घाटी में रहकर भी स्वयं को भारतीय न कहने वाले गिलानी के बारे में कितना जानते हैं आप?

02 सितम्बर, 2021
जम्मू-कश्मीर राज्य के अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी का निधन

कश्मीर घाटी को भारत का हिस्सा न मानने एवं स्वयं को भारतीय नागरिक न कहने वाले जम्मू-कश्मीर राज्य के अलगाववादी, कट्टरपंथी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी का बुधवार (1 सितंबर, 2021) की रात को इंतकाल हो गया।

गिलानी एक लंबे समय से कश्मीर घाटी को एक अलग राज्य बनाने को लेकर मजहबी मुहिम चला रहे थे। 91 वर्ष तक इस धरा पर जीवित रहे गिलानी ने अपने जीवन का अधिकतर समय भारत के अविभाज्य अंग कश्मीर में अराजकता फैलाने एवं युवाओं के हाथों में पत्थर देकर उन्हें पहले पत्थरबाज़ और उसके उपरांत आतंकवादी बनाने में ही बिताया।

5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 और 35A के कुछ प्रावधानों ने निरस्त होने के बाद से ही घाटी में कट्टरपंथ, अलगाववाद और अलगाववादी नेताओं पर लगाम कसी गई है। परंतु एक समय ऐसा भी था जब यही इस्लामी विचारधारा रखने वाले लोगों का घाटी में एकछत्र राज चला करता था। ये वही लोग हैं जिन्होंने 80 के दशक के अंत में घाटी से पंडितों का नरसंहार कर उन्हें राज्य से भाग निकलने को मजबूर कर दिया था।

शिक्षा बदल सकती है मानसिकता? 

29 सितंबर, 1929 को जम्मू कश्मीर के बंदीपोरा में जन्मे सैयद अली शाह गिलानी ने लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज से शिक्षा ली। जिन लोगों को ऐसा लगता है कि किताबी शिक्षा ग्रहण करने के बाद एक कट्टर इस्लामी विचारधारा वाले व्यक्ति को बदला जा सकता है, गिलानी जैसे लोग उन्हीं के मुँह पर एक तमाचे की तरह हैं।

ये लोग यह सिद्ध करते हैं कि किताबी ज्ञान केवल आपके मस्तिष्क के कपाटों को खोल सकता है, परंतु अगर किसी के डीएनए में ही बचपन से कट्टरपंथ और विश्व के कुछ सम्प्रदायों के प्रति ईर्ष्या और कुंठा कूट-कूट कर भर दी जाए तो कोई किताब या शिक्षा उसे सुधार नहीं सकती।

इसका एक कारण यह भी है कि अगर केवल एक ही चिन्हित किताब को ही विश्व की हर अन्य किताब, ज्ञान या विचार से सर्वोपरि माना जाए और बचपन से ही उसे निरंतर रटवाते रहा जाए तो मस्तिष्क किसी अन्य विचार सोच या ज्ञान को समझने की क्षमता ही खो बैठता है। 

किताबी ज्ञान अर्जित कर के सैयद अली गिलानी जैसे लोग कानून और देश के संविधान का केवल फायदा ही उठाते हैं। इस व्यक्ति द्वारा पहले कश्मीर की जमात ए इस्लामी संगठन की सदस्यता ली गई, जिसके बाद गिलानी ने 1994 में तहरीक-ए-हुर्रियत नामक संस्था को स्वयं जन्म दिया।

तहरीक-ए-हुर्रियत कश्मीर के ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का ही एक हिस्सा रही है और के भी उन संस्थाओं में से एक रही है जो कश्मीर को भारत से अलग कर एक अलग राज्य की तरह स्थापित करना चाहती हैं।

वर्ष 1993 में 20 से अधिक मजहबी संस्थाओं और राजनीतिक दलों ने मिलकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी। हुर्रियत में बिखराव के बाद यह दो धड़ों में टूट गई थी। जिसके बाद हुर्रियत (गिलानी) का गठन हुआ।

कट्टरपंथी और मजहबी नेता सैयद अली गिलानी को इसका आजीवन अध्यक्ष चुना गया था। हालाँकि, वर्ष 2020 में जून के माह गिलानी ने खुद को इस ‘हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस’ से भी अलग कर लिया था। दरअसल, घाटी से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के निष्क्रीय होने के बाद गिलानी मानने लगा था कि उनके साथ के अन्य नेताओं का हौंसला टूटने लगा है और उनकी ‘भारत-विरोध’ की इच्छाशक्ति अब ख़त्म हो चुकी है।

पाकिस्तान प्रेम 

यह बात तो जगज़ाहिर है कि ये लोग किसी प्रकार की स्वतंत्रता या आजादी में विश्वास नहीं रखते हैं। इनका एकमात्र लक्ष्य इस क्षेत्र में इस्लामी राज्य कायम करना एवं इसे भी पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान जैसा बना देना ही है।

यही कारण भी है कि आज इस अलगाववादी विचारक व्यक्ति की मौत पर कश्मीर और हिंदुस्तान से अधिक मातम पाकिस्तान में मनाया जा रहा है। पाकिस्तान ऐसे मातम मना रहा है कि मानो कोई दूसरा बाप मर गया हो। यह बात और है की एक स्वतंत्र देश होने का दावा करने वाला यह पाकिस्तान आज भी हर कट्टरपंथी में अपना कोई नया अल्पकालिक बाप ढूँढ ही लेता है और इसी कारणवश आज तक यह मुल्क अनाथ ही है।

पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म ने इस मौके पर गिलानी की मौत पर दुख जताया और उन्हें एक ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहा। इससे यह साफ होता है कि 70 से अधिक वर्षों से अपने देश कि हर बच्चे की नसों में कश्मीर नाम का इंजेक्शन भोंक चुके पाकिस्तान को आज भी यह वहम है कि वे कश्मीर को अपने कब्ज़े में ले जा सकते हैं।


देशद्रोह और मजहब प्रेम 

गिलानी पर वर्ष 2010 में कथित लेखिका अरुंधति रॉय, अलगाववादी आंदोलनकारी वारावारा राव समेत राजद्रोह की धाराएँ भी लगी थीं। इस व्यक्ति ने कश्मीरी आवाम और युवाओं की नसों में कट्टरपंथ का ज़हर घोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी थे। गिलानी द्वारा वर्ष 2014 में कश्मीरियों से लोकसभा चुनावों का बहिष्कार करने की माँग की गई थी।

युवाओं को भड़का कर उन्हें आतंकी बनाने वाले गिलानी समान नेताओं द्वारा अपने बच्चों को विवादित क्षेत्र से सबसे पहले बाहर किया जाता है। गिलानी के 6 बच्चे हैं, जिनमें से कोई डॉक्टर तो कोई निजी एयरलाइन में वरिष्ठ पदों पर जमा हुआ है और ये लोग चाहते हैं कि कश्मीरी युवा केवल भारतीय सेना पर पत्थर बरसाए और यह कुत्सित कार्य करते हुए समय-समय पर उनकी गोलियों से मारा जाता रहे।


“सेकुलरिज़्म-नैशनलिज़्म नहीं चलेगा, यहाँ सिर्फ इस्लाम चलेगा” और “हम पाकिस्तानी हैं पाकिस्तान हमारा है” जैसे नारे देने वाले गिलानी को वर्ष 2014 में छाती में इंफेक्शन की समस्या पैदा हुई, जिसके बाद ही वर्ष 2015 में इस व्यक्ति ने भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था।

इस मामले में गिलानी द्वारा अपने आवेदन पत्र में जानबूझकर राष्ट्रीयता का कॉलम खाली छोड़ा गया था। इस समय ही इस व्यक्ति ने यह भी कहा था कि वे स्वयं को हिन्दुस्तानी नहीं मानते, तथा उन पर और उनके लोगों पर कब्ज़ा किया गया है। 

वैसे तो गिलानी की मौत की अफवाहें कई बार फैलाई गई हैं, परन्तु 1 सितम्बर, 2021 को इस व्यक्ति के शरीर ने अपनी कुत्सित आत्मा को अंततः त्याग ही दिया। वैसे अभी तक तो किसी महान मीडियाहस्ती या कथित विचारक ने गिलानी को डॉक्टर, शिक्षक, परोपकारी जैसे विशेषणों से संबोधित नहीं किया है, परन्तु एक आशा की किरण अभी भी है कि कथित लिबरल और वामी-इस्लामी कॉकटेल आने वाले समय में यह कारनामा भी कर ही देगा।

तब तक के लिए देशप्रेमी थोड़ी प्रतीक्षा करें और इन लोगों के आने वाले नैरेटिव को काटने के लिए तर्क और ट्रोल दोनों ही तैयार रखें। 



सहयोग करें
वामपंथी मीडिया तगड़ी फ़ंडिंग के बल पर झूठी खबरें और नैरेटिव फैलाता रहता है। इस प्रपंच और सतत चल रहे प्रॉपगैंडा का जवाब उसी भाषा और शैली में देने के लिए हमें आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आप निम्नलिखित लिंक्स के माध्यम से हमें समर्थन दे सकते हैं: