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दुःख बुढ़िया के मरने का नहीं है, दुःख इसका है कि मौत ने घर देख लिया

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2 दशकों में ही इस पार्टी की जड़ें इतनी दुर्बल हो गई हैं कि आज संसद में पूर्ण बहुमत के बाद भी अपने ही देश के कुछ उपद्रवियों से घबराकर सरकार के पैर और हाथ तो क्या नींव तक कँप-कँपा गई है।

व्यंग्य: एक प्रचंड संघी पर क्या बीती जब मोदी सरकार ने लिए कृषि कानून वापस

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जिस तरह से 'एलके आडवाणी जी' जिन्ना की मजार पर जाने के बाद 'मार्गदर्शक आडवाणी जी' बनकर रह गए, कहीं मोदी जी के राजनीतिक जीवन में ये वैसा ही कोई प्रकरण न बन जाए।