बंगाल के पीड़ित भाजपा कार्यकर्ता किस सरकार से न्याय माँगें

07 मई, 2021 By: पुलकित त्यागी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह (फ़ाइल फ़ोटो)

बंगाल से पिछले कुछ दिनों से जिस प्रकार के हृदय खिन्न कर देने वाले चित्र व वीडियो सामने आ रहे हैं उन्हें देखकर किसी भी साधारण व्यक्ति का मन विचलित हो जाना कोई आश्चर्यजनक बात न होगी। लेकिन अब हालात यह हैं कि भारतीय अथवा विशेषकर बंगाल की राजनीति से शून्य मात्र भी संबंध रखने वाले किसी व्यक्ति के जीवन पर यह समाचार, शवों के यह चित्र अथवा वीडियोज उतना ही प्रभाव डालेंगे  जितना किसी मोर्चरी के चौकीदार पर।

ऐसा नहीं है कि ऐसा बंगाल या भारत में ही कहीं पहली बार हो रहा हो। राजनीतिक प्रतिशोध के नाम पर जलते घर एवं क्षत-विक्षत शव इस देश के इतिहास ने अनेक बार अनुभव किए हैं।

एक ओर जहाँ बिहार में लालटेन के जलने पर भूमिहार, राजपूतों से लेकर ‘महादलितों’ ने अपनी झोपड़ियाँ जलती देखी हैं तो वहीं उत्तर प्रदेश में दलितों ने अपनी समस्त बस्तियों को विभिन्न अवसरों पर साइकिल के टायरों के नीचे कुचला पाया है। बंगाल भी करीब 30 वर्षों तक लाल क्रांति के नाम पर सड़कों को आम जनमानस के रक्त से पाटा गया।

वह एक बुरा दौर था। एक ऐसा दौर, जब लोकतंत्र लोकतंत्र न होकर गुण्डातंत्र था। चुनाव केवल बहीखातों व धूल भरे दस्तावेजों की एक छवि मात्र हुआ करते थे। बैलेट बॉक्स केवल नाम की ताकत था। धरातल पर राज सिर्फ ‘बुलेट बॉक्स’ का ही चला करता था। आम जनमानस का विश्वास राजनीति से उठ चुका था। उसने यह स्वप्न देखना भी त्याग दिया था कि एक वोट डालकर उसके जीवन में कोई बदलाव आ सकता है। समय ने अपना कालचक्र पलटा और EVM ने भारतीय राजनीति में एक डिजिटल क्रांति के रूप में प्रवेश किया।

भारतीय राजनीति का एक सुगम समय प्रारंभ हुआ। लोगों द्वारा अपनी इच्छानुसार नेता चुने जाने लगे। छोटे-बड़े राज्य अपने सीमित संसाधनों के साथ विकास की ओर बढ़ाने ही लगे थे। ऐसे समय में किसी ने यह न सोचा था कि वह भयावह भूतकाल राष्ट्र के राह में एक बार पुनः रोड़ा बन आ खड़ा होगा।

वर्ष 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों के उपरांत देश की राजधानी में जिस प्रकार हिन्दू विरोधी दंगों ने अपना रूप दिखाया, उसे देख समस्त राष्ट्र भयभीत था। देश की राजधानी कई दिनों तक जलती रही। जनता ने इसे इत्तेफाक मात्र मान कर भुलाना चाहा। परंतु इस घटना को महज इत्तेफाक के बजाय एक तय षड्यंत्र के रूप में सामने आने में केवल एक वर्ष का समय ही लगा।

बंगाल सदा ही हिंदू-मुसलमान विरोधाभास का एक गढ़ रहा है। फिर चाहे वो स्वतंत्रता से पूर्व ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ हो या स्वतंत्रता के उपरांत अलग-अलग क्षेत्रों में हुए विभिन्न हिंदू नरसंहार! 2021 बंगाल विधानसभा चुनावों ने इन सभी मानकों को बौना साबित कर दिया।

भारतीय जनता पार्टी द्वारा एक ओर जहाँ सोनार बांग्ला का नारा दिया गया, वहीं ममता बनर्जी द्वारा राज्य में ‘खेला होबे’ का नारा बुलंद था। दोनों ही पार्टियों द्वारा प्रचार में समस्त संसाधनों का उपयोग कर अपने अपने विजय रथ को सम्पूर्ण तेल पिलाया गया। 

इस दौरान भाजपा एवं संघ के ढेरों कार्यकर्ताओं के घरों के चिराग भी बुझ गए। धरातल पर खून-पसीना बहा रहा संघ अथवा भाजपा का वह कार्यकर्ता केवल इस आस में था कि शायद उसकी पार्टी की विजय के उपरांत उसे 10 वर्षों के इस जंगलराज से मुक्ति मिलेगी।

लेकिन चुनाव नतीजों ने सब कुछ पलट कर रख दिया। मई 2, 2021 की तारीख़ बंगाल भाजपा कार्यकर्ताओं के जीवन में और अंधेरा ले कर ही आई। तृणमूल कॉन्ग्रेस ने 200 से अधिक सीटों पर अपना आधिपत्य जमाते हुए एक बार पुनः राज्य में सरकार बना डाली।

इसके साथ ही प्रारंभ हुआ एक और रक्तरंजित खेल। 2 मई की रात से ही एक के बाद एक भाजपा कार्यकर्ताओं को मारे जाने के समाचार आने लगे। हिंदुओं और आदिवासियों के गाँव जला दिए गए। महिला कारकर्ताओं के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आ रही हैं।

लंबे समय तक न तो पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं, न ही देश के गृहमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा इस पर कोई टिप्पणी की गई। खुद केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और भाजपा के नेता पीड़ित बन कर ही सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं।

अब देखना यह है कि इस राजनीतिक गुंडागर्दी से केंद्र सरकार कैसे निपटती है और अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मान और जीवन की रक्षा करने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है। केंद्र सरकार का यही निर्णय तय करेगा की बंगाल का ‘भविष्य’ एवं ‘भूगोल’ दोनों ही क्या होंगे?



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