मोपला विद्रोह: आजादी के नायकों की सूची से हटेंगे हिंदुओं के हत्यारों के नाम, 'वामी-इस्लामियों' में डर का माहौल

24 अगस्त, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
वर्ष 1921 में कई माह तक हिन्दुओं का नरसंहार किया गया था

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ‘शहीदों’ की लिस्ट से मालाबार विद्रोह (Malabar Rebellion) के नेताओं वरियामकुनाथ कुन्हमेद हाजी, अली मुसलियार और अन्य मोपला विद्रोहियों के नाम हटाने के प्रस्ताव पर मुस्लिम संगठन और ‘बुद्धिजीवी’ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।

बता दें कि ‘भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद’ (Indian Council of Historical Research- ICHR) द्वारा नियुक्त एक उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट में मालाबार विद्रोह को खिलाफत का आंदोलन और हिन्दू-विरोधी हिंसक आंदोलन बताते हुए 387 नामों को स्वतन्त्रता सेनानियों की लिस्ट हटाने की सिफारिश की है।

दरअसल वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री द्वारा ‘शहीदों की सूची’ से संबंधित एक पुस्तक ‘शहीदों का शब्दकोष: भारत का स्वतंत्रता संग्राम वर्ष 1857-1947’ को जारी किया गया था। इस सूची में मोपला विद्रोह में शामिल नेताओं को भी स्वतंत्रता सेनानियों की ‘शहीद सूची’ में शामिल किया गया था, जिसका लगातार विरोध हो रहा था।

संघ परिवार’ सहित अनेक हिंदूवादी नेता मोपला विद्रोहियों को ‘शहीद सूची’ में शामिल करने के सरकार के इस निर्णय से नाराज थे। उनका मानना है कि मोपला विद्रोह में शामिल नेताओं ने न केवल सैकड़ों हिंदुओं का नरसंहार किया बल्कि अनेक हिंदुओं को इस्लाम धर्मं अपनाने को मज़बूर किया गया। विरोध के बाद से सूची वेबसाइट से हटा ली गई थी।

मुस्लिम मंचों ने नाम हटाने पर जताई नाराजगी

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के राज्य महासचिव पी अब्दुल हमीद ने इस कदम को राष्ट्रविरोधी करार दिया। वहीं, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने कहा है कि स्वतंत्रता संग्राम के शहीद लोगों के दिलों में रहेंगे, रिकॉर्ड में रहे या न रहें।

IUML के राष्ट्रीय महासचिव और विधायक पीके कुन्हालीकुट्टी ने कहा, “भारत को आजादी मिलने के बाद के वर्षों तक इतिहास के के बारे में किसी को कोई संदेह नहीं था, लेकिन अब बीजेपी और केंद्र को अब कई बातों पर संदेह है। वे अपने सांप्रदायिक अजेंडे में अंधे हो चुके हैं। दुनिया उनसे सहमत नहीं होगी, भारत की तो बात ही छोड़िए।”

IUML के जिलाध्यक्ष सैयद सादिकली शिहाब थंगल ने कहा कि जमीन के लिए लड़ने वालों का कृतज्ञ नहीं होना चाहिए, आपको उनका आभारी होने की भी ज़रूरत नहीं है, लेकिन आपको इतना कृतघ्न भी नहीं होना चाहिए। इतिहास से बेईमानी से निपटने की कोशिश करके, आप अगली पीढ़ी के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रहे हैं।”

केरल मुस्लिम जमात के राज्य महासचिव सैयद इब्राहिम खलील बुखारी ने भी इस कदम की निंदा की। उन्होंने कहा, “अंग्रेजों से लड़ने वालों के नाम हटाना स्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ी शर्म की बात होगी। यह इतिहास के साथ क्रूरता है और देशभक्त इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।”

इतिहासकार एमजीएस नारायणन इस निर्णय को सही नहीं मानते लेकिन वो ये भी मानते हैं कि कुन्हमेद हाजी को स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना जा सकता। वह कहते हैं, “हाजी स्वतंत्रता में रुचि रखते थे, लेकिन उनका कद और कार्य इतने बड़े नहीं थे कि उन्हें स्वतन्त्रता सेनानियों की लिस्ट में रखा जाए।

जानिए क्या कहती है ICHR की रिपोर्ट

ICHR की उपसमिति द्वारा सौपीं गई रिपोर्ट में ‘मालाबार विद्रोह’ (मोपला विद्रोह) के नेताओं के नाम ‘शहीदों की सूची’ से हटाने की सिफारिश की गई थी। ICHR की यह रिपोर्ट, दक्षिण भारत से स्वतंत्रता संग्राम के शामिल उन नेता की समीक्षा से सम्बंधित थी जिनको ‘शहीद’ के रूप में स्वतंत्रता सेनानियों की लिस्ट में शामिल किया गया है।

रिपोर्ट में अली मुसलीयर, वरियामकुननाथ कुंजाहम्मद हाजी सहित 387 मोपला विद्रोहियों तथा ‘वैगन त्रासदी’ में शहीद नेताओं के नाम ‘स्वतन्त्रता शहीदों की सूची’ से हटाने की माँग की गई थी। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि वर्ष 2021 को मोपला विद्रोह की 100वीं वर्षगांठ के रूप में चिन्हित किया गया है।

वैगन ट्रैजडी (Wagon Tragedy) पर क्या कहती है रिपोर्ट

‘वैगन ट्रेजडी’ ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों के खिलाफ अपनाई गई दमनकारी घटनाओं में से एक प्रमुख घटना थी। वैगन त्रासदी में लगभग 60 मोपला कैदियों को एक बंद रेल के मालवाहक वैगन में मौत के घाट उतार दिया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार ‘वैगन ट्रैजडी’ में जिनकी मृत्यु हुई वे भारत के स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, क्योंकि इन विद्रोहियों ने कभी भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम या असहयोग आंदोलन का पूर्ण समर्थन नहीं किया गया था।

इन विद्रोहियों ने सिर्फ खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया था। रिपोर्ट के अनुसार, अंग्रेजों ने जाँच के बाद ही इन विद्रोहियों को दोषी ठहराया तथा इन मृतकों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता नहीं दी गई थी।

मोपला या मालाबार विद्रोह पर क्या कहती है रिपोर्ट

मोपला केरल के मालाबार तट के मुस्लिम किसान थे, जहाँ ज्यादातर जमींदार हिन्दू थे, जिन्हें क्षेत्रीय भाषा में ‘जेनमी’ कहा जाता था। मोपला विद्रोह प्रारंभ में इन्ही जमीदारों के खिलाफ शुरू हुआ वर्ग संघर्ष था, लेकिन बाद में उसने सांप्रदायिक रूप ले लिया।

मोपला (मुस्लिम किसान) और ‘जेनमी’ (हिंदू जमीदार), दोनों ही समूह अपने पक्ष में लोगों को शामिल करने के लिये अपने धर्मों का हवाला देने लगे।

विद्रोह के दौरान मोपलाओं (मुस्लिम किसानों) ने जेनेमी (हिन्दू जमींदारों) के घरों को लूटना और आग लगाना शुरू किया, लेकिन इस दौरान अनेक हिन्दू धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया जिसके बाद विद्रोह ने धार्मिक रूप ले लिया। बाद में महात्मा गाँधी के आह्वान पर मालाबार में मोपलाओं के धार्मिक नेताओं ने एक ‘खिलाफत समिति’ का गठन किया।

‘खिलाफत आंदोलन’ में किसानों की माँग का समर्थन किया गया, बदले में किसानों ने भी खिलाफत आंदोलन में अपनी पूरी शक्ति के साथ भाग लिया। ‘भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस’ (INC) द्वारा मोपला विद्रोह का समर्थन किया गया। मोपला विद्रोह के हिंदुओं के खिलाफ हिंसक रूप लेने के साथ ही कई राष्ट्रवादी नेता आंदोलन से अलग हो गए तथा शीघ्र ही आंदोलन समाप्त हो गया।

रिपोर्ट में वरियामकुननाथ कुंजाहम्मद हाजी को बताया गया हिंसक हत्यारा

हिंदुओं का नरसंहार करने वाले खिलाफत आंदोलन के नेताओं को भारतीय राष्ट्रीय काॅन्ग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता के रूप में पेश किया, इनमें ही एक नाम कुंजाहम्मद हाजी का था।

हाजी ने कालीकट तथा दक्षिण मालाबार में खिलाफत आंदोलन का नेतृत्त्व किया था। ICHR रिपोर्ट में हाजी को ‘कुख्यात मोपला विद्रोही नेता’ और ‘कट्टर अपराधी’ के रूप में चिह्नित किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, हाजी ने वर्ष 1921 के मोपला विद्रोह के दौरान असंख्य हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला और उनके शवों को एक कुएँ में जमा कर दिया था। मोपला विद्रोह के अंतिम चरण में हाजी को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर 20 जनवरी, 1922 को गोली मारकर हत्या कर दी गई।



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