'गेट वेल सून' के संदेशों से नहीं रुकती हिंसा: कम्युनिस्टों से TMC ने सीखा, अब आपकी बारी है

05 मई, 2021 By: आनंद कुमार
बंगाल में हो रही हिंसा का समाधान क्या है? (चित्र साभार: टेलीग्राफ़)

विख्यात उपन्यास ‘द गॉडफादर’ में डॉन कार्लीऑन अपने कुछ उसूलों के साथ माफिया राज चलाता होता है। एक बार उसके पास नशे के कुछ व्यापारी आते हैं, जिनके साथ काम करने से वो इंकार कर देता है। नतीजा ये होता है कि नशा बेचकर पैसे कमाने के लालच में कुछ लोग कार्लीऑन के दुश्मन बन जाते हैं।

उसकी शक्ति ख़त्म करने के लिए वो उसके सबसे खतरनाक माने जाने वाले अपराधी लूका ब्रेसी को मारकर उसकी लाश गायब कर देते हैं। कार्लीऑन को भी गोलियाँ लग चुकी होती हैं और उसके बेटे सत्ता संभाल रहे थे। वो लोग परेशान हो रहे होते हैं कि ऐसे माहौल में लूका ब्रेसी कहाँ गायब है?

एक दिन बैठक चल ही रही थी कि एक पैकेट आता है। जब उसे खोला जाता है तो अन्दर से एक समुद्री मछली और लूका की बंडी निकलती है। बाकी सारे लोग समझ जाते हैं कि क्या हुआ है मगर कार्लीऑन का सबसे छोटा बेटा माइकल हैरान हो जाता है। वो पूछता है कि आखिर हुआ क्या? ये किस तरह का सन्देश है? उसे बताया जाता है कि लूका ब्रेसी की बंडी उसकी पहचान के लिए है और मछली का मतलब कि उसकी लाश समुद्र के तल में कहीं फेंककर गायब कर दी गई है।

हिंसा के साथ ये बड़ी अजीब सी चीज है। जब तक उससे सामने से पाला न पड़ा हो, वो समझ में ही नहीं आती। दिल्ली में सर पर पट्टी बाँधने का नाटक किये एक तथाकथित नेत्री आयशी घोष भी जब भाजपा को फासिस्ट बताती होंगी तो उनका असल में हिंसा से पाला ही नहीं पड़ा था। बंगाल के जमुरिया से जब वो चुनाव लड़ने उतरी, तो वो एक ऐसी सीट थी जहाँ से वाम मजहब के लोग पिछले चालीस वर्षों से नहीं हारे थे। चुनावों में पंद्रह प्रतिशत मतों के साथ वो वहाँ से हार गई। लेकिन अभी उनका ‘फासिज्म’ समझना बाकि था। उम्मीद है कल के बाद से उन्हें फासिज्म की बढ़िया जमीनी समझ हो गयी होगी। बंगाल के कॉन्ग्रेसी भी अब फासिज्म समझने लगे हैं।

जहाँ तक हिंसा को रोकने का प्रश्न है, वो आज तक कभी भी अहिंसा से नहीं रुकी। अहिंसक बामियान बुद्ध की प्रतिमाओं को बचाया नहीं जा सका। अहिंसक नालंदा के बौद्ध भिक्षुक नहीं बचे थे। अहिंसक शिया धर्मगुरु सईद मुहम्मद बाकिर अल सद्र (1 मार्च, 1935- 9 अप्रैल, 1980) जो की इराक के शिया दार्शनिक और इस्लामिक दावा पार्टी के विचारधारा के संस्थापक भी थे, उन्हें सद्दाम हुसैन ने छोड़ तो नहीं दिया था।

सत्तर वर्ष के बूढ़े शिया काजी नूरुल्ला शुश्तारी को मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने छोड़ा नहीं था। इतिहास में हिंसा कभी भी अहिंसा से नहीं रुकी है। रमजान के सत्रहवें दिन शुरू हुआ बंगाल का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ गाँधी के ‘वो बलात्कार करते हैं तो करवा लो’ कहने से नहीं रुका था।

फिर हिंसा रूकती कैसे है? हिंसा को जब वापस उससे प्रबल प्रतिहिंसा का सामना करना पड़ता है, तभी उस पर असर होता है। हिटलर को गुलाब नहीं भेजे गए थे, उसकी फौजें साफ़ कर दी गई थीं। इजरायल मुफ्त में नहीं मिला था, भारतीय घुड़सवारों ने जब हाइफा की जंग में ओटोमन सल्तनत को धूल चटा दी, तब यहूदियों को अपना देश बनाने की जगह मिली थी।

सद्दाम हुसैन को ‘गेट वेल सून’ के सन्देश नहीं भेजे गए थे, उसे घसीटते हुए लाकर मौत दी गई थी। ओसामा बिन लादेन को प्रेम और भाईचारे का सबक नहीं पढ़ाया गया था, उसके बिल में घुसकर उसे मारना पड़ा था। गद्दाफी का समूल विनाश करने के अलावा विकल्प क्या था?

बाकी समझना हो तो समझिए, जब आदमी गायब हो और उसके मोबाइल फोन, घड़ी वगैरह के साथ घर पर सफ़ेद साड़ी पहुँचे तो सन्देश समझ में आएगा। नहीं, दूसरे तरीके इस्तेमाल करने हों, तो बंगाल में कम्युनिस्टों से जो टीएमसी ने सीखा है, वो जारी रहेगा।



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