इस्लाम में निकाह सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट है, हिन्दू विवाह जैसा संस्कार नहीं: कर्नाटक HC

21 अक्टूबर, 2021 By: डू पॉलिटिक्स स्टाफ़
कर्नाटक कोर्ट ने मुस्लिम विवाह को बताया 'एग्रीमेंट'

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मुस्लिम विवाह एक ‘अनुबंध (कॉन्ट्रेक्ट) की तरह है, यह हिंदू विवाह की तरह एक संस्कार नहीं है।’ न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि तलाक द्वारा समाप्त किया गया ऐसा विवाह पूरी तरह से सभी दायित्वों को समाप्त नहीं कर देता है। 

न्यायालय की एक बेंच ने 7 अक्टूबर, 2021 को बेंगलुरु में एजाजुर रहमान (52) द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एक आदेश में यह टिप्पणी की। रहमान 12 अगस्त, 2011 के एक पुराने मामले पर फैमिली कोर्ट द्वारा पहले न्यायाधीश द्वारा पारित एक आदेश को रद्द करने की माँग कर रहे थे। 

रहमान ने अपनी शादी के महीनों बाद 25 नवंबर, 1991 को 5,000 रुपए की ‘मेहर’ से तलाक लेकर अपनी पत्नी सायरा बानो को तलाक दे दिया था। तलाक के बाद रहमान ने पुनः शादी की और उनकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। बानो ने 24 अगस्त, 2002 को भरण-पोषण के लिए पैसों की माँग करते हुए मामला दर्ज किया था।

एजाजुर रहमान की याचिका खारिज

इस पर एजाजुर रहमान की याचिका को न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने खारिज कर दिया, उन्होंने कहा:

“विवाह एक अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट की तरह है, यह हिंदू विवाह के विपरीत एक संस्कार नहीं है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि एक मुस्लिम पूर्व पत्नी को कुछ शर्तों को पूरा करने के अधीन भरण-पोषण का अधिकार है, यह तो निर्विवाद है। कुरान में ‘सूरह अल बकरा’ अनुच्छेदों का हवाला देते हुए, न्यायमूर्ति दीक्षित ने कहा कि एक अच्छा मुस्लिम अपनी बेसहारा पूर्व पत्नी को निर्वाह प्रदान करने के लिए एक नैतिक और मज़हबी कर्तव्य का पालन करता है।

उन्होंने कहा:

“आमतौर पर पूर्व पत्नी का भरण-पोषण का अधिकार ‘इद्दत’ से आगे नहीं बढ़ता है। मुझे यह जोड़ना चाहिए कि इस्लामी न्यायशास्त्र ने इसे कभी भी नियम के रूप में नहीं माना है, हालाँकि कुछ न्यायिक राय भिन्न भी हैं। यह मानदंड इस शर्त के अधीन होना चाहिए कि पूर्व पत्नी को भुगतान की गई राशि, योग्य राशि हो, अपर्याप्त नहीं।”

याचिका निरस्त करते हुए जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित ने उस पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। जस्टिस दीक्षित ने कुरान के हवाले से कहा कि अपनी बेसहारा पूर्व पत्नी को मदद करना एक पवित्र मुसलमान के लिए उसका नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस्लामी धार्मिक नियम में मेहर की रकम भी अक्सर भ्रामक और नाकाफी आँकड़ा होती है। इसे अक्सर कम रखा जाता है।



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