँ साझा करते हैं कि कैसे आपके परिचित पर दहेज हत्या का झूठा केस था, और उन्हें पुलिस से ले कर जज तक को ‘मैनेज’ करना पड़ा था।

मीलहसुनों की एक खास बात है कि वो चिंतित बहुत रहते हैं। आखिर पूरे देश को चलाने की जिम्मेदारी है उन पर। संसद-वंसद तो इनकी अधोजटाओं को घुँघराले बालों के त्याज्य गुच्छों की तरह है जहाँ ये अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा कर प्रधानमंत्री को कहते हैं कि आप घुटने पर बैठिए, और हमारा विराट रूप देखिए।

प्रधानमंत्री भावविह्वल हो कर, अश्रुपूरित नयनों से ज्ञान का एक-एक कण कान में समाहित कर लेते हैं जब न्यायाधीश कहते हैं कि हे पार्थ! नरों में इन्द्र तो मैं हूँ, यह चर और अचर, कृषक और खालिस्तानी, आम नागरिक और CAA विरोधी, जामिया और जेएनयू, सब तो मेरे ही आदेशों से चलते हैं! मैं ही तो हूँ जो हवाओं को गति, जल को नमी, आग को ऊष्मा, आकाश को विस्तार और भूमि को आकार देता हूँ। और जो मेरे विरोध में उठते हैं, वो सब मेरे ही बनाए कॉलेजियम नियमों के जाल और कन्टेम्प्ट की चाबुक में ऐसे फँसते हैं कि उन्हें मैं एट माय फकिंग विल परेशान करता रह सकता हूँ।

एक बात की चिंता थोड़े ही रहती है मीलॉर्डों को! वैश्विक चिंता का शेक पी-पी कर बेचारे मानव कल्याण हेतु, स्वयं के ही द्वारा गैरकानूनी करार दिए गए आंदोलनों के स्थलों को खाली नहीं करवा पाते। हमारे अंधे, बहरे और विक्लांग मीलॉर्डों को किसान आंदोलन की आड़ में पलता अजेंडा नहीं दिखता।

हमारे लोकतंत्र के महान स्तंभ के रखवाले मीलॉर्डों को 26 जनवरी, 2021 का कांड नहीं दिखता क्योंकि कानून तो आँख में पट्टी बाँधे बैंगन तौल रहा है, और दूसरे हाथ के तलवार में घूस के पैसों की ऐसी जंग लगी है कि वो वस्तुतः एक म्यान का रूप ले चुका है।

इन्हीं मतिभ्रष्ट जजों की लाचारी के कारण पिछले साल राष्ट्र की राजधानी में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए और 53 लाशें गिरीं। अगर ये न्यायाधीश, इस लोकतंत्र या राष्ट्र की तनिक भी चिंता करते, तो संसद द्वारा पास किए गए कानून के विरोध में, लाखों लोगों के चलने-फिरने के मौलिक अधिकारों को बंद करने वाले शाहीन बाग जैसी हिंसक योजनाओं को इसी संविधान का सहारा ले कर बेद करवा देते।

लेकिन मीलहसुनों को तो यह देखना है कि देखते हैं, इस बार क्या होता है। तो आपने देख लिया कि आंदोलन की आड़ में दिल्ली के हिंदुओं को निपटाने की गहन योजना चल रही थी, आपके पास हर दिन मीडिया में चल रहे वीडियो थे, दिसंबर में जामिया नगर में हुए तीन दिन की आगजनी और हिंसा की वारदातें थीं, फिर भी आप आँख मूँद कर बैठ रहे कि लोकतंत्र है, देखते हैं क्या होता है।

बाकी समय तो ये जज साहब लोग ‘नो बडी:, एब्सॉल्यूटली नो बडी:, ले जज: ये जो भी हो रहा है, गलत हो रहा है, हमें चिंता हो रही है कि दही हांडी की ऊँचाई ज्यादा होती जा रही है’ वाले मीम के ही पात्र बनते रहते हैं, लेकिन जहाँ लोग वास्तव में मर रहे हों, वहाँ इन्हें अपनी गर्मी की छुट्टियाँ प्यारी हो जाती हैं। क्यों? क्योंकि जजों पर तो बहुत प्रेशर होता है, मानसिक चिंता, स्ट्रेस यू नो! नो! आइ फकिंग डोंट नो योर स्ट्रेस… किस बात का स्ट्रेस? आम आदमी का स्ट्रेस कहाँ गया? जिसके केस लंबित हैं, सुनवाई नहीं हो रही, उनका स्ट्रेस कौन देखेगा जो मर जाते हैं तुमसे न्याय की उम्मीद लगाते-लगाते? किस स्तर की संवेदनहीन न्यायपालिका बंगाल में दो मई के चुनाव परिणामों के बाद होती रही हिंसा पर स्वतः संज्ञान नहीं लेती?

और तो और, जब मामला आ भी गया तो जज लोग भाग रहे हैं कि वो इस केस का हिस्सा नहीं बन सकते। दो बंगाली जजों ने ममता बनर्जी से संबद्ध मामलों से स्वयं को अलग करने की बात कही है। इससे किस तरह का संदेश जाता है? यहाँ कोर्ट की गरिमा क्या घुइयाँ के खेत में चली गई?

आप आम आदमी को दो ही संदेश दे रहे हैं: पहला तो यह कि चूँकि मामला बंगाल से संबंधित है तो बंगाली होने के नाते आप लिखित कानून से कम और अपनी जड़ों से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हुए, न्याय नहीं कर पाएँगे। या फिर दूसरा यह कि बंगाली जजों की ममता बनर्जी से फटती है, उनको पता है कि उनका भविष्य क्या है।

फिर मुझे ट्रिपल तलाक मामले की नौटंकी याद आती है जहाँ पाँच जजों की बेंच में हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई-पारसी शामिल किए गए थे। कारण? समुदाय विशेष को यह न लगे कि हिन्दू जजों ने उनके साथ अन्याय कर दिया। इसके बाद उन्हें लगा कि हर धर्म-मजहब के जजों ने उनके साथ अन्याय कर दिया। इससे क्या संदेश दिया आपने? कि मुस्लिमों के मामलों में हिन्दू जज की निष्पक्षता या सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता संदिग्ध मानी जा सकती है?

क्या सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में कहीं भी सुप्रीम कोर्ट ऑफ हिन्दू लिखा हुआ है? फिर तो कानून की पट्टी बाँधने वाली महिला की कमर पर हथौड़ा मार कर तोड़ दीजिए जब यही नौटंकी करनी है तो। इसका संदेश सिर्फ यही गया कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी यह समझते हैं कि हिन्दू जज मुस्लिम मामलों में अन्याय कर बैठेगा। फिर यह मामला उठाया ही क्यों आपने? यह एक घटिया और अश्लील मजाक है कि एक सामान्य बेंच एक संवैधानिक मामले पर निष्पक्षता दिखाने के लिए यूनिफॉर्म के भीतर उस जज की धार्मिक पहचान पर खेल खेलती है।

संदेश भेजने के चक्कर में आप जबरन सेकुलर बनने के लिए पाँच अलग धर्म वालों को लाए। ‘क्विंट’ समेत कई मीडिया वालों ने ‘डायवर्सिटी’ और ‘मायनोरिटी’ रिप्रेजेंटेशन के बारे में ज्ञान दिया है कि मुस्लिम जजों की संख्या कम है। इनका वश चले तो जजों की परीक्षाओं के बदले हर राज्य में चुनाव आयोजित करवाएँ कि जज चुन लिया जाए।

अगली बार पता चलेगा कि पाँच की बेंच में वरायटी या डायवर्सिटी नहीं है तो एक लेस्बियन, एक अफ्रो-अमेरिकन, एक चायनीज, एक अविवाहित, एक ताओ धर्म का, एक हरे-पीले बालों वाला, एक आदिवासी, एक दलित, एक महादलित, एक वोक, एक फेमिनिस्ट अल्ट्रा प्रो मैक्स विद सेवन कैमरा एंड 8-के रिकॉर्डिंग एबिलिटी शामिल किए जाएँ ताकि किसी को संदेह न हो कि कोर्ट में सबका उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। आप लोग जज हैं, नेता नहीं। आप न्यायालय में बैठते हैं, संसद में नहीं जहाँ आपको संदेश देने के लिए वैसे काम करने पड़ें जिससे आपको महान विचारक माना जाए।

मीलॉर्ड लोग आपस में किए गए सेमिनारों में हर साल करोड़ों केसों के लंबित होने पर चिंता जताते रहते हैं। एक ऐसा चीफ जस्टिस नहीं देखा जो इस मुद्दे पर न बोला हो, लेकिन यह भी बात उतनी ही सत्य है कि एक ऐसा चीफ जस्टिस न देखा जिसने इस पर कुछ ढंग का काम किया हो। ज्ञान दे कर समोसा खा कर गाड़ी से निकल जाते हैं ताकि अगले दिन किसी ट्विटर सेलिब्रिटी की बेल पेटिशन पर तुरंत सुनवाई कर सकें।

अब गरीबों का क्या है, बीस साल से लंबित है, एक साल और सही। क्या होगा, मर ही जाएगा न इंतजार में? कम से कम एक लंबित केस तो घटेगा। ये तो एक तरह से मानवता की सेवा हो गई कि व्यक्ति को और चप्पल घिसने की जरूरत नहीं है। जज साहब ऐसा सोचते होंगे कि आखिर कब तक एक गरीब या लाचार व्यक्ति चप्पल घिसेगा, अगली पीढ़ी को भी मौका मिलना चाहिए। इस दृष्टिकोण से जब मैं देखता हूँ तो मुझे सारे जज करुणा के सागर और मानवीय संवेदना की पराकाष्ठा पर बैठे हुए चिनिया बादाम फाँकते नजर आते हैं।

अपने आपको हर तरीके से इम्यून कर चुके इन जजों ने कॉलेजियम की व्यवस्था से यह सुनिश्चित कर लिया है कि संसद भी इनका कुछ नहीं कर सकती। इन्होंने सरकारों से अपनी बातें जबरन मनवाई हैं। जब NJAC बनाई गई तो इन्होंने स्वयं के ही खिलाफ लाए गए मामले को स्वयं ही जज करते हुए कहा कि आ जो ले कर आए हैं वो संविधान सम्मत नहीं है।

संविधान कहता है कि भारत के राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से चर्चा के बाद सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति करते हैं। इसको सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम ला कर, यह बना दिया कि सुप्रीम कोर्ट के पाँच जज जो भी नाम तय करेंगे वहाँ के जजों की नियुक्ति के लिए सरकार के लिए वो नाम बाइंडिंग होंगे, यानी उन्हें वह चुनना ही होगा। उन्होंने राष्ट्रपति द्वारा ‘कन्सल्टेशन’ को ‘कॉन्करेंस’ मान कर यह तय कर लिया कि हम जो नाम देंगे, उन्हीं नामों पर सरकार को सहमति देनी ही होगी।

जबकि, 2014 से यह सरकार सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति को सही करने में लगी हुई है। कई बार बिना अपने बेटे, भतीजों और तमाम तरह के रिश्तेदारों को जज बना देते हैं मीलॉर्ड लोग। इसीलिए, शुरु में ही मैंने कहा कि किसी संस्था द्वारा हर हायकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जज के परिवारों की ऑडिट होनी चाहिए कि वो कितनी पीढ़ी से इस व्यवसाय में हैं, और हर घर से कितने बाप, बेटे, भतीजे आदि चुन कर आगे बढ़े हैं। ऐसा कभी नहीं होगा, आप यह जानकारी माँगेंगे तो आप पर ‘गरिमा गिराने’ का केस भी कर सकते हैं। जज भी जज साहब खुद होंगे उस मामले में।

हमारी न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसकी प्रक्रिया में कभी भी यूनिफॉर्मिटी नहीं दिखती। एक ही जमानत याचिका को एक जज ठुकरा सकता है, दूसरा स्वीकार सकता है, और दोनों ही जजों की नौकरी चलती रहेगी। आप पूरी तरह से कानूनी आधार पर, हर बात के अपने पक्ष में होने के बाद भी यह नहीं मान सकते कि फैसला आपके पक्ष में जाएगा।

जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाइड का झुनझुना जज लोग ही सबसे ज्यादा बजाते हैं और मामले को छः-छः महीने बाद की तारीखों में ऐसे उलझा कर रखते हैं कि सत्ता परिवर्तित होने के बाद उसके लाभ उठाने का मौका हर सरकार को हो। हमारी जुडिशरी ओपन इंडेड है, आप सीक्वल बना सकते हैं, आप पार्ट सेवन तक जा सकते हैं, जहाँ हर एक पार्ट एक पीढ़ी के अवतरण के बाद जुड़ती जाए। टाइम और माहौल रहे तो आप साक्ष्य पैदा भी कर सकते हैं, नवजात साक्ष्य की क्यूटनेस से भी जज लोग प्रभावित होते हैं।

कानून वाली बाई के आँखों की पट्टी शायद फोटोक्रोमेटिक है। कभी दिखना बंद होता है, कभी दिखने लगता है। अंधेरों में डील करने वालों के लिए यह पट्टी पारदर्शी बन कर हर पहचान को स्कैन कर लेती है, लेकिन न्याय के प्रकाश की उम्मीद में आए गरीब, असहाय लोगों के लिए दिन का उजाला उसे काला बना देता है। लेकिन यह कालापन भी उतना ही रहता है कि सामान्य जनता को उसकी वह आँखें न दिखें जिसमें उसकी रात वाली डील की शर्मिंदगी और दिन के उजाले में अंधे बनने की धूर्तता प्रतिबिंबित हो रही हो।

न्यायपालिका होली काउ नहीं है, होली काउ सिर्फ और सिर्फ गौ-माता ही हैं। उन्हें ही इस विशेषण को ओढ़ने का अधिकार है। न्यायपालिका को अपनी सड़ाँध मिटानी होगी, अपना कचरा साफ करना होगा, लोगों में जबरन अपने प्रति विश्वास बैठाने की दलीलों और प्रतीकों की जगह वास्तविक कार्य करने होंगे।

मैं जानता हूँ कि मेरी बातों का ऐसे तंत्रों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन जिस संविधान और संवैधानिक अधिकारों के सुरक्षा की गारंटी यह कोर्ट लेता है, उसी के द्वारा दिए गए अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस संस्था के दोगलेपन, भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े पर हमें बोलना ही होगा।





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