महारानी: वामपंथी लेखन के सहारे राजनीतिक 'गुंडों' को क्लीन चिट देने का एक और असफल प्रयास

07 जून, 2021 By: नवीन रमण
लेटेस्ट वेब सीरीज 'महारानी' के एक दृश्य में हुमा कुरैशी

ओटीटी प्लेटफॉर्म SONY LIV पर 28 मई को ‘महारानी’ (Maharani) वेब सीरीज लॉन्च हुई है। उत्तर प्रदेश की सियासत को रेखांकित करती रिचा चड्ढा द्वारा अभिनीत की गई पॉलिटिकल फ़िल्म ‘मैडम चीफ़ मिनिस्टर’ के बाद निर्देशक सुभाष कपूर ने महारानी (Maharani) वेब सीरीज बनाई है।

ये वही सुभाष कपूर हैं, जिन्होंने ‘जॉली एलएलबी’ फ़िल्म का निर्माण भी किया है। अभिनेत्री हुमा कुरैशी की मुख्य भूमिका वाली ‘महारानी’ में कलाकार- हुमा कुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल, प्रमोद पाठक और कनी कुश्रुती आदि हैं और इसके लेखक हैं उमा शंकर सिंह।

दो हर्फों में 10 एपिसोड का सार यह कहा जा सकता है कि यह राबड़ी देवी से प्रेरित राजनीति की बिसात पर ‘हाउस वाइफ़’ से विधानसभा में ‘हाउस ऑफ़ द लीडर’ बनने के अलावा एक घेरलू महिला का ‘मोहरे से महारानी’ बनने का सफर है।

पटकथा की टैक्टिस

भीमा भारती (सोहम शाह), रानी भारती (हुमा कुरैशी) नवीन कुमार (अमित सयाल) के किरदारों में लालू, राबड़ी और नितिश की झलक मिलना संयोग नहीं हो सकता है, बल्कि ये आजकल की रचनात्मकता का पॉपुलिस्ट तरीका है। है भी और नहीं भी- इस टैकनीक से आप कानूनी दाँवपेंच से बच जाते हैं और विवाद-आलोचना, हंगामा आदि आपके प्रोडक्ट को हिट करवा देते हैं।

दूसरी तरफ, राजनीति की गर्मा-गर्म बहसों से मीडिया को खुराक मिल जाती है और सभी दल अपने नैरेटिव के आसपास शब्दजाल बुनने लगते हैं।

मौटे तौर पर कह सकते हैं कि एक प्रोडक्ट से सभी की ‘दुकानें’ चल पड़ती हैं। दुकान चलने का मतलब है कामयाबी और फिल्मी भासा में कहें तो ‘हिट’।

बिहार की राजनीति और राजनीति की तासीर

1990 के दशक में बिहार समेत पूरे भारत में क्षेत्रीय दलों के उभार ने कॉन्ग्रेस या अन्य विपक्षी दलों के सामने जो चुनौतियाँ पैदा कीं और उन चुनौतियों को विपक्षियों ने अलग-अलग तरीकों से नियंत्रित किया।

हर प्रदेश की जातिगत, धार्मिक और सोशल तासीर ने राजनीति को अपना अलग रंग दिया है। ‘महारानी’ वेब सिरीज़ में असली किरदारों और घटनाओं के रेशे लेकर कल्पनाओं से कहानी बुनी गई और उसमें बिहार की राजनीति के पॉपुलिस्ट सारे विमर्शों-विवादों के साथ राजनीतिक रंग भर दिए गए हैं।

सत्ता हासिल करने के लिए अपने और विरोधियों, दोनों के साथ बौद्धिक-छलकपट आदि से उठापठक करना, जातीय समीकरण साधना, हिंसा और अपराध का सहारा लेना, भ्रष्टाचार में संलिप्त रहना, धार्मिक गुरुओं को ‘टूल्स’ की तरह इस्तेमाल करना और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देना, आदि के कॉकटेल को राजनीति कहने में बिल्कुल गुरेज नहीं करना चाहिए।

राजनीति का असली चरित्र ही यह होता है कि वह समाज में किसी भी स्थिति, घटना, परिस्थितियों, संबंधों और तानेबाने को सहज-सरल और सपाट नहीं रहने देती, जबकि राजनीति पर खास नैरेटिव के साथ लेखन और फिल्माकंन जब किया जाता है तो इन सभी को सीधे और सपाट तौर पर पेश किया जाता है, ताकि अपने अजेंडे में सफलता मिल सके।

इन्हीं पैमानों पर आकलन करते हुए कहे के साथ अनकहे को ‘डिकोड’ करना बेहद जरूरी होता है। इस तरह एक रचना विमर्श के केंद्र में आ जाती है और सभी को अपनी बात कहने का अवसर मिलता है।

पटकथा के भीतर प्रायोजित नैरेटिव होने की संभावना

इस वेब सीरीज में 90 के दशक का बिहार दिखाया गया है। बिहार के सीएम पर छठ वाले दिन गोली चल जाती है और वो चूल्हा संभाल रही अपनी चौथी पास बीवी को कागजी सीएम बना देता है।

इस ‘चौथी पास बीवी’ को हस्ताक्षर करना भी नहीं आता और वो फ़ाइलों को बिना पढ़े अँगूठा लगाती है। वर्ष 1997 में लालू ने राबड़ी देवी को सीएम बनाया था, उस समय नीतिश कुमार सीएम बनने के सपने देख रहे थे।

उपरी तौर पर देखने पर यह वेब सीरीज़ सीएम की कुर्सी के आर्थिक मुश्किलों और जातीय संघर्ष में फंसने के साथ दलित-सवर्ण संघर्षों को भी साथ लेकर चलती है। कुर्सी बचाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त, अफ़सरों की नेताओं के साथ भ्रष्टाचार में साठगाँठ, योग्यता से ज्यादा चापलूसी को तवज्जो देना, नक्सलवादियों को सिस्टम से पीड़ित दिखाना और मजबूरी में उनका हथियार उठाना, अपने हितों व स्वार्थों के लिए हत्याएँ करना, आदि वो तरीके हैं, जो कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

एक सीमा के बाद यह महिला मुख्यमंत्री की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि राजनीति की दुनिया में एक स्त्री की मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाती है।

भारतीय मीडिया के एक खास अजेंडे को गौर से देखेंगे तो साफ पता लगता है कि किस तरह खास रणनीति के तहत उत्तर भारत के राज्यों में जब किसान जातियों के लोग सत्ता पर काबिज हुए तो उसे जंगलराज और अनपढ़राज के तौर पर परोसा गया है।

किस दौर और किसके राज में जंगलराज नहीं चलता है। राज बदलने से केवल सुविधा लेने वाले वर्ग और व्यक्ति बदल जाते हैं। इससे ज्यादा बदलाव नहीं हो पाता।

हाँ, कुछ चीजें ऐसी जरूर की जाती हैं, ताकि उनकी पार्टी जिंदा रह सके। दरअसल राजनीति में आदर्शों की कोई जगह नहीं होती परंतु आदर्शों का लबादा ओढ़ना बेहद जरूरी होता है।

कमजोर तबकों की आवाज को बुलंद किया- सत्ता द्वारा गढ़ा टूल्स

अभिनेत्री हुमा कुरेशी ने ‘महारानी’ के किरदार में रंग जमाने की काफी कोशिशें की हैं और कह सकते हैं कि बहुत हद तक सफल भी रही है। एक उनका ही किरदार इस वेब सीरीज में असर छोड़ पाता है।

हम को इसमें पिछड़ी जाति के साथ अनपढ़ भी दिखाया गया है और विधानसभा में उन्हें नेता विपक्ष अनपढ़ कहकर संबोधित करता है तो वे उन्हें जवाब देते हुए कहती हैं कि ‘मेरे अनपढ़ रहने के पीछे पहले की सरकार ही दोषी हैं। अगर वो गाँव में इस्कूल बना दिए होते तो हम भी पढ़ लेते’।

कहानी के लेखक उमा शंकर सिंह ने यह भरसक प्रयास किया है कि महारानी के माध्यम से राबड़ी देवी की एक नई छवि गढ़ी जा सके और उन्हें सामाजिक न्याय की देवी, ईमानदार सीएम के साथ-साथ बिहार की राजनीति में एक मिसाल के तौर दमदार नेता के रूप में पेश किया जाए। वह कहती है- “जो औरत घर संभालना जानती है, वह देश भी संभाल सकती है।” महारानी के आखिरी एपिसोड में भीमा भारती कहता है कि “स्वर्ग नहीं दे पाए तो क्या स्वर तो दिया।”

Maharani के एक दृश्य में हुमा कुरैशी


पूर्व सीएम राबड़ी देवी की नई छवि गढ़ने का रचनात्मक प्रयास

राबड़ी देवी की छवि गढ़ने के साथ-साथ जातीय उत्पीड़न, नरसंहारों, निजी सेनाओं और नक्सलवाद आदि का चित्रण विश्वसनीय तरीके से किया गया है। यह वेब सीरीज बिहार की पीड़ा, शोषण और अत्याचारों को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है, क्योंकि बहुत-सी चीजों को बहुत ही सपाट तरीके से पेश किया गया है।

क्या यह कहना सही होगा कि राजनीति ने बेजुबानों को जुबान दी है या फिर यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा उन्हें बार-बार यह जताया-बताया जाता है कि हमारी वजह से आपको (बहुसंख्यक, दलित मुस्लिम, पिछड़ी जातियों और हरियाणा में जाट-गैर जाट की राजनीति) राजनीति पूरी तरह स्वांग पर आधारित है।

नेशनल अवॉर्ड विजेता फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने ‘दैनिक भास्कर’ को दिए साक्षात्कार में कहा है कि इस सीरिज में राबड़ी राज की इमेज बनाने के लिए सवर्णों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है।

‘मजहबी टार’ से नहीं बच पाई ‘महारानी’

दूसरी ओर, कुछ आलोचकों का कहना है कि वित्त सचिव परवेज आलम के तौर पर ‘ईमानदार मुस्लिम’ को पेश करने की परंपरा का भी ख्याल रखा गया है।

दरअसल इस वेब सीरीज की स्क्रिप्ट लिखने वाले उमाशंकर सिंह ने ‘दैनिक भास्कर’ को दिए साक्षात्कार में कहा है कि इसकी कहानी कट्टर जातिवादियों को ही नागवार गुजरी है। पर विवाद जातीय से ज्यादा इसकी कहानी को लेकर राजनीतिक है।

राजनैतिक नैरेटिव, पीआर एजेंसी और राजनीति का डिजिटल खेल

महारानी वेब सीरीज के 10 एपिसोड के जो शीर्षक हैं वो हिंदी साहित्य जगत के प्रसिद्ध कवियों की प्रसिद्ध उक्तियाँ (पंक्तियाँ) हैं जैसे- जात न पूछो साधो की (कबीरदास), देख तामाशा कुर्सी का (देख तमाशा लकड़ी का-कबीरदास), घूँघट के पट खोल (कबीरदास), साधो ये मुर्दों का गाँव (कबीरदास), कौन ठगवा नगरिया लूटल हो (कबीरदास), ना काहूँ से दोस्ती- ना काहू से बैर (कबीरदास), बहुत कठिन है डगर पनघट की (अमीर खुसरो), माया महाठगिनी हम जानी (कबीरदास), चाह गई चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह (रहीम) और जो घर फूँके आपनु-चले हमारे साथ (कबीरदास)।

यह मूलतः अजेंडा-बेस्ड पॉलिटिकल ड्रामा है, जो जानबूझकर लालू-राबड़ी और बिहार की राजनीति के आसपास जैसा दिखने वाला रचा गया है। यह पूरी तरह राबड़ी के असली व राजनीतिक जीवन पर केंद्रित नहीं है, बल्कि इससे उनके बाल-बच्चों (राजनीतिक वारिस) को फायदा पहुँचाने की कोशिश जरूर लग रही है। क्योंकि ये शुरू से ही पूर्व निर्धारित राजनीतिक नैरिटव को गढ़ना शुरू कर देती है।

इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि यह किसी पीआर एजेंसी के साथ मिलकर प्रायोजित तरीके से बनाया गया हो। क्योंकि वर्तमान समय में राजनीति पूरी तरह से पीआर एजेंसियों की बैसाखियों के सहारे ही आगे बढ़ रही है।

वेब सीरिज में हुमा कुरैशी का एक डायलॉग है- “हमसे 50 लीटर दूध दूहा लो, 500 गोबर का गोइठा बना लो पर एक दिन में इतना फाइल पर अँगूठा लगाना, ना.. हमसे ना हो पाएगा।”

गाँव की रहने वाली रानी का राजनीति में आने के बाद काया पलट हो जाता है और वो एक ताकतवर महिला बनकर उभरती है। इसको केवल इसी नज़रिए से देखा जाए तो इस महिला सशक्तिकरण की कहानी से आखिर किसी को क्या परेशानी हो सकती है।

लालू यादव जिस चारा घोटाले में सजा काट रहे हैं, उसके लिए उन्हें वेब सीरीज में दोषी माना गया है। बस उसका नाम चारा की जगह दाना कर दिया गया है। अपने पति को उस घोटाले में जेल भेजने के लिए एक क्रांतिकारी महिला के रूप में दिखाई गई हैं और कटपुतली की अपनी छवि को तोड़ती हैं।

उनके फैसलों से साफ लगता है कि वो कागजी सीएम नहीं बल्कि फैसले लेने वाली सीएम हैं। जो अपने विवेक से फैसले लेना जानती है, चाहे उसकी कीमत उसे कितनी ही चुकानी पड़े।

पहले एपिसोड में ‘अगड़ा बनाम पिछड़ा’ की लड़ाई को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर और जातीय घृणा व हिंसा की चासनी में डूबोकर परोसा गया है। पुलिस अफ़सर कहता है कि ‘जाति बिहार का सबसे बड़ा सत्य है’।

ऊँची जाति वाला जूनियर पुलिस अफ़सर पिछड़ी जाति के अपने सीनियर पुलिस अधिकारी से कहता है- “सरकार भले आप लोगों का है, सिस्टम हमारे हाथ में है।”

दरअसल इस तरह से विक्टिम कार्ड खेलने और खिलाने के खेल को भी जनता अब समझने लगी है। एक खास विचारधारा के तहत किन्हीं खास जातियों व धर्म के लोगों पर विक्टिम कार्ड खेलने की आजीवन मोहर लगा दी जाती है और वो भी इससे बाहर नहीं निकल पाते। इसी वजह से वो किसी खास दल या नेता की हमेशा के लिए खुराक बन जाते हैं।

राजनीति में इस तरह ध्रुवीकरण से दूसरी तरफ का ध्रुवीकरण प्रतिक्रियास्वरूप अपने आप हो जाता है। एक तरह से समाज खेमों में बंट जाता है और जनता नेताओं व पार्टियों के मोहरे बनकर रह जाती है।

पटकथा और निर्देशन में सटीक तालमेल न होने के कारण कुछ लोगों को सीरिज में बोरियत महसूस होती है और राजनीति में रस लेने वाले रसिकों को इसमें आनंद मिलता है।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि बिहार ‘राजनीतिक स्टेट’ भर नहीं, बल्कि राजनीति में ‘स्टेट ऑफ माइंड’ है। बिहार की राजनीति को करीब से देखने पर तो ऐसा कुछ खास कभी नजर नहीं आता। पता नहीं वो किस आधार पर ये बात कहते हैं?

वैसे तो हरियाणा के लोगों को भी ‘राजनीति का चासड़ू’ कहा जाता है, तो क्या इस आधार पर हम हरियाणा को ‘स्टेट ऑफ माइंड’ कह सकते हैं?

हाँ, इतना जरूर है कि बिहार के दोस्त इसे बार-बार दोहरा कर खुद मियाँ मिट्ठू जरूर बन जाते हैं और ये वाक्य इतनी अधिक बार रिपिट कर दिया गया है कि अब ये उन्हें सच भी लगने लगा है।

महारानी वेब सीरीज की क्रिएटिव व मार्केटिंग टीम ने खास अजेंडे के तहत राबड़ी देवी की एक प्रोगेसिव छवि गढ़ने की कोशिश की है। ताकि लालू के राजनीतिक वारिशों को इसका फायदा मिल सके, क्योंकि बिहार चुनाव में नीतीश व भाजपा ने लालू परिवार के राज को जंगलराज के नैरेटिव से मात दी थी।

भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर एक नई छवि गढ़ी जा रही है। पूरा प्रोजेक्ट पीआर एजेंसी के निर्देशन में नैरेटिव बनाया गया हो तो कोई हैरानी नहीं होगी।

छद्म वामपंथी मुर्गे लेखक ने लालू को चारे की जगह दाना खिला दिया है और राबड़ी की एक छद्म छवि गढ़ने की नाकाम कोशिश की है। आज के दौर में इंफ्लुएंसर, क्रिएटिव लोग आदि के सहारे सभी दल अपने नैरेटिव गढ़ने में लगे हैं, जिसमें पीआर एजेंसी के थ्रू प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मदद ली जाती है। इसीलिए राजनीति अब इवेंट मैनेजमेंट ज्यादा बन गयी है।

एक्शन का रियेक्शन थ्योरी से विश्लेषण करें तो यह सीरीज मूलतः बिहार, यूपी में बीजेपी को फायदा अधिक देगी, उसका नुकसान कम करेगी। क्योंकि इस के बहाने यूपी में मायावती व मुलायम राज और बिहार में लालू-राबड़ी राज की खास जातिगत हिंसक घटनाएँ दोबारा सिर उठाने लगी हैं। राजनीति में तत्काल मुद्दों से गड़े मुर्दे उखाड़ना ज्यादा खतरनाक होता है।





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