अफगानिस्तान पर तालिबानी नियंत्रण: मध्य एशिया के लिए किस तरह खतरा बन रहा है तालिबान?

16 जुलाई, 2021
तालिबान अफ़ग़ानिस्तान कब्ज़ा क़ायम चुका है (चित्र साभार: अलजज़ीरा)

9/11 के आतंकी हमले के बाद, ओसामा बिन लादेन की तलाश में अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में घुस गया और इस तलाश में उसने उस तालिबान (Taliban) की सल्तनत को उखाड़ फेंका, जिसकी 90 के दशक में अफगानिस्तान (Afghanistan) में तूती बोलती थी। पिछले 20 सालों से अमेरिकी सैनिक इस्लामी कट्टरपंथी तालिबान को खत्म करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में ही डटे हुए थे।

इस दौरान अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 150 लाख करोड़ रुपए ख़र्च किए। इनमें से ज़्यादातर पैसा तालिबान के खिलाफ हुए युद्ध पर खर्च हुआ और कुछ पैसा अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को भी मिला। लेकिन फिर अचानक से अमेरिका ने ‘एग्जिट प्लान’ बना लिया। तालिबान से समझौते के तहत अमेरिका की एक ही मुख्य शर्त थी कि वो अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में अलक़ायदा (Al-Qaeda) को पनपने का मौका नहीं देगा।

अमेरिका ने राष्ट्रपति जो बायडेन द्वारा निर्धारित 11 सितंबर की समय सीमा से पहले अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना वापस ले ली। यह फ़ैसला लेते वक़्त अमेरिका ने सिर्फ अपने बारे में सोचा और अशरफ़ गनी सरकार को तालिबान के गंभीर खतरे के बीच छोड़ दिया। 20 साल तक अफ़ग़ानिस्तान में अरबों डॉलर बर्बाद करने और अपने हज़ारों सैनिकों की मौत के बाद अब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से लौट गए हैं और इसी के साथ लौट आए तालिबानी आतंकी भी! अमेरिकी सौनिक अभी पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान से निकले भी नहीं हैं, लेकिन आधे से ज़्यादा अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का फिर से कब्ज़ा हो चुका है।


अमेरिका और नाटो सैनिकों द्वारा अफगानिस्तान से लगभग 20 वर्षों के बाद अपनी वापसी करते ही ईरान, पाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ कई प्रमुख जिलों और सीमा चौकियों पर तालिबान ने नियंत्रण हासिल कर लिया है

शांति स्थापित करने के लिए युद्धग्रस्त अफ़ग़ानिस्तान के नेता भले ही दोहा में तालिबान से वार्ता करने जा रहे हों, लेकिन तालिबान अभी अफ़ग़ानिस्तान पर पूरी तरह से कब्जा करने में व्यस्त है, ताकि देश के भीतर या बाहर से उसे किसी तरह की चुनौती न दी जा सके। उसके इरादे स्पष्ट है कि सत्ता पर वो बैठेगा ही, चाहे वार्ता के माध्यम से या बंदूक के बल पर!

हालात यही बयाँ कर रहे हैं कि तालिबान एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता हथियाने वाला है। यदि ऐसा होता है, तो मध्य एशिया के लिए एकै कट्टरपंथी मजहबी गिरोह समस्या बनने जा रहे हैं। अफ़ग़ानिस्तान ऐसे में इन सभी गुटों का एक सुरक्षित अड्डा बन जाएगा।

ताजिकिस्तान से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा तक अपना नियंत्रण स्थापित कर उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया है कि ‘नॉर्दन अलायंस’ दोबारा आकार न ले सके, जिसने अमेरिका के लिए जमीनी स्तर पर काफी लड़ाई लड़ी थी। तालिबान का दावा 80% इलाकों में कब्जे का है। वर्तमान स्थिति यह है कि अफ़ग़ानिस्तान में कुल 398 जिले हैं, जिनमें से 193 जिलों पर तालिबान का कब्ज़ा हो गया है।

130 जिलों में तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान की सेना के बीच संघर्ष चल रहा है और केवल 75 जिलों पर वहाँ की सरकार का नियंत्रण रह गया है। जल्द ही क़ाबुल पर तालिबान का कब्जा होने की संभावना है और ये भारत के लिए अच्छी खबर बिल्कुल भी नहीं है। तालिबान का भारत से कभी बेहतर रिश्ता नहीं रहा और भारत एक बार फिर वहाँ साल 1992 की तरह ही अलग-थलग है।


तालिबान के साथ सबसे पहले खड़ा हुआ ‘नया पाकिस्तान’

अफ़ग़ानिस्तान पर पूर्ण कब्जे की ओर बढ़ते तालिबान ने सभी देशों को चेतावनी दी है कि कोई भी अमेरिका की मदद न करे। दिलचस्प बात ये है कि पकिस्तान ने तालिबान के खिलाफ हवाई हमलों के लिए अपना समर्थन न देने का ऐलान सबसे पहले किया है। इस बीच पाकिस्तान ने अफ़ग़ान सुरक्षाबलों को भी तालिबान पर हमला न करने की चेतावनी देकर तालिबान को अपना समर्थन दे दिया है।


सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तान तालिबान को हवाई सैन्य सहायता भी दे रहा है। तालिबान को समर्थन देने का पाकिस्तानी रुख भारत के लिए उतना ही चिंताजनक है, जितना खुद तालिबान और चीन की बढ़ती ताकत अमेरिका के लिए चिंता का विषय है। चीन पाकिस्तान के सहारे इस पूरे मसले पर एकदम सुरक्षित खेल रहा है। तालिबान को पाक के समर्थन का मतलब है भारत के ख़िलाफ़ अफ़ग़ान-चीन-पाक का एक बड़ा गठबंधन।

हालाँकि तालिबान ने कहा है कि वह कश्मीर में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन तालिबान चीन के अंदरूनी मामलों में भी दखल न देने का ऐलान कर चुका है। रही बात चीन की तो अफ़ग़ानिस्तान की खनिज संपदा पर उसकी पहले से गिद्ध-दृष्टि रही है। अगर तालिबान काबुल पर कब्जा करने में सफल रहता है तो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को अफ़ग़ानिस्तान तक बढ़ने की सारी रुकावटें खत्म हो जाएँगी।

चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ योजना में अफ़ग़ानिस्तान एक अहम हिस्सा है। इस समय चीन अफ़ग़ानिस्तान में सबसे ज्यादा निवेश करने वाला देश भी है। चीन ने पाकिस्तान के पेशावर से काबुल तक मोटर वे योजना पर भी काम शुरू कर दिया है।

इसका मतलब पाकिस्तान को अपने साथ लाने के बाद अब चीन ने अफ़ग़ानिस्तान की तरफ से भी भारत की घेराबंदी करने की प्लानिंग पर काम शुरू कर दिया है और इसे रोकना भारत के लिए बड़ी चुनौती होगी।


फिलहाल भारत ने अभी आधिकारिक रूप से तालिबान से किसी वार्ता की घोषणा नहीं कि है। भारत के लिए अगर कुछ हद तक अगर कुछ अच्छी बात है तो वो यह कि पाकिस्तान की खुद की स्थिति भी इस मामले में बहुत ज्यादा जटिल है।

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कब्जे की भारी कीमत पाकिस्तान को भी चुकानी पड़ेगी। आज सत्ता से बाहर तालिबान, सत्ता पर काबिज होने के बाद भी पाकिस्तान से दोस्ती बरकरार रखेगा या नहीं, ये एक बड़ा सवाल है।

विवाद की एक बड़ी वजह डुरंड लाइन भी होगी। तालिबान उसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार करेगा, इसकी संभावना कम ही है। फिलहाल पाकिस्तान में अफ़गान शरणार्थियों की भारी ‘घुसपैठ’ होने की संभावना है, जो पाकिस्तान में पहले से ही करीब 28 लाख है।

स्पिन बोल्डक पर कब्ज़ा

अफ़ग़ान-तालिबान ने कंधार में स्थित स्पिन बोल्डक (Spin Boldak) नाम की रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमा पर कब्जा कर लिया है। स्पिन बोल्डक बलूचिस्तान में क्वेटा के पास चमन नामक जगह में मिलता है।


आम तौर सारे अफ़ग़ान और पाकिस्तानी सीमा के इस गेट से ही एक-दूसरे देश में प्रवेश करते हैं। अफ़ग़ान शरणार्थियों की भारी आमद की आशंका के चलते पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान से लगता चमन बॉर्डर गेट पूरी तरह बन्द कर दिया है। पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं, जब अफ़ग़ानिस्तान के सैनिकों ने तालिबानी हमलों से अपनी जान बचाने के लिए ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान की ओर भागकर शरण ली।

इसके अलावा, अफ़ग़ान तालिबान और मलाला पर हमला करने वाले पाकिस्तान के ‘तहरीके तालिबान’ में भी वैचारिक समानता और मित्रता है।

अफ़ग़ान तालिबान के सत्ता में बैठने का मतलब है कि पाकिस्तान में ‘तहरीके तालिबान’ की ताकत भी बढ़ेगी। जाहिर सी बात है, पकिस्तानी चरमपंथियों और आतंकी समूहों की गतिविधियाँ भी पाकिस्तान में बढ़ेंगी।

चीन भी इस खतरे से डरता है। हाल ही में पाकिस्तान में निर्माण गतिविधियों में लगे चीनी इंजीनियरों पर हुआ आतंकी हमला इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि पाकिस्तान के हाथ भी अपनी लगाई आग में जलेंगे जरूर।

इस बीच, तालिबान ने एक बयान जारी कर स्थानीय मजहबी नेताओं को उन्हें 15 साल से अधिक उम्र की लड़कियों और 45 साल से कम उम्र की विधवाओं की सूची देने का आदेश दिया है।

तालिबान ने वादा किया है कि वो अपने लड़ाकों से उनकी शादी कराएगा और उन्हें पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान ले जाया जाएगा, जहाँ उन्हें इस्लाम में परिवर्तित किया जाएगा और फिर से संगठित किया जाएगा।

आदेश के मुताबिक, कब्जे वाले इलाकों में सभी इमामों और मुल्लाओं को तालिबानी लड़ाकों से शादी करने के लिए तालिबान को 15 साल से ऊपर की लड़कियों और 45 साल से कम उम्र की विधवाओं की सूची देनी होगी। तालिबान की मंशा ये आदेश स्पष्ट रूप से बयाँ करता है।

धीरे-धीरे तालिबान अपने कब्जे वाले इलाकों में इस्लामी कानून के अपने संस्करण को भी लागू कर रहा है। अफ़ग़ानिस्तान के बुजुर्गों का कहना है कि तालिबान उनकी बेटियों को ले जाएगा और जबरन उनकी शादी कर देगा और उन्हें गुलाम बना देगा।

उनका कहना है कि जब से तालिबान ने सत्ता संभाली है, वो निराश हैं। वो घर पर जोर से नहीं बोल सकते, संगीत नहीं सुन सकते और महिलाओं को बाजार नहीं भेज सकते। तालिबानी बाहर निकल रहे लोगों से उनके परिवार के सदस्यों के बारे में पूछ रहे हैं।





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