लाल बहादुर शास्त्री: वह प्रधानमंत्री जिन्होंने पाक से लेकर अमेरिका तक को घुटनों पर झुकाया

02 अक्टूबर, 2021 By: पुलकित त्यागी
आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जन्मदिवस है

8 जनवरी, 1966, भारतीय सेना लाहौर से मात्र 2-3 घंटों की दूरी पर खड़ी थी और पड़ोसी देश यह जान चुका था कि उसने वर्ष 1965 के भारत को 1948 का भारत समझ कर बहुत बड़ी भूल कर दी है। पाकिस्तानी अफ़सरों का दिल्ली में नाश्ता करने का स्वप्न अब भारतीय सेना लाहौर में दोपहर का खाना खाकर चकनाचूर करने वाली थी।

देश में आखिर ऐसा क्या बदल गया था कि केवल 3 वर्षों पहले चीन से पराजित होने वाली भारतीय सेना का मनोबल इस समय सातवें आसमान पर था और पाक को अब लाहौर तो क्या, इस्लामाबाद तक हाथ से निकल जाने का भय सता रहा था। 

इन 3 वर्षों में कुछ बदला था तो वह था देश का राजनीतिक नेतृत्व। इस समय देश का नेतृत्व ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ का चूर्ण चटा कर खतरे के सामने शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन ज़मीन में घुसा देने वाले नहीं बल्कि लाल बहादुर शास्त्री कर रहे थे। 

2 अक्टूबर, 1904 को जन्मा और जून, 1964 को प्रधानमंत्री की कुर्सी सँभालने वाला यह 5 फीट 2 इंच का मासूम सा प्रतीत होने वाला व्यक्ति भीतर से लौह का बना था। इस बात को शास्त्री जी ने न केवल विभिन्न कालखंडों पर प्रमाणित किया अपितु आज उनकी मृत्यु के 50 से अधिक वर्षों के बाद भी इतिहास के पन्नों में वे बगैर आलोचकों के एक महान आत्मा की तरह जीने वाले एक व्यक्ति के रूप में अंकित हैं।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे त्रिभुवन नारायण सिंह ने देश की संसद में खड़े होकर लाल बहादुर शास्त्री को ‘अजातशत्रु’ के उपनाम से संबोधित किया था। अजातशत्रु अर्थात एक ऐसा व्यक्ति जिसका कोई शत्रु नहीं था।

भारतीय राजनीति, जिसमें एक समय पर केवल परिवारवाद और पिता से पुत्र/पुत्री को सत्ता हस्तांतरित होने की प्रथा थी, शास्त्री जी इसमें ऐसे व्यक्ति बने जिन्होंने लगभग डेढ़ वर्ष की आयु में अपने पिता को खो देने के बाद न केवल अपने कन्धों पर समस्त जीवन जिया बल्कि वे भारतीय राजनीति के सबसे ऊँचे स्थान पर भी विराजमान हुए। 

प्रतिकूल स्थिति में संभाली थी देश की कमान 

गुरुकुल प्रणाली से वर्ष 1925 में उन्होंने फर्स्ट क्लास स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद ही लाल बहादुर के नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा। यह भी बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि शास्त्री जी ने स्वतंत्रता से पूर्व लाला लाजपत राय के लोक सेवक मंडल में स्वयंसेवक की तरह कार्य किया था।

इसमें उन्होंने हरिजनों की स्थिति के सुधार के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए गए थे। स्वतंत्रता से पूर्व मोहनदास गाँधी के आदर्शों पर चलने वाले शास्त्री का असली राष्ट्रवादी स्वरूप तब देखने को मिला जब वे वर्ष 1964 में देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते लाल बहादुर शास्त्री (9 जून, 1964) (चित्र साभार-ट्विटर)

उस समय भारत चीन से हुए भीषण युद्ध के बाद सँभलने का प्रयास कर रहा था एवं देश की आर्थिक स्थिति भी कुछ विशेष अच्छी नहीं थी। कहा जाता है कि शास्त्री जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाना कॉन्ग्रेस के कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा चली गई एक कूटनीतिक चाल थी, जिसमें वे शास्त्री को एक कठपुतली की तरह प्रयोग कर सत्ता के तार अपने हाथों में रखना चाहते थे, परंतु इस व्यक्ति ने इन सभी समीकरणों को नष्ट करते हुए न केवल देश में, अपितु विदेशों में भी अपनी एक नई और मजबूत पहचान स्थापित कर ली।

‘जय जवान-जय किसान’ और दुग्ध क्रांति 

युद्ध से उबरे किसी भी देश को पुनः एक सामान्य स्थिति में आने में वर्षों, तो कई बार दर्शकों भी लग जाते हैं। भारत के साथ भी कुछ ऐसा समय ही चल रहा था। ऐसे समय में देश की जनता के मृत आत्मा विश्वास के पुनरुत्थान हेतु शास्त्री जी ने कई कदम उठाए।

उस समय देश में अनाज के साथ-साथ दूध की भी भारी कमी थी, जिसे गंभीरता से लेते हुए प्रधानमंत्री ने दूध के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया एवं ‘अमूल’ जैसे कई ब्रांडो को बढ़ावा दिया।

इसी पहल ने आगे चलकर ‘श्वेत क्रान्ति’ का नाम लिया और आज भारत में दूध उत्पादन की स्थिति यह है कि भारत न केवल अपने देश की जनता की आपूर्ति कर रहा है बल्कि भारी मात्रा में इसका निर्यात भी करता है।


स्वतंत्रता के लगभग दो दशकों बाद और हाल ही में एक भीषण युद्ध से गुज़रे देश में अनाज की भी भारी कमी थी। उस समय भारत में अमेरिका से PL (पब्लिक लॉ)-480 के कानून के तहत लाल गेहूँ आयात होता था। कहा जाता है कि उस गेहूँ के गुणवत्ता इतनी निम्न थी कि उसे अमेरिका में जानवर तक नहीं खाते थे। इसके बावजूद अमेरिका ने भारत को यह चेतावनी दी कि वह भारत में यह गेहूँ भेजना बंद कर देगा।

अमेरिका ने सोचा था कि पिछले प्रधानमंत्री की तरह यह व्यक्ति भी उनकी इस गीदड़ भभकी से घबराकर कथित ‘वर्ल्ड पावर’ के समक्ष घुटने टेक देगा, परंतु शास्त्री जी ने इसके उलट यह अमेरिकी गेहूँ लेने से ही इंकार कर दिया।

जब आसपास के लोगों ने उनसे कहा कि इस निर्णय के कारण देश में भुखमरी की स्थिति आ सकती है तो शास्त्री जी ने देश की जनता से हफ्ते में किसी एक दिन व्रत रखने का आग्रह किया ताकि देश में अनाज की स्थिति को सुधारा जा सके।

प्रधानमंत्री के इस निर्णय का न केवल आम जनता ने बल्कि रेस्टोरेंट्स और खाने-पीने के अन्य स्थानों के मालिकों ने भी पालन किया और हर सोमवार को व्रत रखना प्रारंभ कर दिया। इस भारी जनसमर्थन के बाद इस मुहिम को ‘शास्त्री व्रत’ के नाम से जाना गया। इसी कड़ी में आगे चलकर लाल बहादुर ने देश को ‘जय जवान जय किसान’ का नारा भी दिया।  

लाहौर पर कब्ज़ा, घुटनों पर पाक  

चीन से 1962 में मिली हार के बाद भारतीय सेना का मनोबल भी हतप्रभ था। इस बात का फायदा उठाते हुए वर्ष 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। पाकिस्तान ने 5 अगस्त, 1965 को ढाई लाख से अधिक इन्फेंट्री, 700 से अधिक टैंकों और लगभग 300 हवाई जहाजों के साथ नियंत्रण रेखा को पार करके कश्मीर क्षेत्र पर आक्रमण किया।

कश्मीर के तिथवाल, पुंछ और उरी क्षेत्र में पाकिस्तान को भारी बढ़त भी मिल गई थी और कश्मीर के रास्ते पाकिस्तानी सेना राजधानी दिल्ली तक कब्ज़ाने के सपने देखने लगी थी। 

पाकिस्तान की इस नीच हरकत को देखते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने सभी सीमाएँ खुलवा कर भारतीय सेना के हाथ खोल दिए और भारतीय सेना ने न केवल नियंत्रण रेखा पार करके पाकिस्तान में प्रवेश किया बल्कि चंद समय में सेना पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुख्य शहर लाहौर से केवल 2 घंटों की दूरी पर खड़ी थी और लाहौर समेत समस्त पंजाब प्रांत कब्ज़ाने के केवल आदेशों की प्रतीक्षा कर रही थी।

कई पाकिस्तानी अफसरों ने बाद में अपनी आत्मकथाओं में यह बात साफ की है कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि भारतीय सेना युद्ध से उबरने के बाद इस कदर प्रतिकार कर पाएगी और पाकिस्तानियों को अपना क्षेत्र बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। बता दें कि 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए इस युद्ध में केवल 12 दिनों के भीतर पाकिस्तानी सेना घुटनों पर आ गई थी।

1965 के युद्ध में भारतीय सेना द्वारा क़ब्ज़ाए गए पाक के टैंक पर खड़े प्रधानमंत्री शास्त्री

भारतीय सेना के इस पलटवार से भयभीत होकर पाकिस्तान को अपना अस्तित्व तक समाप्त हो जाने का डर सताने लगा तो वह हर बार की तरह अमेरिका की शरण में भागा और अमेरिका से भारत के साथ बातचीत करने की गुहार लगाई।

अब क्योंकि अमेरिका लाल बहादुर शास्त्री के व्यक्तित्व से पहले ही परिचित था तो उन्होंने इस मामले में स्वयं न कूदकर रूस के माध्यम से दबाव बनाने का प्रयास किया और यही आगे चलकर ‘ताशकंद समझौता’ बना, जिसने इस देश से एक कद्दावर नेता को छीन लिया।

अतुलनीय जीवन, रहस्यमई मृत्यु  

लाल बहादुर शास्त्री भारत के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनके जीवन के साथ-साथ उनकी मृत्यु की भी चर्चा आम हैं। 10 जनवरी, 1966 को हुए ताशकंद समझौते के लिए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री रूस गए थे, जहाँ उन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर किए एवं भारतीय सेना द्वारा जीती गई सारी जमीन पाकिस्तान को वापस कर दी।

ताशकंद समझौता (1966)

कहा जाता है कि विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी देश ने अपनी सेना द्वारा जीती गई भूमि लौटाई हो। जहाँ एक ओर ताशकंद समझौते की तस्वीरों और वीडियोज़ में लाल बहादुर शास्त्री खासे सामान्य और खुश प्रतीत होते हैं, वहीं उनके करीबी बताते हैं कि वे इस समझौते से बहुत विषाद में थे।

लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु को भारतीय इतिहास की एक सबसे रहस्यमई घटनाओं में से एक कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा। 11 जनवरी, 1966 को रात में शास्त्री जी ताशकंद स्थित अपने कमरे से बाहर आकर केवल ‘डॉक्टर’ शब्द कह पाए। इसके बाद उन्हें चिकित्सा प्रदान की गई, परंतु उन्हें बचाया न जा सका।

उनकी मृत्यु को लेकर विभिन्न लोग विभिन्न साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। कोई कहता है कि उनकी मृत्यु हार्टअटैक, यानी दिल का दौरा पड़ने से हुई, तो कई लोग कहते हैं कि उन्हें दूध में ज़हर मिलाकर पिलाया गया। एक बात तो साफ है कि इस पूर्व प्रधानमंत्री की मृत्यु सामान्य तो नहीं थी क्योंकि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब उनके मृत शरीर को भारत लाया गया तो वह पूरी तरह से नीला पड़ चुका था। विशेषज्ञों की मानें तो शव का नीला पड़ना या तो ज़हर दिए जाने या साँप के काटने के कारण ही होता है।

पूर्व प्रधानमंत्री का मृत शरीर

उस समय उच्च अधिकारियों और नेताओं द्वारा हार्टअटैक की बात कहकर देश के प्रधानमंत्री की मृत्यु के कारण को दबा दिया गया। न तो शास्त्री जी के शव का उचित पोस्टमार्टम हुआ, न ही उनके परिवार को कोई सीधी-सपाट व्याख्या दी गई।

14 फरवरी, 1966 को पहली बार इस मामले को संसद में वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेई द्वारा उठाया गया। उन्होंने संसद के समक्ष ऐसे कई सवाल रखे जिन पर सत्ताधारी कोई उचित उत्तर नहीं दे पाए। बहुचर्चित लेखक अनुज धर के अलावा आज तक किसी ने शास्त्री जी के जीवन पर विस्तार से कुछ लिखा तक नहीं है।

न भूतो न भविष्यति  

कहा जाता है कि शरीर मिटाया जा सकता है, विचार नहीं। इसी बात को चरितार्थ करते हुए लाल बहादुर की मृत्यु के 50 से अधिक वर्षों बाद भी आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर सोशल मीडिया और ट्विटर पर ट्रेंडिंग सेक्शन में चलते उनके नाम से यह सिद्ध होता है कि चाहे उनके जीवन के बड़े से बड़े कार्यों, मज़बूत निर्णयों और उनकी मृत्यु के कारणों को भी छुपाने का संपूर्ण प्रयास किया गया हो, परंतु अपने कपड़ों के भंडार में केवल 2 धोती-कुर्ते के जोड़े रखने वाले 5 फुट के इस प्रधानमंत्री ने देश के आने वाली पीढ़ियों पर अपनी एक सकारात्मक छाप अवश्य थोड़ी है।



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