बंगाल में हिंसा की दहकती आग के बीच अहिंसा की खेती

05 मई, 2021 By: संजय राजपूत
बंगाल हिंसा पर अहिंसा का रास्ता कितना कारगर है?

बचपन के दिनों में मुझे मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्मों का बहुत शौक़ चढ़ा हुआ था। अपनी ओवर एक्टिंग की वजह से उन्हें मिडिल क्लास में थर्ड क्लास हीरो माना जाता था। वो साइकिल के पीछे छुप कर बच जाते थे, वो गोलियों को हाथ से रोक लेते थे। वो हवा में उछल जाते थे और बीस गुंडों को लात मारने के बाद ही वापस हवा से जमीन में पैर रखते थे।

मिथुन ऐसे ही फिल्मी स्टंट के साथ रिक्शा वालों, फेरी वालों और लेबर क्लास के लोगों के लिए असली ‘हीरो’ बन गए थे। लोग उनमें नायक ढूँढते थे, एक रक्षक! बच्चों के लिए तो वो सुपर हीरो थे। उनकी सुपर हीरो की ये छवि सिनेमा ने बनाई थी और लोगों ने हमेशा उन्हें इसी रूप में देखा। लेकिन सिनेमा की बनाई छवि और वास्तविकता में फर्क होता है, ये एक उम्र के बाद ही समझ में आता है।

बंगाल में भाजपा समर्थकों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद वहाँ आज लोकतंत्र जिस जगह आकर खड़ा है, उसके बावजूद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में जो सन्नाटा पसरा है, उस से आम लोगों के मन में भाजपा को लेकर बनी ‘रक्षक’ वाली फ़िल्मी छवि टूटनी शुरू हो गई है।

हालाँकि, भाजपा की ये छवि भाजपा से ज्यादा विपक्ष ने बनाई है। विपक्ष का जोर हमेशा से ये साबित करने में रहा है कि भाजपा हिंदुओं की पार्टी है और भाजपा गोडसे की राह पर चलने वाला साम्प्रदायिक लोगों का एक राजनीतिक दल है, जो हिंसा में यकीन रखता है। जबकि वास्तविकता ये है कि हिंसा कम्युनिस्ट चरित्र है और भाजपा का मिजाज फिलहाल कॉन्ग्रेसी ही है।

भाजपा नेहरूवियन मॉडल से ग्रसित है; जातिय और धार्मिक शोषण शून्य हो मगर जाति औऱ धर्म शीर्ष पर बना रहता ही है। हुतात्मा गोडसे अमर रहे, मगर अपने समर्थकों की राजनैतिक हत्या का विरोध ऐसे किया जाए कि गाँधी के आदर्शों को भी आँच न आए।

इसके विपरीत, विरोधियों ने हमेशा गोडसे को सही साबित किया है और गाँधी को गलत। स्पष्ट शब्दों में कहूँ तो बंगाल में आज जो हालात है उनमें भाजपा एक ‘पेंडुलम पार्टी’ साबित हो रही है। पेंडुलम पार्टियों के समर्थक अतीत में भी पिटते रहे हैं, आज भी पिट रहे हैं और आगे भी पिटते रहेंगे।

भाजपा के साथ समस्या यह है कि सत्ता हाथ लगते ही ये अवकाश लेकर मरीज की भाँती बिस्तर पर लेट जाती है। इस बीच सत्ता हाथ से निकल जाती है और फिर ये पार्टी वापस सत्ता में आते ही विरोधियों को सबक सिखाने की बात करने लगती है। सत्ता की हनक क्या होती है ये जानते ही नहीं हैं।

चुनाव से पहले इतने कार्यकर्ता मारे गए पर केंद्र में बैठी भाजपा ने लाश गिना के प्रचार करने के अलावा कुछ नही किया। अब जब वहाँ राजनीतिक गुंडों द्वारा भाजपा समर्थकों के साथ हिंसा, आगजनी लूट बलात्कार की घटनाएँ अखबारों की सुर्खियाँ बन गई हैं तो लोक-लाज औऱ आलोचना के भय से ही सही, शीर्ष नेतृत्व नींद से जागा है।

अब वक्त बदल चुका है। नया सवेरा होने वाला है। बंगाल में जान गँवाते अपने समर्थकों को बचाने के लिए भाजपा धरना दे रही है। शास्त्रों में इसे ही चरस के खेतों के बीच धान बोना कहा गया है।



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