प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए वामपंथी संपादक जोसेफ का नामांकन, जानिए क्या है विवाद

13 अक्टूबर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
कारवॉं मैगजीन के संपादक को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य पद के लिए नामित किया गया है

केंद्र सरकार द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया (PCI) समूह के लिए नामांकन दिए गए, जिन्हें लेकर सरकार की भारी आलोचना हो रही है। इन नामों में वामपंथी प्रोपेगेंडा ‘द कारवाँ’ मैगजीन के वरिष्ठ सम्पादक विनोद जोसेफ़ (Vinod K Joseph) का भी नाम शामिल है।

इसे लेकर सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि भाजपा सरकार द्वारा सालों से हिंदू-घृणा और प्रोपेगेंडा फैलाने वाली संस्था के सम्पादक का नाम नामांकित करना एक शर्मनाक कृत्य है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के पुनर्गठन को लेकर एक अधिसूचना जारी की। 7 अक्टूबर, 2021 को जारी किए गए इस नोटिफिकेशन में PCI समूह के लिए 22 सदस्यों का नामांकन किया गया था, जिनमें ‘द कारवाँ’ मैगज़ीन के एक्जीक्यूटिव एडिटर विनोद जोसेफ़ का भी नाम था।


बता दें कि ‘कारवाँ’ मैगजीन एक लंबे समय से हिंदू घृणा और हिंदुओं के विरुद्ध झूठे नैरेटिव समेत कई प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्ट चलाती आ रही है। इस सब के बाद इस मैगजीन के एक वरिष्ठ सम्पादक को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में लेना केंद्र सरकार को भारी पड़ रहा है क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी इस मामले में सरकार की आलोचना कर रही है।

सोशल मीडिया पर विरोध 

कई लोगों ने सोशल मीडिया और ट्विटर पर भाजपा के विभिन्न मंत्रियों को टैग करते हुए यह सवाल उठाया कि उनकी सरकार इस तरह के हिंदू घृणा से भरे पत्रकारों का पीसीआई में नामांकन कैसे भेज सकती है? लोगों ने भाजपा पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का भी आरोप लगाया।


सेवानिवृत आईएएस और राजनीतिक विश्लेषक संजय दीक्षित ने भी इस मामले में ट्वीट करते हुए लिखा कि क्या किसी ने इस बात का संज्ञान लिया कि PCI ले लिए कैसे लोगों का नामांकन भेजा जा रहा है?

संजय दीक्षित ने लिखा है कि विनोद जोसेफ़ जैसे लोगों का नामांकन करके ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा कोई लोग यह मानते हैं कि राष्ट्रवादी और हिंदू हित की बात करने वाली आवाज़ों का देश में कोई मोल नहीं और देश के हर दुश्मन का तुष्टिकरण होना चाहिए।


हालाँकि, एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार दावा किया जा रहा है कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया में सदस्यों को नामित करने के लिए भारत सरकार जिम्मेदार नहीं है। फिर भी, सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे जो पत्र विवाद का विषय हैं, उनमें लगा भारत सरकार का चिन्ह तब भी इस प्रकरण को संदेहास्पद ही बनाता है।

उल्लेखनीय है कि ये वही कारवाँ मैगजीन है जिसने पुलवामा आतंकी हमले में आतंकियों का मजहब छुपाने के साथ-साथ बलिदानी जवानों की जाति तक पर वामपंथी प्रोपेगेंडा चलाया था।

इस प्रोपेगेंडा के कहानीकार ‘एजाज अशरफ’ ने यह साबित करने का प्रयास किया था कि पुलवामा हमले में ‘सवर्ण जातियों की हिस्सेदारी’ न के बराबर है। इसके अलावा यह भी साबित करने का प्रयास किया गया था कि कैसे एक आतंकी हमले के लिए सिर्फ ‘सवर्ण हिंदू’ साजिश रच रहे हैं।

इस आर्टिकल में कारवाँ के लेखक एजाज अशरफ ने सीआरपीएफ के तमाम जवानों के ताबूतों में से सबकी जातियाँ ढूँढ निकाली और फिर लिखा कि देखिए ‘मरने वालों में सिर्फ 12.5% ही सवर्ण हैं और बाकी जवान पिछड़े-दलित हैं’। कारवाँ ने लिखा कि ये सवर्णों की पिछड़ों के खिलाफ साजिश है।

कारवाँ के अजेंडा का हिस्सा

NSA डोभाल और उनके बेटों पर लगाए थे मनगढंत आरोप

इसके अलावा ये वही कारवाँ है, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और उनके बेटों पर मनगढंत आरोप तक लगा दिए थे। इसके लिए विवेक डोभाल ने मानहानि का भी केस दायर किया था, जिसके बाद कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश को माफ़ी भी माँगनी पड़ी थी।

क्या करता है प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया

बता दें कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना प्रेस काउंसिल एक्ट 1978 के तहत की गई थी। इसमें कुल 28 सदस्यों की टीम बनाई जाती है। इनमें से 3 लोकसभा सदस्य, 2 राज्यसभा सदस्य, 3 अखबारों के संपादक, 7 कार्यप्रणाली से जुड़े पत्रकार होते हैं।

इसके साथ ही इसमें तीन ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें सार्वजनिक जीवन को लेकर विशेष ज्ञान होता है। साथ ही, एक ऐसा व्यक्ति होता है जो किसी न्यूज़ एजेंसी का संचालन कर रहा हो और 6 ऐसे लोग जो किसी अखबार का संचालन कर रहे हों।

पीसीआई पत्रकारिता से जुड़े कई मुद्दों को देखता है, जैसे अखबारों और न्यूज़ एजेंसियों की स्वतंत्रता का बना रहना। इसके साथ ही पत्रकारों के आचार संहिता एवं प्रोफेशनल मानकों पर भी यह नज़र रखता है। पीसीआई ख़बरों की सत्यता एवं समाचारों के उच्च मानकों को भी जनता के लिए सुनिश्चित करता है।

इस सबके बीच प्रोपेगेंडा चलाकर पत्रकारिता में नाम कमाने वाली और देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए घृणा भाव रखने वाली ‘द कारवाँ’ मैगजीन के वरिष्ठ संपादक को इतना महत्वपूर्ण पद देना सरकार की नीयत पर सवाल तो अवश्य ही खड़े करता है।



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