व्यंग्य: मुगलों-बौद्धों से पहले 'अन्नदाताओं' ने मना ली थी पराली जला कर 'मीनिंगफुल' दिवाली

05 नवम्बर, 2021 By: पुलकित त्यागी
दीपावली पर चलाए जाने वाले वोक और वामियों के नाकाम अजेंडा का एक और वर्ष

दोस्तों बड़ी पीड़ा के साथ सर्वसाधारण को सूचित करना पड़ रहा है कि इस वर्ष फिर कुछ जालिम हिंदुओं ने न मी-लॉर्ड्स के आदेशों की परवाह की, न अनुष्का के कुत्ते की और न ही प्रियंका की साँसों की और साँस में तेरी साँस मिली तो मुझे बास आई के गाने की हर बीट पर एक के बाद एक रॉकेट आकाश में दागते चले गए। इस गाने में शायद यह सारे हिंदू उसी बास का जिक्र कर रहे थे जो निक जीजू की आलीशान नाव पर एक के बाद एक सिगार सुलगाने के बाद जो मिस्टर जोनास के मुँह से आती है।

अब इस पर कई लोग कहेंगे कि तुझ जैसे ‘हायपर टॉक्सिक मेल’ जब सिगरेट पी सकते हैं तो कोई महिला क्यों नहीं? महिला सिगरेट पिएगी तो क्या ही हो जाएगा। मैं इन सबको बड़ी विनम्रता के साथ बताना चाहता हूँ कि महिला को भी सिगरेट पीने से वही होगा जो कि मुझे, यानी कैंसर। मेरे होने न होने पर शक हो सकता है परंतु कैंसर पूरी तरह जेंडर न्यूट्रल होता है।


इस बार ट्विटर पर क्रांतिकारी मोर्चा नई इंटर्न्स को सौंपा गया। चिकन और मटन की शौकीन दिशा पाटनी ने अपनी IQ के अनुसार ही एक GIF ढूंढ कर ट्विटर पर दिवाली की शुभकामनाओं के साथ-साथ जानवरों पर दया भाव दिखाने का सन्देश देते हुए साझा किया।

इस पर लोग दिशा से इस GIF का दिवाली के साथ लॉजिक पूछने लगे। अरे भाई जिस इंसान ने अपने जीवन में मलंग, बाघी और राधे जैसी फिल्में चुनी हों उसकी बातों में आप लॉजिक तलाश कर, उसकी नहीं अपनी ही तौहीन कर रहे हैं।

मुझे दिशा से कोई शिकायत नहीं है, मेरा केवल इतना कहना है कि दिशा के जीवन की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि धोनी की बायोपिक है, और दिशा की हरकतों को देखते हुए मुझे अब शक हो रहा है कि वो फिल्म माही के व्यक्तित्व और सुशांत की अदाकारी से ज़्यादा शायद इस कारण हिट हुई क्योंकि उसमे दिशा का किरदार आधी फिल्म में ही मर जाता है।

लोगों का तो यहाँ तक कहना था कि इस फ़िल्म में जान ही वहाँ से आई जहाँ से दिशा पाटनी फ़िल्म में दोबारा दिखाई नहीं देतीं। #पनौती अलर्ट 


बाकी मुझे क्या, मैं तो केल्विन क्लीन पहनता भी नहीं हूँ, मेरी फेवरेट तो आज भी रूपा है। पनौती से याद आया इस बार अनुष्का दीदी ने कोई भारी क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया और कारण सबको पता है।

बेचारी बस बैठे-बैठे कुढ़ रही हैं कि ‘मार भी तो नहीं सकती प्यार जो करता है मुझसे’। उन्होंने बेशक कोई कदम नहीं उठाया हो पर मैंने उठाया।

परी और फिलौरी की टिकट के लिए दिए गए एक-एक रुपए की कसम अनुष्का, मैंने तो रोकने की बहुत कोशिश की थी। नहीं नहीं मोहल्ले के लौंडो को नहीं, हमारे मोहल्ले के कुत्ते जैंगो को। But As You Know, Django is a Free Nibba. Just like Mr Virat…. वो भी किसी की नहीं सुनता और मुझसे पहले वह पटाखे छुड़ाने मोहल्ले में निकल गया, तो इस बार कुत्ता लॉजिक तो फ़ेल हो गया अनु।

इस बेचारे मूर्ख जैंगो को यह तक नहीं पता कि दिवाली तो हिंदुओं का त्यौहार है ही नहीं। जेएनयू की पीएचडी स्कॉलर ने यह बता दिया है कि दीवाली वह नहीं है जो आप सोचते हैं। दिवाली असल में ‘दीपदान उत्सव’ है, जो कि एक बौद्धों का त्यौहार है।

बाकी तो जेएनयू के पीएचडी वाले ज़्यादा जानते ही होंगे कि बौद्ध हिंदू थोड़ी होते हैं बौद्ध तो मिस्र के पिरामिड से निकलकर सीधे ऊँट पर बैठकर भारत आए थे। माफ कीजिएगा, ऊँट में बैठकर तो कोई और आए थे, पर जाने देते हैं क्योंकि त्योहारों के शुभ अवसर पर उनकी बात नहीं करेंगे।

तो गुप्ता जी के ‘दी प्रिंट’ के अनुसार दिवाली असल में इसलिए मनाई जाती है कि इस दिन सम्राट अशोक द्वारा 84,000 स्तूपों का निर्माण पूर्ण किया गया था और इसी कारण सम्राट अशोक ने इस कार्तिक अमावस्या के दिन को ‘दीपदान उत्सव’ के रूप में मनाया था।


अब आप कहेंगे, तो क्या फर्क पड़ता है क्या एक ही तिथि पर दो महत्वपूर्ण चीजें नहीं हो सकती। अरे इतना लॉजिक अगर वामी लगा पाते तो नरकीय मार्क्स के फॉलोअर होते क्या?

इनके लॉजिक के हिसाब से अगर आपका और आपकी माँ का जन्मदिन एक ही तिथि पर नहीं पड़ सकता, और अगर गलती से पड़ जाए तो आप घर में बनने वाले पकवानों को खाने से पहले माँ से ये सवाल करें कि पहले क्लियर करो यह जो भटूरे छन रहे हैं ये आपके बर्थडे के नाम के हैं या मेरे। इस सवाल के जवाब से पहले मई भठूरे को हाथ तक नहीं लगाऊँगा। इस तरह के सवाल करने वाला बच्चा घर में अक्सर पकवान नहीं केवल लात खाता है।

क्या बौद्ध, हिंदू धर्म से ही निकली एक शाखा नहीं है? क्या अशोक जिस परिवार में पैदा हुए, सम्राट बने वह परिवार हिंदू नहीं था? सबसे जरूरी सवाल क्या ये सारे तथ्य इन प्यारे लिबरपंथियों को पता नहीं हैं?

पता हैं, सब पता हैं। पर सच्चाई यह है कि जब कुत्ता लॉजिक, पर्यावरण लॉजिक और अंत में महामहिम का ब्रह्मास्त्र भी लोगों को अपना त्योहार मनाने से नहीं रोक पाते तो अब यह बौखलाए वामपंथी हर वर्ष अपनी टकसाल से कुछ नया-नया लाने का प्रयास करते रहते हैं और कसम सम्राट अशोक की तलवार की हर बार निरंतर विफल हो रहे हैं और होते रहेंगे।

कभी मुगल मंदिर बनवाते थे, कभी दिवाली बौद्ध धर्म का त्योहार है, अगर इसी गति से चलते रहे तो कुछ वर्षों या दशकों में वह दिन भी दूर नहीं कि जब ये गधे के पिस्सू लोगों को अपना त्योहार मनाने और पटाखे चलाने से नहीं रोक पाएँगे तो हार कर दिल्ली-एनसीआर के कुछ कथित एंटर मार लेखक-लेखिकाएँ ये तक लिख डालेंगे कि दिवाली पर पटाखे चलाने का तो कोई रीति रिवाज ही नहीं हैं, ये असल में दिवाली अन्नदाताओं का त्योहार है और वे इस मौके पर पराली जला कर दिवाली से महीना भर पहले ही दिल्ली-एनसीआर की हवाओं में क्रांतिकारी मिठास घोल दिया करते हैं।

पराली से याद आया इस बार पराली का धुआँ दिल्ली कैसे पहुँच गया वो भी दिवाली से एक महीने पहले, जबकि उत्तर भारत के सारे कथित किसान तो सिंघु बॉर्डर पर धरने पर बैठे हैं। मेरे शक की सुई खड़ी हो ही रही थी कि मेरे एक सुपरमैन शेरलॉक सिसोदिया नामक आम आदमी पार्टी के आईटी सेल में काम करने वाले मित्र ने मुझे अंदर की बात बताई।

पंजाब-हरियाणा के किसान पराली नहीं जलाते थे। असल में भगवंत मान कुछ मनमोहक पदार्थों का सेवन करने के बाद आम आदमी पार्टी के मेनिफेस्टो को आग लगा दिया करते थे, ताकि एक तीर से दो निशाने मारे जा सकें। पंजाब के लोगों को कह दिया जाएगा कि सारे मेनिफेस्टो तो जल गए। अब कैसे वादे और काहे की मुफ्त बिजली।


बाकी दिल्ली वालों का ‘काटना’ कितना ही कठिन है। केजरीवाल खड़े होकर कह देंगे- “देखो जी धुँआ दिख रहा है किसान पराली जला रहा है, प्लीज तुम तो पटाखे मत छोड़ो। कम से कम राघव चड्ढा के क्यूट गालों पर रहम खाओ। तुम्हारे प्रदूषण के चक्कर में उसका स्किन टोन बिगड़ जाता है। फिर दो महीना फेयर-एंड-लवली घिस घिस कर क्रिसमस की पार्टी के लिए तैयार होना पड़ता है।”

पर इस बार दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे देश ने इन सभी थ्योरीज को नकारते हुए सीधे सवाल किए कि चलो भगवंत मान पर तो पदार्थों के सेवन का इल्जाम लगा दोगे, परंतु गुजरात में तो ऐसे सभी पदार्थ बैन हैं। तो फिर कुछ लोग किस मदहोशी में हैं और क्यों हर वर्ष एक इंजीनियरिंग प्रथम वर्ष के छात्र की तरह 4 वर्षों से चौथे साल में अटके सीनियर रूपी मी-लॉर्ड्स के‌ हर निर्णय पर ‘यस सर यस सर’ कहते हुए इनकी बकवास को मानने का आदेश दे देते हैं?

इस बार देश की जनता ने न पराली लॉजिक सुना, न मी-लॉर्ड्स का लॉ, और मोमबत्ती की एक एक लॉ से लॉ जलाई और रॉकेटों की सुर्रियों से वो लॉ छुलाई है कि रॉकेट आसमान में जाकर फटे और लॉ कहीं और लगे। देशभर समेत दिल्ली-एनसीआर वालों ने भी आसमान के साथ-साथ मी-लॉर्ड्स के घरों के इलाके भी धुआँ-धुआँ कर डाले।

कई ज़ालिमों ने तो असलियत से ज्यादा सोशल मीडिया पर भी आतिशबाजी का दौर जारी रखा। पटाखे ये लोग घरों में जला रहे थे, परंतु धुआँ ट्विटर और फेसबुक पर एक खास धड़े के एक खास अंग से निकलता देखा जा सकता था। 

भारतीय तो भारतीय NRI तो भारतीयों से चार हाथ आगे निकले और न्यूयॉर्क के हडसन नदी पर भी भीषण आतिशबाजी का नज़ारा देखा गया। बेचारी प्रियंका, निक की गोद में पड़ी-पड़ी चीखती रह गई कि मेरी साँस जा रही है, मेरी साँस जा रही है.. और ये ज़ालिम NRI इतने के बाद भी देसी गर्ल को ट्रोल करते हुए कहते रहे कि अभी तो बस साँस जा रही है तुमने अपनी बकरचिट्टियाँ बंद नहीं की तो तुम्हारा ससुर भी जाएगा।

भारतीयों ने भी मना ली, अमेरिकनों ने भी मना ली, ब्रिटेन वालों तक ने शुभकामनाएँ भेज दीं और तो और UFC के कथित नोटोरियस लोगों तक की ओर से बधाई संदेश आ गए।


अबे सालों…. माफ कीजिएगा मेरा मतलब है बॉलीवुड वालों, इनसे ही कुछ सीख लो। हमें पता है कि इन्हें भारत में बस 130 करोड़ का मार्केट दिखाई देता है और इन्हें केवल अपनी टिकटें बेचनी हैं। पर बेचनी तो तुम्हें भी वही हैं।

तो क्यों न कायदे और फायदे दोनों में रहा करो और शराफत का दामन थामते हुए प्यार-प्रेम से धंधा करो। त्योहारों को त्योहारों की तरह लिया करो और केवल शुभकामनाएँ दिया करो, ज्ञान नहीं। क्योंकि ज्ञान हमारा अपना नहीं सँभल पा रहा है।

धन्यवाद। शुभ दीपावली।



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