क्या भगवान वाल्मीकि डाकू थे? या यह कहानी दसवीं शताब्दी के बाद प्रचलन में आई?

01 अगस्त, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
कौन थे महर्षि वाल्मीकि? डाकू या ऋषि

रविवार को सोशल मीडिया साइट ट्विटर पर कई लोगों द्वारा #ArrestDhongiAnirudhAcharya लिखकर अनिरुद्ध आचार्य के विरुद्ध एक मुहिम चलाई गई। इस कथित बाबा पर वाल्मीकि समुदाय एवं महर्षि वाल्मीकि की छवि धूमिल करने का आरोप लगाया गया। इसी कारण ट्विटर पर इस क्षेत्र में शीघ्र कार्रवाई किए जाने एवं इस बाबा की गिरफ्तारी की भी माँग उठी।

इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह चर्चा हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के विषय में थी। एक लंबे समय से महर्षि वाल्मीकि को लेकर गहन चर्चा चली आ रही है। कई कथित इतिहासकारों द्वारा यह दावा किया जाता है कि वाल्मीकि अध्ययन कर ऋषि बनने से पूर्व एक डाकू थे।

परंतु इस बात में कितना सत्य है? क्या रामायण के रचयिता सचमुच ही एक डाकू थे या यह इतिहास में लिखा गया एक कोरा झूठ है?

क्या है प्रचलित कथा?

महर्षि वाल्मीकि ऋषि बनने से पूर्व रत्नाकर के नाम से जाने जाते थे तथा वे डकैती और लूटपाट करके अपने परिवार का पालन पोषण किया करते थे। एक दिन संयोगवश नारद मुनि जंगल के उस रास्ते से निकल रहे थे जिस पर रत्नाकर लोगों को लूटते थे। रत्नाकर ने नारद मुनि को बंदी बनाकर उन्हें लूटने की भी बात कही, जिस पर नारद ने उनसे पूछा कि वे इस प्रकार का पापी कार्य क्यों और किसके लिए करते हैं। इसके जवाब में रत्नाकर ने कहा कि उन्होंने अपने परिवार के पालन पोषण के लिए यह यह राह अपनाई है।

यह सुनकर नाराद ने उनसे पूछा कि क्या उनका परिवार उनके इस पाप के कार्य में उनका भागीदार है? इस पर रत्नाकर सोच में पड़ गए और नारद ने उन्हें अपने परिवार वालों से जाकर यह पूछने की सलाह दी। रत्नाकर ने जब अपनी पत्नी और पिता से जा कर यह प्रश्न किया तो उन्होंने उनके पाप में भागीदार बनने से इनकार कर दिया।

यह जानकार रत्नाकर का संसार से मोहभंग हो गया और उन्होंने मोह-माया त्याग एक साधु के जीवन को अपना लिया। इसके बाद रत्नाकर ने एक नदी तट पर क्रौंच पक्षियों के जोड़ों को प्रणय करते देख रहे थे। उसी समय एक शिकारी ने इस जोड़े के नर को अपने तीर से मार गिराया। यह देखकर आहत हुए महर्षि के मुँह से अचानक ही यह श्राप निकला-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

(हे निषाद ! तुमको अनंत काल तक (प्रतिष्ठा) शांति न मिले, क्योकि तुमने प्रेम, प्रणय-क्रिया में लीन असावधान क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की हत्या कर दी।)

अपने मुँह से निकले इस संस्कृत श्लोक के बाद ही नारद मुनि द्वारा उन्हें यह बताया गया कि उनके द्वारा ही रामायण की रचना की जाएगी और इस तरह आगे चलकर यही रत्नाकर, महर्षि वाल्मीकि बने और उन्होंने रामायण की रचना की।

डॉक्टर मंजुला सहदेव का शोध

इस कथा को लेकर कई भ्रांतियाँ भी मौजूद हैं। कई लोग इस कथा को केवल मानव रचित पुराणों की एक कहानी बताते हैं और उनका मानना है असल में वाल्मीकि डाकू नहीं थे। 

इस भ्रांति को लेकर 2010 में जालंधर के नव विकास ने एक टीवी चैनल पर मुकदमा दर्ज किया था, जिसने महर्षि वाल्मीकि को डाकू के रूप में टीवी पर दिखाया गया था। कोर्ट में दर्ज की गई याचिका में डॉ मंजुला सहदेव के शोध के आधार पर यह दावा किया गया था कि महर्षि वाल्मीकि अपने जीवन में कभी डाकू थे ही नहीं। उन्हें डाकू के रूप में प्रस्तुत कर वाल्मीकि समाज की धार्मिक भावनाएँ आहत की जाती हैं।

डॉ मंजुला सहदेव

बता दें कि डॉ मंजुला सहदेव वाल्मीकि पर रिसर्च करने के लिए पंजाब सरकार द्वारा 1995 में पंजाब विश्वविद्यालय में बनाए गए महर्षि वाल्मीकि ट्रस्ट की चेयर पर्सन थीं। इन्होंने वाल्मीकि रामायण एवं ‘संस्कृत नाटकों में राम’ विषय पर पीएचडी की है। उनके द्वारा एक किताब ‘महर्षि वाल्मीकि- एक समीक्षात्मक अध्ययन’ भी लिखी गई है।

डॉ मंजुला के इस शोध में पाया गया कि वैदिक साहित्य से लेकर नौवीं शताब्दी तक कोई ऐसे प्रमाण नहीं मिलते हैं जो ये साबित कर सकें कि महर्षि वाल्मीकि डाकू थे। इस बात का पहला संदर्भ 10 वीं शताब्दी के स्कंद पुराण में मिलता है। इससे पहले के सभी ग्रंथों में यहाँ तक कि रामायण में भी उन्हें भगवान, मुनि, महर्षि और ऋषि के उपनामों से संबोधित किया गया है।

इसके उपरांत अगला संदर्भ 15वीं शताब्दी की आध्यात्मिक रामायण में मिलता है और उसके बाद 16वीं शताब्दी की आनंद रामायण में।



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