सैयद अली शाह गिलानी हतो, नरो वा शूकरो वा

02 सितम्बर, 2021 By: अजीत भारती
नहीं रही कट्टरपंथियों की 'परी'

आज एक युग का अंत हो गया है। आज एक पिता, एक शिक्षक, एक डेटा साइंटिस्ट, एक मजहबी प्रचारक, क्रिकेट प्रेमी, हूर मामलों के जानकार, हथियार विशेषज्ञ, पत्थर को दिखा देने वाले, और हर घर से अफजल निकालने की तकनीक के पुरोधा का असामयिक निधन हो गया।

भारत के वामपंथियों के पिता भी वही माने जाते हैं। विक्की डोनर से पहले वही तो थे जो भारत के तमाम पाकिस्तान परस्त लोगों की अम्मियों के बाँझपन को अपने शुक्राणुओं से खत्म किया था। आज छाती पीटने वालों में उनके बेटे-बेटियाँ, भले ही घर वाले बापों से अपनी नाक, होंठ, आँख या दाँत मिला लें, लेकिन अम्मियों को पता है कि गिलानी साहब का अतुलनीय योगदान क्या रहा है।

उम्र ही क्या थी? 92 साल। किया ही क्या था? बस 47,000 लाशें गिरवाईं थी। पोटेंशियल की कमी नहीं थी, अभी सक्रिय रहते तो ताला-चाभी उनकी हाथों में इतनी सलाहियत देते कि रियासते पुदीना पाकिस्तान की सीमाओं को और भी बड़ा कर सकते थे। उम्र ही क्या थी! महज 92 साल… यह भी कोई जाने की उम्र होती है…

आप सोचिए कि गिलानी साहब भारत और कश्मीर की सरकारों के पैसों पर पलते हुए भी कभी भी अपने कौम और वतन से गद्दारी नहीं की। कहते रहे कि पाकिस्तान उनका देश है और आजादी ले कर रहेंगे। गिलानी साहब अलहदा शख़्सियत थे, एकदम माय डीयर टाइप के।

उन्होंने ही अपने प्रयोगशाला में ‘तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ की तकनीक विश्व को दी थी। ये बात और है कि भारतीय सेना ने अफजलों की पूरी फौज ही बर्बाद कर दी। अब अफजल अम्मी के पल्लू में यूट्यूब देखता है और पूछता है कि अम्मी, अब निकलूँ क्या। अम्मी कहती है, बेटे अभी मोदी है, फिर योगी है, तू घर में पेट्रोल बम बनाने की रसायनिक विधि पर ध्यान दे, उसे परफैक्ट कर, जब ताला-चाभी की मर्जी होगी, तब निकलना।

पाकिस्तान के लिए लेटेक्स का गुब्बारा थे गिलानी साहब, वो भी फ्लेवर वाला। फ्लेवर का आनंद भारत के वामपंथियों और उनकी असामयिक मृत्यु पर रूदन करने वाली बेवाओं ने खूब लिया, जो अब उन्हें बेइंतहा मिस कर रही हैं। कुछ लौंडे भी हैं जो रो रहे हैं, इससे पता चलता है कि गिलानी साहब अपना फ्लेवर लौंडों में भी बाँटा करते थे।

हृदय अगर विशाल हो तो आप किताब के विरुद्ध भी जा सकते हैं। मुगलों की बच्चाबाजी कला को गिलानी साहब ने खूब आगे बढ़ाया और सामाजिक बंधनों के बाद भी अंधेरे कमरों और मजहबी जगहों पर कोने में ले जा कर उन्हें भी रसास्वादन करवाया। गिलानी साहब प्राणीमात्र में लिंग के आधार पर कभी भी कोई भेदभाव नहीं करते थे।

आज मैं इतना दुखी हूँ कि पार्टी करूँगा शोक में। आप अगर चाहते हैं कि एक आत्मा को समुचित विदाई दी जाए, जिसमें गीत संगीत हो, चाय-कॉफी हो, चखना-चखना हो, तो आप भी नीचे के नंबर पर हमें पेटीएम, गूगल पे, फोन पे आदि कर सकते हैं। इतना शोक मैं अकेले बर्दाश्त कर ही नहीं पाऊँगा।

मैं तो यह गाना सुन रहा हूँ कि जिएँ तो जिएँ, कैसे? बिन आपके… फटता नहीं बम कहीं, बिन आपके… क्या आप एक काफिर को पार्टी करने देंगे? चुनाव आपका है।

मानवाधिकारों के पक्षधर थे गिलानी साहब। स्वतंत्रता की राह में, क्रांति की राह में दाढ़ी सफेद हो गई थी, लेकिन मजाल है कि भारत के खिलाफ जहर की तीव्रता में कोई कमी आई हो। टूट गए, लेकिन झुके नहीं।

कोई कह देगा कि प्रातःस्मरणीय श्री अजीत भारती जी ब्रो, जिस व्यक्ति ने कश्मीर में… मैं कहूँगा कि आप अगला शब्द बिलकुल मत कहना, यूट्यूब बैन कर देगा। मैं समझ गया कि आप क्या कहना चाह रहे हैं।

देखिए, सारा खेल पर्सपेक्टिव, अर्थात् दृष्टिकोण और संदर्भों का है। जिनकी किताब में गैरमजहबी व्यक्ति को मानव माना ही नहीं गया तो फिर उनके अधिकार कैसे होंगे? फिर जो बच गए, जिसमें पत्थरबाज होंगे, आजादी की माँग करने वाले युवक होंगे, तो मानवाधिकार तो उनके ही थे न। गिलानी साहब तो उसी के लिए प्रयासरत थे, उनकी ही लड़ाई लड़ रहे थे। खैर छोड़िए, आपको कितना समझ में आएगा कि वो कितनी बड़ी हस्ती थे।

ओलम्पिक खेलों को ले कर काफी उत्सुक रहा करते थे गिलानी साहब। सात-आठ साल के बच्चों के हाथों में पत्थर देना, बड़े लड़कों के हाथ में लाठी देना, कुछ युवकों के हाथों में बंदूक पकड़ा देना… विजनरी व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। कितने कम संसाधनों में, सात-आठ साल की कच्ची उम्र से गोला फेंक, तश्तरी फेंक, भाला फेंक से ले कर टेन मीटर एयर रायफल, डबल ट्रैप आदि के लिए तैयार कर रहे थे।

वस्तुतः, गिलानी साहब ऐसे व्यक्ति थे जिसे भारत ने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की। वो तो खेलों के कोच थे। कश्मीर कभी जाइए तो आप पाएँगे कि स्टेडियम या कोचिंग सेंटर तो छोड़िए, सपाट धरती भी बहुत कम है। ऐसे में बच्चे दौड़ते हुए, रन अप ले कर, डिस्कस थ्रो या शॉट पट की ट्रेनिंग कैसे करेंगे? सड़कों पर ही तो करेंगे। ऐसे में कुछ लोग सामने आ जाते हैं, तो उन्हें हट जाना चाहिए, या सर झुका कर बैठ जाना चाहिए। क्या हम आने वाले ऑलम्पिक में कुछ पदकों के लिए थोड़ा सा बलिदान नहीं दे सकते, सह नहीं सकते थोड़ा सा?

आज वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वामपंथी कहते हैं कि विचार मरते नहीं। आप विचारों की हत्या नहीं कर सकते। सही बात है, इसीलिए तो भारतीय सेना ऐसे विचारकों के विचारों को मारने की जगह उन्हें ही हूरों के पास वैचारिक मैथुन हेतु भेज देती है।

मुझे निजी तौर पर, एक पत्रकार होने के नाते दुख तो हुआ ही है। ऐसे लोगों के मरने पर पत्रकारों के बाद कई स्कोप होते हैं प्रोफाइल करने के लिए। हर पत्रकार गिलानी साहेब के व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डाल सकता है। किसी को उनमें अपना बाप नजर आएगा, किसी को स्कूल का हेडमास्टर, किसी को शतरंज का खिलाड़ी, किसी को खेलों का कोच…

कई लोग तो उनके परपोते के दसवीं की परीक्षा के परिणामों का इंतजार करते हैं ताकि उस समय एक खबर बनाई जाए कि गिलानी का परपोता गालिब बड़ा हो कर पत्थरों के घनत्व पर शोध करना चाहता है ताकि कम आकार में, ज्यादा भार छुपाए होने वाला पत्थर को जब एक तय वेग से फेंका जाए तो जो त्वरण बनेगा, उससे कितना प्रभाव पड़ेगा… सैनिकों पर!

गिलानी साहब ने कभी भी अपने बच्चों को कश्मीर की लड़ाई में शामिल नहीं किया। कोई दिल्ली में पढ़ाई कर रहा था, तो कोई विदेश में। उनका मानना था कि कोई भी बच्चा अपना या पराया नहीं होता, सब बच्चे उन्हीं के हैं। सब बच्चे आजादी के लिए हैं, लेकिन उनमें से कुछ एक बाहर भी पढ़ने जा सकते हैं, और पत्थर या हथियारों की जगह आम भारतीय कट्टरपंथियों की तरह पढ़ कर भी तो देश से गद्दारी कर सकते हैं।

उन्होंने अपने और दूसरों के बच्चों में कभी अंतर नहीं किया। उन्हें तो यह भी नहीं पता कि वो जिन बच्चों को अपना कहते हैं, वो भी उनके अपने हैं या नहीं। इसलिए, हम उन पर यह आरोप नहीं लगा सकते कि उन्होंने ‘अपने’ बच्चों को कश्मीर से दूर रखा। क्या पता हलाला टाइप का कुछ हुआ है, कुछ का इन्होंने किया, कुछ ने इनके घर में कर दिया हो। ये सब तो आम बातें हैं जिनसे हमें कुछ भी अधिक पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।

मैं यह देख कर भी क्षुब्ध हूँ कि प्रधानमंत्री जी ने कश्मीर की तरफ एक जैतून की शाखा नहीं पकड़ाई। मोदी जी तो दानिश सिद्दीक़ी जैसे पत्रकार की बंदूक और गोली द्वारा की गई हत्या पर भी एक ट्वीट तक नहीं किया, तो उनसे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। क्या कश्मीर के लोगों को अच्छा नहीं लगता अगर मोदी जी ने एक ट्वीट लिख दिया होता? क्या बिगड़ जाता आपका मोदी जी?

अरे जो मर गया, उसके बारे में दो शब्द ही कह देते। कश्मीर घाटी के लोगों को कितना अच्छा लगता कि मोदी जी 5 अगस्त के कार्य के बाद कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने के लिए तत्पर हैं और सबसे बात करना चाहते हैं। अमन की आशा और सफेद कबूतरों का भी तो कुछ होने चाहिए! क्या अब धवल कपोत शांति के प्रतीक नहीं रहे? एक ट्वीट आपका धवल कपोत भी सकता था मोदी जी, लेकिन भीतर में जो है आपके, वह बताता है कि आपके वश का है नहीं किसी भी ‘क्रांतिकारी’ के लिए ट्वीट करना।

एक समाज के तौर पर हम हार चुके हैं। राम ने भी रावण की मृत्यु के बाद उसे भला-बुरा नहीं कहा था। निजी जीवन में गिलानी चाहे जितना भी बड़ा भ#वा, मा#र#द, भों$#वाला, #ल्ला, ह#मी, क#ना, हत्यारा, नरसंहारक रहा हो, लेकिन मृत्यु के बाद हमें भला-बुरा नहीं कहना चाहिए।

हमारे संस्कार इसका इजाजत देते हैं क्या? नहीं देते। यूपी पुलिस के उस कर्मचारी का गीत भी चलन में आ रहा है जिसमें उसने गीतों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी थी कि ला ला ललललल्ला…

मुझे निजी तौर पर दुख हुआ है, आज रात का भोजन नहीं कर पाऊँगा। नमस्कार!



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