रावण से प्रेम करती है सीता: 'कला' के बहाने हिन्दू-घृणा परोसती रावण लीला फिल्म

11 सितम्बर, 2021 By: पुलकित त्यागी
रावण-लीला फिल्म में प्रतीक गाँधी

बॉलीवुड अपनी हिन्दूघृणा और देवी-देवताओं के अपमान का एक नया उदाहरण प्रस्तुत करने को तैयार है। लैला, पीके और तांडव जैसी फ़िल्मों के बाद अब एक ‘रावण-लीला’ (Ravan Leela) नाम की फिल्म का ट्रेलर यूट्यूब पर रिलीज हुआ है। 

इस बार इस फिल्म में जिस चीज़ को ढाल की तरह उपयोग किया गया है वह है ‘नाटक’ यानी प्ले। फिल्म में दशहरा के पर्व पर होने वाली रामलीला का मंचन दिखाया गया है, परंतु इस सबके बीच जहाँ वायरस की तरह नैरेटिव इंजेक्ट करने का प्रयास किया गया है, वह है पात्रों का निजी जीवन।

एक ज़बरदस्ती का प्लॉट, अटपटा से लिखा पात्रों का करैक्टर अर्क, भगवा गमछे पहने कुछ पार्टी कार्यकर्ता जो तिलक लगाकर केवल तोड़फोड़ और आगजनी करते हैं और कॉमेडी के नाम पर कुछ सस्ते व्हाट्सऐप फॉरवर्ड चुटकुले। इसी सामग्री का उपयोग कर इन दिनों बॉलीवुड ने एक विवादास्पद फिल्म बनाने का साँचा सा तैयार करके रख लिया है।


ध्यान देने योग्य बात यह नहीं है कि बॉलीवुड इस प्रकार का धूर्त सिनेमा बना रहा है क्योंकि इस संस्था से तो इससे अधिक कुछ अपेक्षित भी नहीं है। असली दंडवत प्रणाम तो उन लाल सलामी वीरों को है जो बॉलीवुड के इन कुकृतियों का समर्थन करके इसकी व्याख्या देते हुए, इंटरनेट पर ज्ञानी बनने की होड़ में चले आते हैं।

ये दर्शकों को एक सड़े-गले प्लॉट के अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाने के प्रयास करते हैं, कभी डायरेक्टर का नज़रिया तो कभी एक्टिंग जैसे शब्दों का प्रयोग कर फिल्म के प्लॉट की असली धूर्तता को छिपाने में अपनी पूरी शक्ति व बुद्धि झोंक देते हैं।

3 घंटे की कबीर सिंह का आँकलन एक थप्पड़ के शॉट से और तान्हाजी जैसे महान योद्धा की बायोपिक को केवल एक संवाद के चलते ‘इस्लामोफोबिक’ और ‘कट्टर हिंदू फिल्म’ बताने वाले यही कथित फिल्म क्रिटिक, सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट से ‘The End’ तक का फ्रेम स्क्रीन पर आने तक केवल अजेंडा से भरी फिल्मों में दृष्टिकोण, नज़रिया, एक्टिंग, प्लॉट जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए जनता को मूर्ख समझने की असफल प्रयास करते हैं।

वैसे बॉलीवुड में इस तरह अजेंडा मिश्रित फिल्मों के निर्माण की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। 70 के दशक से ही सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे लेखक अपनी ज़हरीली स्क्रिप्टों में हल्के-हल्के अपनी हिंदू घृणा और समुदाय विशेष के प्रति प्रेम का तड़का लगाते ही रहे हैं।

फिर चाहे एक नास्तिक, मंदिर में शिव की प्रतिमा के आगे खड़े युवक को 786 के बिल्ले के प्रति सहानुभूति और आस्था रखते हुए दिखाना हो या गाँव पर तीन-चार बेटे वार देने के बाद करने वाले दयालु उदार रहीम चाचा।

पी.के (2014) 

इस दशकों से चले आ रहे रिवाज़ का केवल प्रारूप बदला है, निशाना नहीं। वर्ष 2021 में आने वाली फ़िल्म रावण-लीला की असली कहानी अजेंडा से भरी है या नहीं, यह तो फिल्म रिलीज़ के उपरांत ही पता चलेगा, परंतु हाल ही में आया ‘रावण-लीला’ का ट्रेलर एक बार पुनः विवाद उत्पन्न करने के लिए तैयार है। यह कहना भी पूर्णतः गलत न होगा कि इन दिनों जानबूझकर ट्रेलर टीज़र के माध्यम से विवाद खड़े कर फिल्मों के मुफ्त प्रमोशन की तकनीक भी धड़ल्ले से चल रही है।

ट्रेलर से फिल्म के प्लॉट का जो अंदाज़ा लगाया जा सकता है वह यह है कि रामलीला में रावण और सीता की भूमिका अदा करने वाले पात्र अपने निजी जीवन में एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। इसके चारों ओर पूरी कहानी गढ़ कर समाज को इस प्रथा का विरोध करते दर्शाया गया है, परंतु अधिक प्रश्न खड़े तब होते हैं कि जब निजी जीवन में किया गया यह प्रेम फिल्म के पात्र पर इतना हावी हो जाता है कि वह रावण जैसे राक्षस की वकालत करते हुए उसके समर्थन में तर्क प्रस्तुत करने लगता है।


एक दृश्य में यह पात्र सवाल उठाता देखा जा सकता है कि राम ने रावण की बहन का निरादर किया, जिसके प्रतिकार में रावण ने राम की पत्नी का निरादर किया तो, दुनिया रावण को गलत राम को सही क्यों मानती है?

इतिहास के साथ खिलवाड़ करना हमारे देश के वामपंथियों की पुरानी नीति रही है। इस प्रकार के कुतर्की प्रश्न वामपंथी हर हिंदू त्योहार पर खड़े करते हैं, जैसे होलिका को ‘दलित’ होने के कारण जलाना, रक्षाबंधन का पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और दशहरे पर रावण को सही और राम को दोषी करार देना।

बुद्धि पर ताला लगाए जी रहे इन मूर्खशिरोमणियों को यह समझना आवश्यक है कि रावण को एक नकारात्मक दृष्टिकोण से केवल सीता का अपहरण करने के लिए नहीं अपितु अन्य कई कारणों से भी देखा जाता है। फिर चाहे वह ऋषि-मुनियों पर किए गए अत्याचार हों, अपने ज्ञान का अहंकार हो या विभिन्न स्रोतों से मिले तथ्य कि वह मानव एक बलात्कारी भी था। माँ सीता के अपहरण के कृत्य ने तो इस राक्षस के पापों के घड़े को भरने में अंतिम बूँद का कार्य किया था।

वामपंथियों से सीखने लायक गुण यह है कि ये लोग ‘जूते पड़ें हज़ार तमाशा घुस कर देखेंगे’ नामक कहावत को चरितार्थ करते हैं। इसे भले ही बेशर्मी कहा जाए या कर्मठता, वामपंथी अपना अजेंडा थोपने से कभी बाज़ नहीं आते।

जब देश की जनता ने त्योहारों पर चलाए जाने वाली इनकी  मूर्खतापूर्ण बकवास को काटने के साथ साथ लेनिन की तमाम अवैध औलादों का बहिष्कार भी प्रारंभ कर दिया तो अब ये लोग सिनेमा और कला जैसे स्रोतों के माध्यम से सॉफ्टकोर तरीके से हिंदुओं के देवी-देवताओं और धार्मिक ग्रंथों के साथ छेड़छाड़ पर उतर आए।

सिनेमा इत्यादि अजेंडा को धकेलने में एक कैटलिस्ट (Catalyst) का काम इस कारण भी करते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में फँसने पर आर्टिस्टिक फ्रीडम, लिबर्टी जैसे शब्दों का प्रयोग इन वामी लम्पटों का बचाव कर देते हैं। 

तांडव (2021)

पाताल लोक (2020)

यह बात तो साफ है कि ‘रावण-लीला’ के प्लॉट में भी मंकी बैलेंसिंग के लिए कोई न कोई सकारात्मक मोड़ अवश्य दिया जाएगा, परंतु अब लोगों को बॉलीवुड में बन चुके इस प्रकार के पैटर्न को समझने और उस पर तार्किक सवाल करने की आवश्यकता है।

जनता को स्वयं को क्यूब्रिक और हिचकॉक की औलादें कहने वाले इन कथित डायरेक्टरों और प्रोड्यूसरों पर इन सवालों के बाण मारते रहना होगा कि जब धार्मिक एंगल को भी प्लॉट के समानांतर लेकर चलते हुए और बिना किसी अजेंडा या धर्म को नकारात्मक दृष्टि में दिखाने के बाद भी ‘बाहुबली’ जैसी फ़िल्में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता की चरम ऊँचाइयों को छू सकती हैं तो हर बार इस उर्दू फिल्म इंडस्ट्री को ही अपनी फिल्में चलाने के लिए इस प्रकार के तुच्छ प्रयोगों की आवश्यकता क्यों पड़ जाती है?



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