प्रधान सेवक के 7 साल: हिंदुत्व के विषय पर कैसी रही ‘हिंदूवादी सरकार’ की रिपोर्ट

19 मई, 2021 By: मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
पिछले 07 साल में 'हिंदुत्व और नरेंद्र मोदी' कितने दूर और कितने पास रहे?

16 मई, 2014 का दिन भाजपा ही नहीं, पूरे देश के लिए ऐतिहासिक था। नरेंद्र मोदी की जीत तो लगभग तय थी। लेकिन यह इतनी बम्पर होगी, ऐसा उनके कुछ करीबी सहयोगियों के अतिरिक्त समर्थकों ने भी शायद ही सोचा होगा। संसद में 206 सीटों से 44 पर सिमटने वाली कॉन्ग्रेस उस सदमे से 7 साल बाद भी उबरने को तरस रही है।

यह जीत इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर को भुनाते हुए राजीव गाँधी की 400 सीटों की जीत के बाद आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतक जीत थी। फिर इस जीत का रिकॉर्ड भी खुद मोदी ने ही 5 साल बाद आज ही के दिन तोड़ा।

आज भले ही नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी वर्ष 2014 और वर्ष 2019 की प्रचंड विजयों का श्रेय ‘विकास’ के नारे को देते नहीं थकते हों, लेकिन अपने दिल में यह सच्च्चाई खुद आईटी सेल के ‘प्रधान सेवक’ भी जानते हैं कि जनता ने वोट मूलतः हिंदुत्व के ही लिए दिया था। वही हिंदुत्व, जो भाजपा की स्थापना के पहले से आरएसएस से जुड़े रहे हर राजनीतिक संगठन का मूल मन्त्र रहा है।

खुद मोदी को मीडिया के ‘गुजरात का हत्यारा’ वाले प्रॉपगैंडा ने ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ का ऐसा कवच दे दिया था, जिसे भेदने के लिए कॉन्ग्रेस और मीडिया को मानना पड़ता है कि 12 साल तक उन्होंने गुजरात के बारे में ज़हर और झूठ की खेती की थी। विकास और भ्रष्टाचार-उन्मूलन तो जनता ने, खासकर कि भाजपा के कोर वोटर ने, भाजपा के हिंदुत्व के पैकेज के ऊपर महज एक ‘ऐड-ऑन’ ही माना था।

फिर जनता के पास ऐसा करने के अच्छे-भले कारण भी थे। आर्थिक मामलों में तो कम-से-कम यूपीए-1 के पहले चार साल कुछ ढंग के गए थे। लेकिन हिंदुत्व और धर्म को तो सोनिया गाँधी के सत्तारोहण के साथ ही निशाने पर ले लिया गया था।

काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती को एक ऐसे मामले में आम सड़कछाप गुण्डे की तरह जेल में सड़ाने के पुरज़ोर प्रयास किए गए, जो अंततः झूठा निकला। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ हुए रोमहर्षक अत्याचारों की पूरी दास्ताँ तो साल 2019 में निकल कर आई, लेकिन 2013-14 में भी लोगों को उनके साथ हो रहे अन्याय का भान हो चुका था।

बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक श्रीराम सेतु को सोनिया गाँधी और करुणानिधि की साठ-गाँठ ने ज़मींदोज़ कर देने की लगभग तैयारी कर ली थी, ताकि तमिल ब्राह्मणों को अपमानित किया जा सके। वह तो वाजपेयी की भाजपा सरकार गिरवाने के लिए ‘गद्दार’ कहे जाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने अंतिम अवसर पर अनर्थ को थाम लिया था।

ऐसे में, पौरुष और ओजस से लबालब छवि प्रक्षेपित करते, खुद को पूरे सोशल मीडिया से योगी, सन्यासी, कर्मयोगी, दृढ़ हिन्दू कहलवा रहे नरेंद्र मोदी ने जब सत्ता कि दहलीज़ पर दस्तक दी तो लाज़मी तौर पर हिन्दुओं ने द्वारचार समेत सभी पूजाओं को परिपूर्ण करते हुए उनका राज्याभिषेक कर दिया। बताया गया कि क्योंकि वे अविवाहित हैं, तो भला सेक्युलर जमात की खाड़ी और वैटिकन की रिश्वत लेकर वे भला हिन्दुओं को किसके लिए बेच देंगे? उनके आगे पीछे तो कोई है ही नहीं!

लेकिन जब हिंदुत्ववादी धड़ा पिछले सात सालों का हिसाब-किताब करने बैठता है तो खुद को बेहद ठगा हुआ महसूस करता है। वो भी किसी और के नहीं, बल्कि स्वयं मोदी और उनके ‘राईट हैंड’ अमित शाह के हाथों।

पिछले 7 साल में राजनीतिक या प्रशासकीय तौर पर हिंदुत्व के लिए शून्य से भी कम ‘उखाड़ा’ गया है। कश्मीर में 370 भले नहीं है, लेकिन अभी भी हिन्दुओं के लिए वहाँ जाना, बसना, बहुसंख्यक बनना मुंगेरीलाल के जानलेवा सपने मात्र हैं है।

इसी स्वप्न पर सीएए-एनआरसी के लिए हिन्दुओं ने अपने अपनों की बलि वर्ष 2020 के दिल्ली-दंगों में चढ़ा दी, ताकि पाकिस्तान से जान और इज्ज़त किसी तरह बचाकर आए 30,000 हिन्दुओं को उनका हक़ मिल सके। उस सीएए-एनआरसी पर अमल तो दूर की बात, ज़िक्र भर से पार्टी प्रवक्ताओं को साँप सूँघ जाता है। न्यायपालिका समेत सरकार का हर अमला हिन्दू समाज का गला उस हद तक मरोड़ने के लिए प्रतिबद्ध रूप से आक्रामक है, जिस भी हद तक जाना समाज की चेतना और उसके प्राणों के हरण के लिए आवश्यक हो।

विधायिका में तो खुद भाजपा के निर्वाचित मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को हिन्दुओं पर आक्रामक होते हुए देखा जा सकता है। नेहरू के ‘सर्व धर्म समभाव’ कि ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीबी खिचड़ी को ही मोदी ‘सबका विश्वास’ के नाम पर बेचने की कोशिश कर रहे हैं, मीडिया में हिन्दू-घृणा की मानसिकता से भरे लोग और विचारधारा ही आज भी नीति-निर्धारक पदों पर बैठे हैं।

नीति-निर्धारक चर्चा के कर्ता-धर्ता हैं, और प्रधानमंत्री और उनके मंत्री इनकी ही शाबाशी के लिए 100 करोड़ हिन्दुओं को, उनकी आस्था और उनके धर्म को हलाल कर देने के लिए उद्यत ही नहीं, उत्सुक प्रतीत होते हैं।

इस निष्ठुरता के केंद्र में बैठे हैं इस देश के दो सबसे ताकतवर व्यक्ति- मोदी, और उनके ‘राईट हैंड’ अमित शाह! यह दोनों इन सभी बहावों को नियंत्रित ही नहीं करते, बल्कि ये पत्ते खड़कते इन्हीं के आदेश से हैं। इनके पास राजनीतिक असलहे की कोई कमी नहीं है, जिसमें सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र है ‘आईटी सेल’।

इस आईटी सेल के इस्तेमाल से एक ही समय पर हिन्दू रोष को लगातार हवा भी दी जाती हैं, ताकि वोटों की खेती हो सके, और साथ ही मोदी-शाह की अकर्मण्यता और हिन्दुओं के लिए हानिकारक रवैयों का बचाव किया जा सके, उनके निशाने पर किसी और को नाहक ही घसीटा जा सके।

सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि मात्र यही इस विकल्पहीनता की रात का सबसे काला हिस्सा नहीं है; सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि जो कोई अन्य पार्टियाँ छिटपुट हिंदुत्व को समर्थन दे देतीं थीं, उन्हें भी बड़े करीने से हिंदुत्व के खेमे से बाहर का रास्ता दिखा कर हिन्दुओं को भाजपा की बपौती बना दिया गया है।

शिवसेना हिंदुत्व से पल्ला झाड़कर मराठी माणूस के नाम पर मुंबई में गुंडागर्दी के साम्राज्य में वापिस जा चुकी है, और अकाली इस ऊहापोह में हैं कि उसे पंजाब में धीरे-धीरे नेपथ्य में जाते हुए अप्रासंगिक हो जाना चाहिए या खालिस्तानियों से हाथ मिलाकर एक आखिरी मलाई काटने की ज़ोर-आजमाईश करनी चाहिए।

अन्य किसी को हिन्दुओं और हिंदुत्व में कोई दिलचस्पी न थी, न होगी। जब कॉन्ग्रेस आज की भाजपा की तरह हिन्दुओं के सर पर सवार होने के लिए बेताब थी, तब उस समय कम-से-कम प्रमुख विपक्षी पार्टी के तौर पर भाजपा को हिन्दुओं की फ़िक्र थी। आज सत्ता में वह परवाह शून्य है।

जो हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल, विहिप कॉन्ग्रेस के कुशासन में हिन्दुओं के काम आते थे, ‘लातों के भूतों’ को उन्हीं की भाषा में उस समय जवाब देते थे, जब सरकारी मशीनरी पल्ला झाड़ लेती थी, उन संगठनों को भी कमज़ोर और निष्क्रिय करने का आरोप मोदी पर ही लगता है।

कुल मिलाकर मोदी-राज में हिन्दुओं का, हिंदुत्व का कोई माई-बाप नहीं है, भाजपा भी नहीं। बंगाल में हिंसा और नृशंसता का नंगा-नाच हुआ, पूरी दुनिया ने देखा। हिन्दुओं को जानवरों से भी बुरी तरह मारा गया, अपने ही घरों और गाँवों से ‘शरणार्थी’ बन भागना पड़ा- ‘गुनाह’ केवल इतना था कि मोदी के पक्ष में और ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ मतदान किया था।

भाजपा सरकार के सिरमौर मोदी इस हत्याकाण्ड की मुख्य रचयिता ममता को उनके तीसरे शपथ ग्रहण पर बधाईयाँ दे रहे थे। उनका गृह मंत्रालय, उनके राज्यपाल ‘रिपोर्ट-रिपोर्ट’ खेलते नहीं अघा रहे थे। हर प्रकार की सत्ता और अधिकार पर बैठे हुए भी भाजपा के लोग ‘धरना’ दे रहे थे, अमित शाह के ही मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस को ‘गिरफ़्तारी’ दे रहे थे, और उस पर भी ‘कोविड नियमों का पालन करते हुए’ की चिकोटी काटते हुए।

इन हालातों में यह महती आवश्यक हो जाता है कि आज जब मोदी-2 के भारी बहुमत से लौटने की सालगिरह है, तो इनके पिछले एक साल के कार्यकाल का लेखा-जोखा किया जाए।

हाथ पर धरे हाथ ‘मौन’ मोदी

मनमोहन सिंह को उनके कायरतापूर्ण मौन के लिए कैसे पूरा देश ही ‘मौन’मोहन सिंह कह उनकी मौज लेता था, यह शायद ही कोई भूला हो! लेकिन उनसे ज़्यादा उद्दंडतापूर्वक, लज्जाजनक रूप से मुँह सिए बैठे वर्तमान प्रधानमंत्री पर तो यह उपनाम और भी अधिक फ़बता है।

हिंदुत्व के मुद्दों पर उनके स्कूल के ‘गुड बॉय’ की तरह मुँह पर ऊँगली रख कर बैठे रहने का सबसे ताज़ा उदाहरण बंगाल का सामुहिक हत्याकाण्ड है, जहाँ उनके ही लोग सबसे अधिक निशाने पर हैं। उनका ‘गुनाह’ ही मोदी का समर्थक होना। और मोदी इसके बाद भी दम साधे बैठे हैं।

ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस के हाथों मिली भाजपा की हार ने यही हाल गृहमंत्री अमित शाह का कर दिया है, जिनके ऊपर तो सीधे-सीधे देश के हर एक नागरिक को ऐसी हत्या से बचाने का उत्तरदायित्व है! लेकिन जब उनसे उत्तर लेने का हक़ रखने वाला इकलौता व्यक्ति ही उनके साथ मौन-मौन के खेल में भागीदार बना बैठा है तो काहे की हिफाज़त और काहे की जवाबदेही!

हालिया विधानसभा चुनावों के बाद, बंगाल में विस्थापन को मजबूर हुए हिन्दुओं की संख्या कोई भी 4-5 हज़ार से काम नहीं बता रहा है- काफ़ी लोगों का अनुमान 10 हज़ार के पार है।

‘इंडिक कलेक्टिव’ जैसी संस्थाओं को राष्ट्रपति शासन के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा क्योंकि राज्य में संवैधानिक मशीनरी ध्वस्त हो जाने और हिन्दुओं की जान ममता के रहमोकरम पर आ जाने के बाद भी सरकार कानों में तेल डालककर बैठी थी, और पश्चिमी मीडिया और लिब्रांडुओं की शाबाशी बटोरने के लिए ममता को बधाईयाँ देने में व्यस्त थी।

कंगना को भी गच्चा

अभिनेत्री कंगना रानौत इस सरकार और नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े समर्थकों में गिनी जातीं हैं। भाजपा के लिए शिवसेना की मुख़ालफ़त उन्होंने की, और कीमत में अपना ऑफ़िस खोने की नौबत तक आ गई।

लेकिन जब ट्विटर ने उनका अकाउंट हमेशा के लिए बंद कर उनकी आवाज़ का गला घोंटा, तो प्रधानमंत्री चुपचाप तमाशा देखते रहे, धृतराष्ट्र की तरह। कंगना की गलती केवल इतनी थी कि उन उन्होंने 2000 के दशक की तरह का कठोर प्रशासक दोबारा बनने की अपील मोदी से एक ट्वीट में कर दी थी।

कहने को तो कोई यह भी कह सकता है कि कंगना ‘दंगा दबाने वाले’ नहीं, वामपंथियों के अनुसार, ‘दंगा भड़काने वाले मोदी’ का आह्वाहन कर रहीं थीं। लेकिन फिर सवाल यह है कि सरकार हिन्दुओं के दृष्टिकोण के हिसाब से चलेगी या उनके दुश्मनों के?

क्या यह सच नहीं कि 12 साल तक नरेन्द्र मोदी ने अदालत-से-अदालत घूम-घूम कर साल 2002 के दंगों में अपनी बेगुनाही की दुहाई दी, और यह दावा किया कि उन्होंने ही असल में दंगा रोका था, और उन्हीं के चलते उसके बाद से गुजरात में कोई दंगा ही नहीं हुआ? अगर वह सच था तो ‘वैसा वाला मोदी’ दोबारा बनने की कंगना की अपील मोदी को ‘दोबारा दंगाई’ वाली छवि कैसे दे दी?

फिर सबसे बड़ी बात कि कंगना मोदी की ही विचारधारा की समर्थक हैं, अतः उनका समर्थन करना तो मोदी के लिए लाज़मी बनता ही था। प्रधानमंत्री के तौर पर भले ही ट्विटर इंडिया के ख़िलाफ़ कदम उठाने में उनकी मजबूरी पर विचार शायद एक बार किया जा सकता है (सहमत उससे भी नहीं हुआ जा सकता), लेकिन एक भाजपा नेता और राष्ट्रवादी होने के नाते अपने निजी अकाउंट से ही एक बार क्षोभ प्रकट कर सकते थे।

और कंगना का मामला इकलौता हो, ऐसा भी नहीं है। वैश्विक सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी कम्पनियाँ जैसे गूगल, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर आदि लगातार कम्युनिस्ट-विरोधी हर आवाज़ को दबाने में लगी हैं, उनके ख़िलाफ़ ऑनलाइन मॉब-लिंचिंग जैसा माहौल बनाती हैं। उनकी आवाज़ दबा देती हैं, और मोदी और भाजपा का हाईकमान नेतृत्व सन्नाटे में बैठा रहता है।

ऐसा केवल पिछले साल हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। हिंदुत्व के मुद्दों पर मोदी के सन्नाटे की यह बहुत लम्बी शृंखला है।

कंगना से पूर्व, वर्तमान डू पॉलिटिक्स संपादक एवं सह-संस्थापक अजीत भारती का निजी ट्विटर अकाउंट भी ठीक इसी तरह पिछले साल प्रतिबंधित कर दिया गया था। उसके भी पहले वर्ष 2019 में समूचा ‘ऑपइंडिया’ पोर्टल इसका शिकार बनाया गया था, और उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स को हिन्दुओं के ख़िलाफ़ देश में चल रही मॉब-लिंचिंग और हत्याओं को उजागर करने के लिए विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से निलंबित होना पड़ा था। मोदी तब भी सन्नाटे में ही थे, जबकि उस समय वे कुछ ही दिन पहले प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आए थे।

मोदी का यह सन्नाटा रोमन राजा कॉन्स्टेंटाइन की याद दिलाता है। वह खुद तो जीवन भर रोमन-ग्रीक मतावलम्बी ही रहा, लेकिन उसके राज में ईसाईयों को दूसरों को ईसा को न मानने के लिए ज़िंदा जलाने समेत कई प्रकार के अनाचारों की खुली छूट मिली हुई थी। अंततः, उसकी नीतियों के चलते रोमन साम्राज्य इतना कमज़ोर हो गया कि उसकी मौत के कुछ ही समय बाद उसका पतन हो गया।

गैरों पे करम

सोशल मीडिया पर हिन्दुओं के प्रति घृणा से भरी सामग्री में न केवल पिछले साल यकायक बढ़ोतरी हो गई, बल्कि पिछले एक साल में तो यह कम्पनियाँ खुल के हिन्दू-विरोधी हो गईं। इन्होंने हिन्दुओं की राजनीतिक चेतना ही नहीं, सीधे-सीधे धार्मिक सामग्री पर भी प्रतिबंध लगाने प्रारम्भ कर दिए।

बाबा रामपुरी नामक संत का राजनीतिक हिंदुत्व से कुछ लेना-देना नहीं था, वे संत परंपराओं, उनकी संस्कृति और साधना इत्यादि पर वीडियो बनाते थे। उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि दशकों की मेहनत से बने वीडियोज़ वाला उनका यूट्यूब अकाउंट रातों-रात गायब हो गया। लेकिन इसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।

एक अन्य मामले में, यूट्यूब ने नटराजा मंदिर के दीक्षितारों (अर्चकों) के वीडियो को नग्नता और पोर्नोग्राफ़ी बताकर उसे ‘अडल्ट कंटेंट’ की श्रेणी में डाल दिया। हास्यास्पद बहाना यह दिया गया कि चूँकि वे पुरुष पुजारी शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई वस्त्र नहीं पहने थे, अतः यह ‘नग्नता’ होती है।

सोशल मीडिया पर इन दोनों ही घटनाओं को लेकर क्षोभ प्रकट होने के बाद भी मोदी सरकार ने कार्रवाई तो दूर, संज्ञान लेना तक आवश्यक नहीं समझा।

अपनों पे सितम

मोदी की निष्ठुरता का शिकार उनकी पार्टी के भी लोग हैं। बंगाल में पिछले एक साल में दर्जनों भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुईं, बलात्कार हुए, नृशंसताएँ हुईं, और ममता सरकार की खुली शह पर हुआ। भ्रष्टाचार की जाँच करने गई सीबीआई टीम तक पर हमला हो गया।

पूरा देश ममता सरकार को 356 के अंतर्गत निष्कासित करने और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की गुहार कर रहा था लेकिन मोदी-शाह ने चुपचाप तमाशा देखने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया।

उन्हें चिंता थी बंगाल चुनावों में ममता को सहानुभूति वोट न मिल जाए इस बात की, और मोदी की अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छवि की। उनके अपने लोगों की जान वे इसके लिए कुर्बान करने के लिए प्रस्तुत भी थे, और उन्होंने की भी।

यह मात्र पिछले एक साल की ही हिंसा हो, ऐसा भी नहीं है। ममता के दस साल पहले सत्ता में आने के साथ राजनीतिक हत्याओं का नंगा नाच चालू हो गया था, और उनकी सरकार को बर्खास्त करने की माँग भी मोदी से उनके पहले कार्यकाल में ही होने लगी थी। लेकिन जैसे शाहीनबाग़ के दंगे अमित शाह के लिए दिल्ली और बंगाल चुनावों की सीढ़ी थे। इसलिए दिल्ली में हिन्दुओं की हत्या फ़ायदेमंद दिखी, उसी तरह बंगाल में गिर रही लाशों की तस्वीरों से हिन्दू-आक्रोश की राष्ट्रव्यापी फ़सल काटने के लोभ ने उन्हें बंगाल के तालिबानीकरण को रोकने नहीं दिया।

पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग

पीएम मोदी की हिन्दुओं को लेकर निष्ठुरता का चरम तो पिछले ही साल दिख गया था, जब महाराष्ट्र के पालघर में दो निरीह, निहत्थे साधुओं की एक संदिग्ध भीड़ ने घेर कर हत्या कर दी। ऐसे कई दावे आए कि इस हत्या के पीछे महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछले इलाकों में पैर पसार रहे ईसाई मतान्तरण गिरोहों का हाथ है।

देश उबल पड़ा, लेकिन अपने आईटी सेल और अंध-समर्थकों से दिल्ली के ऑड-ईवेन की तर्ज पर ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ और ‘स्ट्रेटेजिक साइलेंस’ बदल-बदल कर जपवाने वाले नरेंद्र मोदी कुछ नहीं बोले। न ही उस समय बोले, और न ही आज तक बोला है।

पाठ्यपुस्तकों में बदस्तूर जारी है हिन्दू-घृणा

पाठ्यक्रमों में परिवर्तन और उनमें से हिन्दू-विरोधी प्रॉपगैंडा, जैसे- महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी में हार का सामना करना पड़ा था, भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता थी, वीर सावरकर ने अपनी प्राणरक्षा के लिए अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी, विभाजन में हिन्दू-मुस्लिम बराबर के दोषी हैं, हिंदुत्व सदा से जातिवादी और शोषक रहा है.. इत्यादि को हटाना हिन्दू समाज की प्रमुखतम माँगों में से एक रहा है।

प्रधानमंत्री के खुद के आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल समेत हिंदुत्व का प्रबुद्ध वर्ग लगातार इस बात पर ज़ोर डालता रहा है कि हिन्दुओं में इतिहास-बोध का अभाव हमारी मानसिक और वैचारिक दासता को जारी रखने में महती भूमिका का निर्वहन करता है।

लेकिन इस दिशा में पिछले एक साल में पहले की ही भाँति कोई काम नहीं हुआ है। नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में भी शिक्षा की सामग्री, कथानक (नैरेटिव) आदि पर कोई आमूलचूल बदलाव करने की कोई योजना परिलक्षित नहीं होती।

जेएनयू, जामिया, डीयू समेत केंद्र के पैसे से चल रहे विश्वविद्यालयों में हिन्दुओं से घृणा करने वाले और पाठ्यपुस्तकों में उनके विरुद्ध विषवमन करने वालों की नियुक्ति भी अविरल, निर्विरोध चल रही है।

इसके उलट, अगर कॉन्ग्रेस को देखें तो वर्ष 2018 में राजस्थान में सत्ता वापस मिलते ही उसने वसुंधरा राजे की सरकार ने सावरकर के लिए सम्मानसूचक ‘वीर’ उपाधि को हटाने समेत अपने प्रॉपगैंडा का जाल फैलाना शुरू कर दिया था। उसका प्रोपेगंडा और झूठ पढ़ कर 2019 से 2024 के बीच जो युवा 18 पार कर पहली बार वोट देने बूथ में घुसेंगे, वे भला किसको वोट देंगे?

कश्मीर में कायरता

कश्मीर में तो भाजपा को किसी और से नहीं, खुद अपने प्रधानमंत्री से ही बचाए जाने की आवश्यकता है। उनके कृत्यों और मौन के ही चलते कार्यकर्ताओं की जान का संकट हर प्रकार से अपनी सत्ता होते हुए भी आ गया है।

न केवल मुसलमानों को अनुचित और खतरनाक जनसांख्यिकीय ताकत देने वाले अनुच्छेद 370 और 35A को ‘डोमिसाइल’ नियमों के चोर दरवाज़े से दोबारा वापस लाए जाने के प्रयास हुए हैं, बल्कि कश्मीर की संस्कृति के ध्वजवाहक कश्मीरी पंडितों को दोबारा सुरक्षित तौर पर घाटी में बसाए जाने को लेकर भी मोदी मौन हैं।

कश्मीरी पंडित उनकी कश्मीर पर बातों से पूरी तरह नदारद होते हैं। शायद ही किसी ने हर साल आम हिन्दुओं में सोशल मीडिया पर हर साल मनाए जाने वाले 19 जनवरी के काले दिवस में भागीदारी करते देखा हो।

गौरतलब है कि 1990 में कश्मीरी हिन्दुओं के विरुद्ध स्थानीय मुसलमानों ने इसी तारीख को सामूहिक हत्याकाण्ड, बलात्कार, आदि प्रारम्भ कर दिए थे, जिसके चलते करीब 5 लाख कश्मीरी हिन्दुओं को घर छोड़कर शरणार्थी बन जम्मू से लेकर ओडिशा तक देश के विभिन्न हिस्सों में पलायन करना पड़ा था, और आज भी वे घर नहीं जा पाए हैं।

आज क्या, पिछले एक साल क्या, मोदी ने कश्मीरी पंडितों पर बात उस दिन भी नहीं की थी जब वे 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद रेडियो के माध्यम से देश से मुख़ातिब हुए थे। उन्होंने उस दिन उस प्रशंसनीय निर्णय के पीछे पर्यटकों की सुरक्षा, स्थानीय मुसलमानों के रोजगार से लेकर वाल्मीकि समाज को 35A के चलते अच्छी नौकरियाँ न मिलने तक के कारण गिना डाले, लेकिन कश्मीरी पंडितों का ज़िक्र तो उस दिन भी नहीं किया था।

विदेश में भी हिंदुत्व की रक्षा में असफल

कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी को अपने नाम पर बहुत गर्व है, क्योंकि यह स्वामी विवेकानंद के जन्म का नाम था। करोड़ों लोगों की तरह मोदी को भी स्वामी जी के हिन्दू धर्म की कीर्ति दुनिया के कई हिस्सों में फ़ैलाने का प्रशंसक माना जाता है।

‘मोदी मिथ’ के कहानीकार बताते हैं कि मोदी ने घर भी स्वामी जी जैसा सन्यासी बनने के लिए ही त्यागा था। अगर इन गल्पों में लेशमात्र भी सत्य है, तो ऐसे में विदेश में हिंदुत्व और धर्म की रक्षा करने में विफलता को तो मोदी को राजनीतिक से अधिक व्यक्तिगत नाकामी के तौर पर देखना चाहिए!

रश्मि सामंत

मेरी रश्मि सामंत से व्यक्तिगत तौर पर शून्य सहानुभूति है। उसने ऑक्सफ़ोर्ड जाकर उसी वामपंथ, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, ‘सिस्टेमिक रेसिज्म’ आदि का राग अलापा जो ब्रिटेन और भारत दोनों में ही हिंदुत्व और धर्म का शत्रु है। लेकिन मेरे व्यक्तिगत आग्रह से मोदी की अकर्मण्यता क्षम्य नहीं हो जाती।

रश्मि सामंत विदेश में फंसी एक हिन्दू थी, जिसके साथ कई प्रकार के दुर्व्यवहार और प्रताड़नाएँ केवल हिन्दू होने के चलते, राम जन्मभूमि मंदिर का समर्थक होने के चलते हो रहीं थीं। उसका इतना मानसिक शोषण हुआ कि न केवल उसे ऑक्सफॉर्ड छात्र समिति की जीती हुई अध्यक्षता से त्यागपत्र देकर भारत लौटना पड़ा बल्कि कई मीडिया के अनुसार वह मानसिक त्रास से यहाँ भी बीमार पड़ गई।

ऐसे में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कर्त्तव्य था कि उस हिन्दू महिला की रक्षा में, उसे न्याय दिलाने में अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक शक्ति का प्रयोग करते। ऑक्सफ़ोर्ड का गला एंठते कि अगर रश्मि का उत्पीड़न करने वाला हिन्दू-विरोधी प्रोफ़ेसर शाम तक नौकरी से नहीं निकाला गया तो ऑक्सफॉर्ड के ख़िलाफ़ भारत के सभी क़दमों के विकल्प खुले हैं।

लेकिन ऐसा कुछ करना तो दूर, मोदी ने अन्य कई मामलों की तरह इस पर भी ट्वीट तक करना आवश्यक नहीं समझा। उनके विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस मुद्दे पर संसद में उठे प्रश्न का जवाब यह दिया कि ‘उचित समय’ पर भारत इसका उत्तर देगा।

खालिस्तान को खुली छूट

जब बात जयशंकर की हो रही है तो किसान आंदोलन के नाम पर खालिस्तान के जिन्न के पुनर्जीवन का ज़िक्र आवश्यक है। वृहद दक्षिणपंथी और हिंदुत्ववादी समुदाय ही नहीं, भाजपा के कट्टर समर्थक, सदस्य और मंत्री तक ट्वीट पर ट्वीट कर किसान आंदोलन की आड़ में हिन्दू-विरोधी खालिस्तान आंदोलन को हवा दिए जाने की बात कर रहे थे। विदेशी खालिस्तानी फ़ंडिंग के सबूत देने का दावा कर रहे थे। लेकिन न ही जयशंकर और न ही मोदी ने इसे लेकर कुछ भी करना आवश्यक समझा।

जब कनाडा और ब्रिटेन में खालिस्तानियों के हाथों हिन्दू सिखों और हिन्दुओं के साथ हिंसा की खबरें आ रहीं थीं, तब भी जयशंकर ने उस बारे में कुछ नहीं किया। जब किसान आन्दोलन का पूँजीपति-बनाम-किसान, बाजार-बनाम-एमएसपी का मीडिया और सोशल मीडिया नैरेटिव हिन्दू-बनाम-सिख और सिख पंथ व इस्लाम की ‘एकता’ की तरफ़ मुड़ने लगा तब भी मोदी और उनकी सरकार ने कुछ नहीं किया।

मुस्लिम हमलावरों द्वारा राजपूतों के किलों के बाहर मोर्चा डालने जैसी छावनी खालिस्तानियों के दिल्ली के बाहर खड़ी कर दी, लेकिन मोदी ने उन्हीं हिन्दू-विरोधियों को एक-के-बाद-एक 11 बार ‘वार्ता’ के नाम पर बुला कर उनकी खुशामद करने के आलावा कुछ नहीं किया। ऐसा ही सन्नाटा उनके नायब अमित शाह भी मारकर बैठे रहे।

आज भारत में कोरोना वायरस के जिस ‘यूके वेरिएंट’ के चलते मौत का ताण्डव मचा है, वह भी ब्रिटेन से सीधे दिल्ली आकर शाहीनबाग़ जैसे घेराव में बैठ जाने वाले खालिस्तानियों के चलते ही फैला है। लेकिन इस तरह की तमाम चेतावनियों के बाद भी मोदी को खालिस्तानी आतंकियों और उनके समर्थकों में ‘अन्नदाता’ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखा। और इसी अंधेपन की परिणति इस वर्ष के गणतन्त्र दिवस के अवसर पर इस गणराज्य की सम्प्रभुता को ट्रैक्टर-सवार दंगाईयों द्वारा मिट्टी का माधो साबित करने से हुई।

देवी दुर्गा के अपमान पर चुप्पी

जब वर्तमान अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस चुनाव प्रचार कर रहीं थीं, तो उनकी भाँजी मीना हैरिस ने एक तस्वीर ट्वीट की। इस तस्वीर में कमला को देवी दुर्गा, राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बायडेन को उनका सिंह-वाहन और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प को असुर महिषासुर दिखाया गया था।

यह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का सीधे-सीधे अपमान था कि कोई राजनीतिक प्रत्याशी, जिसकी हिन्दू धर्म के प्रति कोई आस्था भी नहीं है, वह खुद को हमारे देवता के समकक्ष प्रस्तुत करता।

साथ ही, यह भारत के हिन्दुओं के हितों पर भी सीधा हमला था क्योंकि जहाँ ट्रम्प भारत के हिन्दुओं द्वारा राज्य में उन्हें अल्पसंख्यक और मुस्लिम समुदाय को बहुसंख्यक बनाए रखने वाले अनुच्छेद 370 को हटा कर ‘कश्मीर विजय’ के समर्थक थे, वहीं कमला हैरिस ने अपनी माँ और अन्य कई रिश्तेदारों के हिन्दू होने बाद भी इसका विरोध किया था और हिन्दू-विरोध को डेमोक्रैटिक पार्टी की नीति बना दिया था।

ऐसे में, हिन्दुओं के धार्मिक हितों की वैश्विक रक्षा और उनकी धार्मिक भावनाओं दोनों के ही लिहाज से प्रधानमंत्री और विदेश मन्त्रालय के स्तर पर इसके ख़िलाफ़ आपत्ति प्रकट करना आवश्यक था। लेकिन दोनों ने ही ऐसा नहीं किया।

और यह वही नरेंद्र मोदी हैं, जिनके ‘निजी आईटी सेल कर्मचारी’ हर वर्ष नवरात्रि पर उनके कथित नौ दिन के उपवास, उनके खिचड़ी के भोजन आदि की माला जपते नहीं थकते, इसे उनके हिंदुत्व और हिंदुत्व के प्रति उनकी निष्ठा का सबसे बड़ा प्रमाण बताते हैं।

हिन्दुओं की जड़ में मठ्ठा घोलने में कॉन्ग्रेस से भी आगे हैं गृहमंत्री

अगर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी हिन्दुओं और हिन्दुत्ववादियों को खलती है, तो अमित शाह के कुछ कर्म उससे 4 कदम आगे जाकर हिन्दुओं के घावों पर नमक छिड़कने का काम करते हैं। वर्ष 2019 में ‘भाजपा भारत को हिन्दू-राष्ट्र के रूप में अब नहीं देखती’ कहने वाले मोदी के इस ‘चाणक्य’ नायब ने इस साल तनिष्क के विरुद्ध हो रहे विरोध प्रदर्शन को ‘ओवर-एक्टिविज़्म’ बताने समेत हिन्दुओं के हितों पर आघात करने में अपनी ओर से कोई कमी नहीं बाकी रखी।

बंगाल से सीएए-एनआरसी नदारद

जिस बंगाल में सीएए और एनआरसी होने की हिन्दुओं में आशा और मुसलमानों में इतना डर था कि उसे लेकर दिल्ली में दंगे हो गए, 53 लोगों की हत्याएँ हुईं, सीएए-एनआरसी को भाजपा ने उसी बंगाल के निर्वाचन नैरेटिव में गोल कर दिया।

इसके पीछे बंगाल का निर्वाचन प्रबंधन संभाल रहे गृहमंत्री अमित शाह का सीधा हस्तक्षेप बताया जा रहा है। इस पर अविश्वास करने का कोई कारण भी नहीं है क्योंकि शाह मोदी के बाद भाजपा के सबसे ताकतवर नेता हैं, और यदि वे न चाहते तो यह अनर्थ होना लगभग असम्भव था।

यह ऐसा मुद्दा था जिसने पूरे देश के मानस का मंथन कर दिया था और देश का लगभग बच्चा-बच्चा या तो इसके पूरी तरह पक्ष में था या इसके सर्वथा ख़िलाफ़। ऐसे में, जब जिस राज्य में इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ना था, उसी की राजनीति से दश का गृहमंत्री इस मुद्दे को सन्नाटे में गायब कर देगा तो उसका असर तो दिखना ही था, और निर्वाचन के नतीजों में दिखा भी।

अफसोस की बात केवल यह है कि खुद को और मोदी को ‘स्टेट्समैन’ दिखाने हेतु लिए गए अमित शाह के इस आत्मघाती निर्णय कोई उन्हें खुद कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, और बंगाल के लाखों भाजपा कार्यकर्ता और करोड़ों हिन्दू कब तक इसकी कीमत चुकाएँगे, इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

तनिष्क के साथ, हिन्दुओं के ख़िलाफ़

तनिष्क ने ‘एकत्वं’ नामक लव जिहाद को बढ़ावा देने वाला, उसकी तारीफ़ करने वाला एक विज्ञापन पिछ्ले वर्ष दिवाली पर प्रकाशित किया था। स्वाभाविक रूप से हिंदुत्व के धड़े में इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया हुई, तनिष्क के वरुद्ध हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए, उनकी दुकानों के सामने और उनमें घुस कर लोगों से हिन्दू-विरोधियों के साथ व्यापार न करने का आह्वाहन किया गया।

कई लोगों ने उनकी विभिन्न योजनाओं में किया गया अपना निवेश खींच लिया। लिहाजा भारी विरोध और रोष के चलते टाटा ग्रुप की कम्पनी को वह विज्ञापन वापस लेना पड़ा और हिन्दुओं से बेमन से ही सही, आधी-अधूरी ही सही लेकिन माफ़ी माँगनी पड़ी।

इस सब के बीच, जब अमित शाह से एक मीडिया चैनल द्वारा इस विवाद पर उनका मत पूछा गया तो उन्होंने हिन्दुओं से क्रोध को ‘ओवर-एक्टिविज़्म’ बता कर उसकी सारी विश्वसनीयता छीन ली और आईटी सेल व सरकार के अंध-समर्थकों से पीछे हट जाने का इशारा कर दिया।

इससे वह आम हिन्दू ठगा रहा गया, जिसने अपनी नौकरी खतरे में डालकर इस आंदोलन का समर्थन किया था, अपने आर्थिक नुकसान की परवाह किए बिना हिन्दू-विरोधियों के साथ व्यापार बंद कर दिया था।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह भी है कि तनिष्क के ख़िलाफ़ हिन्दुओं का यह आंदोलन, यह विरोध प्रदर्शन उग्र अवश्य था, लेकिन इस हिंसक या गैर-क़ानूनी बिलकुल नहीं बनने दिया गया था। इससे यह तर्क भी लोगों के गले नहीं उतरा कि गृहमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति ‘हिंसा’ का समर्थन नहीं कर सकता था।

ऑल्ट-न्यूज़ फैक्ट-चेकर है, ऑपइंडिया नहीं

पिछले साल कोरोना के बीच 10 मई को लोग सुबह सोकर उठे तो पता चला कि अमित शाह के गृह मंत्रालय के हिसाब से हिन्दुओं से घृणा करने वाला, उनके लिए दुनिया में नफ़रत भरने वाला ऑल्ट न्यूज़ विश्वसनीय फ़ैक्ट-चेकिंग संस्था था, लेकिन हिंदुत्व के समर्थक ऑपइंडिया और स्वराज्य पत्रिका नहीं।

गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले ब्यूरो ऑफ़ पुलिस, रिसर्च, एन्ड डेवलपमेंट (बीपीआरडी) ने ऐसे ही मजमून वाली एक सूची प्रकाशित की थी, जिसमें उन ‘विश्वसनीय’ समाचार संस्थाओं के नाम थे, जिनसे किसी भी खबर की सत्यता की जाँच की जा सकती थी।

इस देश का शायद हर हिंदुत्ववादी यह जानकर ठगा रह गया कि उस सूची में ऑल्ट न्यूज़ का तो नाम था, लेकिन हिंदुत्व के समर्थक ऑपइंडिया और स्वराज्य पत्रिका का नहीं। बवाल होना था और बवाल हुआ।

पूरे बवाल के बाद ‘भूल सुधार’ के नाम पर बीपीआरडी ने पूरी सूची ही अपने पोर्टल से हटा दी। बजाय ऑल्ट न्यूज़ का नाम हटाने या ऑपइंडिया और स्वराज्य का नाम जोड़ने के इसे महज ‘बाबुओं द्वारा की गई मानवीय भूल’ मान लिया गया। इस मुद्दे पर भी अमित शाह की ओर से कोई भी बयान या सफ़ाई नहीं आए।

हिन्दुओं की लिंचिंग पर आज तक नहीं खुली ज़ुबान

मोदी को एक चोर तबरेज़ की लिंचिंग का 2019 में इतना दुख हुआ कि बाकायदा संसद में कामधाम रोक कर इस पर बयान जारी किया गया। लेकिन आज तक किसी भी हिन्दू की हत्या पर मोदी को इतना दुःख नहीं हुआ कि उसके परिवार के लिए संवेदना में दो शब्द ट्विटर पर भी कह दिए जाएँ।

पिछले सात सालों में तो अंकित शर्मा, अंकित त्यागी, डॉ. प्रशांत नारंग, ई-रिक्शा चालक रविंद्र, कासगंज के चंदन गुप्ता, बजरंग दल के प्रशांत पुजारी, तमिल नाडु के रामलिंगम, मथुरा के लस्सी विक्रेता भारत यादव समेत सैकड़ों नामों की फेहरिस्त है, लेकिन उस पर तो एक पूरा लेख क्या, एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। फ़िलहाल पिछले एक साल में ही हुईं 2 हत्याओं की बात करें- निकिता तोमर और निधि पासवान। दोनों की हत्या मुसलमान मनचलों ने भरपूर ‘स्टॉकिंग’ के बाद की। क्या मोदी ने इन दोनों या ऐसे किसी भी हिन्दू पीड़ित के पक्ष में कोई ट्वीट तक किया?

आखिर क्यों

केंद्र की सत्ता में आए हुए नरेन्द्र मोदी को 7 साल हो चुके हैं। उसके पहले वे 12 साल मुख्यमंत्री रह चुके थे। अनुभव की कमी नहीं है। जहाँ एससी-एसटी एक्ट, 370 हटाना, कृषि क़ानून पास करने जैसी करने की नीयत हो, वहाँ क़ाबिलियत की भी कमी नहीं है। यानी कि अगर कुछ नहीं है तो वह है कुछ करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति।

क्यों नहीं है, इसके बारे में कयास ही लगाया जा सकता है। शायद एक कारण हीनभावना है, कि पश्चिमी मीडिया, मुसलमानों, लिब्रांडुओं की ही शाबाशी चाहिए। उन्हीं का अनुमोदन मिलेगा तो लगेगा कि हाँ सत्ता में आना सफल रहा।

और ऐसा क्यों? वे तो इनसे नफ़रत करते हैं, ये मोदी-शाह कल को मर जाएँ तो ख़ुशी के मारे इन तीनों समुदायों के सदस्य कपड़े फाड़कर नाचने लगेंगे! तो भला जो आपसे नफ़रत करता है, उसी से प्रशस्ति-पत्र चाहिए?

क्योंकि मोदी गाँधी के भक्त हैं। मोदी चरखा चलाने लगे हैं, और यह बात वे छिपाते भी नहीं हैं। उसी मोहनदास करमचंद गाँधी के जिसने केरल के मोपला हिन्दू हत्याकांड में न केवल हिन्दुओं को केवल इसलिए बराबरी का जिम्मेदार मान लिया था क्योंकि अगर हिन्दू गलत न होते तो उनके साथ यह न होता।

वही गाँधी, जिनकी हिन्दू औरतों के लिए सलाह थी कि वे अपना बलात्कार होने दें क्योंकि जब मजहबी दंगाई बलात्कार कर-कर के थक जाएगा तो उसके हृदय में करुणा और दया का संचार होगा, और उसके हृदय-परिवर्तन के लिए हिन्दुओं को प्रसन्नतापूर्वक अपने जीवन की हलाली दे देनी चाहिए।

वही गाँधी, जो अपने राजनीतिक ‘सगे चेले’ नेहरू और ‘सौतेले चेले’ पटेल को इसलिए नीचे दिखाने पर तुले थे क्योंकि उन दोनों ने हत्यारे, बलात्कारी पाकिस्तान को महज़ ₹50 करोड़ उसके हिंदुओं के साथ हत्यारे बर्ताव के चलते देने से इंकार कर दिया था।

यह हम हैं जो मोदी की अंध-भक्ति में वह सच देखने से इंकार कर रहे हैं, जिसे मोदी छिपा तक नहीं रहे। जैसे, 1920 के दशक में हमारे पूर्वजों ने महाभारत और गीता में अहिंसा ढूँढ़ने का दावा करने वाले गाँधी को हिन्दू संस्कृति, राजनीतिक चेतना, संस्कृति का ध्वजवाहक मान लिया था, जबकि वे तो खुलकर ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ केवल हिन्दुओं के गले में ठूँसने में लगे थे।

अब आगे क्या?

सोशल मीडिया में मोदी और उनके कोर वोटरों के रिश्ते को एक दिलचस्प उपमा से व्याख्यायित किया जाता है। इसके अनुसार, मोदी के कोर वोटर 50 और 60 के दशक की उन सुपरहिट फिल्मों की नायिका के जैसे हैं, जो अपने पति को लेकर तब भी सती-सावित्री बनी रहती है जब उसका पति उसे घास तक नहीं डालता।

चाहे वह उसे जितना भी हिंसा का शिकार बनाए, चाहे वह जितना भी बाहर ‘चरित्रहीन’ महिलाओं और खलनायिकाओं के पीछे मुँह मारे, इस पत्नी का अनुराग कम नहीं होता। बल्कि वह पति इतना दुस्साहसी इस पत्नी के कारण ही होता है क्योंकि वह जानता है कि ये वाली तो कहीं जाने ही नहीं वाली। मज़े की बात यह है कि इस प्रकार की फ़िल्में सर्वाधिक इसी प्रकार की महिलाओं में ही पसंद की जातीं थीं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि आज तो इस प्रकार की महिलाओं ने भी इस प्रकार की फ़िल्में देखना बंद कर दिया है। ऐसे में, पीएम मोदी आखिर अपने मैटिनी-शो को लेकर कब तक आश्वस्त रह सकते हैं?



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