कैसे कर लेते हो रवीश? विजयन कुछ देता है का?

10 सितम्बर, 2021 By: अजीत भारती
रवीश कुमार केरल मॉडल के प्रेम से 'मूव ऑन' नहीं कर पा रहे हैं

भारत जानता है, भारत की जनता जानती है, ट्विटर जानता है, फेसबुक जानता है, केरल जानता है, केरल के बीमार लोग जानते हैं, उनके परिजन जानते हैं, केरल का मुख्यमंत्री विजयन जानता है, लेकिन रवीश कुमार और उनका गिरोह नहीं जानता कि भारत में कोरोना के कुल मामलों में लगभग 70% केरल से आ रहे हैं।

8 सितंबर को जहाँ भारत में कुल 43,263 मामले आए, अकेले केरल में 30,196 मामले आए। भारत में हुई कुल 338 मौतों में, केरल से इसी दिन 181 आए। केरल का वर्तमान औसत प्रतिदिन 149 लोगों का है, लेकिन रवीश और उनका गिरोह इस पर लिंक शेयर करता दिख रहा है कि यूपी में डेंगू फैल गया है और देखिए लोगों को बुखार लग रहा है, जबकि सरकार तो दावा कर रही थी कि उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार ला दिया है। इस रवीशियापा पर आगे चर्चा करेंगे, पहले केरल मॉडल को समझ लेते हैं।

केरल का एक मॉडल था, जिस पर भारत के सम्मानित दुग्गल साहबों और उनके सरबेटों ने किताब लिखी थी। कुछ लोगों ने विजयन चालीसा पढ़ी थी, और बाकी लोग विजयन को अवतारपुरुष बता रहे थे। केरल ने ही भारत को कोरोना का पहला मामला दिया था, और केरल ही एक ऐसा प्रदेश है, जो महाराष्ट्र के ‘तेरा भाई यूटी’ के साथ लगातार कोरोना का सम्मान किए जा रहा है।

रामायण में हनुमान जी पर जब मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया तो हनुमान जी ने सोचा कि अगर वो इससे नहीं बँधते हैं, तो ब्रह्मा जी के इस अस्त्र का अपमान हो जाएगा, तो सम्मान करने हेतु, वो बँध जाते हैं। वैसे ही, केरल के पास मॉडल तो है, और सबसे शिक्षित प्रदेश होने के कारण ज्ञान की कमी भी नहीं, इससे भी ऊपर बात यह है कि वो वामपंथी हैं तो देश में किसी भी चीज में वो नीचे कैसे रह सकते हैं, प्रोग्रेसिव लोग हमेशा प्रोग्रेस करते रहते हैं।

अतः, अपने ही वैचारिक पिता शी जिनपिंग के इस कोरोनास्त्र का सम्मान करने के लिए विजयन जी झुक कर बैठ गए और आगे का आपको पता ही है। विजयन साहब मामूली आदमी नहीं हैं, घाघ कम्यूनिष्ट हैं। उनके ही पार्टी के पूर्व सांसद, एपी अब्दुलकुट्टी जी ने बताया था कि कैसे पिन्नाराई विजयन साहब को बंगाल के कम्यूनिष्टों से बड़ा ही स्नेह था और उनके द्वारा अपने शत्रुओं को ‘किडनैप करने और जीवित ही गहरे गड्ढे में नमक की एक बोरी के साथ दफनाने’ की प्रक्रिया से कितने प्रभावित थे।

विजयन जी ने अपने कार्यकर्ताओं को कहा था कि वो मॉडल सही मॉडल है। कमाल की बात यह है कि इस मॉडल की विहंगम व्याख्या विजयन साहब ने तब की थी जब वो थोड़ी ही देर बाद जिला कलेक्टर द्वारा एक शांति सभा में आमंत्रित किए गए थे। तो विजयन साहब दूरदृष्टि वाले व्यक्ति तो हैं, जिन्हें मॉडलों से बड़ा ही प्रेम है। अब आप कहेंगे कि प्रातःस्मरणीय श्री अजीत भारती जी ब्रो, केरल मॉडल तो चला ही नहीं, फिर भी आप विजयन की बड़ाई करते थक नहीं रहे।

देखिए, ऐसा है कि किसी भी मॉडल को टेस्ट करने के लिए आपके पास आँकड़े चाहिए। आप ही बताइए कि यूपी टाइप 31 जिले कोविड मुक्त हो जाएँ और 64 में शून्य मामले आ रहे हों, तो कैसे होगी टेस्टिंग केरल मॉडल की? यूपी की जनसंख्या 24.1 करोड़ है, और केरल की 3.58 करोड़।

यानी, यूपी जनसंख्या के मामले में केरल से लगभग सात गुणा बड़ा है और कोरोना के मामले केरल यूपी से 141 गुणा आगे चल रहा है। सुशिक्षित केरल भारत को अपनी तरफ से 70% मामले दे रहा है, वहीं बर्बाद यूपी 0.49% पर अटका हुआ है।

शर्म की बात है, यूपी के लिए कि किसी दूसरे राज्य की छवि बर्बाद करने के लिए उसने अपने लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देनी शुरू कर दी है। भाजपा वाले कम्यूनिस्टों को नीचा दिखाने के लिए सत्तर साल से बर्बाद स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधार देंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी। क्या यही हैं अच्छे दिन? क्या इसी तरह की ईर्ष्या से चलेंगे योगी महाराज कि विजयन जी को अपना नाम पराजयन करना पड़े! वाह मोदी जी, वाह!

मैं आपको अब वैज्ञानिकता से भरी बात बताता हूँ कि केरल में हो क्या रहा है। जैसा कि मैंने कहा कि आँकड़े होंगे तभी किसी मॉडल की जाँच की जा सकती है। जैसे कि 36-24-36 एक आँकड़ा होता है, जबकि मेरी निजी पसंद की बात की जाए तो मैं अखंड सिंगल होने के कारण 36-32-36 पर भी कॉम्प्रोमाइज कर लेता हूँ। खैर एक सामाजिक वीडियो में अपना दुख क्या सुनाना!

तो, कहने का तात्पर्य यह है कि केरल ने अपने मॉडल की सफलता दर नापने के लिए आँकड़े बढ़ाने शुरु किए। ज्यादा लोग बीमार होंगे तभी तो हर गली, नुक्कड़, नारियल पानी की दुकान आदि पर सरकार के लोग मॉडल में कही गई बातें अप्लाय कर पाएँगे, इसीलिए दिल्ली के मोमोज की दुकानों और बिहार के दीवाना पान भंडार और आशिक हेयर कटिंग सैलून की दुकानों की तरह केरल में ‘विजयन कोराना भंडार’ खोले गए कि पहले आइए, पहले पाइए और अपने राज्य के मॉडल के लिए योगदान कीजिए।

वैसे भी, मोदी जी के आने के बाद युद्ध और आतंकी घटनाएँ, दोनों में ही कमी आ गई है तो लोग असामयिक मृत्यु का औसत गिरता जा रहा था। बीच में प्रयागराज के तट पर खड़े हो कर बरखा दत्त से ले कर लाशों की तस्वीर बेच कर घर चलाने वाले कुछ पत्रकारों ने उस औसत को जबरन बढ़ाने की कोशिश की जब गंगा किनारे के शवों को कोरोना से ग्रस्त बताने लगे। लेकिन, वो प्रोपेगेंडा टिक नहीं सका।

ऐसे में वामपंथियों ने सोचा होगा कि भारत का नाम कोरोना से मरने वालों की संख्या देने में पीछा नहीं रहना चाहिए, तो उन्होंने केरल में अपनी सरकार होने के कारण इस महान कार्य में योगदान देने को कहा, वरना केरल में कोरोना तो बॉर्डर पर से वकांडा वाले शील्ड से टकरा कर मर जाता।

दूसरी लहर तो आई और चली गई। भारत की बहुत थू-थू हुई। जो हमारी चिताओं को दिखा कर नाच रहे थे, वो अब तीसरी लहर झेल रहे हैं, और उनके अस्पतालों में ऑक्सीजन और बेड नहीं मिल रहे। लेकिन हाँ, यहाँ के वामपंथी और रवीशिया गैंग साँस थामे इस प्रतीक्षा में बैठे हुए हैं कि तीसरी लहर कब आएगी।

इस गिरोह के सदस्य पहली लहर के समय ही रैंडम लोगों को वायरस मामलों के जानकार बता कर भारत में साठ करोड़ लोगों के संक्रमित होने की बातें कर रहे थे, लेकिन वो हुआ नहीं। दूसरी लहर के आँकड़ों पर ये अभी भी संदेह करते हैं और न्यूयॉर्क टाइम्स के दफ्तर में बैठे किसी लम्पट के लिखे लेख को, जिसका आधार सिर्फ यह है कि लिखने वाला फिरंगी है, और हम भारतीय, उसे सच मान कर यहाँ चालीस लाख लोगों के मरने की बातें की जा रही हैं।

अगर आपको लगता है कि भाजपा सरकार ने मामले छुपा लिए तो फिर गैरभाजपा शासित प्रदेशों के आँकड़े कहाँ गए? मतलब, मोदी तो झूठ बोल ही रहा है लेकिन उसी कोरोना पर मोदी को घेरने वाले कॉन्ग्रेस और अन्य पार्टियाँ भी झूठ ही बोल रही हैं, परंतु, न्यूयॉर्क टाइम्स वाला फिंरगी जो है, सच बोल रहा है।

तीसरी लहर आ नहीं रही तो रवीश बेचारा अपने टाइम लाइन पर ‘चीनी में तेजी, जीरा लुढका’ टाइप की खबरों से ले कर ‘फलाँ जगह सड़क में गड्ढा हो गया’ पोस्ट कर के यह बता रहा है कि देश में सब खराब चल रहा है।

बीच-बीच में वीडियो में भी आता है और कहता है कि इतिहास जब लिखा जाएगा और उसको जब लोग पढ़ेंगे तब जब पन्ने उलटे जाएँगे तो लोगों को मिलेगा… ऐ बाही! बस कर बाही! इतिहास, दस्तावेज, पन्ने, पलटे, स्कोडा, लहसुन… कोई पन्ना नहीं पलटता, तूने पलटा क्या आज तक?

जिन लोगों ने देश को बर्बाद किया आज तू उसे प्राइवेट लैपडांस दे रहा है, तो जब माज़ी के सफ़ों को पलटने वाले उँगलियों में थूक लगा कर तेरा नाम खोजेंगे कि तू क्या कर रहा था ऐसे दौर में तब उन्हें यह भी तो दिखेगा कि तुझसे पोलडांस की उम्मीद की जा रही थी और तू अपने मन से ही ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ कहते हुए लैपडांस करने लगा था कि तेरी पैंटीज़ की रबड़ में गुलाबी नोट घुसेड़ दिए जाएँ। इतिहास के पन्नों में ये रंगारंग कार्यक्रम भी तो दर्ज होगा ब्रो!

मैंने सोचा कि केरल में हाल बुरे हैं, बकरीद के बाद से 9000/दिन के आँकड़े, जो वैसे भी भारत में सर्वाधिक थे, लगातार 24-30000 जाने लगे, तो रवीश ने कुछ तो लिखा ही होगा। मैंने बहुत खोजा, नहीं मिला। इसी खोजने के क्रम में मुझे यह मिला कि रवीश जी योगी आदित्यनाथ के राज्य में ‘चरमराई हुई स्वास्थ्य व्यवस्था’ पर लोकल अखबारों के भीतरी पन्नों की रिपोर्ट के स्क्रीनशॉट लगा रहे हैं कि देखो जी लोगों को बुखार लग गया है और कहा जा रहा है कि योगी ने तो सब सही कर दिया।

इस धूर्त आदमी के तर्क देखिए कि योगी की तारीफ कोरोना को थामने को ले कर हो रही है, लेकिन रवीश ने उसको मानने से सिर्फ इनकार ही नहीं किया, वो इतना गिर गया है कि वो यह कह रहा है कि ‘अगर योगी ने इतना अच्छा काम कर दिया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार हो गया तो लोगों को बुखार क्यों हो रहा है? इसकी गहराई समझते हैं आप?’

मतलब, कल को कोई आदमी रवीश जी को यह लिख दे कि रवीश जी, कल मैंने भोज में तली हुई पूड़िया ज्यादा खा ली, और सुबह से लगातार पाकिस्तान में बम गिराते ही जा रहा हूँ, तो रवीश फेसबुक पर यह लिख देगा: “स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को सुधारने वाले योगी के राज्य में लूज मोशन लगे हुए हैं युवाओं को…”

एक तर्क यह भी दिया जाता है कि केरल ने आँकड़े नहीं छुपाए कभी। बाकी के राज्य छुपा रहे हैं। तो भाई मेरे, बाकी के राज्यों में क्या यूपी ही एक राज्य है? या उनमें पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान भी आते हैं? तो कभी उनके ऊपर ही लिख दिया करो।

यूपी में तो मैं लगातार घूम रहा हूँ और दिख रहा है कि लोग सामान्य रूप से अपने काम कर रहे हैं, न कोई पैनिक है, न अस्पतालों के बाहर कोई भीड़… इन्हें यह नहीं देखना कि तुमने जिस मॉडल की शान में गजलें गाईं थी, वो वस्तुतः कोठे पर घुँघरु पहन कर नाचने वाली औरत थी और तुम पान मुँह में भकोसे, दलालों की तरह पैसे ले कर साइड में बैठने वाले वैसे आदमी हो जिसे नाचने वाली भी गरियाती है, कोठे की मौसी भी, और नाच देखने आए हुए बाकी लोग भी।

रवीश ने यह तो शेयर किया कि फिरोजाबाद में 75 लोगों की जान गई, लेकिन वो केरल में हर दिन औसतन 149 लोगों के मरने की बात पर आज तक कभी कुछ नहीं लिख पाया है। उसे लखनऊ में बुखार के 270 और मरीजों के अस्पताल पहुँचने की खबर में बहुत रुचि है जिनमें उस दिन सिर्फ तीन नए डेंगू मरीज हैं, लेकिन केरल में हर दिन तीस हजार लोगों के अस्पताल में पहुँचने की बात में कोई रुचि नहीं है।

उसे इस बात में रुचि नहीं है कि यूपी के कुल 75 जिलों में से 31 कोरोना मुक्त हैं, 64 में नए मरीजों की संख्या शून्य है लेकिन हाँ लोगों को बुखार क्यों हो रहा है, अस्पताल में इकने लोग क्यों पहुँच रहे हैं।

वस्तुतः, रवीश के तर्क से चलें तो उत्तर प्रदेश, कोई और प्रदेश नहीं, उत्तर प्रदेश ने अगर यह क्लेम किया हो कि कोरोना को ले कर स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हुआ है, तो वहाँ न तो कोई मरना चाहिए, न किसी को बुखार हो, न किसी को खेलते समय चोट लगे, न कोई गैस छोड़े… मतलब एकदम सब-कुछ टनाटन हो जाए।

रवीश के कुतर्कों के आलोक में तीसरी लहर से जूझते अमेरिका की स्वास्थ्य व्यवस्था तो टट्टी है… सॉरी, सॉरी, सॉरी… अमेरिका उत्तर प्रदेश में थोड़े ही है, वहाँ लोग मर रहे हैं तब भी वो फर्स्ट क्लास जगह है और कोरोना के मामले में गजब का काम कर रहे हैं।

मुझे ये समझ में नहीं आता कि ये लोग किस जमाने में हैं? सिर्फ टीवी का जमाना रहता जहाँ ये लोग शाम में आ कर कुछ पढ़ देते और हम मान लेते, तो और बात थी लेकिन इंटरनेट के दौर में, जहाँ हर दिन कोरोना के आँकड़े आते हैं, हर आदमी शेयर करता है, तब भी रवीश केरल पर चुप रह कर, यूपी में तीनी कैसे महँगी हो गई, इस पर बात करता है, तो इसकी हिम्मत, आत्मा को किस्तों में बेचने की प्रवृत्ति और इसके लम्पट प्रशंसकों पर ताज्जुब होता है कि ये लोग किस डायमेंशन में रह रहे हैं!

जिस भीड़ को ले कर रवीश और उसका गैंग रैलियों के समय और हिन्दू त्योहारों के समय चिंतित होता रहता है, वही रवीश किसान आंदोलन की महानौटंकी पर स्खलित होता दिखता है कि आहाहा, क्या भीड़ है… अबे भीड़ है, अंग्रेजी ऑर्जी या जापानी बुक्काकी नहीं चल रही है कि तुमसे कंट्रोल नहीं हो पा रहा है। पता नहीं विजयन ने क्या दे रखा है हाथों में, या मुँह में भी संभवतः, कि न लिख पा रहे हैं, न बोल पा रहे हैं।



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