सरदार उधम: औपनिवेशिक नृशंसता का जीवंत चित्रण

18 अक्टूबर, 2021 By: अजीत भारती
फिल्म में सरदार उधम सिंह की भूमिका अभिनेता विकी कौशल ने निभाई है

सरदार उधम सिंह ने इसी फिल्म में एक जगह कहा है कि जलियाँवाला बाग हत्याकांड अंग्रेजी इतिहास में किसी नकारे गए तथ्य की तरह नीचे पड़ा होगा। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे हर हत्याकांड की कहानी वस्तुतः भारतीय इतिहास में भी किसी नकारे गए तथ्य की ही तरह प्रस्तुत की जाती है।

हम मुगलों और अंग्रेजों की क्रूरता को एक गुलाबी भाषा के चमकीले अनुवाद में पढ़ते हैं जहाँ उनके द्वारा किए गए हत्याकांड, आगजनी, लाखों की योजनाबद्ध हत्याएँ, एक दयादृष्टि बना कर दिखाई जाती है कि तुम्हें त जीना भी नहीं आता था, मुगलों और अंग्रेजों ने सिखाया कि साँस कैसे लें, खाना कैसे खाएँ और सड़क पर कैसे चले।

आभार निर्देशक शूजीत सरकार का जिन्होंने इस पूरे प्रकरण को सिर्फ एक क्रांतिकारी के अंतिम कार्य तक पहुँचने के घटनाक्रम के रूप में नहीं दिखाया, वरन यह सुनिश्चित किया कि पात्र उस स्थिति में कैसे पहुँचा, उसकी मानसिक अवस्था क्या थी, और वह घटना क्या थी जिसकी नृशंसता किसी भगत सिंह को 23 साल में फाँसी पर झूलने को विवश करती है, तो किसी उधम सिंह को दो दशक तक प्रतीक्षा कर के उसे न्याय तक पहुँचाने में भूमिका निभाती है।

निर्देशक ने जो चित्रण प्रस्तुत किया है, वह बताता है कि कथा की गति कहाँ धीमी रख कर, कैसे आपके आँखों तक हर वो चित्र, अपने संपूर्ण वीभत्स रंगों में लगातार आते-जाते रहें, ताकि पुस्तकों में की गई त्रुटियाँ हमारे मन-मस्तिष्क से धुलें और नए चित्र हमें अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों, अपने क्रांतिवीरों की ओर खींचे।

इन नवयुवकों को, इन क्रांतिकारियों को भारतीय इतिहास की पुस्तकों में ‘आतंकवादी’ कह कर पढ़ाया जाता रहा है। जितनी नीचता अंग्रेजों ने हमारे साथ नहीं की, उससे कहीं अधिक नीच हमारे गुहा, चंद्रा, हबीब और थापर निकले। सामान्यतया, हम देखते हैं कि आज भी ऐतिहासिक घटनाओं पर फिल्म बनाते समय हम अंग्रेजों को ही संतुष्ट करने के चक्कर में रहते हैं। वो कीड़ा इस फिल्म के निर्देशक को नहीं काटा है और उन्होंने उधम सिंह और भगत सिंह, दोनों के ही उद्गारों को बिना किसी प्रदूषण के साथ दिखाया है।

भगत सिंह को वैचारिक श्रद्धांजलि देना और उनके जीवन के कुछ प्रकाशित तस्वीरों को जीवंत होते देखना एक अच्छा अनुभव रहा। विकी कौशल का अभिनय प्रारंभिक दृश्यों में अपेक्षित ही रहा, परंतु जलियाँवाला बाग वाले हिस्से से उसमें एक नया आयाम दिखा। गिरना, दौड़ना, उठना, संभलना… मुख पर दर्द और शारीरिक वेदना को उन्होंने ऐसे आत्मसात किया है जैसे वो पात्र को जी रहे हों।

ऐसे पात्रों को जीने का अवसर हर किसी को नहीं मिलता। साथ ही, हर कोई इस गंभीरता से पात्रों को नहीं निभा पाता। पटकथा अच्छी थी, संवाद कम थे परंतु अच्छे थे। न्यायालय की बहस को थोड़ा और खींचते तो अच्छा होता। मैंने उन संवादों को पढ़ा है। निर्देशक चाहते तो और भी शब्द डाल सकते थे। कैमरे का कार्य अच्छा है। कुछ दृश्य जो ऊपर से लिए गए हैं, वो विभीषिका के स्तर को उभारने में सहायक हैं।

कई जगह दृश्यों के कम्पोजिशन अच्छे बन पड़े हैं। जैसे कि जेल के भीतर खिड़की से आती हल्की रोशनी में उधम सिंह के द्वारा बाईं तरफ देखते हुए, दाईं तरफ के व्यक्ति से बात करना। वह दृश्य एक उपेक्षा का भाव तो दिखाता ही है, साथ ही, नायक की पीड़ा को उकेरता है। इस फिल्म में एडिटिंग में थोड़ी कमी दिखी। आरंभिक क्षणों से लगभग आधी फिल्म तक, टाइम लाइन में आगे-पीछे जाना, लय को तोड़ता प्रतीत होता है।

एक दर्शक के तौर पर आप एक दृश्य, सीक्वेंस के साथ एकाकार होते हैं, आप उसमें उतरते हैं तभी एडिटर नया दृश्य ला देता है। यह कथा की तारतम्यता को अनावश्यक रूप से छेड़ता है। सीक्वेंस थोड़े लम्बे होते, तो फिल्म और बेहतर होती। बैकग्राउंड स्कोर, यानी पार्श्व ध्वनि संयोजन उत्कृष्ट है।

विशेषतः, जलियाँवाला बाग वाले पूरे हिस्से में वह इतना व्यापक और गुँथा हुआ है कि आपको पता नहीं चलता कि कुछ बज भी रहा है। अन्य दृश्यों में भी संयोजन अच्छा है। ऐसे क्रोध और पीड़ा वाली कहानी में अगर साउंड डिजाइन सही न हो, तो वह फिल्म की गुणवत्ता को नकारात्मक तौर पर प्रभावित करता है।

निर्देशक और नायक को आभार कि उन्होंने एक उत्कृष्ट रचना की है। हमारे देश के लोग नहीं जानते कि उधम सिंह जैसे वीरों का क्या संघर्ष था, उनका जीवन कैसा था। कुछ राजनीति ने और कुछ हमारी अपनी निकृष्टता ने हमारे अपने नायक हमसे दूर कर दिए हैं।

हमें ऐसी हर फिल्म, हर पुस्तक को देखना और पढ़ना चाहिए। हमें इस पर चर्चा करनी चाहिए ताकि यह अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे। हर व्यक्ति को यह जानना चाहिए कि हमारे नायक आज के आतंकियों की पुश्तें नहीं थीं, हमारे नायक भगत सिंह, आजाद, बोस, उधम सिंह जैसे लोग थे जिनका जीवन और विचार सदैव प्रासंगिक और अनुकरणीय है।



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