यौवन आने पर मुस्लिम लड़की की शादी वैध: कोर्ट ने दिए हिन्दू से शादी करने वाली नाबालिग को सुरक्षा देने के आदेश

27 दिसम्बर, 2021 By: DoPolitics स्टाफ़
मुस्लिम पत्नी और हिंदू पति के जोड़े को हरियाणा उच्च न्यायालय ने दी पुलिस सुरक्षा

हरियाणा उच्च न्यायालय ने 17 वर्ष की एक मुस्लिम लड़की की याचिका स्वीकार करते हुए पुलिस को उसके और उसके पति को सुरक्षा देने के निर्देश दिए हैं। 17 वर्ष की इस मुस्लिम लड़की ने हिंदू लड़के से शादी की थी और अब विवाहित जोड़े को लड़की के घरवालों से जान का खतरा बताया जा रहा है।

हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनके समक्ष आई एक मुस्लिम लड़की की याचिका पर संज्ञान लेते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। दरअसल 17 वर्ष की इस लड़की ने एक हिंदू युवक से शादी की थी, जिसकी आयु 33 वर्ष है। इस शादी के बाद लड़की के घरवाले लड़की को नाबालिग बताकर इस रिश्ते को मानने से इंकार कर रहे थे और दोनों की जान को भी खतरा था, जिसके कारण लड़की द्वारा यह याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय ने यह तर्क दिया कि मुस्लिम कानून के अनुसार यौवन और प्रौढ़ता एक ही चीज़ होती हैं। मुस्लिम कानून में यह माना जाता है कि 15 वर्ष की आयु में प्रौढ़ता हासिल हो जाती है और जो भी मुस्लिम लड़का या लड़की इसे हासिल कर लेते हैं वे शादी के लिए स्वतंत्र हैं। 

इसी संदर्भ में वकील ने सर दिनशाह फरदूंशी मुल्ला की किताब ‘प्रिंसिपल्स ऑफ़ मोहम्मडन लॉ’ के आर्टिकल 195 में शादी के लिए कही गई बात बताई, जिसमें लिखा है “सही सलामत दिमाग वाला हर मुस्लिम जिसने यौवन हासिल कर लिया है वह शादी कर सकता है।”

साभार- दैनिक भास्कर

परिवार न करे हस्तक्षेप 

तर्क सुनने के बाद जस्टिस हरनरेश सिंह गिल ने कहा कि कानून साफ है कि किसी मुस्लिम लड़की की शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के ज़रिए होती है और इस किताब के आर्टिकल 195 के मुताबिक एक 17 वर्ष की मुस्लिम लड़की अपनी पसंद के लड़के के साथ शादी के लिए योग्य है।

मामले की सुनवाई में जज ने आगे कहा:

“न्यायालय इस बात से भी आँखें नहीं फेर सकता कि याचिकाकर्ताओं की चिंता के बारे में सोचना आवश्यक है। सिर्फ इस बात से कि याचिकाकर्ता ने अपने परिवार की आज्ञा के विरुद्ध शादी कर ली, उन्हें संविधान के तहत मिले मूलभूत अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”

जब सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष द्वारा न्यायालय में यह तर्क  दिया गया कि लड़की कानूनी रूप से नाबालिग है तो जस्टिस हर गिल ने कहा कि मुस्लिम लॉ के अनुसार अधिकतर मामलों में यौवन की आयु 15 वर्ष मानी जाती है और अगर जोड़ा बराबरी का है तो परिवार वालों को इस पर रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं है। दोनों शादी के लिए स्वतंत्र हैं और उन्हें सुरक्षा दी जाएगी।



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