हंगामा है क्यों बरपा: दानिश सिद्दीकी की मृत्यु पर क्यों हो रहा है विवाद

16 जुलाई, 2021 By: संजय राजपूत
पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी की मौत पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है

एक भारतीय पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी (Danish Siddiqui) की अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan) में रिपोर्टिंग करते हुए हत्या कर दी गई। दानिश सिद्दीक़ी समाचार एजेंसी रॉयटर्स (Reuters) के फोटो जर्नलिस्ट थे और अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदा हालात को कवर करने के लिए पिछले कुछ दिनों से वहाँ डटे हुए थे। दानिश सिद्दीक़ी की मौत बृहस्पतिवार (15 जुलाई, 2021) रात कांधार प्रांत के स्पिन बोल्डक (Spin Boldak) इलाके में हुई।

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स्पिन बोल्डक को पाकिस्तान में चमन बॉर्डर के नाम से जाना जाता है। इस बॉर्डर पर हाल में ही तालिबान (Taliban) ने अफ़ग़ान सेना को खदेड़कर अपना कब्जा जमाया है। दानिश सिद्दीक़ी को साल 2018 में पुलित्जर पुरस्कार (Pulitzer Prize) मिला था। उस समय वह पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय बने थे।

दानिश सिद्दीक़ी की मौत पर बंट गया सोशल मीडिया

दानिश को यह पुरस्कार रोहिंग्या शरणार्थी संकट को कवर करने के लिए मिला था। दानिश की मृत्यु वाकई दुखद है। मृत्यु दुखद होती ही है, खासकर किसी की पत्रकार की मृत्यु क्योंकि उन्हें समाज का आईना माना जाता है। जो हम और आप देख नहीं पाते, वो पत्रकार हमें दिखाते हैं। कई बार वो हमें वो भी दिखा दे देते हैं, जो असल मे होता ही नहीं।

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पत्रकार भी आम इंसान होते हैं, उनके कार्य उन्हें हीरो या विलेन बनाते हैं। हीरो बनने के लिए कई बार पत्रकार अपने हिसाब से चीजों को लिखते और दिखाते हैं। घटनाओं में हेर-फेर और तोड़-फोड़ करते हैं। एक आम इंसान की तरह एक पत्रकार के भी व्यक्तिगत स्वार्थ होते हैं, व्यक्तिगत कुंठा होती हैं और अपनी मजहबी विचारधारा भी।


पत्रकार की अपनी एक फ़ैन फ़ॉलोइंग होती है जहाँ उसे लोग निष्पक्ष मानते हैं, लेकिन दूसरे अन्य लोग भी होते है जो उस ‘निष्पक्षता’ के पीछे छिपे अजेंडे को पहचानने का दावा करते है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि कई बार कोई व्यक्ति ‘पत्रकार’ दिखता तो है, लेकिन बहुत बारीकी से देखने पर पता चलता है कि वह एक मज़हबी व्यक्ति से ज्यादा कुछ नहीं है।

ये देखना बहुत जरूरी है कि पत्रकार की तथाकथित निष्पक्षता का रास्ता किसी महजबी अजेंडे पर जाकर खत्म तो नहीं हो रहा है? यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं ये पत्रकार इकतरफा धर्मनिरपेक्षता की उम्मीद करने वाले उन ‘गर्दन धसाऊ शुतुरमुर्गों’ के गिरोह का हिस्सा तो नहीं है, जो मजहबी जिहाद पर आँखें बंद कर लेते हैं और गिरोह बनाकर ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के नाम पर राष्ट्र की छवि धुमिल करते हैं।

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दानिश रोहिंग्या शरणार्थियों की रिपोर्टिंग करके चर्चा में आए थे। दानिश के चाहने वाले अनगिनत लोग थे, तो उन्हें नापसंद करने वाले लोग भी थे। जो उन्हें नापसंद करते थे, उनका मानना था कि उन्होंने रोहिंग्या मसले पर इकतरफा रिपोर्टिंग की। उनका ये भी मानना कि दानिश ने अपनी फोटो पत्रकारिता से कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की फ़जीहत कराई थी।


दरअसल दानिश सिद्दीक़ी ने 22 अप्रैल को दिल्ली के एक शमशान घाट में जलती चिताओं की तस्वीरें ट्विटर पर शेयर की थी, जिसमें एक ड्रोन शॉट में 50 से ज्यादा चिताएँ थीं। दानिश ने तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा था:

“अब जब भारत में कोरोना के मामले विश्व में सबसे ज्यादा आ रहे हैं, नई दिल्ली के शमशान से उन लोगों की चिताओं की तस्वीर, जो कोरोना से मर गए।”

इस ट्वीट की वजह से उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। कई लोगों ने इसे भारत की छवि खराब करने की साजिश बताया था। दानिश को लाशों पर पत्रकारिता करने वाला ‘गिद्ध’ कहा गया था।

गंगा में तैरती लाशों वाली अजेंडा पत्रकारिता का नायक भी दानिश को ही माना जाता था। किसान आंदोलन, CAA विरोध प्रदर्शन, मॉब लिंचिंग की दुखियारी कहानियों पर इकतरफा रिपोर्टिंग को लेकर भी उनकी आलोचना होती रही।

दानिश के समर्थकों का कहना था कि वो एक ‘हीरो’ थे। उनका मानना है कि दानिश का जाना देश का बहुत बड़ा नुकसान है। यकीनन, देश का एक मजदूर भी मरता है तो देश का नुकसान होता है। जहाँ दानिश के समर्थक इस हादसे से दुखी हैं, वहीं कुछ लोग उनकी इकतरफा पत्रकारिता पर सवाल भी उठा रहे हैं। लिबरल गिरोह को इस बात से पीड़ा हो रही है। हालाँकि यही लोग कुछ दिन पहले राष्ट्रवादी पत्रकार रोहित सरदाना की मौत उनकी ‘इकतरफा’ पत्रकारिता की आलोचना करते हुए हँस रहे थे।


पिछले कुछ समय से हमारे देश में सोशल मीडिया पर लोगों के मरने पर हँसने की परंपरा शुरू हो गई है। हम नेताओं की, पत्रकारों की, अभिनेताओं की मौत पर हँसने लगे हैं।

लाशों पर हँसना अच्छी बात नहीं है। लाशों पर हँसा नहीं जाना चाहिए। लाशों को आर्थिक लाभ के लिए बेचा भी नहीं जाना चाहिए, लाशों पर राजनीतिक रोटियाँ नहीं सेकी जानी चाहिए। अपना करियर चमकाने के लिए लाशों पर पत्रकारिता भी नहीं करनी चाहिए, चाहे वो तालिबान की गोली से मरे हों या कोरोना से…





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