हिन्दू-मुस्लिम नहीं, सिख व ईसाईयों में बढ़ा है दहेज का चलन: केरल की स्थिति गंभीर- शोध में खुलासा

02 जुलाई, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
वर्ल्ड बैंक द्वारा किया गया यह शोध वर्ष 1960 से 2008 के बीच की समयावधि का है।

भारतीय समाज में विवाह के दौरान दहेज प्रथा का चलन एक लंबे समय से चला आ रहा है। जहाँ इस परंपरा को प्रारंभ में दो परिवारों को जोड़ने तथा एक नए जीवन की शुरुआत करते युगल के लिए उपहारों की दृष्टि से देखा जाता था, वहीं आगे चलकर इसका दुरुपयोग भी प्रारंभ हो गया। ऐसे कई उदाहरण समाज में देखे गए जहाँ इस प्रथा का दुरुपयोग कर विवाह में पक्ष विशेष को शोषित किया जाने लगा। 

इसको देखते हुए समाज द्वारा भी धीरे-धीरे इस प्रथा को समाप्त करने के प्रयास किए गए। वर्ष 1961 में सरकार द्वारा इसे एक दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया। सरकार ने जबरन दहेज लेने-देने पर पाबंदी लगाते हुए ऐसा करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने के कानून बनाए।

क्या केवल कानून मात्र बन जाने से एक सामाजिक कुप्रथा या बुराई संपूर्ण रुप से मिट जाती है? इसका उदाहरण इसी कानून और इसके बनने के उपरान्त आए मामलों का विश्लेषण करके सरलता से प्राप्त हो सकता है। धरातल पर देखा जाए तो इस कानून ने एक कुप्रथा को समाप्त करने की बजाय समाज में एक अन्य ही नवीन समस्या उत्पन्न कर दी।

इस कानून का सहारा लेकर विवाह के उपरांत अब दूसरे पक्ष पर आरोप लगाकर कानून का दुरुपयोग किया जाने लगा। यह जानना भी अति आवश्यक है कि क्या इस कानून के द्वारा भारत से यह प्रथा संपूर्ण रूप से समाप्त हुई?

वर्ल्ड बैंक द्वारा किए गए एक शोध में इससे संबंधित कई विचित्र तथ्य सामने आए। वर्ल्ड बैंक द्वारा विभिन्न राज्यों से विभिन्न पंथ एवं जातियों के 40,000 शादियों का डेटा उठा कर शोध किया गया। यह शोध वर्ष 1960 से 2008 के बीच की समयावधि का है। 

समय के आधार पर आँकड़े 

अगर वर्षों के आधार पर आँकड़े देखे जाएँ तो वर्ष 1975 से पहले और वर्ष 2000 के बाद को हटाकर लगभग एक लंबे कालखंड में इनकी स्थिति स्थिर ही रही है। वहीं, दूसरे शोध में विवाह में लड़के के पक्ष द्वारा किया गया औसत व्यय लगभग 5,000 रुपए तो वहीं लड़की पक्ष द्वारा विवाह में औसत 32,000 रुपए तक खर्चे किए जाते हैं।

चित्र साभार- WORLD BANK

इन आँकड़ों को देखते हुए यह 27,000 रुपए अतिरिक्त का दबाव केवल एक ही पक्ष पर आना हमारे सामाज में विवाह के मामले में अस्थिरता का उदाहरण पेश करता है। 

ऐसा नहीं है कि ऐसे कोई मामले नहीं जहाँ लड़के पक्ष द्वारा अधिक खर्चा किया जाता है, परंतु ऐसे मामलों की संख्या इसके उलट के मुकाबले बेहद निम्न है।

पंथ के आधार पर विश्लेषण

दहेज को अधिकतर एक हिंदू रीति मान कर इसे एक ‘हिंदू समाज की कुप्रथा’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है, परंतु ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि यह एक पंथ विशेष द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रथा नहीं अपितु एक सामाजिक प्रथा है, जिसमें भारत में बसने वाले सभी पंथ अपनी लगभग बराबरी की साझेदारी प्रदान करते हैं। 

हिंदुओं के बहुसंख्यक होने के कारण केवल आँकड़ों में उनकी मात्रा अधिक प्रतीत होती है, परंतु अगर जनसांख्यिकी के स्तर को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो आँकड़े चौंकाने वाले हैं। 

इन 48 वर्षों के शोध में यह सामने आया कि भारत के दो बहुसंख्यक पंथ, यानी हिंदू और मुस्लिम, दहेज के मामलों में लगभग बराबरी के आँकड़े दिखाते हैं। जहाँ हिंदुओं में यह आँकड़े मुस्लिमों से थोड़े ही ऊपर देखे गए, वहीं सिख एवं ईसाई समुदाय इन में हिंदुओं और मुस्लिमों, दोनों से ही बेहद ऊपर साबित हुए।

चित्र साभार- WORLD BANK

वहीं, जाति के आधार पर ये आँकड़े इन 48 सालों के शोध में भी प्राचीन समय से कुछ विशेष बदले नहीं हैं। इसमें सामान्य वर्ग सबसे ऊपर, उसके बाद ओबीसी वर्ग, जिसके बाद शेड्यूल कास्ट (SC) तथा अंत में शेड्यूल्ड ट्राइब (ST) वर्ग आते हैं।

राज्य के स्तर पर तुलना

जहाँ राष्ट्र के स्तर पर इन 48 सालों में एक लंबे कालखंड में आँकड़ें स्थिर दिखते हैं। वहीं अगर विश्लेषण अलग-अलग राज्यों के स्तर पर किया जाए तो आँकड़ों में विविधता देखी जा सकती है।

उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र जैसे राज्यों में वर्ष 1960 के दशक के बाद औसत दहेज के आँकड़े लगातार गिरते ही दिखते हैं। हरियाणा, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में ये आँकड़े 1960-70 के दशकों के बाद लगातार बढ़ते चले गए।

चित्र साभार- WORLD BANK

अक्सर यह तर्क सामने आता है की शिक्षित लोग और समाज ऐसी प्रथाओं को नहीं मानता तथा ऐसे लोगों के बीच इन प्रथाओं का कोई अस्तित्व नहीं होता है, परंतु ये आँकड़े इस मिथ्या पर से भी पर्दा हटा देते हैं।

केरल को देश का सबसे शिक्षित राज्य माना जाता है, तो तार्कित आधार पर यहाँ इस कुप्रथा के आँकड़ों में समय के साथ गिरावट आनी चाहिए थी। परन्तु इसके ठीक उलट, यहाँ के औसत दहेज लेन-देन के आँकड़े 1970 के दशक से आज तक केवल ऊपर ही गए हैं तथा पिछले कुछ वर्षों में केरल दहेज लेने-देने वाले राज्यों की गिनती में सबसे ऊपर देखा गया है।



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