राइट विंग के 'अपने' लोगों से सीधी बातचीत: कायरों वाला आचरण त्यागो

08 जून, 2021 By: अजीत भारती
स्वामी यति नरसिंहानन्द सरस्वती

वामपंथियों ने एक अच्छा सिस्टम बनाया हुआ है कथित दक्षिणपंथियों के लिए। इस सिस्टम में, वामपंथी स्वयं हिन्दुओं के भगवानों को बलात्कारी, नारीविरोधी कहता है; देवियों को वेश्या कहता है; पूरे सनातन समाज को गाय, गोबर और गोमूत्र के नाम पर तिरस्कृत करता है; मंदिरों को बलात्कार का अड्डा बताता है; चूड़ियों, मंगलसूत्र और सिंदूर के नाम पर हमारी स्त्रियों का अपमान करता है; हमारे धर्म को आतंक से जोड़ कर ‘भगवा आतंक’ जैसे शब्दों का सृजन करता है; हमारी बच्चियों के लव जिहाद में होने वाले बलात्कार और हत्याओं को प्रेम के नाम पर छुपाता है; हमारे दलितों को जातिसूचक गालियों से अपमानित करता रहता; हमारी मूर्तियों के विसर्जन पर हमले करवाता है; हमारे धार्मिक जुलूसों पर पत्थरबाजी करवाता है… और फिर भी बच कर निकल जाता है। यह सिस्टम उन्हें हमेशा वैचारिक और धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर नैरेटिव बना कर बचा लेता है।

और यह नैरेटिव भी वही भावुक हिन्दू बनाता है जिसे लगता है कि दुनिया गुलाबी कमरों में गुलमोहर के पुष्पों को ताकने के लिए बनी है, और वो उसी दुनिया में रहता है। यह भावुक हिन्दू तब उद्वेलित हो उठता है जब आप आतंकी का मजहब बता देंगे। इतना बचाव तो उनके अपने भी नहीं करते जितना ये भावुक हिन्दू ब्रीड करने लगता है। इनके तर्क के हिसाब से कोई आसिफ किसी महंत को मारने की योजना के एक हिस्से के रूप में मंदिर के भीतर जायजा लेने पहुँचता है, और पानी पीने का तर्क देता है, तो जज्बाती हिन्दू मंदिर, महंत, हत्या सब भूल कर ये कहने लगता है कि ‘यार बच्चे को मारना नहीं चाहिए था’। सड़कछाप भाषा में कहूँ तो ये विशुद्ध चूतियाप की श्रेणी में आता है, और उसे वही कहना भी चाहिए। हमारे अपने ही ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करते हैं क्योंकि उनको ‘कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद’ वाला ‘मोरा पिया’ इन्हीं वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों में दिखता है। मुझे ये समझ में नहीं आता कि क्या फेटिश है इन आतंकियों को ले कर हम हिन्दुओं में कि हम सब कुछ भूल कर अचानक भावुक हो कर उनके नैरेटिव में घुस जाते हैं?

उनका नैरेटिव इतना मजबूत है कि कुल मिला कर उनके द्वारा कही गई हर बात सत्य हो जाती है, लेकिन ज्योंहि आपने सात साल के आयशा की बात कह दी, सैंतालीस साल के बलात्कारी इलियास की बात कह दी, उनके चार बीवियों की बात कर दी, निकाह हलाला की बात कह दी, बाबर के आतंकी होने की बात कह दी, मजहबी स्थलों में अनवरत हो रहे बलात्कारों की बात कह दी, हर आतंकी के एक ही रेगिस्तानी मजहब से पनपने की बात कह दी, किताब में काफिरों के हत्या की योजनाओं को सामने ले आए, आपने अपने ही इतिहास के पाठ्यपुस्तकों में छुपे दोगलेपन पर कुछ लिख दिया, लव जिहाद पर स्वर तीव्र किए, तो आप मानवता के दुश्मन कह दिए जाएँगे। आपके हर चुटकुले पर आपसे माफी मँगवा ली जाएगी, जबकि वही व्यक्ति आपके देवताओं का उपहास करता रहेगा, आपको गौमूत्र पीने वाला कहता रहेगा और आप रोते रहेंगे।

आज-कल मैंने देखा है कि अपने ही लोग, जो स्वयं को सनातनी योद्धा मानते हैं, वो जुबैर जैसे लम्पटों के साथ हो कर उन लोगों पर ज्ञानवृष्टि कर रहे हैं जो मुखर हो कर जुबैर के चाचा-फूफा और बापों से ले कर वो जिसे सबसे ऊपर मानता है, उसको भी धोता रहता है। ट्विटर के स्पेस में वार्ता का आयोजन करते हुए गिद्धों की तरह, एक राजनैतिक विचारधारा से प्रेरित हो कर अपने विचारों को यति नरसिंहानंद जैसे लोगों पर थोपने का कार्य हो रहा है। ऐसे दिखाया जा रहा है मानो हिन्दुओं का सबसे बड़ा दुश्मन वही है जो सबसे ज्यादा सटीक भाषा का प्रयोग करता है।

हम अचानक से अपने आप को ऐसे देखने लगते हैं जैसे कि हम वेदव्यास हों और गणेश जी से महाभारत लिखवानी है, तो वहाँ सिर्फ संस्कृत में सुभाषित ही बोले जाएँ! हम स्वयं लाख अमर्यादित रहें, लेकिन हमें वो भगवा पहना आदमी तो वेद की ऋचाएँ सुनाता दिखना चाहिए। क्या ऐसा है कि वेद और पुराणों के अध्येता कम हो गए हैं देश में? क्या कहीं से आकाशवाणी हुई कि नरसिंहानंद ने भगवा वस्त्र धारण कर लिया है तो वो अब दिन भर ‘अयं निजः परवैति गणनालघुचेतशाम्’ करता फिरेगा? क्या हमारे ऋषियों ने शस्त्रशिक्षा नहीं दी है? क्या हमने धर्मयुद्धों में छल का सहारा नहीं लिया है?

फिर ये बकैती क्या चल रही है कि वो तो भगवा वस्त्र पहन कर गाली दे रहा है? हाँ, दे रहा है गाली, इसमें समस्या क्या है? तुमने अपने जीवन में गाली नहीं दी कभी? तुम्हें क्रोध नहीं आया? या सारे सदाचरण हमें एक भगवाधारी में ही चाहिए, भले ही हम स्वयं नीचता के लिजलिजे घोल में नहाए हुए हों? एक व्यक्ति जो तुम्हारे मनोभावों को खुल्लमखुल्ला, अपने जान पर खेल कर, हर दिन मौत के खतरों से खेलता हुआ, माइक पर सामने आ कर बोलता है, because you are fucking too weak and meek to utter those words, तब तुम्हें आदर्श बालक वाला चार्ट याद आने लगता है कि ब्रह्म मुहूर्त में जगना चाहिए, माता-पिता के पाँव छूने चाहिए, वाणी को मीठा रखना चाहिए…

ये क्या कवि सम्मेलन चल रहा है या फिर कालिदास के मेघदूतम् का मंचन हो रहा है? तुम्हें यह नहीं पता कि हम कहाँ खड़े हैं? तुम्हें यह नहीं पता कि असलम और अहमद अपने घरों की छतों पर पत्थर इकट्ठा कर रहे हैं और उनकी आठ बीवियाँ बारूद को गुल के डिब्बे में रख कर, उनमें कील भर कर, सुतलियों से बाँध कर कोने में समेट रही है? तुम्हें यह नहीं पता कि सलमा अपने भाई द्वारा लाई गई उस हिन्दू दुल्हन को यह समझाती है कि वो उसके बड़े भाई, उसके अपने पति, उसके बाप और भाई के दोस्तों के साथ भी सोए? ऐसा नहीं करने पर उसकी लाश सूटकेस में तैरती मिलती है। कहाँ सो रहे हो तुम? लव जिहाद की हजार घटनाएँ तुम्हारे सामने हैं, जहाँ हिन्दू बच्चियों को धोखे में रख कर फँसाया गया, उनका बलात्कार हुआ, उन्हें गर्भवती बना कर छोड़ दिया गया, उनके साथ ऐसा करना हिन्दुओं को नीचा दिखाने का एक आजमाया हुआ तरीका है। और तुम्हें पड़ी है कि वो रामदेव बाबा जो हैं, वो तो धंधा कर रहे हैं, और ये जो स्वामी जी हैं, वीडियो में गाली देते हैं!

हम रोते हैं कि यार हमारी विरासत के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही। हम बिलखते हैं कि देखो आयुर्वेद को कैसे दकियानूसी और अवैज्ञानिक कह दिया गया। और हमें इस बात से समस्या हो जाती है कि रामदेव को IMA चीफ ऑस्टिन जयालाल के साथ ऐसे नहीं पेश आना चाहिए था। वो अस्पतालों को ईसाई कन्वर्जन का सेंटर बनाना चाहता है, वो आयुर्वेद को नीचा दिखाता है, और तुम्हें चाहिए कि बाबा ने तो ऐसा बोल दिया, मेरा सारा समर्थन और सम्मान वो खो चुके हैं। मैं तो बड़ा सम्मान करता था।

तुमसे किसने समर्थन माँगा था? यति नरसिंहानंद के लिए दो ट्वीट कर के तुमने सम्मान और समर्थन दे दिया? उन्होंने तुम्हें बुलाया था? गिड़गिड़ाए क्या तुम्हारे सामने? तुम्हारा समर्थन दो ट्वीट का, और तुम्हारी उम्मीद इतनी ज्यादा कि वो व्यक्ति अपना पूरा आचरण तुम्हारे हिसाब का बना कर डासना में भजन-कीर्तन करने लगे? भजन-कीर्तन वाले कम हैं क्या! एकाध बाबा को तो वो बोलने दो जो तुमसे नहीं बोला जाता। एकाध व्यक्ति को तो खुला समर्थन दो कि आप जो भी कहें सब सही है। तुमसे वो संभव नहीं है इसलिए तुम्हें कोई भी गौमूत्र पीने वाला कह कर चला जाता है और तुम दाँत निपोड़ कर ये कहते हो कि ‘अरे कहने दो, कहने से क्या होता है’।

कहने से यह होता है कि वो बातों सामान्य हो जाती हैं। कहने से ही यह संभव हुआ है कि आज कहीं भी बम फटता है तो हमें पता होता है किस मजहब के नुमाइंदे ने ऐसा किया होगा। यही है शक्ति नैरेटिव की। वो अपने आतंकियों को भी बचाते हैं, उसे ऐसा दिखाते हैं कि वो तो अच्छा खासा हेडमास्टर का बेटा था, गलती तो तुम्हारी थी कि तुमने एक दिन उसे डाँट दिया तो फिर उसका दिमाग खराब हो गया। वो यह जताते हैं कि आदिल अहमद डार तो क्यूट सा बालक था, उसे आर्मी के कर्नल ने उठक-बैठक करवा दी तो उसने आतंकवादी बनने की ठान ली। उनके पास ऐसी ही मानवता से ओत-प्रोत कहानियाँ हैं जहाँ आतंकवादी बनने और दसियों की जान लेने वाले हत्यारे को भी हत्यारा बनाने वाला कोई हिन्दू ही होता है। और तुम क्या करते हो, तुम उन कहानियों पर विश्वास कर के भावुक होने लगते हो कि ‘यार सात साल के आसिफ को मारना नहीं चाहिए था।’

ये बच्चे नहीं हैं। ये कल के आतंकी हैं। यह बात यति नरसिंहानंद जानते हैं। उन्होंने यह झेला है। इसलिए उनकी भाषा इतनी कड़वी और असामाजिक है। तुमने कितना सहयोग दिया है कि आज तुम छंद और अलंकारों की बात कर रहे हो? कितने करोड़ पहुँचा दिए स्वामी जी के मंदिर में? पूरा जीवन तुम्हारा इस लोभ में बीता है कि एक फोटो फलाने जी के साथ हो जाती तो प्रोफाइल पिक्चर बना लेता, और तुम बात कर रहे हों हिन्दुओं के साथ खड़े होने की? हाथ निकालो, हथेली पर थूको, और नाक डुबा कर साँस रुकने से मर जाओ पापी आदमी। तुम हिंदू हितों पर ज्ञान मत दो।

हम यहाँ चारों तरफ से हो रहे वैचारिक और सामरिक हमलों को बीच में खड़े हैं और हमे याद आ रही है कि यार उसकी भाषा सही नहीं है। काहे? किताब लिखवानी है या कविता पाठ पर बुला रहे हो स्वामी जी को? कविता का शौक है तो पढ़ो जा कर, योद्धाओं से कहा जा रहा है कि आप तलवार ले कर क्यों घूमते हैं, किसी को लग जाएगी। हद चूतियापा चल रहा है इधर! बोली इतनी तीक्ष्ण करो कि जिस पर निशाना हो वो कट जाए। यहाँ कॉलेज के लॉन में प्रेमिका को गोद में लिए चाँद तोड़ने की बात नहीं हो रही है। यहाँ हम अपने हिन्दू भाइयों, बहनों, पिताओं और माताओं की लाशों से पटी रक्तरंजित भूमि पर खड़े हैं और शवों का अनवरत गिरना जारी है। यहाँ मैं तलवार उठाऊँ या ‘ललितलवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे, मधुकर निकर करंबित कोकिल कूँजत कुंज कुटीरे’ कहता फिरूँ?

हमारा राइट विंग चाहता है कि हमें अपने शब्दों पर नियंत्रण रखना चाहिए वरना ‘वो’ लोग क्या कहेंगे? काहे? हमने ठेका ले रखा है क्या मर्यादित होने का? हमारी बहनों का बलात्कार हो रहा है और आपको इस बात पर शर्म आ जाती है कि किसी वामपंथी या पंचरपुत्र जुबैर ने आपको एक वीडियो दिखा दिया कि ‘देखो-देखो! राइट विंग वाले जिसको समर्थन देते हैं, वो तो गाली दे रहा है’। हाँ देंगे गाली, इतना देंगे कि तुम्हारे कान से खून निकल जाए। क्यों नहीं देंगे? काम ही ऐसा कर रहे हो कि बिना दिए रह जाना, भीरुता है। वो घरों में बम बना रहे हैं, और हम गाली भी न दें?

वो यही दिखा कर, आपको नैतिकता की याद दिला कर, अपराध बोध की यात्रा पर निकाल देता है, और आप शर्म के मारे, अपने ट्वीट डिलीट करने लगते हैं, या डिस्क्लेमर देने लगते हैं कि भाई हमसे गलती हो गई कि हमने फलाने स्वामी को अपना समर्थन दिया था। उन्होंने तुम्हारे लोगों की हत्या की, बलात्कार किया, उस पर हँसे कि देखो हिन्दू ‘लव जिहाद’ कह रहा है, तब जिसने इसके विरोध में आवाज उठाई, उसी को तुम यह कह कर समर्थन नहीं देने का ढिंढोरा पीट रहे हो कि ये तो गाली देता है। यह तय करो कि बहन का बलात्कार करने वाला अपराधी है, या गाली देने वाला। बहुत सारे संशय मिट जाएँगे। नहीं मिट रहे हैं तो ‘सुमिरैं हनुमत बलवीरा’ करो, बकलोली मत करो ट्विटर पर।

इन राइट विंग के पुरोधाओं और प्राचीन ट्विटरिया योद्धाओं की इतनी फटती है वामपंथियों से जैसे कि इनकी बहनों से उनका विवाह होने वाला है, और उनके खिलाफ बोल देंगे तो विवाह न हो पाएगा। वामपंथियों को अपना बहनोई बनाना है तो खुल कर बनाओ। लेकिन याद रखना, ये तब भी तुम्हें गरियाएँगे और कहेंगे कि साले-बहनोई में तो इतना चलता है। और तुम्हारी रीढ़ की हड्डी इतनी लचर है कि तुम कहोगे ‘जी जीजाजी! आपका तो बनता है मुझे बहन की गाली देना, लेकिन आपको कोई गाली दे दे, तब मैं उसे छोड़ूँगा नहीं क्योंकि आप तो परिवार के लोग हैं।’ बिलकुल यही एटिट्यूड है हमारे इन तथाकथित ओपिनियन मेकर्स का जिन्होंने नैरेटिव बनाने की फैक्ट्री का पासवर्ड अपने पास रखा हुआ है, बाकी बनाते हैं तो कहने लगते हैं कि ये तो चायनीज माल है, असली मुर्गा छाप पटाखा हमारा है, होलोग्राम देख लीजिए।

ये लोग हमें बताएँगे कि हम अपनी लड़ाई कैसे लड़ें? अब मोहम्मदवादी और वामपंथी यह तय करेंगे कि हम आतंकियों को, हिन्दूफोबिक गिरोह को, सनातन के शत्रुओं को कैसे देखें, और उनसे लड़ने का तरीका क्या होगा? ये हमें बताएँगे कि हमारे भाषा की मर्यादा क्या होनी चाहिए? स्वयं को सुनिए कभी कि आपके जैसे 31 करोड़ लोगों द्वारा चुने जाने वाली पार्टी और प्रधानमंत्रीको फासीवादी, हत्यारा, देशद्रोही, गद्दार समेत कितने विशेषणों से संबोधित किया जाता है। आप चुनी सरकार को फासीवादी, हत्यारा, तानाशाह कह देते हैं, और सामने वाला उसे ‘साला’ भी कह दे तो दिक़्क़त है कि आप तो गाली दे रहे हैं। कम से कम मुझमें यह ईमानदारी तो है कि मेरा क्रोध गाली के रूप में निकल रहा है, मैं किसी चुनी सरकार को फासीवादी और हत्यारा तो नहीं कह रहा? आप मुझे बताइए कि हत्यारा बड़ी गाली है, आपातकाल बड़ी गाली है, फासीवादी बड़ी गाली है या फिर ‘मादर-फादर’?

कथित राइट विंग जब तक मर्यादाओं और नैतिकता की चादर से बाहर निकल कर नहीं सोचेगा, वो अपने ही लोगों को नोचता रहेगा। वामपंथी और मोहम्मदवादी जब आपको वीडियो दिखा कर मोरल हाय ग्राउंड लें तो उन्हें कहिए कि हाँ, देंगे गाली और समर्थन भी करेंगे, तुम अपनी बहनों को मौलवियों से बचाओ जा कर, हम अपना देख लेंगे। साथ ही, दो-चार-दस गाली इन्हें भी दे दिया कीजिए। ऐसे लोगों को गाली देने में शर्म या लज्जा की कोई बात नहीं, कोई अगर गाली का पात्र है, और आप उसे गाली नहीं दे पा रहे हैं, तब आपका आचरण गलत है। ये युद्ध है, यहाँ हम विधर्मियों और आतंकी सोच वालों से घिरे हुए हैं, यहाँ क्यूट-क्यूट खेलने से नहीं होगा। आपके तेवर सदैव, बिना बात के भी आक्रामक होने चाहिए। वामपंथी-कट्टरपंथी लोगों को सुबह-शाम बिना बात के भी दो गाली दे दिया कीजिए। एकदम रैंडम, ताकि उन्हें पता चले कि हमारी दृष्टि में उनकी औकात क्या है।

पोलिटिकली करेक्ट होने का काम मोदी जी का है। उनको अपना काम करने दीजिए। उनको हमने इसीलिए चुना ही है कि वो सभ्य शब्दों में, बढ़िया बंडी पहन कर, नील-टीनोपाल वाला कुर्ता पहने हुए, फ्रेमलेस चश्मा में एकदम झकापक दिखते हुए हिन्दुओं के हितों के लिए बढ़िया-बढ़िया योजना बनाते रहें जैसे कि CAA है, 370 था, राममंदिर हुआ। इधर-उधर भडकेंगे तो उन्हें याद भी दिलाते रहेंगे। लेकिन हम नेता नहीं हैं। हमारे आम जीवन पर आतंकियों की छाप पड़ी हुई है, हमें रिफाइंड और सॉफिस्टिकेटेड शब्दों के साथ ‘मसले फूलों की महक में, तितलियों की क्यारियाँ’ करने को कहा जा रहा है। वो तो नहीं होगा। हर मर्यादा तोड़ी जाएगी, हर नैतिकता से ऊपर आना होगा, बिना किसी लज्जा के इनके नैरेटिव को तोड़ने का हर तरीका उठाना होगा।

राम का समय आदर्श था, दुश्मन भी आदर्श थे, युद्ध नियम से लड़े जाते थे। राम को यह पता था कि राजा का आचरण संदेह के दायरे से बाहर होना चाहिए, इसलिए वो सीता का त्याग कर देते हैं। वो अपने निजी संबंधों को, अपने पति और पिता होने को अपने राजा होने से हमेशा कम प्राथमिकता से देखते हैं। वो मर्यादा पुरुषोत्तम बनते हैं क्योंकि वो अफोर्ड कर सकते हैं, क्योंकि वो सतयुग है। कृष्ण ने अपने युग में पांडवों की दुर्दशा देखी, धृतराष्ट्र जैसे ज्ञानी को पतित होता देखा, भीष्म जैसे महारथी की विवशता देखी जो एक संदर्भहीन प्रतिज्ञा से बँधने के बहाने से स्वयं को ठगते रहे, और उन्होंने युद्ध में अभिमन्यु की हत्या देखी। वो तो नारायण थे, उन्हें तो सब दिखता था। उन्हें पता था कि अभिमनकी आयु क्या है, चाहते तो पूरा युद्ध ही रोक देते और अपने बंधु-बांधवों को बचा लेते।

उन्होंने युद्ध होने दिया, उन्होंने कौरवों के हर कर्म को फलित होने दिया। और युद्ध के टूटते नियमों का ही सहारा ले कर उन्होंने एक धर्मयुद्ध को अपने नियत परिणाम तक पहुँचाया। भगवान कृष्ण से तो मर्यादा के प्रश्न नहीं पूछे गए। जब भी सा संशय हुआ, जब बलराम ने युद्ध के अंतिम क्षणों में नैतिकता की पाठशाला लगाने की कोशिश की तो उन्हें याद दिलाया गया कि जब वो निर्णायक स्थिति में हो सकते थे, तो उन्होंने तटस्थ होना बेहतर समझा। लेकिन युद्ध के अंतिम समय में वो ज्ञान देने आ गए थे कि क्या उचित है, क्या अनुचित। भगवान ने अपने अग्रज तक का मान नहीं रखा क्योंकि उन्हें वह करना था जो उचित था, उन्हें धर्म की स्थापना करनी थी। उसके लिए माखनचोर, रणछोड़ जैसे विशेषणों को सुनते हुए, जयद्रथ वध हेतु सूर्य को सुदर्शन से ढकने से ले कर भीष्म वध के लिए शिखंडी को रथ पर चढ़ाने, युधिष्ठिर से ‘नरो वा कुंजरो वा’ कहलवाने, रथ के नीचे उतरे कर्ण पर अर्जुन से बाण चलवाने और अंत में दुर्योधन की जाँघ तोड़ने तक, कृष्ण से सब सुना-देखा।

सतयुग के बाद आने वाले हर युग में मानवता पतित होती चली जाती है। सतयुग में धर्म एक ऋषभ के समान है जो चार पैरों पर खड़ा था, त्रेता में वह तीन पैरों पर रहा, द्वापर में दो और कलियुग में एक पाँव पर। हमारी लड़ाई इसी एक पैर को बचाने की है। यह चला गया, तो सब चला जाएगा। इसीलिए, नियमों और नैतिकता की बात वहाँ मत कीजिए जहाँ कुछ भी निर्धारित नहीं। राइट विंग को यह समझना होगा कि हम कृष्ण से कई हजार साल आगे हैं। यहाँ नियम बने ही नहीं जिन्हें तोड़ा जा सके। इसलिए संभल जाइए, समय रहते। वरना आप भजन-कीर्तन करवाते रहेंगे और उधर आपके मठ तोड़े जाते रहेंगे।

हर व्यक्ति हथियार ले कर ही लड़ाई नहीं लड़ता। कुछ तो कीबोर्ड योद्धा भी होते हैं हमारे कथित राइट विंग की तरह। लेकिन, आप अपने धर्म की रक्षा हेतु लगातार अपने स्तर से प्रतिकार कीजिए। अपराध बोध में मत जाइए कि इसका बाबा तो गाली देता है, तुरंत पलट कर कहिए तेरा मौलवी रेप करता है छोटी बच्चियों का।



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