ब्राह्मणों में अच्छी पकड़ वाले जितिन प्रसाद की मौजूदगी का UP चुनाव में BJP को कितना लाभ होगा

09 जून, 2021 By: संजय राजपूत
आगामी चुनाव में जितिन प्रसाद की मौजूदगी का लाभ उठा सकती है भाजपा

कॉन्ग्रेस की युवा टीम के कद्दावर नेता और राहुल गाँधी के बेहद करीबी माने जाने वाले जितिन प्रसाद ने कॉन्ग्रेस का ‘हाथ’ छोड़कर ‘कमल’ थाम लिया है। एक बड़े घटनाक्रम में पिछले काफी समय से नाराज चल रहे जितिन प्रसाद ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए दिल्ली में भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। जितिन प्रसाद अपने इस फैसले को ‘नए भारत के निर्माण में योगदान’ बता रहे हैं।


जितिन प्रसाद ने बुधवार सुबह ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से उनके आवास पर मुलाकात की थी। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने ट्वीट कर कहा कि आज दोपहर 1 बजे एक मशहूर हस्ती भाजपा कार्यालय में भाजपा की सदस्यता ग्रहण करेगी। इसके बाद से ही सबकी निगाहें जितिन प्रसाद की ओर उठ गई थी।

भाजपा खेमे में खुशी, कॉन्ग्रेस में गम

मध्य प्रदेश में जीत के बाद हाशिए पर धकेले जाने के बाद कभी कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा में आए मध्य प्रदेश के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी जितिन में भाजपा में शामिल होने के फैसले पर खुशी जताई।

सिंधिया ने कहा कि मुझे खुशी है कि ‘जितिन प्रसाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। वह मेरे छोटे भाई जैसे हैं। भाजपा में उनका स्वागत है’।


वहीं, कॉन्ग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनके इस कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि भाजपा में शामिल होना उनकी अपनी मर्जी है लेकिन उनका भविष्य कॉन्ग्रेस में था। उनका जाना अच्छा नहीं है क्योंकि उनके पिता भी कॉन्ग्रेस में थे। फिर भी उन्होंने ऐसा किया, ये दुर्भाग्यपूर्ण है।

तीन पीढ़ियों से कॉन्ग्रेस के साथ रहा है जितिन का परिवार

जितिन प्रसाद के परिवार का पिछली तीन पीढ़ियों से कॉन्ग्रेस से नाता रहा है। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेताओं में रहे हैं। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद अपने समय में कॉन्ग्रेस के उपाध्यक्ष होने के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और नरसिम्हा राव के राजनीतिक सलाहकार भी रह चुके हैं।

इससे पहले उनके दादा ज्योति प्रसाद भी कॉन्ग्रेस के बड़े और सक्रिय नेता रह चुके हैं। ज्योति प्रसाद ने निकाय चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक पार्टी के लिए आधार तैयार करने का काम किया था। जितिन प्रसाद अपनी पीढ़ी के तीसरे कॉन्ग्रेसी नेता थे।

पिता जितेंद्र प्रसाद ने भी की थी सोनिया से बगावत

कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता एवं सांसद रहे जितेंद्र प्रसाद ने भी अपनी महत्वाकांक्षा के चलते सोनिया गाँधी के खिलाफ बगावत की थी। वर्ष 2000 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में वह सोनिया गाँधी के खिलाफ लड़े थे।

जितेंद्र प्रसाद कॉन्ग्रेस के बड़े नेता रहे हैं


वह आखिरी साँस तक सोनिया गाँधी को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के खिलाफ रहे। हालाँकि, सोनिया के विरुद्ध वह अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए थे। इसके थोड़े समय बाद ही उनका निधन हो गया, जिसके बाद जितिन प्रसाद ने कॉन्ग्रेस में वापसी की थी।

साल 2001 में इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद साल 2004 में जितिन शाहजहाँपुर से जीतकर पहली बार में ही लोकसभा पहुँच गए। यूपीए-1 में मंत्री बनने वाले जितिन प्रसाद सबसे युवा चेहरे थे।

राहुल की करीबी ‘चौकड़ी’ में से एक माने जाते थे जितिन

जितिन प्रसाद के कॉन्ग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लेने पर कॉन्ग्रेस से ज्यादा व्यक्तिगत नुकसान राहुल गाँधी का होना तय माना जा रहा है। राहुल गाँधी के सबसे करीबियों में उनकी गिनती होती थी। राहुल की सबसे करीबी चौकड़ी माने जाने वाली टीम में उनका नाम आता था।

 फाइल फोटो

राहुल गांधी की सबसे करीबी इस चौकड़ी में जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा का नाम लिया जाता था। जब राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बने थे तो यह राहुल गाँधी के सब के करीबी लोगों में से थे। इन्हें राहुल गाँधी की युवा टीम का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था।

‘चौकड़ी’ में से बचे हैं सिर्फ दो नाम

राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह माना जा रहा था कि राहुल गाँधी की युवा टीम में उनके सबसे करीबी इन्हीं 4 चेहरों का वर्चस्व रहेगा। राहुल गाँधी इन्हीं 4 चेहरों के सहारे अपनी युवा राजनीति चमकाना चाह रहे थे।

बदलते राजनैतिक हालात में इन चारों ही लोगों को हाशिए पर धकेल दिया गया है। इनमें से दो ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद कॉन्ग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमे के बीच जारी घमासान किसी से छुपा नहीं है।

Credit: Legend news

युवा नेताओं के दम पर राजस्थान और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कॉन्ग्रेस हाईकमान ने दोनों युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को हाशिए पर ढकेल दिया था।

ज्योतिरादित्य सिंधिया पहले ही भाजपा में शामिल हो कर मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार गिरा चुके हैं और राजस्थान में सचिन पायलट भी लगातार बगावती सुर दिखा रहे हैं।

मिलिंद देवड़ा भी कुछ दिनों से कॉन्ग्रेस के प्रति अपनी नाराजगी जता चुके हैं। भारत-चीन मसले पर राहुल गाँधी के बयानों को निशाने पर लेना हो या महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार बनाने का फैसला, मिलिंद देवड़ा ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई है।

हाशिए पर ढकेल दिए गए इन युवा नेताओं की चौकड़ी में से बचे हुए ‘2’ को कॉन्ग्रेस कब तक संभाल कर रख पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

हाशिए पर थे जितिन

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की कमान प्रियंका गाँधी के हाथ में आने के बाद से जितिन प्रसाद किनारे कर दिए गए थे। प्रियंका गाँधी के करीबी और प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष लल्लू प्रसाद भी जितिन को कुछ खास तवज्जो नहीं देते थे।

इसी नाराज़गी में चलते साल 2019 में भी जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने की खबरें आई थी लेकिन तब प्रियंका गाँधी ने उनसे बात करके उन्हें पार्टी में ही रोक लिया था।

File photo

जितिन प्रसाद की नाराजगी पिछले साल हाईकमान को कॉन्ग्रेस में संगठनात्मक चुनाव के लिए लिखी गई चिट्ठी में भी सामने आई थी। जिन 23 नाराज नेताओं ने यह चिट्ठी लिखी थी, उनमें जितिन प्रसाद भी एक थे।

तब जितिन प्रसाद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर लखीमपुर कॉन्ग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव भी पारित किया था। बंगाल चुनाव के वक्त उन्हें बंगाल का चुनावी प्रभारी बनाकर यूपी की राजनीति से पूरी तरह दूर कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश में भाजपा का ‘ब्राह्मण’ चेहरा बन सकते हैं जितिन

जितिन प्रसाद शाहजहाँपुर, लखीमपुर तथा सीतापुर में काफी लोकप्रिय नेता हैं। जातिगत समीकरण बिठाने के लिए जितिन प्रसाद ने ‘ब्राह्मण चेतना परिषद’ की स्थापना की थी। यह कोई छुपी बात नहीं है कि वह हमेशा से ही ब्राह्मण जाति केंद्रित राजनीति ही करते रहे हैं। यूपी में भी वह ‘ब्राह्मणों के कथित अत्याचार’ पर भाजपा सरकार को घेरते रहे हैं।


जितिन प्रसाद शाहजहाँपुर ललितपुर सीतापुर समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई सीटों में गहरा प्रभाव रखते हैं । साल 2022 में होने जा रहे उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव में जितिन भाजपा के लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार से ‘नाराज़’ है ब्राह्मणों का एक वर्ग

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी 14% के करीब है, लेकिन पिछले कुछ समय से प्रदेश में ब्राह्मणों का एक तबका उत्तर प्रदेश सरकार से, खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नाराज बताया जा रहा है। यह नाराजगी कानपुर के हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद खुलकर सामने आई थी।


जिस समय विकास दुबे का प्रकरण उछला था, तब वामपंथी मीडिया द्वारा भी इस विषय को जमकर हवा दी गई। हालाँकि भाजपा ने विपक्ष एवं मीडिया के इस अजेंडा को कभी गंभीरता से नहीं लिया।

आम आदमी पार्टी के यूपी प्रभारी संजय सिंह ने भी इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश में डेरा डाल रखा है। दलित राजनीति करने वाली मायावती भी ब्राह्मणों की इस नाराजगी का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है।

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वर्ग के वोट शेयर की यदि बात की जाए, तो यह लगभग हर चुनाव में ही यह देखने को मिला है कि जिस दल के साथ ब्राह्मण वर्ग रहा, उसके हाथ सत्ता रही। ऐसे में, भाजपा इस फैक्टर को नजरअंदाज नहीं करना चाहेगी।

ऐसे में, चूँकि जितिन प्रसाद कॉन्ग्रेस में ब्राह्मण राजनीति का चेहरा रहे हैं तो भाजपा उनके सहारे उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने का प्रयास करने की रणनीति पर काम कर सकती है।


चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि जितिन प्रसाद सीतापुर या लखीमपुर सीट से अगला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। यह भी माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह उन्हें भी सीधे राज्यसभा भेजा जा सकता है।

उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में भी जितिन प्रसाद को कोई बड़ा पद देकर सरकार में शामिल किए जाने की भी संभावना जताई जा रही हैं। भाजपा को जितिन प्रसाद से कितना फायदा होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन पहले से ही हाशिए पर जा चुकी कॉन्ग्रेस को अपने युवा नेता के इस फैसले का अच्छा-खासा नुकसान होना तय माना जा रहा है।





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