माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से संवाद

04 मई, 2021 By: अजीत भारती
बंगाल में जारी हिंसा पर अब भी मौन है केंद्र सरकार?

प्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, आज के इस संवाद में पहले मैं आपको वस्तुस्थिति से अवगत कराना चाहूँगा, और उसके बाद कुछ समाधान बताऊँगा। मैं चाहता तो खूब कड़े शब्दों में आपसे प्रश्न पूछ देता कि भाजपा बंगाल में कर क्या रही है, परंतु हम शायद उस कालखंड से आगे आ चुके हैं। पूर्वी बीरभूम जिले के आउसग्राम थाना के काँकोरा गाँव को फूँक दिया गया है, यह गाँव आदिवासियों का है। लोग गाँव छोड़ कर जंगलों में छुपे हुए हैं। पूर्व मेदिनीपुर में एक गाँव में हनुमान मंदिर तोड़ कर सामने के तालाब में फेंक दिया गया है। सीतलकूची तो याद ही होगा जहाँ चुनाव वाले दिन ही भाजपा कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी, वहीं आज मानिक मित्रा, चन्दन रॉय और मिंटू बर्मन की नृशंस हत्या कर दी गई है।

यहाँ तो गाँव के गाँव तोड़े गए हैं, 2-3000 लोग अपने गाँव छोड़ कर भागे हुए हैं जान बचाने के लिए। बीरभूम के नानूर की खबर तो आपको पार्टी के सांसद स्वपन दासगुप्ता जी से मिल ही गई होगी कि हजार से ज्यादा परिवार खेतों में छुपे हुए हैं। इसी जगह भाजपा के दो महिला पोलिंग एजेंट के साथ कल गैंगरेप किए जाने की भी खबर आई थी। डायमंड हार्बर के उत्तर पंचोग्राम में तीन सौ घरों को लूट लिया गया। पूर्वी बर्धमान के धात्रीग्राम में मंदिर तोड़े जा रहे हैं। बर्धमान के मेमारी में भी मंदिरों को तोड़ा गया है। बर्धमान के ही जमालपुर में हिंसा के प्रतिरोध में दो मुसलमानों की भी हत्या हुई है।

माननीय मोदी जी, ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसा होती थी, यह तो सर्वविदित है, परंतु चुनाव के तुरंत बाद इस तरह की लूटपाट, आगजनी और हिंसा पिछले दस सालों में बंगाल में कभी नहीं हुई। यह तो मुलायम सिंह यादव को समाजवादी पार्टी का दौर याद दिलाता है जब दलितों की बस्तियाँ फूँक कर जीत का जश्न मनाया जाता था। प्रधानमंत्री जी, एक और नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है इस बार टीमसी की जीत के बाद: अब हिन्दुओं के दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है। एक हिंसक भीड़ बाजारों में हिन्दुओं को दुकानों को चिह्नित कर के लूट रही है। पहले घर पर हमले होते थे, लोगों को पीटा जाता था, लेकिन इस बार हिन्दुओं और भाजपा समर्थकों के अर्थतंत्र को भी निशाना बनाया जा रहा है। यह नई आग है, और आप ही इससे बंगाल को उबार सकते हैं।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, आप भारत जैसे वृहद राष्ट्र के लिए आशा की एक किरण बन कर आए थे, और आपके द्वारा किए गए कार्यों ने उस किरण को अब एक देदीप्यमान सूर्य में बदल दिया है। ‘चलता है’, ‘सरकारी में तो यही मिलता है’ जैसे वाक्यों को ढो रही इस सभ्यता में आपने न सिर्फ उम्मीद जगाई बल्कि सनातन संस्कृति की ध्वजा पकड़ने वालों के लिए एक संबल बन कर आए। आपने माँस के लोथड़े जैसी जनसंख्या में रीढ़ की हड्डी लगाई। हमारे जैसे करोड़ों युवा इसके लिए आपके आभारी हैं। हम आपके होने, और न होने, दोनों ही का अर्थ समझते हैं, इसी हेतु इस वैचारिक समर के मध्य में हम आपके लिए समस्या नहीं समाधान की बात ले कर आए हैं।

माननीय प्रधानमंत्री जी, बंगाल में जो हो रहा था, उसे रोकने के लिए आप और आपकी पार्टी ने स्वयं को आपादमस्तक झोंका था। यह सत्य है कि परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। साथ ही, इस सत्य के प्रतिफलित होने से निकला परिणाम इतना भयावह होगा, इसकी कल्पना हम सब करे रहे थे। पुष्ट और अपुष्ट खबरों की मानें, तो बिना संख्या बताए, यह कहा जा सकता है कि कई भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, भाजपा के कार्यालयों में आग लगाने के वीडियो सामने आ रहे हैं, भाजपा समर्थकों के घर में गुंडे घुस कर तोड़-फोड़ और उपद्रव कर रहे हैं, उनके दुकान लूटे जा रहे हैं… माननीय प्रधानमंत्री जी, आप तक कदाचित यह समाचार भी पहुँचा हो कि दो पोलिंग एजेंट्स का सामूहिक बलात्कार कल, यानी तीन मई की शाम को, हुआ! ये खबरें तो राष्ट्रीय मीडिया में चल रही हैं लेकिन मैंने जो शुरुआत में बताया और दिखाया, वो कहीं पर भी नहीं दिख रहा क्योंकि मीडिया की प्राथमिकता भी अपने संस्थान और अपना जीवन बचाना ही है।

देर शाम यह खबर आई कि भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने इन घटनाओं का संज्ञान लिया है और इस पर कार्रवाई होगी। महोदय, आप अनुभवी हैं, आपने उस राज्य कों भी दंगामुक्त कर दिया जहाँ लग रहा था कि असंभव होगा, फिर बंगाल तो उसके सामने कुछ भी नहीं। भारतीय संविधान में एक अनुच्छेद है जो राष्ट्रपति महोदय को, मंत्री परिषद के अनुमोदन पर चुनी हुई सरकार द्वारा संवैधानिक तरीके से काम न करने की स्थिति में छः महीने से तीन साल तक राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति देता है।

अनुच्छेद का नाम है 356 जो कॉन्ग्रेस की सरकारों ने न सिर्फ मनमाने तरीके से बल्कि कुछ मामलों में तो असंवैधानिक तरीके से लगाया है। 2005 में बिहार में राष्ट्रपति शासन कैसे लगा था, यह किसको याद नहीं। माननीय प्रधानमंत्री जी, क्या आप यह नहीं मानते कि इस चुनाव के पहले हुई 135 हत्याएँ और उन परिवारों को किसी भी तरह के न्याय न मिलने की स्थिति उनके संविधान प्रदत्त अधिकारों का हनन है? अगर आपने चुनाव के पहले राष्ट्रपति शासन नहीं लगवाया, तो क्या आप अब भी, पिछले एक दिन की हुई घटनाओं के आलोक में भी, ऐसा नहीं करेंगे?

आपको न तो सरकार गिरने की चिंता होनी चाहिए, न ही सुप्रीम कोर्ट की क्योंकि आपके वकील इतने सक्षम तो होंगे ही कि उन 135 परिवारों के साथ-साथ, 2 और 3 मई को गिरी लाशों वाले परिजनों को मीलॉर्डों के सामने परेड करवा कर पूछें कि ‘हाउ मच इज़ एनफ?’। अखबार की कतरनें दिखा कर वामपंथी गर्भवती होने के नाम पर, विद्यार्थी होने के नाम पर आतंकियों और उनके हिमायतियों को छुड़ा ले जाते हैं, क्या आपके पास पेड़ों में टँगी लाशों की, जीवित जले हुए शरीरों की, कँटीले तार से बिंधे देहों की तस्वीरें नहीं हैं? मैं तो आपके ही कार्यकर्ताओं से मिल कर आया हूँ, आप दो दिन का वक्त देंगे तो आपके ही पार्टी के लोग आपको सारी जानकारी दे देंगे।

यह तो आप भी जानते हैं महोदय कि चुनावी जीत के बाद विपक्षी पार्टी के समर्थकों के जीवन की रक्षा वही संविधान करने को कहती है जिसकी शपथ ले कर आप प्रधानमंत्री बने और जिस संसद भवन की सीढ़ियों पर सर झुकाते हुए आप इस राष्ट्र के नायक के रूप में स्वीकारे गए। महोदय, उनके जान की, उनके घरों की, उनके दुकानों की, उनके परिजनों की भी तो कीमत है इस बंगाल में। फिर अनुच्छेद 356 लगाने में डर कैसा?

आप विरोधियों से क्यों डरते हैं? आप उस जनता के प्रति जवाबदेह हैं जिसने आपको उम्मीद से चुना है। आपको न कोई कानून, न संविधान इस पर कठोर कार्रवाई करने से रोकती है। आखिर चुनावों के पहले के 135 और कल की 11 से 28 कार्यकर्ताओं की कथित हत्याओं पर एक्शन लेने में आप किससे खौफ खा रहे हैं? आप अनुच्छेद 356 का प्रयोग कीजिए। सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है यह तय करना कि राष्ट्रपति शासन लगे या न लगे। न संसद की अनुमति चाहिए, न कोर्ट की। यह विशुद्ध संवैधानिक प्रक्रिया है जो कि मंत्री परिषद के कहने पर राष्ट्रपति लागू कर सकते हैं। उसके बाद, आप छः महीने तक हर गुंडे, हत्यारे और अपराधियों को न सिर्फ जेल में डालिए बल्कि विशेष न्यायालयों के प्रावधान के साथ उन्हें सजा दिलवाइए और हर उस पुलिस अधिकारी की नौकरी खत्म कीजिए जिन्होंने चुप्पी साधना बेहतर समझा। उन पर आपराधिक साजिश और साक्ष्यों को मिटाने का, अपराधियों का साथ देने का मुकदमा चलाइए और इस क्रूर राजनीति का अंत करवाइए।

जब घर में तिलचट्टे ज्यादा हो जाते हैं तो जहरीली स्प्रे का प्रयोग करना ही पड़ता है। लेकिन यह सुन कर दुख होता है कि कैलाश विजयवर्गीय जी ट्वीट कर के ‘हैशटैग शेम ममता’ लिख रहे हैं। और भी घोर आश्चर्य की बात यह है कि पोलिंग एजेंट के सामूहिक बलात्कार और कार्यकर्ताओं की हत्याओं के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर धरना देने की बात की है। यह धरना भी कोरोना के प्रोटोकॉल के अधीन होगा। फिर तो सम्माननीय अध्यक्ष महोदय ऑनलाइन हैशटैग ट्रेंड करवा कर वैश्विक स्तर पर भी धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी, आप अनुभवी हैं, सरकारों को चलाने का भी अनुभव है लेकिन सत्ता में रह कर यह विपक्ष वाली तकनीक का प्रयोग क्यों कि आप धरना देंगे? धरना तो महँगाई, पुल टूटने और काम न होने की स्थिति में देते हैं, यहाँ नरसंहार हो रहा है और भाजपा धरना देगी, ट्वीट करेगी?

महोदय! पाकिस्तानियों को जब आप घर में घुस कर मार सकते हैं, तो फिर अपने ही कार्यकर्ताओं के जीवन, आदिवासियों के गाँवों, हिन्दुओं के मंदिरों, घरों और दुकानों को बचाने के लिए अपने ही संविधान और कानून व्यवस्था का प्रयोग कीजिए। राष्ट्रपति शासन लगाने में हिचकिचाहट है तो क्या पार्टी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय और भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे को ले कर ममता की सरकार और पुलिस के खिलाफ मामले दर्ज किए? कम से कम वो तो दर्ज कीजिए और अपने पार्टी के लोगों से उस पर नैरेटिव तो बनाने कह ही सकते हैं। इसी नैरेटिव की शक्ति थी कि आप सत्ता में आए थे, फिर उसका प्रयोग लोगों में एक जन आंदोलन चलाने के लिए क्यों नहीं किया जा रहा? ये जो आईटी सेल है वो क्या हैशटैग चलाने और अपने ही लोगों को ट्रोल करने भर के लिए बना रखा है भाजपा ने? उनसे पोस्टर्स बनवाइए, हर मीडिया संस्थान में इन मुद्दों को विशुद्ध आँकड़ों के साथ रखिए। चुनाव खत्म हो चुका है, इस आईटी सेल से कहिए कि वो पहले तो अपना घमंड त्यागे और पार्टी के लिए कुछ ढंग का काम करे वरना दस रुपए ले कर ट्वीट करने के काम तो बाकी लोग भी कर ही रहे हैं, भाजपा इनको क्यों ढो रही है?

माननीय मोदी जी, एक और रास्ता है जो आपको आने वाले समय में प्रयोग में लाना पड़ सकता है। हाल के दिनों में जब एक के बाद एक राज्य ने अपने यहाँ सीबीआई को आने की स्वाभाविक अनुमति देने से इनकार कर दिया है, तब केन्द्र सरकार ने क्या किया? आप ही के द्वारा गठित नीति आयोग का सुझाव आया है कि पुलिस को राज्यों की सूची से निकाल कर, संयुक्त सूची यानी कन्करेंट लिस्ट में डाल दिया जाए। क्योंकि, कई मामले ऐसे हैं जिनका प्रभाव एक राज्य से दूसरे राज्य तक में होता है।

जब आपके कार्यकर्ता मर रहे हैं, जब संघ के युवाओं की बलि चढ़ रही है, तब भाजपा के पास केन्द्रीय जाँच एजेंसियों के प्रयोग का रास्ता तो है ही। आखिर इतनी ज्यादा मौतों के बाद भी ममता बनर्जी की सरकार उन्मुक्त विचरण क्यों कर रही है? पिछले दो दिनों में जो हुआ है, उस पर आपके गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट मँगवाई है और गवर्नर साहब ने सचिव को तलब किया है। महोदय! यह बताइए कि रिपोर्टों और आधिकारिक बुलावों की राजनीति के बीच सामूहिक बलात्कार की शिकार उन पोलिंग एजेंट्स या फिर दर्जनों नृशंस हत्याओं के शिकार कार्यकर्ताओं की वेदना क्या खो नहीं जाएगी? गरीबों को अपना घर खड़ा करने में समय नहीं लगेगा? हम यह उम्मीद तो रख ही सकते हैं कि केन्द्रीय नेतृत्व स्वयं आज से अगले सप्ताह, या पूरे महीने बंगाल में इन आदिवासियों के साथ, कार्यकर्ताओं को साथ खड़ा रहे। हमें यह तो दिखना चाहिए कि जेपी नड्डा हों या कैलाश विजयवर्गीय, ये लोग उन्हीं घरों की ईंट लगा रहे हैं, जिन्हें गुंडों ने तोड़ दिया।

बदलाव के लिए तो चुना था आपको, लेकिन उसका तात्पर्य यहीं तक तो नहीं था कि पीड़ित परिवारों को छब्बीस जनवरी को दिल्ली में आमंत्रित किया जाए। दिल्ली ले आए थे तो इस सर्वकालिक धरना स्थल वाले जगह पर उन परिवारों को आपने सुप्रीम कोर्ट के आगे धरना क्यों नहीं दिलवाया? आखिर, जब कुछ गुंडे दिल्ली का बॉर्डर पाँच महीने से बंद किए रह सकते हैं, कुछ अपराधी सौ दिनों तक मुख्य सड़क पर बैठ कर पूरी दिल्ली को पंगु बना सकते हैं, तो फिर ऐसे सही प्रदर्शनों को दिल्ली में क्यों जगह नहीं दिलवा पाती सरकार?

मोदी जी, आप इन सारे परिवारों को बुलाइए, इनके लिए टेंट लगवाइए, कूलर, टीवी और इंटरनेट को इंतजाम के साथ, भोजन पानी की व्यवस्था कीजिए और सुप्रीम कोर्ट के मीलॉर्डों की मखमली राह में बिठा दीजिए। वो संज्ञान लेंगे और एक दिन में लेंगे। मीलॉर्ड लोगों की राह में कोई आता है तो जल्दी संज्ञान लेते हैं। माननीय प्रधानमंत्री जी, जिनके घर से बाइस साल के बेटा चला गया हो, तीस साल का पति पेड़ से लटका दिया गया ह, बयालीस साल का पिता अधजली अवस्था में नदी से निकला हो, वो कहीं भी, किसी भी समय तक बैठा रह सकता है अगर आप विश्वास दिला दें कि उन्हें न्याय मिलेगा।

विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी क्या इन दो सौ परिवारों के हजार-पंद्रह सौ लोगों को लिए टेंट और बिछौने का इंतजाम नहीं कर सकती? क्या आपका आईटी सेल ट्विटर से विलग इनके लिए एक यूट्यूब चैनल नहीं खोल सकता? क्या वो लोग इनके लिए चार पन्ने का अखबार नहीं छाप सकता? क्या इनके लिए पोस्टर बनाने वाले लोग भाजपा नहीं ला सकती? मुझे तो संदेह नहीं है कि आपकी पार्टी के पास फंड की कमी होगी। और हाँ मोदी जी, अगर वास्तव में फंड की कमी हो, तो आप बताइए तो, कोई सिग्नल दीजिए, सौ-दो सौ करोड़ रुपए तो हम हिन्दू चंदा कर के इकट्ठा कर लेंगे। आप हमें रास्ता तो दिखाइए। हम वैयक्तिक स्तर पर अपने मृतक भाइयों के लिए जितना कर सकते हैं, उससे अधिक ही करेंगे।

प्रधानमंत्री जी, आप मन की बात करते हैं, मैं भी वही कर रहा हूँ। और यह बोलते वक्त हृदय भर आया है क्योंकि आपको छोड़ कर और कोई राह दिखती नहीं। आप कड़े ही नहीं कठिन और अविश्वसनीय निर्णय लेने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। आपको एक लकीर खींचनी ही होगी कि बस, अब और नहीं। मोदी जी, आप उनमें से नहीं हैं जो अपने ही लोगों पर भारतीय वायुसेना से बमबारी करवा दे। महोदय, आप नरेन्द्र दामोदरदास मोदी हैं, जो स्टेशन पर चाय बेचने के संघर्ष की आग से तप कर कुंदन बन कर निकला है। आपको इसका भान है कि मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए, दैनिक श्रम कर पेट भरने वालों के लिए, एक कमाने वाले पुत्र की अहमियत क्या होती है। आप वास्तविकता से कटे लुटयन्स के लाल पत्थरों वाले संवेदनहीन महलों के निर्मम गलियारों से नहीं आए हैं जिनके लिए मृत व्यक्ति या तो राजनैतिक तंदूर में थूक कर लगाई जाने वाली रोटी है, या फिर एक संख्या। आप जानते हैं कि दो मई 2021 से गिरने वाली हर लाश के साथ एक-एक परिवार पथराई आँखों वाली अचल मूर्तियों की तरह अपने घरों में बंद हो कर रह जाएगा।

महोदय! आपने तो उन परिजनों को मंच पर बुला कर वार्तालाप भी किया था, ढाढस भी बँधाया था। आपकी स्मरण क्षमता से तो सब परिचित हैं, आपको तो एक-एक व्यक्ति की शिथिल आँखें, झुके कंधे याद होंगे। आप इन निर्दोष परिवारों को, इन याचना भरे चक्षुओं को, भावशून्य हो चुके आननों को, न्याय की आस त्याग चुकी विधवाओं को, पिता के वापस आने की राह तकती बच्चियों को, इकलौते पुत्रों को खो चुकी उदास माँओं को देख कर, उनकी विपदा की कहानी सुन कर भी द्रवित नहीं हुए होंगे, ऐसा प्रतीत नहीं होता। आप अपनी माँ से जिस सहृदयता से मिलते हैं प्रधानमंत्री जी, वो हर भारतीय के लिए सांस्कृतिक गौरव की विषयवस्तु है। मोदी जी, कई माँओं ने अपने पुत्रों को किशोरावस्था और युवावस्था में जिस नृशंसता की बलि चढ़ते देखा है, उनकी छाती फट जाती है वही कहानी बार-बार कहते हुए। मोदी जी, आपको पता है कि वो माँ, वो पत्नी, वो भाई, वो पिता बार-बार अपनी पीड़ा हर मीडिया वाले से क्यों कहते हैं? क्योंकि ऐसे परिवारों को, जो पुलिस, प्रशासन और न्यायालयों से न्याय की उम्मीद त्याग चुके हैं, मीडिया के द्वारा चर्चा में आने से, उस पीड़ा को देख कर किसी सत्ताधीश की आँख डबडबाने की आशा रहती है। इसीलिए, वो बार-बार उसी दुख से गुजरते हैं।

हे नरेन्द्र! बंगाल में वही दौर वापस लौटा है। उसकी एक झलक दिख गई है। अब समय रिपोर्ट और जवाबतलबी का नहीं रहा। वह तो राज्यपाल महोदय लम्बे समय से कर रहे थे, आप भी जानते हैं कि एक तानाशाह और विकृत मानसिकता की स्त्री ऐसे राज्यपालों को कितनी गंभीरता से लेती है। राष्ट्रपति शासन लगवाइए, और छः महीने में बंगाल को रहने लायक बनाइए। लोग कहेंगे कि बंगाल ने चुन लिया है ममता को। आप उनसे कहिए कि कई बार आपको जब तक नई चीज हाथ में नहीं दे दी जाती, आपको पता ही नहीं होता कि आपका जीवन बेहतर हो सकता है। आप उन्हें समझाइए कि यही लोकतंत्र आपको उसी संविधान के माध्यम से ऐसी क्रूर सत्ताओं को हटाने के लिए रास्ते उपलब्ध कराता है। जिस शेर ने कश्मीर से 370 हटा दिया, उसके लिए बंगाल का कचरा साफ करना बड़ी बात नहीं।

माननीय प्रधानमंत्री जी, अंततः बस यही कहना चाहूँगा कि लोकतंत्र के क्रियान्वयन हेतु तंत्र के साथ लोक का होना भी आवश्यक है। यहाँ तो ‘लोक’ हर दिन दस के हिसाब से घेर कर मारा जा रहा है। इसमें तंत्र का इस्तेमाल कीजिए और बंगाल को हिंसा के इस दौर से मुक्ति दिलवाइए। अगर आप यह नहीं करेंगे तो इतिहास आपको उन्हीं लोगों में गिनेगा जो लाशों की संख्या रैलियों में सिर्फ इसलिए बोलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सुनने वालों का गुस्सा वोट के रूप में उन्हें सत्ता तक पहुँचाएगा। आप सत्ता से दूर किए जा चुके हैं, अगले चुनाव की तैयारी के लिए आपको लोगों की आवश्यकता होगी। आप ही बताइए कि अगर पाँच सालों में इसी दर से आपके स्थानीय कार्यकर्ता मारे जाते रहेंगे, तो आप किनके बल पर अमित शाह जी की चाणक्य नीति का प्रयोग कर के सत्ता में आएँगे?

आभार आपका

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