व्यंग्य: ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा? पेगासस की लिस्ट और मोदी जी की छतरी

22 जुलाई, 2021 By: अजीत भारती
ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा?

भले ही भाजपा वाले मुझे वामपंथी कह कर मेरा हिन्दू हृदय सम्राट वाला सर्टिफिकेट कई बार फाड़ कर फेंक चुके हैं, फिर भी मैं पतितों की तरह आज एक बार फिर उनके पक्ष में बोलने से स्वयं को नहीं रोक पा रहा हूँ। आप तो मेरा नेचर जानते ही हैं। राज्यसभा में बताया गया कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कोरोना की दूसरी लहर में, राज्य सरकारों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार एक भी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई। इस पर बवाल हो गया कि ऐसे कैसे हो सकता है, मेरे तो पिताजी की मृत्यु हो गई, मेरे दादाजी नहीं रहे, मेरी पत्नी ऑक्सीजन के लिए तड़पती रही, मेरा भाई सिलिंडर के अभाव में चला गया…

देखिए, किसी की मौत हो जाए तो लोग भावुक हो जाते हैं। भावनाओं में लोग मृत्यु का कारण वही पढ़ते हैं, जो वो पढ़ना चाहते हैं। भावनाओं में लोग सरकार की बात नहीं मानते। यही कारण है कि आपको कष्ट हो रहा है। आपका कोई अपना मर गया, आपने खुद दो-दो दिन कहाँ-कहाँ फोन कर के सिलिंडर की व्यवस्था की, या करने की कोशिश की, आप में से किसी को मिला सिलिंडर, किसी को नहीं मिला, और उसके बाद आपके परिजन की मृत्यु हो गई। इसके बाद अखबारों में छपा कि फलाँ अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु हो गई, फलाँ आदमी को सिलिंडर नहीं मिला, फलाँ अस्पताल में सप्लाय ही खत्म हो गई…

पहली बात तो यह समझिए कि क्या वहाँ, उन अस्पतालों में सरकार के लोग खड़े थे जब यह हुआ? नहीं थे न? जब वहाँ सरकार के विधायक, या मंत्री या मुख्यमंत्री जी नहीं थे, तो आप कैसे कह सकते हैं कि सरकार के आँकड़े गलत हैं? मृत्यु तो तब मानी जाएगी न जब उन्होंने देखा हो। पेंसिल और नोटपैड ले कर अगर वो घूम रहे होंगे, उन्होंने लिखा होता अगर उन्होंने देखा होता। एक बात और बताइए कि कॉन्ग्रेस की सरकार झूठ बोल सकती है, टीएमसी वाले झूठ बोल सकते हैं, भाजपा वाले झूठ बोल सकते हैं, जेडीयू वाले झूठ बोल सकते हैं। लेकिन ये सारे लोग एक ही मुद्दे पर कभी भी एक ही राय रखते हैं? कभी देखा है? एक कहेगा कि बंगाल में राजनैतिक हिंसा में लोग मरे, दूसरा कहेगा कि नहीं मरे, तीसरा कहेगा कि बंगाल तो भारत में है ही नहीं तो हमें उस से क्या, और भाजपा कहेगी वहाँ तो चुनाव हो गए, अब बोलने का भी क्या फायदा। 

लेकिन हमने क्या पाया? हमने पाया कि अपनी प्रकृति के विरुद्ध, सारी पार्टियाँ, सारे राज्य यह कह रहे हैं कि उनके यहाँ कोई भी ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरा। अच्छा ये सब गंभीर बातें छोड़िए और ये बताइए कि कभी ऐसा हुआ है कि आपके किसी सिंगल मित्र ने किसी वीकेंड पर पार्टी रखी हो और कहा हो कि सारे लोग गर्लफ्रेंड के साथ आ जाना। चूँकि उसने बीस लोगों को निमंत्रण दे रखा था, और आपका कहीं और जाने का प्लान था, तो आपने और आपकी मित्र ने एक दूसरे से कहा, “यार उसने तो बीस लोगों को बुलाया है, हम नहीं भी जाएँगे तो क्या होगा।” अगले सोमवार को जब आप लोग कॉलेज में मिलते हैं तो सिंगल मित्र आपको गालियाँ देता मिलता है कि कोई नहीं आया। केन्द्र सरकार वही सिंगल मित्र है जिसे हर राज्य ने यह सोच कर ‘ज़ीरो’ भेज दिया कि बाकी तो भेजेंगे ही, हमारा कितना पता चलेगा। पता चला कि सब अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ‘सैंया के साथ मड़ैया में, बड़ा मजा आए रजैय्या में’ कर रहे थे। 

दूसरी बात, जो वैज्ञानिक है, वो यह है कि आप ही बताइए कि धरती पर कौन सी जगह है जहाँ ऑक्सीजन नहीं है? इतने पेड़-पौधे हैं, सब ऑक्सीजन फ्री में दे रहे हैं। हमारे खून में भी ऑक्सीजन होता है। ऑक्सीजन हर जगह है। पानी में भी घुला हुआ रहता है। ऐसे में कोई आपको यह कह दे कि उसको ऑक्सीजन नहीं मिला तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी? आप तो यही कहेंगे कि झूठ बोल रहा है आदमी या फिर वर्जिन गैलेक्टिक या ब्लू ऑरिजिन के साथ स्पेस में जा कर जहाज की खिड़की खोल दी होगी। दो ही संभावनाएँ दिखती हैं। जब ऑक्सीजन हर जगह है तब सरकार का यह कहना कि एक भी व्यक्ति ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरा, बिलकुल सहज और सुपाच्य तथ्य होना चाहिए, इस पर हल्ला तो सिर्फ राजनीति से ही प्रेरित हो सकता है। 

अन्य खबरों में

आजकल पेगेसस, पीगासस, पीगेसुस या और भी जो भी एक्सेंट आपको आता है, वो चर्चा में है। भोजपुरी में इसे पिगेससबा कहा जा रहा है। हुआ ये कि मनमोहन सिंह की सरकार में जवान हुए कुछ बुजुर्गों ने यह कह दिया कि मोदी जी ने उनके फोन में इजरायली वायरस इंजेक्ट कर दिया है। उनका मानना है कि पिगेससबा, जो कि पंखों वाला एक घोड़ा है, उसका मिनियेचर बना कर, नैनो टैक्नॉल्जी से कोरोना की इंजेक्शन में भर कर भारत के कुछ पत्रकारों और नेताओं के फोन में डाल दिया। इसमें अजीत भारती जैसे पत्रकार परेशान हो गए कि उनका नाम क्यों नहीं है लिस्ट में। ऐसा है भारती जी, आप हो दो टके के यूट्यूबर, आपको सरकार क्यों ट्रैक करेगी? स्वयं को इतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं मानना चाहिए आदमी को कि अपने नाम में प्रातःस्मरणीय लगाए घूम रहा है। 

खैर, ‘द वायर’ वाले धागा खोल रखे हैं अपने स्कर्ट का पेगासस प्रोजेक्ट को ले कर। हर दिन पनामा लीक्स की तर्ज पर चार आर्टिकल चेप रहे हैं और ये उम्मीद कर रहे हैं कि मोदी जो है मुँह लटकाए हुए लोकसभा में कहेगा कि भारी गलती हो गई महाराज, सिद्धार्थ वरदराजन जी को प्रधानमंत्री बना दीजिए, हम चले केदारनाथ वाली गुफा में। ऐसा होने से रहा। पिगेससबा ऐसा बजरखसौना निकला कि वाशिंगटन पोस्ट के ग्लोबल एक्सपोज़े के बाद भी दूध नहीं दे रहा, भले ही बाल्टी ले कर ये लोग बैठे थे कि धार बहेगी। पता नहीं घोड़े में कहाँ से दूध निकाल रहे थे ये लोग, लेकिन गोरी चमड़ी वाले हैं तो निकाल लेते होंगे, हम गरीब लोग घंटा समझेंगे इस गूढ़ बात को! 

मनमोहन सिंह ने कहा था कि आंतरिक सुरक्षा के लिए, राष्ट्रहित में फोन टैपिंग जरूरी है। नीली पगड़ी वाले ऑक्सफोर्ड शिक्षित प्रधानमंत्री ने बोला तो सब ने मान लिया होगा। मोदी न तो ऑक्सफोर्ड गए, न ही इस बात पर कुछ बोला है, इसलिए विपक्ष के पास कुछ करने को बचा नहीं तो संसद में हो-हल्ला कर रहे हैं। सरकार कह रही है कि वो चर्चा को तैयार हैं, विपक्ष कह रहा है कि खुली चर्चा की जाए, भाजपा वाले डेरेक ओब्रायन का यह पैंतरा समझ नहीं पा रहे हैं कि चर्चा और खुली चर्चा में क्या अंतर है? किसी मसखरे ने कहा कि उनका मतलब होगा लॉन में चर्चा होनी चाहिए, इस पर टीएमसी के एक बड़े सासंद ने कहा कि खुली चर्चा का मतलब है कि कोई एक कपड़ा खोल कर चर्चा करनी होगी। इस पर ऑल पार्टी मीटिंग होने की बात चल रही है। सूत्र बता रहे हैं कि आँख मूँद कर बंगालियों की बात मानने वाले भाजपाई शायद कुर्ता त्याग कर खुली चर्चा करने को तैयार हो सकते हैं। आप कहेंगे कि ये क्या बकलोली चल रही है, तो मैं कहूँगा कि बंगाल में डेढ़ सौ कार्यकर्ताओं को मरवाने के बाद भी जो पार्टी चूँ नहीं बोलती और ममता के भेजे आम खाती रहती है, वो उनके हिसाब से चलने और फासीवादी न कहे जाने के भय से कुर्ता क्या, धोती भी खोल कर खुली चर्चा कर सकती है। 

वहीं श्री इमरान भाई खान ने कहा कि भारत उनका भी फोन टैप कर रहा था। शाम के सात बजे हाथ की मोटी नस में सिरिंज मार कर सोने वाला न तो सेक्सटिंग कर पाता होगा, न ही ओयो रूम जाता होगा, ऐसे में उसका फोन टैप कर के भी भारत सरकार करेगी क्या! मतलब, कोई आपको भाव नहीं दे रहा, तो खुद ही बिकने को तैयार हैं ठेले पर बैठ कर। चीनियों की बम ब्लास्ट में मृत्यु से ले कर पोलियो के टीके में नपुसंकता के नैनोबॉट्स ढूँढने वाली कौम, अपने आप को इतना बड़ा कैसे मानती है जबकि पूर्वजों ने मुगलों की अस्तबलों की लीद हटाने के सिवा और कोई याद रखने योग्य कार्य कभी किया ही नहीं था। लेकिन इसमें इमरान भाई का दोष है भी नहीं, हमारे विपक्ष के लोग स्वयं को भारत के कम और पाकिस्तान के ज्यादा समीप पाते हैं, तो हो सकता है पाकिस्तानी पीएम खुद को कॉन्ग्रेस पार्टी का सदस्य मानता हो। कॉन्ग्रेस खुद को तो पाकिस्तान की पीटीआई का सदस्य तो लम्बे समय से मानती ही रही है क्योंकि इन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर, एयर स्ट्राइक पर, उरी, पुलवामा, पठानकोट पर, पाकिस्तान का ही तो पक्ष लिया है। 

मोदी जी की छतरी

लोगों को लगा कि मॉनसून सत्र में मोदी जी की स्पीच होगी और मीडिया में नूतन उत्साह का संचार होगा। मोदी जी छतरी ले कर आए और वैक्सीन लगवाने वालों को बाहुबली बनने बोल कर चले गए। आगे, संसद में उन्हें बोलने नहीं दिया गया। यह बात भाजपा के बड़े नेताओं ने बताई कि पीएम को बोलने नहीं दिया गया, परंपरा तोड़ दी गई है। जो भी हो, दो दिन तक मोदी जी से ज्यादा उनकी छतरी चर्चा में बनी रही। यूँ तो मोदी जी की छतरी भी पहले दूसरे लोग ले कर चलते देखे गए हैं, लेकिन ‘माय फ्रेंड बराक’ की तर्ज पर अपने आठवें साल में मोदी जी और उनके साथ के सांसद अपना छाता खुद पकड़े नजर आए। इसके बाद तो राहुल गाँधी, सोनिया और प्रियंका गाँधी की छतरियाँ भी चर्चा में आ गईं। इंटरनेट पर मोदी जी की छतरी और बाकियों की छतरी किसने पकड़ी है, यह कह कर बताया जाने लगा कि असली सरकार तो यही है। 

पुराने राजनैतिक मुहावरे याद आने लगे कि नामदार सरकार नहीं है, वीआईपी कल्चर खत्म हो रहा है। इस तस्वीर को ट्विटर पर इतना घुमाया गया कि वो छतरी अब फट गई है। मोदी जी भी सोचेंगे कि एक सीजन भी चल जाता तो दाम निकल जाता पूरा, लेकिन भाजपा के मित्रों ने इंटरनेट पर उसकी गारंटी पीरियड खत्म कर दी है। दो दिन में लगभग आठ सीजन के बराबर वह छतरी लोगों को दिखाई जाने लगी है। लोग छतरी को ले कर इतने उत्साहित हो गए हैं कि दूसरों की छतरियाँ छीन कर खुद पकड़ ले रहे हैं। इसी बीच तीन स्टार्टअप कम्पनियों ने मुद्रा लोन ले कर छतरियाँ बनाने के कारखाने रेंट पर ले लिए हैं। भाजपा वालों ने तीन लेखकों को कहा है कि ‘मोदी जी का छाता’, ‘मोदी जी का बचपन’, और ‘मोदी जी के सपनों की छतरी’ नामक तीन किताबें माह के अंत तक लिख कर जमा करने को कहा है। ये तीनों किताबें तीन रिटायर्ड आइएएस अफसरों के नाम से छापी जाएँगी। लेखकों ने पैसे की बात की तो कहा गया कि ‘पागल हो क्या? मोदी जी पर किताब लिख रहे हो, यही मेहनताना है’। बचपन से ही ‘दुल्हन ही दहेज है’ पढ़ने वाला लेखक गिल्ट में आ गया कि यह क्या पाप कर दिया मैंने पैसे माँग कर! 

वहीं दूसरी खबरों में, लोग भाजपा वालों के ट्वीट्स से इतने प्रभावित हैं कि वो अपने बंद कमरों में छाता पकड़ कर बैठे देखे गए हैं। वैसे परमसम्माननीय और प्रातःस्मरणीय श्री अजीत भारती जी ब्रो अपना छाता बाल्यकाल से ही स्वयं पकड़ते रहे हैं, लेकिन उनकी तस्वीर किसी ने ट्विटर पर नहीं लगाई। जिन भजपइयों ने मुझे वामपंथी कहा है वो देख लें कि मैं मोदी जी को टाइम मशीन में देख कर 2009 से अपना छाता स्वयं लगा रहा हूँ। लेकिन आइटी सेल ने यह कह कर मुझे भगा दिया कि मैं सुश्री मायावती जी की पार्टी के रंग की छतरी, टीशर्ट और थ्री क्वार्टर पहने बैठा हूँ और 2009 से ही वामपंथी विचारों का रहा हूँ। उन्होंने पीछे के भगवा बैग पर ध्यान ही नहीं दिया जिसमें मेरा दिल रखा हुआ है जिस पर मैंने ‘टू मोदी जी, विद लव’ लिख कर कूरियर करने के लिए रखा हुआ है। 

यूट्यूब ने बैन किया एक और राष्ट्रवादी अकाउंट

पिछले सप्ताह ‘सब लोकतंत्र’ नामक यूट्यूब चैनल को सात दिनों के लिए स्सपैंड करने के बाद कल ‘सैम शर्मा शो‘ को सात दिनों के लिए सस्पैंड कर दिया गया है। लोग परेशान हैं कि भाजपा के राज में यह क्या हो रहा है। ट्वीट लिखे जा रहे हैं कि यूट्यूब अपने संविधान से चल रहा है, भारत के कानूनों की अवहेलना हो रही है। बात यह है कि ट्वीट लिख कर आप क्या कर लोगे? आपका अकाउंट कोई भाजपा के किसी नेता का तो अकाउंट है नहीं, कि वो बात कर लें। किसी ने कहा कि अनुराग ठाकुर जी को कहा जाए, संसद में आवाज गूँजनी चाहिए। देखिए संसद में साउंड प्रूफिंग इतनी अच्छी है न कि कभी-कभी तो प्रधानमंत्री की भी आवाज नहीं गूँज पाती, आप तो फिर भी चार-पाँच टके के यूट्यूबर हैं। 

सरकार का काम चल रहा है। उनके लोग आपका नाम ले कर आगे यह बात कर लेते हैं कि फलाँ तो अपना भाई है, वो तो अपना ही लड़का है, अरे उसको तो बोल देंगे तो वो चार विडियो बना देगा। हम और आप विडियो बनाते भी हैं, कोई फेवर नहीं माँगते या लेते। ये बात और है कि कुछ लोग जो अपने नाम में ‘मोडीफाइड’ होने का दावा करते हैं, या मोदी जी के साथ तस्वीरें लगवाए घूमते हैं, वो आपके द्वारा विडियो बनवाने के नाम पर वहाँ से पैसे भी लेते हैं, जो आप तक कभी नहीं आते। आप ‘फलाँ’ बाबूसाहब के भाई बन कर विडियो बनाते रहिए, आपका चैनल सस्पैंड होगा तो कहा जाएगा कि ‘यार, तुमने तो हमें बताया ही नहीं, कुछ तो निकल ही आता। बताया तो करो… हैं! आगे कुछ होगा तो सीधा फोन करना, ठीक है…’ 

मतलब, आप उनके लिए विडियो बनाइए, आप उनके लिए जान पर खेल कर बंगाल के मटिया ब्रुज से ले कर भाटापारा और हावड़ा की सँकड़ी गलियों में जाइए और फिर आप उनको तेल भी लगाइए कि सर, कल सुबह में गुड मॉर्निंग वाला मैसेज आपको भेज नहीं पाया था, इसलिए आज दो भेज रहा हूँ। सरकारों के लोग इसी ‘तेल लगवाने’ में गहन आस्था रखते हैं, उन्हें आपके नाम के इस्तेमाल से अपनी राजनैतिक सीढ़ियाँ चढ़नी हैं। यह भी संभव है कि टॉप के नेताओं को इन बातों की हवा भी न लगती हो कि नीचे उनके लोग क्या-क्या कर रहे हैं। मुझे तो नहीं लगता कि PMO से किसी व्यक्ति को कॉल आता है कि आपके एडिटर ने मोदी जी के खिलाफ ट्वीट कर दिया है, उसको डिलीट करवाइए, तो वास्तव में मोदी जी ये सब टुच्चे काम करते होंगे। 

मैं इतना बड़ा मूर्ख तो हूँ नहीं कि यह मान लूँ कि मोदी जी दिन भर हमारे यूट्यूब वीडियो देखते हैं और ट्वीट पढ़ते हैं। अक्सर, नीचे के ओहदों पर काम करने वाले ही स्वयं क प्रधानमंत्री समझ लेते हैं और उनके नाम का इस्तेमाल कर के आप से वो सब करवाते हैं जो आपको सोचने पर विवश करता है कि भला मोदी जी को इतना समय कहाँ से मिल रहा है कि वो ट्वीट पढ़ कर कह रहे हों कि उसको कहिए डिलीट करे? 

ख़ैर, यूट्यूब ने संभव शर्मा का चैनल सस्पैंड कर दिया। यह न तो पहली बार है, न अंतिम। हमें चाहिए कि हम दो चैनल तो बना कर रखें ही क्योंकि सरकार को वीडियो कंटेंट में दो कौड़ी के यूट्यूबर दिखते हैं जो फ्री में उनका काम कर ही रहे हैं। उन्हें आपकी चिंता नहीं है। याद कीजिए कि कितनी बार आईटी सेल आप पर यह फेंक कर मारता है कि ‘तुम्हें लगता है तुम्हारे विडियो देख कर लोग वोट करते हैं’। नहीं भाई, लोग वोट तो आपके ट्वीट्स पढ़ कर करते हैं कि देखो मोदी जी अपना छाता स्वयं ले कर चल रहे हैं। कल को आईटी सेल वाले मोदी जी के खाने की तस्वीर न लगा दें कि देखो, आदमी प्रधानमंत्री बन गया लेकिन खाना अपने ही हाथों से खाता है। 

हमें यह सरकार इसलिए चाहिए क्योंकि बाकी सरकारों में मैं अपना अस्तित्व सोच भी नहीं पाता। हमें यह सरकार इसलिए चाहिए क्योंकि दशकों बाद हमारी बात कहने और करने वाली एक सरकार आई है। हमें यह सरकार इसलिए चाहिए क्योंकि हमें नरेन्द्र मोदी की नीयत पर कभी भी, किंचित् मात्र भी संदेह नहीं रहा कि यह व्यक्ति राष्ट्र का हित सोचता है। कई बार कुछ नीतियाँ, कुछ चुप्पियाँ, कुछ उपेक्षाएँ हमें कचोटती हैं और वो हम बताते रहेंगे। 

यूट्यूब हो या ट्विटर, वो सरकार की नहीं सुनेंगे, यह तय है। हमने देखा है कि जब तक रविशंकर प्रसाद मंत्री थे, ट्विटर के बारे में खूब बयान दे रहे थे कि ये कर देंगे, वो कर देंगे। दो-चार FIR भी दर्ज हुईं, ट्विटर के एमडी को भी बुलाया गया। फिर नए मंत्री आए, ट्विटर पर केस होना बंद हो गया। ट्विटर ने दो चार पोर्टलों और उनके पत्रकारों के अकाउंट वैरिफाय कर दिए, ‘सब चंगा सी’ हो गया। उन्होंने तीन महीने की डेडलाइन नहीं मानी, सरकार ने कुछ नहीं किया। उन्होंने अपने समय में अधिकारी नियुक्त किए, सरकार चुप रही क्योंकि आप भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को नुकसान नहीं पहुँचा सकते। मुख्य बात वही रही कि क्या दस वैरिफाइड हैंडल के बदले सरकार यह भूल गई कि कितने लोगों के अकाउंट भारतीय संविधान के द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रयोग के कारण हटाए गए हैं और वो आज भी बंद पड़े हैं? 

सरकारों से हम कोई फेवर नहीं माँग रहे, हम सरकार को सीधे खड़े होने बोल रहे हैं। हम सरकार से अपने अधिकारों की रक्षा की बात कर रहे हैं। हमें पता है कि सरकार जैसे वृहद तंत्र को लिए हम किसी पेड़ पर लगे एक पत्ते की तरह हैं जो हवा चलने पर कंपित होते रहते हैं। फिर भी हर वोटर अपनी चुनी हुई सरकार से आशा रखता है। मुझे ऐसा कोई मतिभ्रम नहीं हुआ है कि मेरे कहने से पाँच लोग भी वोट करते हों, इसलिए ब्लैकमेल नहीं कर सकता सरकार को। इसके उलट, फिर वो भी हमें ब्लैकमेल करने की कोशिशें न करें। हवा में उड़ती एक चिड़िया ने बताया कि आने वाले दिनों में भाजपा के लोग मुझे डिस्क्रेडिट करने वाले हैं। 

यह कोशिश आपने अप्रैल को पहले सप्ताह में भी की थी। पेगासस वाली लिस्ट में मेरा नाम न पा कर, मैं वैसे भी वर्थलेस महसूस कर रहा हूँ कि सरकार क्या मेरे व्हाट्सएप्प चैट के स्क्रीनशॉट भी नहीं पढ़ती, मैं क्या इतना बुरा लिखता हूँ? मुझे डिस्क्रेडिट क्या करोगे! पर्सनल बातें, दो चार फोटो बाहर ले आओगे? मुझसे माँग लेना, HD वाला दूँगा क्लाउड से डाउनलोड कर के। अविवाहित हूँ, व्यभिचार के भी आरोप नहीं ठहरेंगे। ओयो रूम में नेता जाते भी हैं, मैं तो नहीं जाता। फेक न्यूज फैलाता नहीं, तो फिर ये जो ब्लैकमेलिंग टेक्नीक है न, वो रखो अपने पास कि ऐसी बातें हवा में छोड़ देना ताकि आदमी डर के मारे स्वयं ही रास्ते बदल ले।

मैं रास्ता बनाता हूँ, बदलता नहीं।

विस्तृत वीडियो आप इस यूट्यूब लिंक पर देख सकते हैं

Zero Deaths by Oxygen Shortage? Seriously Modi ji?




सहयोग करें
वामपंथी मीडिया तगड़ी फ़ंडिंग के बल पर झूठी खबरें और नैरेटिव फैलाता रहता है। इस प्रपंच और सतत चल रहे प्रॉपगैंडा का जवाब उसी भाषा और शैली में देने के लिए हमें आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आप निम्नलिखित लिंक्स के माध्यम से हमें समर्थन दे सकते हैं:

ताज़ा समाचार