नौसिखिए ‘शोधकर्ता’ के हवाले से न्यूयॉर्क टाइम्स ने की भारत के कोरोना मैनेजमेंट की आलोचना

16 सितम्बर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
भारत सरकार की छवि खराब करने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की अजेंडाबाजी

बहुचर्चित मीडिया संस्थान ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ द्वारा एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट में भारत सरकार द्वारा वुहान लैब से निकले चीनी वायरस की रोकथाम के लिए उठाए गए कदमों के विषय में छापा गया है। साथ ही कोरोना वायरस के दौरान भारत के लोगों की स्थिति की व्याख्या की गई है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी रिपोर्ट जिन तर्कों और शोध के आधार पर बनाई गई है, वे केवल एक कथित रिसर्चर और डॉक्टर द्वारा कही गई बातें हैं और इन्हीं के आधार पर सरकार पर निशाना साधा गया। 

यह रिपोर्ट मुख्यतः केंद्र सरकार और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए लिखी गई थी। इसके प्रारंभ में ही नरेंद्र मोदी सरकार के सम्बन्ध में यह छापा गया कि कोरोना काल में प्रधानमंत्री का ध्यान केवल दो चीज़ों पर था- एक तो करोना काल में खराब हुई अर्थव्यवस्था को पुनः कैसे रास्ते पर लाया जाए और दूसरा कि चुनाव प्रचार किस तरह किया जाए?

इस पर किसी डॉ अग्रवाल का नाम लेते हुए लिखा गया कि उन्होंने कहा था कि ये सब चीज़ें करोना महामारी को और फैलाने का कारण बन सकती हैं।


भाजपा ने की थी ऑनलाइन कैंपेनिंग की माँग 

अमेरिकी अख़बार द्वारा लगाए गए ये सभी आरोप निराधार इस कारण भी साबित होते हैं क्योंकि भाजपा द्वारा ही चुनाव आयोग के सामने चुनावों के लिए ऑनलाइन कैंपेनिंग करने की बात कही गई थी, जिसके विरुद्ध विपक्षी राजनीतिक दलों द्वारा आवाज़ उठाई गई एवं उन्होंने इस बात को स्वीकृति देने से इंकार कर दिया। इसके बाद ही सभी पार्टियों ने सामान्य कैंपेनिंग प्रारंभ कर दी थी।

लॉकडाउन खोलने और अर्थव्यवस्था को पुनः चालू करने को एक गलत निर्णय कहने की न्यूयॉर्क टाइम्स की बात भी गलत इसलिए साबित होती है क्योंकि विपक्ष एवं कई बड़े उद्योगपतियों द्वारा भी लॉकडाउन का भारी विरोध किया गया था।

जहाँ एक ओर राहुल गाँधी ने लॉकडाउन की आलोचना करते हुए इसे तुगलकी लाॅकडाउन बताया था, वहीं बहुचर्चित उद्योगपति नारायण मूर्ति ने भी कहा था कि लंबे समय तक चले लॉकडाउन के कारण कोरोना से भी अधिक लोगों की जान चली जाएगी।



इस पूरे घटनाक्रम को लेकर रक्षा मामलों के वरिष्ठ जानकार अभिजीत अय्यर मित्रा ने ट्विटर पर एक थ्रेड साझा किया। उन्होंने कई मामलों में न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का खंडन किया है।

मित्रा ने बताया कि जहाँ न्यूयॉर्क टाइम्स अपने लेख को केवल एक डॉक्टर अग्रवाल नामक शोधकर्ता के तर्कों पर आधारित बता कर वाह-वाही बटोरना चाह रहा था वहीं यह सामने आया कि डॉ अग्रवाल एक 32 वर्ष का नौसिखिया कथित शोधकर्ता है।

यह कहना भी पूर्णतः गलत न होगा कि डॉ अग्रवाल को सभी तथ्यों और गूढ़ आँकड़ों की जानकारी तक भी नहीं होगी।


बगैर तथ्य के आरोप 

वायरस के उपचार की विधि पर भी न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपना अजेंडा घुसाते हुए लिखा कि डॉ अग्रवाल और उनकी टीम द्वारा पहले ही उपचार के दो तरीकों यानी ब्लड प्लाज्मा एवं हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा, दोनों को ही खारिज कर दिया गया था, परंतु सरकार इलाज के लिए इन्हीं को प्राथमिकता देती रही।

सनसनीखेज लेख में दावा किया गया है कि इसी कारण इन दवाओं की खुलकर कालाबाजारी हुई। हालाँकि, इस आरोप को लगाते समय इस मीडिया संस्था ने कहीं किंचित मात्र भी कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं किए हैं।

सरकार पर यह आरोप भी लगाए गए कि भारत सरकार कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए न तो स्वयं तैयार थी न ही उन्होंने जनता को इसके लिए तैयार किया। जबकि इन दावों के एकदम उलट, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जनता से विभिन्न अवसरों पर यह बात की गई थी कि लोग बीमारी को हल्के में न लें। प्रधानमंत्री ने यहाँ तक कहा था कि लोग दवा लगवाने के बाद भी पूरी सुरक्षा बरतें।


तबलीगी जमात कांड 

इस अमेरिकी समाचार पोर्टल ने कोरोना महामारी के दौरान भारत सरकार एवं देश को ‘मुस्लिम विरोधी’ दिखाने का भी पूर्ण प्रयास किया। अपने लेख में न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि लॉकडाउन के दौरान सरकार द्वारा एक इस्लामी सभा को चिन्हित कर निशाना बनाया गया। साथ ही, यह भी आरोप लगाया गया है कि हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा मुस्लिम समुदाय पर महामारी फैलाने के आरोप लगाए गए।

न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा यह लेख लिखते समय तथ्यों पर पूरी तरह आँखें मूँद ली गईं। इसमें यह साफ था कि केवल तबलीगी जमात के कुछ लोगों द्वारा ही दिल्ली समेत भारत के कई प्रदेशों में सुपर स्प्रेडर का काम किया गया एवं कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जहाँ पर तबलीगी जमात के कई लोगों द्वारा जानबूझकर अस्पतालों में वायरस को फैलाने के कुत्सित प्रयास किए गए।


न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट से यह तो साफ होता है कि यह रिपोर्ट तथ्यों के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक विचारधारा से अधिक प्रेरित देखी जा सकती है, यह भी एक सोचने का विषय है कि एक बहुचर्चित मीडिया संस्थान केवल एक युवा नौसिखिया डॉक्टर की कही गई बात मान कर उसी को तथ्य बताते हुए कैसे छाप सकता है?

जबकि उस कथित डॉक्टर की सम्पूर्ण तथ्यों तक पहुँच भी नहीं है। विश्व के कई देशों के मुकाबले भारत ने चीनी वायरस की रोकथाम के लिए कई उपयोगी कदम उठाए और जनसंख्या के आधार पर देखें तो भारत में मृत्यु दर भी खासा कम रहा है।

इसी कारण केवल एक विदेशी संस्था होने के कारण किसी वामपंथी और राजनीतिक विचार से ग्रसित मीडिया हॉउस की रिपोर्ट को विश्वसनीय मानना एक बेवकूफी ही होगी।



सहयोग करें
वामपंथी मीडिया तगड़ी फ़ंडिंग के बल पर झूठी खबरें और नैरेटिव फैलाता रहता है। इस प्रपंच और सतत चल रहे प्रॉपगैंडा का जवाब उसी भाषा और शैली में देने के लिए हमें आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आप निम्नलिखित लिंक्स के माध्यम से हमें समर्थन दे सकते हैं:

ताज़ा समाचार